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समीक्षा

प्रार्थना के बाहर एवं अन्य कहानियां
(वाणी प्रकाशन)
---कलावंती




यह नैतिकताओं का संक्रांतिकाल है । गीताश्री की कहानी की नायिकाएँ इस बात को बखूबी सिद्ध करती हैं। वे तेज हैं, समझदार हैं ,पढ़ी लिखी हैं और बेहद संवेदनशील भी हैं। उनकी बोल्डनेस में भी एक मासूमियत है। वे बस उतनी ही शातिर हैं, जितने में अपनी मासूमियत की रक्षा कर सकें। वे बोल्ड हैं पर क्रूर नहीं हैं। सबसे बड़ी बात कि वे अपनी भावनाओं के प्रति ईमानदार हैं और बहुत साफ ढंग से सोचती हैं। गीताश्री ने अपनी भूमिका में ही लिखा है –"जो रचेगा, वही बचेगा। एक और जहां है उसी जहां की तलाश में मेरी आग चटक रही है। देर हो चुकी है ।जहां ढेर सारे मठ- महंत पहले से पालथी मारे बैठे हैं। वहाँ मैं अब बहुत देर से प्रवेश कर रही हूँ। इस रचनातमक यात्रा में क्या कभी देर हो सकती है।जब उठ चलो तब ही यात्रा शुरू हो गई ।"
वे लिखती हैं "मूल्यों के बीच पिसती हुई स्त्रियाँ खुद कहानी बनती जा रही हैं।मुक्ति के लिए छटपटाती हुई स्त्रियॉं का विलाप शायद मुझे ज्यादा साफ सुनाई देता है। वर्जनाओं के प्रति उनके नफरत का अहसास मुझे ज्यादा होता है।" गीताश्री ने स्त्री विमर्श के नाम पर सिर्फ स्त्रियॉं के गुण गायें हैं ऐसा नहीं हैं। उनकी कहानियों में कमजोर और मजबूत दोनों ही तरह के पुरुष और स्त्री  पात्र मिलते हैं जो आपकी चेतना पर बहुत सारे सवाल छोड़ जाते हैं।
"प्रार्थना के बाहर" संग्रह की पहली कहानी है। "बुरी लड़की को सब मिल गया , अच्छी ऐसे ही रह गई।" रचना को लगा जिंदगी उसके हाथ से फिसल गई है। यह अकेले रचना की छटपटाहट नहीं है ।बहुत सी रचनाएँ हैं पूरे हिंदुस्तान में। पर सोचिए संपन्नता के कितने भी ऊंचे पायदान पर पहुंचा आदमी देर सबेर खुद से मुखातिब होता ही है। बहुत आज़ाद समझे जाने वाले देशों में भी औरतें सुरक्षित नहीं  और औरतें सुरक्षित नहीं तो आपके बच्चे भी सुरक्षित  नहीं। क्या पुरुषों के बराबर बैठकर शराब पी लेने की आज़ादी ही स्त्री की वास्तविक आज़ादी है। गर्भपात अब वैधानिक है तो क्या मूँगफली खाने सा सुलभ हो। जीवन रचने की जो दुर्लभता स्त्री को मिली है वह पुरुष के पास कहाँ । इसलिए स्त्री के लिए शरीर मात्र आनंद की वस्तु हो भी नहीं सकती। प्रकृति ने माँ को बच्चे का सर्वाधिकार दिया है। बहुत झमेलों में उलझी जिंदगी में भी रचना ने चिड़िया सा मन बचाए रखा , क्या यह उसकी उपलब्धि नहीं ? किसी समारोह में पुरस्कार देते प्रार्थना ने क्या उस अजनमें बच्चे को नहीं याद किया होगा । किसी प्रकार का कोई अपराधबोध नहीं होना क्या रचना की उपलब्धि नहीं? आप जिन संस्कारों को छोडते हैं उसके बाद आप कितनी ग्लानि महसूस करते हैं या गौरान्वित होते हैं यह आप पर है।
एक अन्य  कहानी है – गोरिल्ला प्यार । अर्पिता, विशवास करती है और विशवास चाहती है । पर इंद्रजीत पुरुष है। उसे कमाने वाली , आत्मनिर्भर और बौद्धिक लड़की से प्रेम करने का शौक तो है पर बाहर जाती स्त्री के पल पल कि खबर भी उसे चाहिए। इधर अर्पिता बेहद स्वाभिमानी स्वावलंबी लड़की है। "अनुभूति को भी क्या कभी गिना जाता है ।क्या अश्रु और स्वेद की गणना मुमकिन है।" अर्पिता का कहना है कि "जिंदगी हमें  एक ही बार मिलती है। हम उसे दूसरों के हिसाब से जीने में खर्च कर देते हैं।... मेरे इस जीने के तरीके में स्पसटता रहेगी। " परंतु सहेली कि बात ही सच निकली "सोच लेना अर्पिता ... हर रिश्ता कुछ वक़्त के बाद एकनिषठता कि मांग करने लगता है।" अर्पिता का दिल यहाँ टूटा कि "नेह में पगी हुई देह वार दी ।वह बता नहीं पायी इंद्र को, कि कैसे उसने बॉस के प्रेम प्रस्ताव को खारिज करके हमेशा के लिए दफ्तर में अपने लिए एक शक्तिशाली दुश्मन पैदा कर लिया।" उसके बाद ऐसा सलूक। अर्पिता इंद्रजीत से आहत अपमानित होकर फेस्बूक पर मित्र तलाशती है। उसे लोगों का व्यवहार देखकर निराशा होती है ।"मछ्ली कि तरह फंसनेवाली औरत चाहिए …. शेरदिल औरत नहीं....."। इसी इमोशनल ट्रोमा में उस रात वह आकाश से गोरिल्ला प्यार कर बैठती है। सुबह जब इंद्रजीत का फोन आता है तब वह कहती है-" इट इज टू लेट इन्द्र।" अर्पिता क्या सिर्फ देह की प्यास में आकाश तक पहुँच गई या अपने को पूरी तरह टूटने से बचाने के लिए। पुरुष समाज को यह सोचना होगा।
"दो पन्ने वाली औरत" कैरिएर बनाने की होड में लगी औरतों की आपसी प्रतिस्पर्धा की कहानी है। आसावरी और रंजना दोनों अपने अपने तरीकों से संपादक को प्रभावित करने की चेष्टा में है। जब योग्यता देह है तो हर लड़की थोड़े दिन बाद अयोग्य हो जाएगी। सत्ता जिसके पास होगी ऐसी लड़कियां भी उसके पास होंगी ।क्या थोड़ी बड़ी गाड़ी, ज्यादा बड़ा मकान यही उपलब्धि है जीवन की । अपनी नज़रों में न गिरनेवाला कोई काम न करना क्या कोई उपलब्धि नहीं? आसावरी अपनी बौद्धिकता को, ज्ञान को मांजेगी। ऊपर उठेगी, यह आत्मविसवास उसमें क्यों नहीं दिखता ? बल्कि कभी रंजनाओं की कहानी भी लेखिका को  लिखनी चाहिए  कि वे बहुत सारे सम्बन्धों और समझौतों से गुजरने के बाद मिली उपलब्धियों के साथ अपने जीवन में कितनी मजबूत और संतुष्ट हैं? "मेरी प्रतिभा को रोज रोज परीक्षाओं से गुजरना होगा?" हर उस लड़की का द्वंद है जो खुद को बचाए भी रखना चाहती है। मूल्यों का महत्व है उसके लिए।
अपने परिवार से मिले संस्कारों से मिले को ना छोड़ पाने वाली लड़कियों की यह सोच बहुत स्वभाविक है।पर उन्हें यह भी समझना होगा की आखिर कितने समझौते करेंगें आप । सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। यदि इतने ओछे समझौते कर ही धन कमाना है तो फिर इतनी पढ़ाई लिखाई क्यों? शुरू  में समझौते कर आगे बढ़नेवाली लड़कियां थोड़े दिन बाद बाज़ार से बाहर हो जाती हैं। ज्ञान और मस्तिस्क को लगातार अपडेट करती स्त्रियाँ ही इस गलाकट प्रतियोगिता में स्वयं को टिकाये रख सकेंगी।
"दो लफ्जों कि एक कहानी" एक बेहद सुंदर प्रेम कहानी है। पूरी कहानी एक सुंदर सी लयबद्ध  कविता है। डेविड का स्वयं का चरित्र एक मजबूत पुरुष चरित्र है। वान्या और पैरीन दोनों ही उसे बहुत प्यार करती हैं। प्रेम क्या सिर्फ सुख भरे पलों को जीने का नाम है ? या उसकी अपनी कोई प्रतिबद्धता भी है। दुख भरे पलों को साथ जीना भी तो प्रेम है। जो आपसे प्रेम करेगा वह आपको किसी तकलीफ में कैसे छोडकर जा सकता है। पैरीं का यह कहना कि उसे जिंदा रखना मेरी पहली प्राथमिकता है। उसके चरित्र की उदादत्ता को दिखाता है।
"अंधेरे में किसी दोस्त के साथ चलना, रोशनी में अकेले चलने से कहीं बेहतर है।"  वह इस यात्रा में वान्या का भी साथ चाहती है भले ही वह साथ मानसिक साहचर्य या संबल कि तरह ही क्यों ना हो।  
"रुकी हुई पृथ्वी" एक साधन सम्पन्न रचनात्मक स्त्री के दिनचर्या से ऊब की कहानी है।"कई बार लगता है कि कामनाएँ भी बेताल कि तरह डाल पर लटक गई हैं।" उसके जीवन में शांतनु हवा के एक ताज़े झोंके की तरह है। उसकी बात सुनने और समझने वाला। घर में पति है पर उसे नेहा की बात सुनने का धीरज नहीं। " वह क्यों नहीं सोचता कि उसे कोई साथी चाहिए जो उससे खूब बातें करें ...प्रोत्साहित करे ... हौसला बँधाये ... उसकी उपलब्धियों पर उसके इतना ही खुश हो ....।" वह अपनी भावनाएं बताती है पर शांतनु डर गया ... एक प्रेम से भरी हुई स्त्री के आवेग से ....।पर अंतत नेहा फैसला करती है कि वह जीवन को बहुत कंप्लीकटेड नहीं बनाएगी...। यहाँ शांतनु की भी तारीफ करनी होगी कि उसने आम पुरुषों कि तरह उसकी ऊब को अपने पक्ष में भुनाने कि कोशिश नहीं की।
"सोनमछरी" की नायिका रूमपा शंकर से बहुत प्यार करती है। पर परिस्थितिवश जब उसे अमित का सहारा लेना पड़ता है तो वह शंकर के लौटने पर भी अमित को छोड़ने को तैयार नहीं होती। गीताश्री की नायिकाएँ साहसी हैं और अपने किए का समूचा दायित्व वे स्वयं लेने को तैयार दिखती हैं। चाहे वह मान सम्मान हो या घोर लांछना। वे प्रेम भी अपनी शर्तों पर करती हैं।
"चौपाल " के बीजू साहब एक अलग ही किस्म के चरित्र हैं॰ शिवांगी के खामोश प्रेमी। जिन्हें बस शिवांगी को देख लेना ही काफी है। उनके चले जाने के बाद शिवांगी उन्हे खोजती फिरती है। धन्यवाद कहने का मौका भी ना मिल सका । पर ऐसे पात्र क्या जीवन भर भुलाए जा सकते हैं?
"ताप" कहानी पाठकों को थोड़े असमंजस में डालती हैं। ऐसा व्यावहारिक रूप से संभव है क्या?" बह गई बैगिन नदी " का असगर जब यह कहता है कि "मैं ... सरजी , पहले तो मैं पैसा ही लेता था लेकिन हमारी अम्मी हराम का पैसा घर लाने को मना करती है।" तो लगता कि यह पृथ्वी अबतक नष्ट नहीं हुई, क्योकि आदमी का जमीर कभी ना कभी जग जाता है।
इन कहानियों का एक कमजोर पक्ष, दूसरे पक्ष यानि रंजना, इंद्रजीत की भावनाओं का पूरी तरह नहीं खुल पाना है।
लेखिका से यह आशा की जा सकती है कि कभी हम उनकी ऐसी कहानियाँ भी पढ़ पाएंगे  जो इन पात्रों के तरफ से लिखी गई होगी , उनकी मनोदशा को दर्शाती हुई।  इसके अलावा लबरी ,फ्री बर्ड , उर्फ देवीजी, एक रात जिंदगी भी अच्छी कहानियाँ हैं।
ये कहानियाँ पितृसत्तातमक समाज की जड़ों पर प्रहार करती हैं और पाठकों को मजबूर करती हैं कि वे भी स्त्रियॉं को मनुष्य की तरह देखना सीखेँ। उनका धीरज अब जबाब देने को है।
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कलावंती, आवास स0 टी 32 बी , नॉर्थ रेल्वे कॉलोनी , रांची 834001, झारखंड. मो 9771484961।




