ओ किटी..रहोगी याद

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गीताश्री

‘मैकलुस्कीगंज? एंग्लो इंडियनों का यह गांव आखिर है क्यों? यही एक सवाल है जो संपूर्ण मैकलुस्कीगंज को संतप्त करता रहा है।’
डेनिस गहरी सांस लेकर कहते थे-‘इसलिए कि हमारी यह नस्ल ईश्वर का एक क्रूर मजाक रही है बेटे। कहते हैं, लॉर्ड कर्जन ने एक बार कहा था कि ईश्वर ने हम ब्रिटिशों को बनाया, ईश्वर ने इंडियंस को बनाया और हमने एंग्लो इंडियंस बनाया। यही विडंबना एंग्लो इंडियंस की रही है बेटे। हम न अंग्रेज थे, न ही हिंदुस्तानी...। फिर क्या थे हम...?’

‘बेटे, एंग्लो इंडियन समुदाय एक ऐसा भटका जहाज था जिसके लिए कोई बंदरगाह नहीं था। पर ई.टी.मैकलुस्की ने एक छोटा सा खूबसूरत बंदरगाह अपने अथक परिश्रम से जरूर बना दिया था।

मि.मैकलुस्की के सपनों का कब्रिस्तान..एंगलो-इंडियनों के अतीत के अस्तित्व की कहानी कहता एक बेपनाह सन्नाटा भर रह जाएगा यहां रोबिन..बस एक दर्दभरा सन्नाटा..। पर उस दर्द को भी आने वाले समय में कौन महसूस करेगा रोबिन..कौन? चलो, अच्छा ही है,एक संतप्त नस्ल अपनी समाप्ति पर है..
(मैकलुस्कीगंज उपन्यास का अंश)