Posted By Geetashree On 8:14 PM 2 comments
युवा कथाकार कवि पंखुरी सिन्हा की कहानी का आश्चर्यलोक 

पंखुरी सिन्हा के मन मिजाज को उसके बचपन से जानती हूं। उसके लेखन को बहुत देर से जान पाई। होस्टल में फुदकती हुई, गौरेया-सी, शाम को मस्ती में मेरे पास आने वाली एक नन्ही लड़की कब कहानीकार में बदल गई, पता ही नही चला। कुछ हम गाफिल रहे जमाने से, या जमाना हमसे रहा..। दोनों तरफ से दूरियां रहीं। पर जब दूरियां कम हुईं तो पंखुड़ी की कहानियां मेरे सामने आश्चर्यलोक की तरह खुली और खुलती चली गईं। उसने जब पहला संग्रह “किस्सा-ए-कोहिनूर” दिया, तभी से उसकी कहानियों को लेकर रोमांच रहा। जिसे आप करीब से जानते हो, उसकी कहानियां कुछ ज्यादा ही खुलती हैं आपके आगे। वह बोले न बोले, कहानियां खुद बोलती हैं। पंखुरी के मामले में मैंने यही पाया कि उसकी कहानियां बात करती है। बातूनी कहानियां हैं तभी उसकी कहानियों के भीतर से गुजरना जिंदगी से होकर गुजरने जैसा लगा कई बार। मैं जिस कहानी पर खास बात कर रही हूं, वह “प्रदूषण” कहानी है। नाम पढ कर पहली बार मुझे अटपटा लगा। पत्रकारीय भाषा में कहे तो सरकारी टाइप शीर्षक। पर कहानी को अंत तक पहुंचते ही शीर्षक के अर्थ खुलने लगते हैं। बहुत सांकेतिक हेडिंग है। ये प्रदूषण बाहरी नहीं, भीतरी है जिससे हम जूझते रहते हैं और दिमाग में कचरे का पहाड़ खड़ा कर लेते हैं। इससे जिंदगी हराम हो जाती है और हम रास्ता भटक जाते हैं। जिंदगी के कुछ फैसले कठोर तो होते हैं लेकिन वे आपको मजबूत बनाते हैं, आत्मनिर्भर भी। रिश्तो के मायाजाल में फंसी हुई नायिका कहानी के अंत में न सिर्फ खुद को समझाती है बल्कि अपने पाठको तक अपना संदेश पहुंचाने में सफल दिखती है...”अपने शहर को प्रदूषण से बचाइए।“ पर्यावरण के बहाने जिंदगी की ओर संकेत देती है और बाकी पाठको के विवेक पर छोड़ देती है।
कहानी में कई किरदार है। रचना, शिशिर, सौम्या, अनिर्वाण, चाचा जी इत्यादि। कुछ अनुपस्थित लोगो का भय भी जैसे मकान मालिक। महानगरो में रह रही सिंगल लड़की या लिव इन में रहने वाली लड़कियों-युगल जोड़ो को इस तरह के खौफ से साबका पड़ता है। कहानी में इस भय की छाया है जो बहुत जेनुइन लगती है। सारे किरदार सहज स्वभाविक हैं। यह कहानी अपने समय का सच है। एक पढने लिखने वाली, कम आय वाली नौकरी करने वाली लड़की को अपने लिए घर में भी स्पेस चाहिए और जिंदगी में भी। वह कभी, प्रेम में पड़ कर तो कभी आर्थिक कारणो से घर साझा कर तो लेती है लेकिन वह खुद खो जाती है। वह बोल्ड तो है लेकिन अपने चाचा की परवाह करने वाली सुघड़ लड़की भी। रचना शहरी और कस्बाई दोनो लड़की का काकटेल है। सौम्या पूरी तरह महानगरीय लड़की है, बिंदास और बेलौस। उसे शादीशुदा पुरुष से प्यार हो जाता है। फिर भी एक घर में रहने वाली सहेली के पुरुष मित्र पर फिदा हो जाती है। कहानीकार ने यहां बड़ी सधी हुई भाषा का इस्तेमाल किया है। वह कहीं भी सौम्या के प्रति कठोर नहीं दिखती पर कटाक्ष वाली भाषा का जरुर इस्तामल करती है। यह लाजिमी भी है कि एर पुरुष से प्यार करते हुए दोस्त के मित्र के सथ गणित पढने के बहाने फ्लर्ट करने लगना। और वही होता है, जो अक्सर इन मामलो में होता है। रचना और सौम्या के रास्ते अलग हो जाते हैं।रचना उसे घर छोड़ने को साफ साफ कह देती है पर घर का किराया उसे अखरने लगता है। फिर अनिर्वाण को उस घर में जगह मिलती है। एक घर में लेकिन अलग अलग कमरे में जीते हुए दो लोग। प्यार को लेकर एकदम स्पष्य विचार वाली ल़ड़की। वह खुद कहती है...”जैसे जैसे समय बीतता गया. मैंने पाया कि प्यार नामक वह चीज बजाए कुछ खूबसूरत होने के अक्सर विस्फोटक झगड़ों में उबल पड़ती थी।“
पंखुड़ी ने इस कहानी को रोचक शैली में लिखा है। कई बार रचना तटस्थ दिखती है या निस्संग। जैसे बाहरी चीजें उसे ढंकने का प्रयास कर रही हों और वह खुद को फंदे से छुड़ाने की तड़प में हो। वह समान्य लड़कियों से थोड़ी अलग है। किस्सागो पंखुड़ी आत्मविश्वास से लैस एक जटिल किरदार को रोचक ढंग से पेश करती है।

कहानी की दोनों लड़कियां महानगर में जीने वाली लड़कियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। अपने फैसले खुद लेने वाली लड़कियां हैं जो नैतिकता के किसी बंधे बंधाएं ढांचे या व्यामोह में नहीं फंसती। उन्हें गलत सही, पाप पुण्य का बोध परेशान नहीं करता। दोनों अपने समय संघर्ष के साथ जुड़े हैं और उन्हें अपने किए का कोई अफसोस नहीं। इन सबके बीच दोनों पुरुष पात्र अपनी अलग छाप छोड़ते हैं। अनिर्वाण भी रचना के लिए बहुत सहयोगी साबित होता है। उसकी देखरेख करता है और सौम्या के आग्रह पर उसे पढाता भी है। सौम्या का ब्वाय फ्रेंड शिशिर पहले से शादीशुदा है और दो बच्चो का बाप भी है। उसकी अपनी पत्नी से नहीं पटती। पर वह तलाक नहीं लेना चाहता। दो बच्चो की खातिर। सौम्या ने उसे इसी रुप में स्वीकार कर लिया है। वह शिशिर से हमबिस्तर भी होती है, कहानी में संकेतो के जरिए इसका जिक्र है। चादर पर पड़ी सिलवटे बताती हैं कि वहां क्या हुआ होगा। इसका ब्योरा देने की जरुरत नहीं होती। इसी तरह के छोटे छोटे रोचक ब्योरे कहानी को बड़ा फलक दे जाते हैं। हिंदी साहित्य की “छाती- कूट” आलोचना से परे, यह छोटी कहानी, नई लड़की की बात इस ग्लोबल समय में ठोस रुप में दर्ज करती है।   

नवल जी की कविता

Posted By Geetashree On 3:24 AM 0 comments

हर कहानी के बाद,
खाली पड़े हिस्से में,
रक्तबीज के वेश में सवाल रक्तपात मचाते हैं,
कहीं कोई अपने कपड़े ठीक कर रही होती है,
तो कोई जीतने का भ्रम पाल,
अपनी मुंछों पर ताव देता है,
कुछ रुदालियां रोती हैं,
कुछ लाशें जमीन पर बीती रात का सच बताती हैं।
अखबारों के पन्नों में भी कभी कभार,
किसी कहानी के बाद की कहानी छप जाती है,
और कोने में खून की कुछ बुंदें या फ़िर कभी,
फ़ुलों का गुच्छा लिये गजगामिनी की तस्वीर,
आंखों के सामने कहानी का अंत बताने का प्रयास करती है,
लेकिन कहानियां तो कहानियां ही हैं,
उनका आदि क्या और अंत क्या,
यह सच वह भी जानती हैं,
समझती हैं इसलिए मौन हैं,
एक बुत के जैसे किताब के शक्ल में,
या फ़िर रंग बिरंगे अखबारों के पन्नों में,
जैसे कोई खुबसूरत सी टिकुली,
ललाट के जगह रुम्पा के गालों को चूम रही हों,
चौपाल की नायिका भी “बन्द गली के आखिरी मकान” के पास,
रुकती है और देखती है उन सभी को,
जिनके लिए एक हसरत है वो,
वह रचना बने या फ़िर प्रार्थना,
दुनिया से ताल ठोककर सवाल करती है,
सोन पुष्प लाने गये राजा की कहानी,
बहुत कुछ कहना चाहती है,
लेकिन अलफ़ाज तब कहां उसे इसकी इजाजत देते हैं,
दुनियावी दस्तूर भी तो नहीं है ऐसा,
हर कहानी के खत्म होने के बाद,
एक नयी कहानी की परंपरा निभानी ही पड़ती है।






























बदनाम बस्ती की जिद्दी लड़की की एक और जिद

Posted By Geetashree On 3:51 AM 8 comments
देसी चीयर्स लीडर के ठुमके गीताश्री बदनाम बस्ती की सबसे जिद्दी लडक़ी इन दिनों बेहद चिंतित और गुस्से में है। उसे बेचैन कर दिया है इस खबर ने कि उस बस्ती की लड़कियां अब बिहार के गांवों, कस्बों में होने वाले रात्रिकालीन क्रिकेट मैचों में चीयर्स लीडर बनकर जा रही हैं। बात सिर्फ चीयर्स लीडर की नहीं है, इसकी आड़ में देह के धंधे का एक नया रूप शुरू हो गया है। लोगो की जरुरत के हिसाब से बस्ती की चीजें बदल गई हैं। मंडी के हिसाब से चीजें नहीं बदलीं। खुद को कलाकार कहने वाली लड़कियां अपनी कला अब अपने कोठो पर नहीं, लोगो की मांग के अनुसार कहीं भी दिखाने पर आमादा है। इनमें से कोई भी खुद को सेक्सवर्कर नहीं कहती। इन्हें अपना फन पेश करने का लाइसेंस मिला है। इन गलियों में कभी सूरज उगने का नहीं ढलने का इंतजार रहता था। दरवाजे तभी खुलते थे जब कोई दस्तक देता था। वहां एक परदा था जो हर किसी की जिंदगी से लिपटा हुआ था। उन गलियों से गुजरकर अक्सर हवा अलसाई हुई सी बहने लगती थी। अब हवा में शोखी है। रौनक गली अब किसी पुरानी रंग उड़ी पेंटिंग की तरह दिखती है। नई पीढी ने बहुत कुछ बदल दिया है यहां। उनके पुकारे कोई आए या ना आए, लोगो की पुकार, मांग उन्हें खेतो, खलिहानो से लेकर क्रिकेट के मैदानो तक ले जा रही हैं। इन दिनों देशभर में आईपीएल का खुमार सिर चढक़र बोल रहा है, वहीं बिहार में आईपीएल की तर्ज पर क्रिकेट नाइट टूर्नामेंट का चलन शुरू हो गया है। वहां भी दर्शकों के मनोरंजन के लिए सेक्सवर्कर मौजूद हैं। हर चौक्के-छक्के पर उनके ठुमके दर्शकों को सिसकारियों से भर देते हैं। ज्यादा दिन नहीं हुए, समस्तीपुर जिले के अधारपुर जगदेव मध्य विद्यालय परिसर में टी-20 नाइट क्रिकेट का आयोजन। मैच के दौरान फूहड़ गानों का शोर उत्तेजना जगाता है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति और चौंकाने वाली है। पूरा ग्राउंड दर्शकों से खचाखच भरा हुआ है। ग्राउंड पर मैच चल रहा है और मंच पर डांस। मैदान में मौजूद ग्रामीण क्रिकेट टीम के कई सदस्य नाबालिग भी हैं। न पुलिस का ध्यान इस तरफ गया और सरकारी स्कूल परिसर में इसके आयोजन पर प्रशासन से अब तक कोई आपत्ति जताई है। हैलोजन लाइट के सुरमई अंधेरे में जलवाफरोश बालाएं चंद पैसों की खातिर भरे मैदान में ठुमक रही हैं। इन सबसे बेचैन लडक़ी नसीमा कहती हैं, धंधे का यह नया रूप ‘लॉन्च’ हुआ है, कहां पहले मुजरा और कव्वाली के दौर चलते थे। फिर आया आर्केस्ट्रा और अब ये चीयर्स लीडर का नया चलन। चतुर्भुज स्थान, मुज्जफरपुर में परचम संस्था से जुड़ी नसीमा हंसती हैं, ‘आईपीएल में विदेशी लड़कियां हैं, हमारे यहां लोग ‘हाई प्रोफाइल’ चीजों को तुरंत अपना लेते हैं। देखिए, कैसे इस प्रवृत्ति ने एक मुजरे वाली को चीयर्स लीडर में बदल दिया।’ नसीमा बताती हैं कि इस तरह के क्रिकेट मैच ज्यादातर छपरा, सिवान, मोतिहारी, आरा, बक्सर, रक्सौल इलाके में खूब हो रहे हैं, जहां हर टीम का अपना चीयर्स लीडर होता है।’ यहां सवाल उठ रहा है कि आखिर क्या सिर्फ आईपीएल की लोकप्रियता या उसकी नकल करने की प्रवृत्ति की वजह से बदनाम बस्ती की लड़कियां मैदान में चीयर्स लीडर बनकर पहुंच गई। इस सवाल का उत्तर देते हैं, बदनाम बस्ती पर किताब लिख रहे युवा कहानीकार प्रभात रंजन। वह बताते हैं, ‘अब तो मेलों और मैचो में रंग जमाने के लिए इनका इस्तेमाल होता है। दुख की बात है कि वहां अच्छी गानेवालिया रह गई हैं, न अच्छी नर्तकी। तवायफों ने इलाका छोड़ दिया। बस उनकी कहानियां बच गई हैं। करीब 100 सालों के इतिहास वाली यह बस्ती अब सिर्फ जिस्म की मंडी में तब्दील हो गई है।’ नसीमा तो सारा दोष प्रशासन को देती है, जिसे यह सब दिखाई नहीं देता। वह कहती हैं, ‘क्यों नहीं सरकार देह व्यापार का लाइसेंस दे देती है। कम से कम ये सब अलग-अलग रूप तो चलन में नहीं आते। क्या विडंबना है कि जो लोग इस व्यापार के खिलाफ है, वही लोग देह व्यापार के नए-नए रूप निकाल रहे हैं। चीयर्स लीडर के लिए क्या है? चौक्को-छक्को पर ठुमके? उनके जीवन का क्या?’ इस बस्ती की नई उम्र की लड़कियों में परंपरागत हुनर (मुजरा-कव्वाली) से कटकर हाई प्रोफाइल महफिलों में जाने का आकर्षण ज्यादा है। पहले कद्रदान इनकी दहलीज तक आते थे। अब नई लड़कियां उनके बुलावे पर कहीं भी उपलब्ध हैं-हर रूप में। चाहे वह आर्केस्ट्रा गल्र्स हो या चीयर्स लीडर। कभी महफिल की शान रही जीनत बेगम कहती हैं, क्या करे? कुछ तो करना होगा ना। महफिलें उजड़ गई हैं। राते बेमजा। समाज बदल गया है। पहले रतजगा हुआ करता था। रात रात भर संगीत की महफिल। जमींदार गए, कौन सजाएगा महफिल। पढी लिखी, मुंहफट नसीमा भी दार्शनिक हो उठती हैं, ‘पहले घर में बैठकर रोटी मिलती थी। अब रोटी का टुकड़ा खिसकता जा रहा है। हम उसके पीछे-पीछे जाते जा रहे हैं...।’ वह दुष्यंत का शेर सुनाती है..दुकानदार तो मेले में लुट गए यारो, तमाशबीन दूकानें सजा कर बैठ गए।

एक लंबी चुप्पी के बाद.....