क्या आप कभी मैकलुस्की गंज गए हैं?
अगर नहीं, तो लगता है भाग्य ने अब तक आपका साथ नहीं दिया है। दरअसल, झारखंड प्रांत की प्राकृतिक आभा- शोभा के बीच व्यवस्थित दुनिया के इस एकमात्र एंग्लो-इंडियन ग्राम को लेकर एक जुमला बड़ा मशहूर है, ‘मेक लक, देन कम टू गंज।’ यानी किस्मत बनाइए, तब गंज आइए।
यों गुजरे दशकों में भले ही कई बार इस गंज को ‘घोस्ट टाउन’ के फतवे से गुजरना पड़ा है लेकिन कुछ कुदरती बात है कि फीनिक्स पक्षी की तरह यह बार-बार राख से उठ खड़ा होता है। क्या मैकलुस्कीगंज का वजूद एक दिन दुनिया से मिट जाएगा? क्या जंगली हवा की सीढियों के संग वाकई गुम हो जाएगा यह अनूठा गांव? ऐसी तमाम आशंकाएं इस गांव के एंग्लो-इंडियन समुदाय को हमेशा बेचैन करती रहती हैं।
इन दिनों गंज के चेहरे पर थोड़ी मुस्कान आई है। गंज को पता चल गया है कि उनकी महागाथा लिखने वाले उपन्यासकार-पत्रकार विकास कुमार झा को अंतराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान के लिए चुना गया है। मैक्लुस्कीगंज उपन्यास में इकलौता एंगलो इंडियन शहर भले उदास है लेकिन इस खबर से वैसे ही हंस रहा है जैसे मिलन कुंदेरा के कथनानुसार उपन्यास में ईश्वर हंसता है।
पिछले दो दशकों से इस गांव से विकास कुमार झा का गहरा अपनापा रहा है और इसी अपनापे के बीच उनका बहुचर्चित उपन्यास ‘मैकलुस्कीगंज’ तकरीबन पंद्रह वर्षों के गहन शोध के बाद पूरा हो पाया है।
इसी गांव की पगडंडी पर एक स्त्री झोला टांगे, साड़ी का पल्लू कमर में ठूंसे लगभग दौड़ती सी चली आ रही है। वह किट्टी मेमसाब हैं। गांव वाले उन्हें इसी नाम से बुलाते हैं।
उपन्यासकार ने लिखा है.. ‘किट्टी अब स्टेशन पर मजदूरी करती है। छोटे मोटे काम करती है। पर मैंने देखा था, आसपास के लोग तब भी किट्टी मेमसाब ही कह कर पुकारते थे। हैसियत गिर गई थी। पर किट्टी तो किट्टी थी रोबिन..उसके संस्कार तो थे ही..वह आधी अंगरेज..वह आधी सी हिंदुस्तानी औरत..।’
जब किट्टी करीब आई तो मैंने उपन्यासकार की आंखों से देखा। उसकी नीली आंखें दोपहरी में भी चमक रही थी इस बात से कि हम विकास जी का पैगाम लेकर आए हैं। वह चहकी.. ‘विकास जी को पूरा गांव प्यार करता है, और वह भी..। उन्होंने बहुत कुछ किया है हमारे गांव के लिए।’
पगडंडी पर धूल उड़ाती किट्टी के साथ चलते हुए फिर पंक्तियां याद आईं--रोबिन..तुम्हारे पापा उस किट्टी पर फिदा रहते थे..किट्टी की रंगत 62 साल की उम्र में भी वैसी ही है। झोपड़ी के बाहर प्लास्टिक की चरमराई हुई कुर्सियो पर धंसते हुए मैंने देखा कि दुबली पतली किट्टी पलक झपकते अमरुद के पेड़ की फुनगी पर गिलहरी की तरह सरसराते हुए चढ गई। ऊपर से पके अमरुद तोड़ कर हमारी तरफ फेंकती हुई कहती है.. ‘खाइए, मीठे हैं, हमारी मिठाई यही है।’ बेपनाह सन्नाटे के बीच फुनगी से टपकते अमरुद हथेलियों में समा नहीं रहे थे।
किट्टी कहती है, ‘यहां सब कुछ खत्म है। कुछ नहीं बचा है। सब चले गए, सब उजड़ गया। ये फल ही बचे हैं जिन्हें बेच कर गुजारा हो जाता है।’
किसी उपन्यास के किरदार से मिलना किसी पाठक के लिए कितना रोमांचकारी हो सकता है, ये मैंने किट्टी समेत अन्य कई किरदारो से मिल कर जाना।
स्वयं विकास के शब्दों में यह गांव मेरे लिए जागी आंखों का सपना है। वाकई इस औपन्यासिक महागाथा से गुजरना इस गांव के अंर्तमन की परिक्रमा करने जैसा है। अपने वास्तविक नामों के संग उपन्यास में मौजूद जीते-जागते अनगिनत पात्र जब गांव में मिलते हैं तो सुखद रोमांच सा होता है। मि. नोएल गॉर्डन, मि.मेडेज, किट्टी टेक्सेरा, जूडी मेडोंसा सरीखे अनगिनत चेहरे। पर एक अनेक संताप सबके चेहरे पर जो विकास के उपन्यास में भी गूंजता है.. हमारी नस्ल ईश्वर का एक क्रूर मजाक रही है। एक कविता... ‘एवरि पार्ट ऑफ मी इन अलाइव एक्सेप्ट माई फेस...।’ हमारे शरीर का हर हिस्सा जिंदा है, सिर हमारे चेहरे के। सच है कि यह संतान एंग्लो इंडियन लोगों के चेहरे से कभी ओझल नहीं हुआ।
हालांकि साइमन कमीशन की रिपोर्ट में अंग्रेजों ने जब इनकार कर दिया कि इस समुदाय की जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी तो तत्कालीन भारतीय नेताओं ने ऐलान किया कि यह समुदाय भारत में सम्मान से रहेगा। इसी से मुग्ध होकर मि.टी.मैकलुस्की ने सन 1934 में एंग्लो इंडियन समुदाय का एक गांव बसाया। दरअसल, मैकलुस्की की समझ थी कि गांवों के देश भारत में इस समुदाय का भी अपना एक गांव होना चाहिए। गांव बसाने के सपने के साथ मैकलुस्की सारे भारत में कहां-कहां नहीं घूमे और आखिरकार जब वे कलकत्ता लौट रहे थे तो छोटानागपुर के इस वन्य अंचल पर उनकी नजर पड़ी। जंगल,पर्वत और नदी की नैसर्गिक आशा से संपन्न मुस्कुराती एक जमीन। यह इलाका रातू राजा की जमींदारी में था। मैकलुस्की ने रातू महाराजा के मैनेजर मि. पेपी के माध्यम से महाराजा से बातचीत की और अंतत: दस हजार एकड़ जमीन का एक डीड रजिस्टर्ड कराया गया ताकि एंग्लो-इंडियन समुदाय का यह गांव बस सके। मैकलुस्की ने तत्कालीन भारतीय वायसराय लॉर्ड इरविन को भी अनी यह योजना बतायी और द कॉलनाइजेशन सोसाइटी गांव इंडिया की मदद से हेसालंग, कंका और लपड़ा आदि जनजातीय गांवों को मिलाकर दुनिया का एकमात्र एंग्लो इंडियन गांव बसाया। देशभर से अनगिनत एंग्लो-इंडियन परिवार यहां आकर बसे। गांव गुलजार हो उठा। सो शुरू शुरू में स्थानीय आदिवासी इन गोरे-गारे साहबों और मेम साहबों को देख भयाक्रांत थे कि जिन गोरों ने देश को नीलाम कर दिया वे कहीं उनके गांव को भी तो नीलाम करने नहीं चले आए। पर धीरे-धीरे स्थिति सहज होती गई।
कई एंग्लो-इंडियन लोगों ने आदिवासियों से शादियों रचाकर आपस के अविश्वास को दूर कर दिया। किट्टी मेमसाहब ने एक आदिवासी रमेश मुंडा से विवाह किया। रमेश से उसके बच्चे सिम्बिया, इवान, लिंडा और बबलू हैं। विकास के उपन्यास में शरीफे के बीज बबूल से अदभूत मुलाकात होती है जिसे अपने बाप के नाम से ही नफरत है। बबलू को लगता है कि इस काले-कलूटे आदिवासी ने उसकी शाही खूनवाली मां किट्टी टेक्सेरा का जीवन नष्ट कर दिया। कुछ ऐसा ही एहसास गांव के डैनी को भी है जिसके एंग्लो-इंडियन पिता ने एक आदिवासी स्त्री से शादी की, जो उसकी मां थी।
मनोविज्ञान का यह बारीक तंतु अपने उलझ सुलझ के साथ बड़े अदभुत मिजाज में जहां इस गांव में मिलता है, दिखता है, वही विकास के उपन्यास के पृष्ठों में फैले इन पात्रों में भी। फिर भी विकास उस गंज से मिलवाते है। जो एक अदभुत मधुर आलाप है... जिसमें राग की सूक्ष्म परते बारीकी से खुलती हैं। इसलिए मैकलुस्कीगंज यानी राग का रस। यानी सुबह की धैर्यवंती। लय का लावण्य। यानी कंका पहाड़ी और चाट्टी नदी से शोभित वह नन्हा भारत, जहां एंग्लो इंडियन समुदाय के संग-संग राम-रहीम पुराने कुरान सब है। और गंज के जंगल की सघन झुरमुट में दिल्ली के एक व्यवसायी स्व. नरेशचंद्र बाहरी द्वारा बनवाया अधूरा ‘प्रेम मंदिर’ जिसमें मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरूद्वारा सब है। और इस प्रेम मंदिर से जुड़ी एक दारुण लोमहर्षक कथा कि कैसे स्व. नरेश चंद्र बाहरी के बेटे ने अपनी पत्नी व बच्चों को मार डाला और उसे फांसी की सजा हुई। गंज के बंशी लोहार से पूछिये तो कहेगा- आज भी आधी राज को एक प्रेतनी रोती है... वही बाहरी खानदान की बहू। मैकलुस्कीगंज का नंदन कानन रहा है। बॉनर भवन आज विवाद में उलझा है। आजीवन अविवाहित रहीं मिस बॉनर ने इस घर को बड़े नाजों से सजा रखा था। पर आज यह मिस बॉनर की आया मरियम और आर.सी. मिशनवालों के बीच स्वामित्व के विवाद में उलझा पड़ा गहरी उदासी में हैं। गंज की यह तमाम उदासी, उल्लास और तड़प मैकलुस्कीगंज उपन्यास की पंक्ति-पंक्ति में समाहित है। खुशी से ढि़लमिलाते शहर के मन की बढती उदासी लेकर लौटना कैसा होता है..ये बता पाना शायद कठिन होता है।