Posted By Geetashree On 3:40 AM 8 comments

दोस्तो

मैं एक बार फिर से हाजिर हूं...लंबी चुप्पी के बाद। मैंने पिछले दिनों अपने शोधकार्य के सिलसिले में खूब यात्राएं की..
वन वन भटकी..देश विदेश चक्कर काट आई..अब थिर हो गई हूं...अब लिखने का काम शुरु...इन दिनों कविताएं, कहानियां..रचनात्मक लेखन का जुनून सा है...दोबारा ब्लाग से जुड़ रही हूं...सो सोचा..पहले आपको एक अनगढ कविता पढवाऊं..अनछपी..यात्रा के दौरान लिखी गई..किसी एकांत में..गीताश्री

तुम अपनी देह पहले अनुपस्थित करो यहां से,
मैं उठूंगी यहां से और मन के उस सिरे से उस सिरे तक जाऊंगी
तुम्हारी दुर्दम्य आकांक्षाओं को तुमसे बेदखल करके
उतर जाऊंगी उस पार

मैं जाऊंगी तुम्हारी अनुपस्थित देह के पास
जो धरी है किसी विस्तर पर
खाली चादर सी
धुली धुली खुली खुली.

तुम जब भी आओ मेरे पास
अपनी देह को इसी तरह वहीं कहीं छोड़ आया करो,
कि मुझे नहीं मालूम कि प्रेम में देह का दाखिल होना
कितना रौनक है कितना विराना
प्रेम है तो उत्सव-स्वांग है तो विराना...तुम उठते हो, इतना कहते हो
और अपनी देह को थामे दोनों हाथों से
प्रस्थान बिंदु के पास जाकर धर आते हो.

दुखते हैं खुशबू रचते हाथ

Posted By Geetashree On 2:37 AM 4 comments




गीताश्री

यहां इस गली में बनती हैं
मुल्क की मशहूर अगरबत्तियां
इन्ही गंदे मुहल्ले के गंदे लोग
बनाते हैं केवड़ा, गुलाब, खस और
रातरानी अगरबत्तियां.
दुनिया की सारी गंदगी के बीच
दुनिया की सारी खुशबू
रचते रहते हैं हाथ।
---अरुण कमल की कविता

मैंने कुछ साल पहले अचानक नेट पर अपने प्रिय कवि अरुण कमल जी की कविता खूशबू रचते हाथ पढी थी। कविता मेरे जेहन में दर्ज हो गई थी। ये उस कौम पर लिखी गई है जिसकी तरफ हमारा ध्यान कभी जाता ही नहीं। मैं सोचती रही कि कहां किस शहर में मिलेंगी ये औरते जो हमारे लिए खूशबू रचती है। कवि ने उन्हें कहीं किसी गली में तो देखा होगा ना..अचानक मैं पिछले साल उज्जैन गई। ट्रेन से आने जाने का प्लान था। आदतन जब ट्रेन किसी शहर में प्रवेश करने लगती है तो मुझे जार्ज डो का एक प्रसिध कथन याद आने लगता है...किसी शहर को देखने का सबसे अच्छा तरीका है ट्रेन के दरवाजे पर खड़े होकर उसे देखें..और मैं एसा करती हूं जब भी कभी ट्रेन से जाती हूं। उज्जैन के करीब पहुंचते ही ट्रेन के दरवाजे पर आई..धीमी होती ट्रेन और धीमे धीमे आती हवा में महक सी थी। पहले लगा कि महाकाल की नगरी है मंदिर से आती होगी..लोकिन पटरियों के एकदम पास नजर गई और मैं दंग रह गई। अरुण कमल जी की कविता..साक्षात..लाइव..कविता की पंक्तियां याद आने लगीं..हाथ ही हाथ थे..जो खूशबू रच रहे थे। खिलखिला रहे थे..खूशबू में सने हाथ ट्रेन के यात्रियों को टा टा बाय बाय भी कह रहे थे। मुझे कविता के किरदार पहली बार मिले..निराला की भिक्षुक कविता के बाद..
फिर तो इन गलियों में गई अपनी लोकल सहेली मधुलिका के साथ। वहां जाकर जो कुछ मिला उसे यहां लिख डाला। कवि होती तो कविता लिखती..तब भी अऱुण कमल से ज्यादा अच्छा नहीं लिख पाती..पत्रकार हूं सो लेक लेश लिख डाला..फोटो खींचे..उनसे बातें की..खूशबू भरी..उनकी पीड़ा लेकर घर लौट आई..ट्रेन को लौटना होता है..

भोर के इंतजार में एक गली

अब खूशबू रचते हाथ दुखने लगे हैं।
उज्जैन की ऊंची नीची, आड़ी तिरछी, तंग गलियों में अगरबत्ती बनाते बनाते तीस वर्षीया संध्या गोमे की उंगलिया पीड़ा गई हैं। कंधे दुखने लगे हैं। अब दुआ के लिए भी हाथ उठाने में दिक्कत होती है। फिर भी एक दिन में वह पांच किलो तक अगरबत्ती बना लेती है। रीना आकोदिया के गले में हमेशा खराश रहती है। कच्चे माल से निकलने वाला धूल उसके फेफड़े में जम रहा है। परिवार चलाना है तो उसे किसी भी हालत में अगरबत्ती बनाना ही होगा। पुष्पा गोमे बताती है, हम रोज का बीस से पचास रुपये तक कमा लेते हैं। घर के बाहर काम करने नहीं जा सकते। हमें घर बैठे काम चाहिए। इसके अलावा और कोई रोजगार यहां है नहीं..क्या करे?
ये महाकाल और कालिदास की नगरी उज्जैन की एक गली है योगेश्वर टेकरी। शायद ऐसे ही किसी गली में कभी अरुण कमल ने संध्या, पुष्पा, रीना, पिंकी जैसो की बहदाली देखी होगी। तमाम पूजाघरो को सुंगध से भर देने वाले हाथ अब बेहाल हैं। लगातार एक ही जगह बैठकर अगरबत्ती बनाते बनाते उनका जीवन कई तरह की मुश्किलो से भर गया है। उनका स्वास्थ्य तो खराब हो ही रहा है घर की माली हालत भी ठीक नहीं हो पा रही है। फैक्ट्री मालिक और बिचौलिए के शोषण दौर निरंतर जारी है। रीना बताती है, बहुत सी औरतो का घर इसी से चलता है। क्या करें। सभी हमारा शोषण करते हैं। कच्चा माल देते हैं साढे सात किलो, लेकिन बनाने के बाद वे पांच किलो तौलते हैं। धूल से बीमारी हो रही है। रीना की तरह ही इस गली की तमाम औरतें शोषण के दोहरे मार से बिलबिलाई हुई हैं। इनका कोई ना कोई संगठन है ना इनके हक में आवाज उठाने वाला कोई स्थानीय नेता। घर के पुरुष सदस्यो को भी इनकी सुधि नहीं है। खुद तो वे दिनभर बैठकर इसतरह का काम करेंगे नहीं। घर की महिलाओं के ऊपर लाद दिया है पूरा कारोबार। उनका ज्यादातर वक्त चौक चौराहो पर बैठकर चाय पीने या बीड़ी का धुंआ उड़ाने में जाता है। शाम को बिचौलिए से पैसे लेने जरुर पहुंच जाते हैं। कम रकम हाथ लगी तो हो हल्ला मचाते हैं। औरत पर दोहरी मार। कम अगरबत्ती बनाने का इल्जाम भी झेलो। अब तक किसी स्वंयसेवी संगठन की नजर इनकी बदहाली पर नहीं पड़ी है। नवगठित एनजीओ भोर की सर्वेसर्वा मधुलिका पसारी ने जब पहली बार फरवरी, 2010 को मेरे साथ इस गली का दौरा किया तो मेरे साथ साथ वह दंग रह गईं। उन्हें अंदाजा ही नहीं था कि खुशबू रचने वाले हाथों को किन मुश्किलो को सामना करना पड़ रहा है। अब तक उपेक्षित इस धंधे में लगी महिला मजदूरो का कोई यूनियन भी नहीं है। पिंकी टटावत बताती है यहां यूनियन नहीं बनती। मैं अगर बनाना चाहूं तो बीच के लोग खत्म कर देते हैं। हम काम करना तो नहीं बंद कर सकते ना। काम बंद होगा तो परिवार कैसे चलेगा?
संध्या बौखला कर कहती है, हमें साढे सात किलो माल देता है बदले में पांच किलो लेता है। वजन में माल कम हो गया ना। हमारी मजदूरी वैसे भी कम है ऊपर से डंडी मार देते हैं। कमसेकम हमारी मजदूरी तो बढा देते।
पूरी तरह से औरतो के कंधो पर टिका है ये धंधा। पांच साल की उम्र से लड़कियां भी निपुण हो जाती है अगरबत्ती बनाने में। घर में जिनती महिला सदस्य होती हैं वे सब घरेलु कामकाज निपटाने के बाद सुबह 11 बजे से शाम पांच या छह बजे तक एक ही जगह पर बैठकर बांस की पतली स्टिक पर मसाला चढाती रहती हैं, सुखाती हैं फिर इनका बंडल बना कर बिचौलिए का इंतजार करती हैं। बदले में वो चंद रुपये दे जाता है। इन पैसो से ना पेट भर पा रहा है ना किस्मत बदल पा रही है। पूरे शहर में और कोई धंधा नहीं है। सारे मिल बंद हो चुके हैं।
देश में उज्जैन पांचवे नंबर का अगरबत्ती उत्पादक शहर है। लगभग 100 अगरबत्ती बनाने वाली फैक्ट्री वहां है। यहां से बनने वाली अगरबत्ती की आपूर्ति देश के कई राज्यो जैसे, गुजरात, राजस्थान, उतर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली में होती है। इस व्यसाय को गृह उधोग का दर्जा प्राप्त है इसलिए सरकार ने कई तरह की छूट दे रखी है। अगरबत्ती व्यसाय से पिछले पचास साल से जुड़े व्यवसायी फखरुद्दीन से बातचीत के दौरान उन वजहो का पता चलता है जो मजदूर महिलाओं के शोषण
का वायस बनी हुई हैं।
वह बताते हैं, उज्जैन की अगरबत्ती गुणवत्ता में कमजोर है। सस्ती बिकती है, मजदूर भी निपुण नहीं हैं। ये कारोबार वहीं फले-फूलेगा जहां गरीब वर्ग है। वैसे भी राजनीति की वजह से कपड़ा मिलें, पाइप फैक्ट्री समेत कई कारखाने बंद हो गए। मजदूर क्या करें। मजबूरन उन्हें इस धंधे में लगना पड़ा।
फरुद्दीन महिला मजदूरो के शोषण के लिए छोटे छोटे कारोबारियो को दोषी ठहराते हैं। उनका कहना है कि छोटे कारोबारियो से हम बड़े कारोबारी बेहद परेशान हैं। उनकी वजह से मध्य प्रदेश के हर गांव में अब अगरबत्तियां बनने लगी हैं। चूंकि किलो के हिसाब से बेचना है तो मोटी अगरबत्तियां बनने लगीं हैं। बारीक बनाएंगे तो वजन कम होगा। धीरे धीरे बारीक बनाना भूल जाते हैं। इसीलिए कच्चा मान बाहर नहीं भेजते, अपनी फैक्टरी में ही मजदूरो को रखकर काम करवाते हैं और उन्हें मीनीमम वेजेस से ज्यादा देते हैं।
अंत में..मधुलिका कहती हैं, अब मुझे कुछ करना पड़ेगा। भोर को एक उद्देश्य मिल गया है। हो सकता है इनकी पहल पर एक नई भोर इन गलियों में आए।

बोल..कि बोलना है जरुरी

Posted By Geetashree On 3:49 AM 9 comments

फांसीघर में चीख

गीताश्री

स्त्रियों के खिलाफ हो रहे पारिवारिक आतंकवाद पर आधारित फिल्म ‘बोल’ (निर्देशक-शोएब मंसूर) देखते हुए भारतीय महिला प्रेस कोर्प, दिल्ली की सभी सदस्यों की आवाजें एक अंधेरी और गहरी चुप्पी में बदल गई थी। मूक, स्तब्ध और अवाक। तीन घंटे लंबी फिल्म आपको वांछित मनोरंजन नहीं, किसी यातना शिविर से गुजरने जैसा अहसास दे रही थी। शायद कलेजा मसोस कर देखने वाली यातना का लाइव टेलीकास्ट। फिल्म प्रभाग के उस हॉल में जहां रिलीज होने वाली फिल्मों के सर्टिफिकेट की किस्मत तय होती है, उस हॉल में बैठे-बैठे जैसे धडक़नों का संगीत फांसीघर के उस चीख में शामिल हो गया था, जब नायिका चीखती है, ‘खिला नहीं सकते तो पैदा क्यों करते हो? मारना जुर्म है तो पैदा करना जुर्म क्यों नहीं है?’ यह सवाल फांसीघर से उठता है और विकासशील देशो के कैनवस पर पसर जाता है। सवाल दर सवाल उठाती यह फिल्म कातिल और गुनाहगार होने में फर्क का खुलासा करती है। अपने पिता का कत्ल करने वाली नायिका फांसीघर में अपनी कहानी टीवी पर लाइव बताती है, यही उसकी आखिरी ख्वाहिश है। वह पूरे मुल्क को आधी रात के अंधेरे में बताती हैं कि वह कातिल जरुर है, गुनाहगार नहीं। वह अपनी फांसी चढते चढते मुल्क के सामने कई सवाल छोड़ जाती है और साथ ही आजाद कर जाती है परदानशीं औरतो को, उनके बुरके नोच कर मानो कट्टपंथियों के चेहरे पर फेंक जाती है जिन्होंने औरतो को अपनी संपत्ति समझ कर ढंक दिया था। नायिका उस मानसिकता की भी मुखालफत करती है जो एक स्त्री को बच्चा पैदा करने की मशीन में तब्दील कर देती है। वह परदानशीं औरतो की चुप्पी को पररिवर्तनकामी चीख में बदल देती है।
वह यातना शिविर में सिर्फ सुंदर सुंदर सपने देखने वाली (यातना शिविर में सपने ज्यादा सुंदर आते हैं) औरतो को अंखुआने का मौका समाज से छीन लेने की हिमायत करती है। यह फिल्म औरतो की उस चुप्पी के खिलाफ है जिसके कारण वे अपने घरो की कैदी बना दी जाती हैं। फिल्म ठोकर मारती है उस व्यवस्था को जिसमें एक पुरुष को नैतिक पाखंड करने की इजाजत हैं लेकिन एक औरत को खुली हवा में सांस लेने की इजाजत नहीं। इस्लामिक समाज में औरतो की बगावत की बुनियाद डालती है। स्त्रीमुुक्ति का रास्ता आखिर पुरुष सत्ता की समाप्ति से होकर ही जाता है। संस्कृति और सभ्यताएं किस कदर औरतो को आतांकित करती और उन पर कहर ढाती है, उसका एक उदाहरण यहां देखिए।
शोएब मंसूर पाकिस्तान के सबसे साहसी फिल्मकार हैं, जो एक परिवार, समाज और देश की समस्या को उठाकर दुनिया के सीने में दर्द की तरह भर देते हैं।
‘बोल’ के जरिए उन्होंने समाज में व्याप्त दोहरे मापदंड की पोल खोली है। पाकिस्तान में कुछ सप्ताह पहले ‘बोल’ रिलीज हुई होगी तब निश्चित तौर पर गरमागरम बहसें शुरु हुर्ह होगी। शोएब की पहली फिल्म ‘खुदा के लिए’ की तरह ‘बोल’ भी पाकिस्तान की सामाजिक पृष्ठïभूमि पर आधारित है।
फिल्म में एक बेटी अपने कट्टïर रूढि़वादी पिता के खिलाफ आवाज बुलंद करती हैं। महिलाओं को पुरुषों के सामने तुच्छ समझने की सदियों पुरानी परंपरा का मुकाबला करने का साहस करती हैं। हकीम साहब की दिल दहलाने वाली कहानी है। वह चाहते हैं कि उनकी पत्नी एक बेटे को जन्म दे जिससे भविष्य में उनका खानदान चलता रहे और उनका नाम रोशन रहे। इस चक्कर में उनकी पत्नी 14 बेटियों को जन्म देती हैं, जिनमें सात ही जिंदा रहती हैं। उनकी आठवीं औलाद ‘किन्नर’ है। फिल्म में हकीम साहब के परिवार की दुश्वारियों और उनके प्रति हर सदस्य की प्रतिक्रिया दिखाई गई है। फिल्म में भावनाओं का उफान गजब का है। बड़ी बेटी ( हुमैमा मलिक) और पिता (मंजर सेहबाई) की सोच हर मुद्दे पर अलग-अलग है। जब भी पिता और बेटी एक साथ परदे पर आते हैं, दोनों के बीच का तनाव दर्शकों के मन पर भी दिखने लगता है। स्त्री-पुरुष के बीच गैरबराबरी और पुरुष सत्ता के खिलाफ आक्रोश फिल्म के केंद्र में है।
चूंकि पाकिस्तान के किसी एक फिल्मकार ने इस कथानक पर फिल्म बनाने का साहस किया, इसलिए शोएब की सराहना दुनिया भर में की जा रही है।
फिल्म के कथानक से जुड़े उपकथानक और कहानी में आए उतार-चढ़ाव भी हैरान करने वाले हैं। इस तरह के जटिल विषय पर बड़े पर्दे के लिए फिल्म विरले ही बनती है। फिल्म के माध्यम से सीमा के दोनों तरफ कट्टïरपंथ को लेकर चेतावनी भी दी गई है कि इसमें दोनों देशों को नुकसान ही होगा, फायदा नहीं।
ऐसा नहीं कि फिल्म में कुछ कमियां नहीं हैं। कहानी कहीं कहीं बिखरी नजर आती है। एक गाना जबरदस्ती ठूंसा हुआ लगता है। डार्क पक्ष कुछ ज्यादा गहरा है। यह आपको उदास कर सकता है बोर नहीं। नसीरुद्दीन शाह को इस फिल्म का हिस्सा ना बन पाने का अफसोस लाजिमी है। बकौल नसीर-यह फिल्म ऐसी होती जिस पर वह गर्व कर सकते थे। फिलहाल शोएब की ईमानदारी फिल्मकारो के लिए गर्व करने लायक है।

ओ किटी..रहोगी याद

Posted By Geetashree On 12:15 AM 11 comments



गीताश्री

‘मैकलुस्कीगंज? एंग्लो इंडियनों का यह गांव आखिर है क्यों? यही एक सवाल है जो संपूर्ण मैकलुस्कीगंज को संतप्त करता रहा है।’
डेनिस गहरी सांस लेकर कहते थे-‘इसलिए कि हमारी यह नस्ल ईश्वर का एक क्रूर मजाक रही है बेटे। कहते हैं, लॉर्ड कर्जन ने एक बार कहा था कि ईश्वर ने हम ब्रिटिशों को बनाया, ईश्वर ने इंडियंस को बनाया और हमने एंग्लो इंडियंस बनाया। यही विडंबना एंग्लो इंडियंस की रही है बेटे। हम न अंग्रेज थे, न ही हिंदुस्तानी...। फिर क्या थे हम...?’