विदा ओ किटी मेमसाब
किटी दूर अपनी झोपड़ी के बाहर छूट जाती है। धूल उड़ाती हुई मेरी जीप इतनी ही दूर होती जा रही थी जितनी किटी से उसकी संस्कृति। मैंने जीवन में पहली बार धूल में लिपटी, झोला टांगे और देहाती अंदाज में सूती साड़ी सपेटे किसी गोरी चमड़ी वाली को देखा था..सो देर तक वो छवि जेहन में धंसी रही। जब किटी का बोलना याद आता है..टिपिकल बिहारी अंदाज..या कहे हिंदी बेल्ट की हिंदी..उसकी झोपड़े में आज भी गौरवशाली इतिहास की तस्वीरें टंगी है। वक्त के साथ वे भी धुंधली हो रही हैं। किटी के बाद उन्हें कोई नहीं संभालेगा। फिलहाल किटी संभाल रही है और उससे मिलने आने वाले हरेक मेहमान को गर्व के साथ दिखाती है। यही तो बचा है उसके पास..मिटती हुई संस्कृति के बीच जीवन को बचा पाने की जड्डोजहद ज्यादा हावी होती है।
किटी पूरे गांव में फेमस हैं। उसको ढूंढ पाना कोई मुश्किल नहीं। गांव का कोई भी बता देगा कि किटी मेमसाहव कौन हैं और अभी कहां हैं। लोग उनसे मिलने आते हैं। जो भी इस गांव पर स्टोरी करने आता है, किटी से बिना मिले बात बनती नहीं। जैसे वह इस गांव के अंतिम सिरे को कस कर पकड़ कर खड़ी हो। मैंने उपन्यास पढा और उस गांव जाने और किटी से मिलने के लिए बेचैन हो गई थी। मेरी चाह जल्दी पूरी हुई। मैं रोमांच से भरी थी जब किटी मेरे सामने आ खड़ी हुई। विकास झा जी का नाम सुनते ही चहक उठी। मोबाइल पर उसने विकास जी से लंबी बात की...जैसे कोई विदेश में रह रहे अपने पाहुन से अपने दिल की बात करता है। मैंने किटी की वो सारी तस्वीरें खींची। फोन कटने के बाद किटी बोलती रही कि विकास जी ने इस गांव के हितो के लिए क्या क्या किया। कई बाते बताईं। वो याद नहीं रहीं। याद रही तो उसका गिलहरी बन जाना।
किटी के आंगन के अमरुद का स्वाद अभी तक नहीं उतरा है। रह रह कर रघुवीर सहाय की कविता की एक पंक्ति याद आती है..औरत की देह ही उसका देश हैं..। किटी की देह इसी गांव की मिट्टी में सनी हुई है। मैक्लुस्कीगंज ही उसका देश है।
कहती है..मैं क्यो जाती कहीं बाहर..यहां मेरे लोग हैं, मेरी जमीन है, मैं यहां खुश हूं..जिन्हें जाना था वे गए. किटी की पतली दुबली काया कंप कंपा जाती है।
उदासी बोलती है..लोग अब गांव को देखने आते हैं और मुझसे जरुर मिलते हैं..अच्छा लगता है। कोई टिकता नहीं। गांव के चारो तरफ माहौल ठीक नहीं है ना इसीलिए..। किटी का इशारा मैं समझ रही थी।