‘बेटे, एंग्लो इंडियन समुदाय एक ऐसा भटका जहाज था जिसके लिए कोई बंदरगाह नहीं था। पर ई.टी.मैकलुस्की ने एक छोटा सा खूबसूरत बंदरगाह अपने अथक परिश्रम से जरूर बना दिया था।

मि.मैकलुस्की के सपनों का कब्रिस्तान..एंगलो-इंडियनों के अतीत के अस्तित्व की कहानी कहता एक बेपनाह सन्नाटा भर रह जाएगा यहां रोबिन..बस एक दर्दभरा सन्नाटा..। पर उस दर्द को भी आने वाले समय में कौन महसूस करेगा रोबिन..कौन? चलो, अच्छा ही है,एक संतप्त नस्ल अपनी समाप्ति पर है..
(मैकलुस्कीगंज उपन्यास का अंश)


क्या आप कभी मैकलुस्की गंज गए हैं?
अगर नहीं, तो लगता है भाग्य ने अब तक आपका साथ नहीं दिया है। दरअसल, झारखंड प्रांत की प्राकृतिक आभा- शोभा के बीच व्यवस्थित दुनिया के इस एकमात्र एंग्लो-इंडियन ग्राम को लेकर एक जुमला बड़ा मशहूर है, ‘मेक लक, देन कम टू गंज।’ यानी किस्मत बनाइए, तब गंज आइए।
यों गुजरे दशकों में भले ही कई बार इस गंज को ‘घोस्ट टाउन’ के फतवे से गुजरना पड़ा है लेकिन कुछ कुदरती बात है कि फीनिक्स पक्षी की तरह यह बार-बार राख से उठ खड़ा होता है। क्या मैकलुस्कीगंज का वजूद एक दिन दुनिया से मिट जाएगा? क्या जंगली हवा की सीढियों के संग वाकई गुम हो जाएगा यह अनूठा गांव? ऐसी तमाम आशंकाएं इस गांव के एंग्लो-इंडियन समुदाय को हमेशा बेचैन करती रहती हैं।
इन दिनों गंज के चेहरे पर थोड़ी मुस्कान आई है। गंज को पता चल गया है कि उनकी महागाथा लिखने वाले उपन्यासकार-पत्रकार विकास कुमार झा को अंतराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान के लिए चुना गया है। मैक्लुस्कीगंज उपन्यास में इकलौता एंगलो इंडियन शहर भले उदास है लेकिन इस खबर से वैसे ही हंस रहा है जैसे मिलन कुंदेरा के कथनानुसार उपन्यास में ईश्वर हंसता है।
पिछले दो दशकों से इस गांव से विकास कुमार झा का गहरा अपनापा रहा है और इसी अपनापे के बीच उनका बहुचर्चित उपन्यास ‘मैकलुस्कीगंज’ तकरीबन पंद्रह वर्षों के गहन शोध के बाद पूरा हो पाया है।
इसी गांव की पगडंडी पर एक स्त्री झोला टांगे, साड़ी का पल्लू कमर में ठूंसे लगभग दौड़ती सी चली आ रही है। वह किट्टी मेमसाब हैं। गांव वाले उन्हें इसी नाम से बुलाते हैं।
उपन्यासकार ने लिखा है.. ‘किट्टी अब स्टेशन पर मजदूरी करती है। छोटे मोटे काम करती है। पर मैंने देखा था, आसपास के लोग तब भी किट्टी मेमसाब ही कह कर पुकारते थे। हैसियत गिर गई थी। पर किट्टी तो किट्टी थी रोबिन..उसके संस्कार तो थे ही..वह आधी अंगरेज..वह आधी सी हिंदुस्तानी औरत..।’
जब किट्टी करीब आई तो मैंने उपन्यासकार की आंखों से देखा। उसकी नीली आंखें दोपहरी में भी चमक रही थी इस बात से कि हम विकास जी का पैगाम लेकर आए हैं। वह चहकी.. ‘विकास जी को पूरा गांव प्यार करता है, और वह भी..। उन्होंने बहुत कुछ किया है हमारे गांव के लिए।’
पगडंडी पर धूल उड़ाती किट्टी के साथ चलते हुए फिर पंक्तियां याद आईं--रोबिन..तुम्हारे पापा उस किट्टी पर फिदा रहते थे..किट्टी की रंगत 62 साल की उम्र में भी वैसी ही है। झोपड़ी के बाहर प्लास्टिक की चरमराई हुई कुर्सियो पर धंसते हुए मैंने देखा कि दुबली पतली किट्टी पलक झपकते अमरुद के पेड़ की फुनगी पर गिलहरी की तरह सरसराते हुए चढ गई। ऊपर से पके अमरुद तोड़ कर हमारी तरफ फेंकती हुई कहती है.. ‘खाइए, मीठे हैं, हमारी मिठाई यही है।’ बेपनाह सन्नाटे के बीच फुनगी से टपकते अमरुद हथेलियों में समा नहीं रहे थे।
किट्टी कहती है, ‘यहां सब कुछ खत्म है। कुछ नहीं बचा है। सब चले गए, सब उजड़ गया। ये फल ही बचे हैं जिन्हें बेच कर गुजारा हो जाता है।’
किसी उपन्यास के किरदार से मिलना किसी पाठक के लिए कितना रोमांचकारी हो सकता है, ये मैंने किट्टी समेत अन्य कई किरदारो से मिल कर जाना।
स्वयं विकास के शब्दों में यह गांव मेरे लिए जागी आंखों का सपना है। वाकई इस औपन्यासिक महागाथा से गुजरना इस गांव के अंर्तमन की परिक्रमा करने जैसा है। अपने वास्तविक नामों के संग उपन्यास में मौजूद जीते-जागते अनगिनत पात्र जब गांव में मिलते हैं तो सुखद रोमांच सा होता है। मि. नोएल गॉर्डन, मि.मेडेज, किट्टी टेक्सेरा, जूडी मेडोंसा सरीखे अनगिनत चेहरे। पर एक अनेक संताप सबके चेहरे पर जो विकास के उपन्यास में भी गूंजता है.. हमारी नस्ल ईश्वर का एक क्रूर मजाक रही है। एक कविता... ‘एवरि पार्ट ऑफ मी इन अलाइव एक्सेप्ट माई फेस...।’ हमारे शरीर का हर हिस्सा जिंदा है, सिर हमारे चेहरे के। सच है कि यह संतान एंग्लो इंडियन लोगों के चेहरे से कभी ओझल नहीं हुआ।
हालांकि साइमन कमीशन की रिपोर्ट में अंग्रेजों ने जब इनकार कर दिया कि इस समुदाय की जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी तो तत्कालीन भारतीय नेताओं ने ऐलान किया कि यह समुदाय भारत में सम्मान से रहेगा। इसी से मुग्ध होकर मि.टी.मैकलुस्की ने सन 1934 में एंग्लो इंडियन समुदाय का एक गांव बसाया। दरअसल, मैकलुस्की की समझ थी कि गांवों के देश भारत में इस समुदाय का भी अपना एक गांव होना चाहिए। गांव बसाने के सपने के साथ मैकलुस्की सारे भारत में कहां-कहां नहीं घूमे और आखिरकार जब वे कलकत्ता लौट रहे थे तो छोटानागपुर के इस वन्य अंचल पर उनकी नजर पड़ी। जंगल,पर्वत और नदी की नैसर्गिक आशा से संपन्न मुस्कुराती एक जमीन। यह इलाका रातू राजा की जमींदारी में था। मैकलुस्की ने रातू महाराजा के मैनेजर मि. पेपी के माध्यम से महाराजा से बातचीत की और अंतत: दस हजार एकड़ जमीन का एक डीड रजिस्टर्ड कराया गया ताकि एंग्लो-इंडियन समुदाय का यह गांव बस सके। मैकलुस्की ने तत्कालीन भारतीय वायसराय लॉर्ड इरविन को भी अनी यह योजना बतायी और द कॉलनाइजेशन सोसाइटी गांव इंडिया की मदद से हेसालंग, कंका और लपड़ा आदि जनजातीय गांवों को मिलाकर दुनिया का एकमात्र एंग्लो इंडियन गांव बसाया। देशभर से अनगिनत एंग्लो-इंडियन परिवार यहां आकर बसे। गांव गुलजार हो उठा। सो शुरू शुरू में स्थानीय आदिवासी इन गोरे-गारे साहबों और मेम साहबों को देख भयाक्रांत थे कि जिन गोरों ने देश को नीलाम कर दिया वे कहीं उनके गांव को भी तो नीलाम करने नहीं चले आए। पर धीरे-धीरे स्थिति सहज होती गई।
कई एंग्लो-इंडियन लोगों ने आदिवासियों से शादियों रचाकर आपस के अविश्वास को दूर कर दिया। किट्टी मेमसाहब ने एक आदिवासी रमेश मुंडा से विवाह किया। रमेश से उसके बच्चे सिम्बिया, इवान, लिंडा और बबलू हैं। विकास के उपन्यास में शरीफे के बीज बबूल से अदभूत मुलाकात होती है जिसे अपने बाप के नाम से ही नफरत है। बबलू को लगता है कि इस काले-कलूटे आदिवासी ने उसकी शाही खूनवाली मां किट्टी टेक्सेरा का जीवन नष्ट कर दिया। कुछ ऐसा ही एहसास गांव के डैनी को भी है जिसके एंग्लो-इंडियन पिता ने एक आदिवासी स्त्री से शादी की, जो उसकी मां थी।
मनोविज्ञान का यह बारीक तंतु अपने उलझ सुलझ के साथ बड़े अदभुत मिजाज में जहां इस गांव में मिलता है, दिखता है, वही विकास के उपन्यास के पृष्ठों में फैले इन पात्रों में भी। फिर भी विकास उस गंज से मिलवाते है। जो एक अदभुत मधुर आलाप है... जिसमें राग की सूक्ष्म परते बारीकी से खुलती हैं। इसलिए मैकलुस्कीगंज यानी राग का रस। यानी सुबह की धैर्यवंती। लय का लावण्य। यानी कंका पहाड़ी और चाट्टी नदी से शोभित वह नन्हा भारत, जहां एंग्लो इंडियन समुदाय के संग-संग राम-रहीम पुराने कुरान सब है। और गंज के जंगल की सघन झुरमुट में दिल्ली के एक व्यवसायी स्व. नरेशचंद्र बाहरी द्वारा बनवाया अधूरा ‘प्रेम मंदिर’ जिसमें मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरूद्वारा सब है। और इस प्रेम मंदिर से जुड़ी एक दारुण लोमहर्षक कथा कि कैसे स्व. नरेश चंद्र बाहरी के बेटे ने अपनी पत्नी व बच्चों को मार डाला और उसे फांसी की सजा हुई। गंज के बंशी लोहार से पूछिये तो कहेगा- आज भी आधी राज को एक प्रेतनी रोती है... वही बाहरी खानदान की बहू। मैकलुस्कीगंज का नंदन कानन रहा है। बॉनर भवन आज विवाद में उलझा है। आजीवन अविवाहित रहीं मिस बॉनर ने इस घर को बड़े नाजों से सजा रखा था। पर आज यह मिस बॉनर की आया मरियम और आर.सी. मिशनवालों के बीच स्वामित्व के विवाद में उलझा पड़ा गहरी उदासी में हैं। गंज की यह तमाम उदासी, उल्लास और तड़प मैकलुस्कीगंज उपन्यास की पंक्ति-पंक्ति में समाहित है। खुशी से ढि़लमिलाते शहर के मन की बढती उदासी लेकर लौटना कैसा होता है..ये बता पाना शायद कठिन होता है।

विदा ओ किटी मेमसाब
किटी दूर अपनी झोपड़ी के बाहर छूट जाती है। धूल उड़ाती हुई मेरी जीप इतनी ही दूर होती जा रही थी जितनी किटी से उसकी संस्कृति। मैंने जीवन में पहली बार धूल में लिपटी, झोला टांगे और देहाती अंदाज में सूती साड़ी सपेटे किसी गोरी चमड़ी वाली को देखा था..सो देर तक वो छवि जेहन में धंसी रही। जब किटी का बोलना याद आता है..टिपिकल बिहारी अंदाज..या कहे हिंदी बेल्ट की हिंदी..उसकी झोपड़े में आज भी गौरवशाली इतिहास की तस्वीरें टंगी है। वक्त के साथ वे भी धुंधली हो रही हैं। किटी के बाद उन्हें कोई नहीं संभालेगा। फिलहाल किटी संभाल रही है और उससे मिलने आने वाले हरेक मेहमान को गर्व के साथ दिखाती है। यही तो बचा है उसके पास..मिटती हुई संस्कृति के बीच जीवन को बचा पाने की जड्डोजहद ज्यादा हावी होती है।
किटी पूरे गांव में फेमस हैं। उसको ढूंढ पाना कोई मुश्किल नहीं। गांव का कोई भी बता देगा कि किटी मेमसाहव कौन हैं और अभी कहां हैं। लोग उनसे मिलने आते हैं। जो भी इस गांव पर स्टोरी करने आता है, किटी से बिना मिले बात बनती नहीं। जैसे वह इस गांव के अंतिम सिरे को कस कर पकड़ कर खड़ी हो। मैंने उपन्यास पढा और उस गांव जाने और किटी से मिलने के लिए बेचैन हो गई थी। मेरी चाह जल्दी पूरी हुई। मैं रोमांच से भरी थी जब किटी मेरे सामने आ खड़ी हुई। विकास झा जी का नाम सुनते ही चहक उठी। मोबाइल पर उसने विकास जी से लंबी बात की...जैसे कोई विदेश में रह रहे अपने पाहुन से अपने दिल की बात करता है। मैंने किटी की वो सारी तस्वीरें खींची। फोन कटने के बाद किटी बोलती रही कि विकास जी ने इस गांव के हितो के लिए क्या क्या किया। कई बाते बताईं। वो याद नहीं रहीं। याद रही तो उसका गिलहरी बन जाना।
किटी के आंगन के अमरुद का स्वाद अभी तक नहीं उतरा है। रह रह कर रघुवीर सहाय की कविता की एक पंक्ति याद आती है..औरत की देह ही उसका देश हैं..। किटी की देह इसी गांव की मिट्टी में सनी हुई है। मैक्लुस्कीगंज ही उसका देश है।
कहती है..मैं क्यो जाती कहीं बाहर..यहां मेरे लोग हैं, मेरी जमीन है, मैं यहां खुश हूं..जिन्हें जाना था वे गए. किटी की पतली दुबली काया कंप कंपा जाती है।
उदासी बोलती है..लोग अब गांव को देखने आते हैं और मुझसे जरुर मिलते हैं..अच्छा लगता है। कोई टिकता नहीं। गांव के चारो तरफ माहौल ठीक नहीं है ना इसीलिए..। किटी का इशारा मैं समझ रही थी।

शाइना नेहवाल के रैकेट और शटल कॉर्क नहीं, देखिए उसकी उछलती स्कर्ट!

Posted By Geetashree On 5:06 AM 4 comments


विभा रानी


छम्मक्छल्लो का उन सबको प्रणाम, जो हमें सेक्स ऑबजेक्ट बनाने पर आमादा हैं.
पोर्न साहित्य देखें, पढें तो आप अश्लील. छम्मक्छल्लो उन्हें अधिक ईमानदार मानती है. छम्मक्छल्लो उनकी बात कर रही है, जो आम जीवन के हर क्षेत्र में हमारी आंख में उंगली डाल डालकर ये बताने में लगे रहते हैं कि ऐ औरत, तुम केवल और केवल सेक्स और उन्माद की वस्तु हो. भले ही तुममें प्रतिभा कूट कूट कर भरी हो, तुम सानिया हो कि शाइना, हमें उसका क्या फायदा, जब हम तुम्हारे हाथों की कला के भीतर से झांकते तुम्हारे यौवन के उन्माद की धार में ना बहें? हाथों की कला तो बहाना है, हमें तो तुहारे यौवन के मद का लुत्फ उठाना है.

आज (22/4/2011) के टाइम्स ऑफ इंडिया के चेन्नै टाइम्स में विश्व के तीसरे नम्बर की बैडमिंटन खिलाडी शाइना नेहवाल द्वारा रुपम जैन को दिए इंटरव्यू में शाइना नेहवाल कहती है कि वह बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन के इस फैसले से खुश नहीं है कि खेल के दौरान महिला खिलाडी शॉर्ट्स के बदले स्कर्ट पहने. मगर, फेडरेशन मानता है कि इससे खेल और पॉपुलर होगा. भाई वाह! समाज में जो दो चार अच्छे पुरुष हैं, इस मानसिकता के खिलाफ आप तो आवाज उठाइए. कामुकों की कालिख की कोठरी में आप पर भी कालिख लग रही है. शाइना कह रही है कि लोग खेल देखने आते हैं, खिलाडियों की पोशाक नहीं. पर फेडरेशन यह माने, तब ना!

अब भाई लोग यह फतवा न दें मेहरबानी से कि ऐसे में शाइना को विरोध करना चाहिये, उसे खेल छोड देना चाहिए. जो भाई लोग स्त्रियों के सम्मान के प्रति इतने ही चिंतित हैं, जिसका ठेका कुछ ने लिया हुआ होता है तो उनसे छम्मक्छल्लो का निवेदन है कि बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन पर दवाब डालें. शाइना मानती है कि ड्रेस का फैसला खिलाडियों पर छोड दिया जाना चाहिए. उसने स्वीकारा है कि अकेला चना भाड नहीं फोड सकता. वह इंतज़ार में है कि अन्य खिलाडी भी स्कर्ट से होनेवाली असुविधा के खिलाफ बोलेंगे और तब सामूहिक स्वर उठेगा, जिसको फायदा खिलाडियों को होगा. मगर तबतक बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन की भोगवादी मानसिकता के प्रति शत शत नमन कि वह विश्व की महिला खिलाडियों के खेल का आनंद तो आगे-पीछे, इसके बहाने उनकी देह, यौवन और यौन का आस्वाद आपको कराएंगे.

अब यह न कहिएगा कि यह फैसला बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन में बैठी किसी महिला अधिकारी ने लिया होगा, क्योंकि महिलाएं ही महिलाओं की सबसे बडी दुश्मन होती हैं.

(विभा रानी हिंदी और मैथिली की साहित्यकार है। चेन्न्ई में नौकरी कर रही हैं। फेसबुक पर खूब सक्रिय है। बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। अपना ब्लाग है..छम्मक छल्लो कहिस. थियेटर करती हैं, नाटक लिखती है। स्त्री के अधिकारो पर बेहद मुखर हैं। यह लेख उन्होंने हमारे लिए लिखा है। मुझ पर उनका बहुत स्नेह है। हम एक जैसा सोचती हैं और एक सा रिएक्ट करती हैं। हम दोनो के भीतर खौलता लावा है। आप पढेंगे तो अंदाजा हो जाएगा।)