शाइना नेहवाल के रैकेट और शटल कॉर्क नहीं, देखिए उसकी उछलती स्कर्ट!

Posted By Geetashree On 5:06 AM 4 comments


विभा रानी


छम्मक्छल्लो का उन सबको प्रणाम, जो हमें सेक्स ऑबजेक्ट बनाने पर आमादा हैं.
पोर्न साहित्य देखें, पढें तो आप अश्लील. छम्मक्छल्लो उन्हें अधिक ईमानदार मानती है. छम्मक्छल्लो उनकी बात कर रही है, जो आम जीवन के हर क्षेत्र में हमारी आंख में उंगली डाल डालकर ये बताने में लगे रहते हैं कि ऐ औरत, तुम केवल और केवल सेक्स और उन्माद की वस्तु हो. भले ही तुममें प्रतिभा कूट कूट कर भरी हो, तुम सानिया हो कि शाइना, हमें उसका क्या फायदा, जब हम तुम्हारे हाथों की कला के भीतर से झांकते तुम्हारे यौवन के उन्माद की धार में ना बहें? हाथों की कला तो बहाना है, हमें तो तुहारे यौवन के मद का लुत्फ उठाना है.

आज (22/4/2011) के टाइम्स ऑफ इंडिया के चेन्नै टाइम्स में विश्व के तीसरे नम्बर की बैडमिंटन खिलाडी शाइना नेहवाल द्वारा रुपम जैन को दिए इंटरव्यू में शाइना नेहवाल कहती है कि वह बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन के इस फैसले से खुश नहीं है कि खेल के दौरान महिला खिलाडी शॉर्ट्स के बदले स्कर्ट पहने. मगर, फेडरेशन मानता है कि इससे खेल और पॉपुलर होगा. भाई वाह! समाज में जो दो चार अच्छे पुरुष हैं, इस मानसिकता के खिलाफ आप तो आवाज उठाइए. कामुकों की कालिख की कोठरी में आप पर भी कालिख लग रही है. शाइना कह रही है कि लोग खेल देखने आते हैं, खिलाडियों की पोशाक नहीं. पर फेडरेशन यह माने, तब ना!