मर्दाने चरित्र प्रमाण-पत्र

Posted By Geetashree On 4:18 AM 9 comments


मनीषा

चरित्र चरमराने से परेशान औरतों में लेखक, साहित्यकार, पत्रकार, बैंकर, अदाकार, कवि, कलाकार, डॉक्टर, इंजीनियर, से लेकर भाजी वाली, घरेलु काम वाली, बीपीओ में रात्रि-पाली करने वाली, नर्स, घरवाली, मास्टरनी या बाबूगिरी करने वाली सभी शामिल हैं। अपने समाज में औरत होने का मतलब ही है, दुविधाओं में ग्रस्त रहना। दूसरों यानी पुरूषों के लिए शोक में लिपटी रहना। आचार-व्यवहार पर चरित्र की चाशनी का मुलम्मा चढ़ाये फिरना। पुरूषों ने बेहद चतुराई से स्त्री के चरित्र को हमेशा अपनी दया का मोहताज प्रचारित किया है। औरतों पर त्वरित टिप्पणी कर उनकी छवि बनाने-बिगाडऩे का ठेका वे हमेशा से अपने अंगूठे के नीचे रखने को स्वतंत्र रहे हैं। आज भी उनके लिए यह निर्णय सुनाना कि अमुक लडक़ी बहुत ‘घटिया’ है, काफी पौरुषेय दंभ देने वाला होता है। लड़कियों को लेकर पुरुषों में काफी अलग किस्म की शब्दावली प्रयोग होती है, जिसका जिक्र भी करना अभद्रता माना जा सकता है। बुरी, चरित्रहीन, छिनाल, बाजारू, रंडी जैसी शब्दावली इनके लिए आम है। दरअसल, ये आज भी औरत को प्रोडक्ट से ज्यादा नहीं समझते। अपनी बीवी और बच्ची के अलावा इनको बाजार में टहलती, दफ्तर में काम निपटाती, बस में सफर करती, बैंक में नोट गिनती, सडक़ पार करती, भाजी-सौदा-सुलभ खरीदती हर औरत का चरित्र गंदा लगता है।
जबकि, असलियत यह है कि समाज की सारी औरतों को चरित्र-प्रमाण पत्र बांटने में जुटे ये लोलुप किसी औरत को साफगोई से देखना जानते ही नहीं! मनोविज्ञान चीख-चीख कर अब कहता है कि पुरुषों के दिमाग में हर छठे मिनट पर सेक्स घूमता है। अपनी इस कामुकता पर उन्हें लगाम लगाने की जरूरत महसूस नहीं होती। मेरी एक पत्रकार मित्र बड़ी आहत हैं, ऐसे ही कुछ उद्दंडी पुरुषों की टिप्पणियों से।
हिंदी की एक बड़ी उपन्यासकार भी आहत हो जाती हैं, ऐसी ही छींटाकशी से। ये प्रबुद्ध औरतें हैं। इनकी समाज-परिवार में अपनी पहचान है। अपनी बात भी उचित ढंग से रखने में सक्षम हैं ये। बावजूद इसके, ये उन्हीं दकियानूस जंजालों में उलझ जाती हैं। कोई (पुरुष) हमारे चरित्र का निर्माता कैसे हो सकता है? ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो उन्हें निर्णायक मानने पर मजबूर करती हैं? जो पुरुष किसी भी औरत को कपड़ों की तमाम परतों में लिपटी होने के बावजूद अपनी नजरों से नग्न ही निहारता है, उसके बारे में क्या कहा जाए? हम सब औरतों को यह अहसास नहीं है कि पुरुष जब औरतों को देखते हैं तो सबसे पहले उनकी नजरें छाती पर अटकती हैं। वे जुबान से कुछ भी बोलें, पर उनके चेहरे के हाव-भाव पढ़ कर हम समझ ही लेते हैं कि पुरुष मन में क्या चल रहा है।

औरत का पर-पति की तरफ देखना भी पुरुषावली के अनुसार घृणित है परंतु पर-स्त्री को प्रणय-निमंत्रण देने को वे विजेता के तौर पर देखते हैं। पुरुषों को भ्रम है कि उनके जीवन में जितनी औरतें (अंतरंग) आती हैं, उनका पौरुष उतना ही स्ट्रांग होता जाता है। इसकी महिमा बखानते समय उनको ना तो अपने चरित्र के तार-तार होने का भय होता है, ना ही अपने यौन उच्छृंखलताओं पर किसी तरह की कोई ग्लानि ही। पुरुषों को हमेशा से भ्रम रहा है कि औरतों का वजूद उनकी दया के भरोसे ही धरती पर शेष है। वे औरतों को अपना शिकार मानते हैं और अपने पौरुष को परखने के लिए उसकी देह का इस्तेमाल शौक से करते फिरते हैं। चरित्र को केवल यौन शुचिता से जोडऩे की नासमझी रखने वालों की माफ करके हम महानता के खांचे में नहीं बने रह सकते। हमको जबरन उनके भ्रम को चकनाचूर करना होगा। उनकी दया को दुत्कारना होगा। साथ ही, उनके झूठे पौरुषेय दंभ को कुचलने में कोई संकोच नहीं करना होगा। सुविधाजनक स्थिति में जीने की इसी आदत के चलते निन्दा-रस के साथ-साथ चरित्र उधेडऩे की रसीली बातों से वे खुद को बचा नहीं पाते। अपने पास यह अधिकार सुरक्षित रखने को लालायित पुरुष ‘बुरी’ औरतों की श्रेणी में उन्हीें औरतों को रखते हैं, जो उनकी पहुंच से बाहर नजर आती हैं। अदभूत तर्क तो यह है कि हर मर्द मानकर चलता है कि वे औरतों का चरित्र प्रमाण-पत्र चुटकियों में खड़े-खड़े ही दे सकते हैं। चरित्र चाशनी का यह भ्रम-रस औरतों के दिमाग में इस कदर ठूंस दिया जाता है कि वे इस पर जरा सी खरोच से भी घबरा जाती हैं। यह जानते हुए भी कि इन बातों में तनिक भी दम नहीं है, औरतें कछुए के इस छद्म खोल मे खुद को छिपाने की हर पल कोशिश करती हैं। चरित्रवान औरतों की काबिलियत के कशीदे पढऩे वाले ही कीचड़ उछालने का काम भी करते हैं।

पौरुषेय उद्दंडताओं से त्रस्त औरतों की संख्या अकेले दिल्ली में 80 फीसद है जो घर से बाहर निकलने में ही खुद को असुरक्षित मानती हैं। नन्हीं-नन्हीं बच्चियों को पुरुषों की यौन कुंठाओं से बचाने में हमारी तमाम ऊर्जा लग जाती है, बावजूद इसके रोजाना पुरुष उनको हवस का शिकार बनाते हैं। चारित्रिक दोषों से घबराने वाली हमारी मानसिकता कब खत्म होगी, कहना मुश्किल है क्योंकि इसके लिए ना तो सरकारें काम करेंगी और ना ही कोई आरक्षण काम आएगा। यह मानसिक दशा है, प्रेशर बनाने की साजिश। जिससे बचने का काम ऊर्जावान, सक्षम स्री को ही करना होगा। मर्दों के गढे पैमानों/ पैटर्न को उखाड़ फेंकना होगा और भयभीत हुए बिना ही उनको ललकारना होगा।
यह आज की समस्या नहीं है, भगवान राम पीढिय़ों से पुरुषोत्तम हैं यानी समस्त पुरुषों में उत्तम, पर उन्होंने भी अपनी गर्भवती पत्नी सीता के चरित्र पर लगे दोष के आधार पर उन्हें घर से निकाला दे दिया था। औरत के ‘चरित्र’ का पैमाना कौन तय करेगा और कैसे करेगा, यह सब पुरुष की निर्णय करते रहे हैं। चरित्र को दूध पर पड़ी मलाई बना दिया गया है, जिसको जो चाहे, आकर उतार दे? यह कोई आवरण तो नहीं है ढक कर रखा जाए।

यह पुरुषवादी प्रपंच की देन है जिसने औरतों को मुटï्ठी में भींचे रखने की चतुराई में गढ़ा है। पांच पतियों के साथ रहने वाली द्रोपदी चरित्रवान है, मॉडल से हीरोइन बनी पायल रोहतगी ने ज्यों ही फिल्म डायरेक्टर दिबाकर बनर्जी पर कास्टिंग काउच का आरोप लगाया तो सारा मीडिया (पुरुषवादी) अचानक फायर-बैक करने में जुट गया। सुधीर मिश्रा जैसा संवेदनशील नजर आने वाला गंभीर फिल्मकार बनर्जी की तरफदारी करने लगा। यह सच है कि आज की तारीख में पायल जाना-माना चेहरा है, वह चतुर है। उसको काम पाना आता है पर इसका यह मतलब तो नहीं कि उसके साथ जो हुआ, वह सिर्फ स्टंट था। फिल्म वाले तो प्रचार के नाम पर जाने क्या-क्या करने को पहले से ही तैयार रहते हैं। कुल मिलाकर, सारे आरोप अकेली लडक़ी पर मढऩे की यह घिनौनी सोच कब बदलेगी? लड़कियों को अपना चरित्र संभाल कर रखना चाहिए, पर लडक़ों को यह पाठ पढ़ाने की जरूरत क्यों नहीं होनी चाहिए? ठंडा पेय बेचने वाली मल्टीनैशनल कंपनी विज्ञापन करती है कि अपनी गर्लफैंड के सामने लड़कियों को कैसे ताको, पर उनमें इतना साहस है कि वे कहें कि किसी दूसरे मर्द को कोई ब्याहता कैसे देखेगी, क्योंकि यह फार्मूला पुरुष-विरोधी है, प्रोडक्ट की बिक्री पर इसकी निगेटिविटी दिख जाएगी। टीवी पर आने वाले सारे सीरियल्स यही बेचते हैं ना कि बुरी औरतें दूसरों के पतियों का शिकार करती हैं, जबकि भली औरतें पति से प्रताडि़त होने के बावजूद भी रोती-बिसुरती घुटती रहती है। यह सच है कि पुरुषों को छलने, उनको प्रलोभन देने, अपना काम बनाने और उनको बेवकूफ बनाने की उतावली में जनाना चालबाजी आम है। पर यह दुतरफा खेल है, यहां ना कोई कीचड़ है ना कमल। यहां दोनों रोग (एक)चरित्र हैं। 50-50, आपसी सहमति से बनाया गया कोई भी संबंध बेमानी नहीं होता। हां, ये गेट टू गेदर होता है, लाभ-अलाभ इसी में शामिल होते हैं। इसमें दोनों बराबरी से भागीदारी करते हैं इसलिए चरित्र केवल स्री का ही धूमिल हो, यह बात जमती नहीं। स्री को चरित्र में उलझाकर, पुरुष के भाग्य भरोसे छोडऩे वाली चतुराई के दिन पूरे हो चुके हैं।
पुरुष को चरित्र प्रूफ बनाये रखने की साजिश और परिवार का भाग्यविधाता होने का भ्रम अब खत्म हो चुका है। औरतें बेहद चतुराई से पुरुषों का चरित्र हरण करके अपना भाग्य बनाने की राह पर निकल चुकी हैं। उनको खोने के दर्द से ज्यादा आनन्द ‘झपटने’ का है।

(मनीषा दिल्ली के राष्ट्रीय सहारा अखबार में फीचर एडीटर है और स्त्री विमर्श पर धारदार लेखन के लिए जानी जाती हैं।)