अब भाई लोग यह फतवा न दें मेहरबानी से कि ऐसे में शाइना को विरोध करना चाहिये, उसे खेल छोड देना चाहिए. जो भाई लोग स्त्रियों के सम्मान के प्रति इतने ही चिंतित हैं, जिसका ठेका कुछ ने लिया हुआ होता है तो उनसे छम्मक्छल्लो का निवेदन है कि बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन पर दवाब डालें. शाइना मानती है कि ड्रेस का फैसला खिलाडियों पर छोड दिया जाना चाहिए. उसने स्वीकारा है कि अकेला चना भाड नहीं फोड सकता. वह इंतज़ार में है कि अन्य खिलाडी भी स्कर्ट से होनेवाली असुविधा के खिलाफ बोलेंगे और तब सामूहिक स्वर उठेगा, जिसको फायदा खिलाडियों को होगा. मगर तबतक बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन की भोगवादी मानसिकता के प्रति शत शत नमन कि वह विश्व की महिला खिलाडियों के खेल का आनंद तो आगे-पीछे, इसके बहाने उनकी देह, यौवन और यौन का आस्वाद आपको कराएंगे.

अब यह न कहिएगा कि यह फैसला बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन में बैठी किसी महिला अधिकारी ने लिया होगा, क्योंकि महिलाएं ही महिलाओं की सबसे बडी दुश्मन होती हैं.

(विभा रानी हिंदी और मैथिली की साहित्यकार है। चेन्न्ई में नौकरी कर रही हैं। फेसबुक पर खूब सक्रिय है। बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। अपना ब्लाग है..छम्मक छल्लो कहिस. थियेटर करती हैं, नाटक लिखती है। स्त्री के अधिकारो पर बेहद मुखर हैं। यह लेख उन्होंने हमारे लिए लिखा है। मुझ पर उनका बहुत स्नेह है। हम एक जैसा सोचती हैं और एक सा रिएक्ट करती हैं। हम दोनो के भीतर खौलता लावा है। आप पढेंगे तो अंदाजा हो जाएगा।)

मर्दाने चरित्र प्रमाण-पत्र

Posted By Geetashree On 4:18 AM 9 comments


मनीषा

चरित्र चरमराने से परेशान औरतों में लेखक, साहित्यकार, पत्रकार, बैंकर, अदाकार, कवि, कलाकार, डॉक्टर, इंजीनियर, से लेकर भाजी वाली, घरेलु काम वाली, बीपीओ में रात्रि-पाली करने वाली, नर्स, घरवाली, मास्टरनी या बाबूगिरी करने वाली सभी शामिल हैं। अपने समाज में औरत होने का मतलब ही है, दुविधाओं में ग्रस्त रहना। दूसरों यानी पुरूषों के लिए शोक में लिपटी रहना। आचार-व्यवहार पर चरित्र की चाशनी का मुलम्मा चढ़ाये फिरना। पुरूषों ने बेहद चतुराई से स्त्री के चरित्र को हमेशा अपनी दया का मोहताज प्रचारित किया है। औरतों पर त्वरित टिप्पणी कर उनकी छवि बनाने-बिगाडऩे का ठेका वे हमेशा से अपने अंगूठे के नीचे रखने को स्वतंत्र रहे हैं। आज भी उनके लिए यह निर्णय सुनाना कि अमुक लडक़ी बहुत ‘घटिया’ है, काफी पौरुषेय दंभ देने वाला होता है। लड़कियों को लेकर पुरुषों में काफी अलग किस्म की शब्दावली प्रयोग होती है, जिसका जिक्र भी करना अभद्रता माना जा सकता है। बुरी, चरित्रहीन, छिनाल, बाजारू, रंडी जैसी शब्दावली इनके लिए आम है। दरअसल, ये आज भी औरत को प्रोडक्ट से ज्यादा नहीं समझते। अपनी बीवी और बच्ची के अलावा इनको बाजार में टहलती, दफ्तर में काम निपटाती, बस में सफर करती, बैंक में नोट गिनती, सडक़ पार करती, भाजी-सौदा-सुलभ खरीदती हर औरत का चरित्र गंदा लगता है।
जबकि, असलियत यह है कि समाज की सारी औरतों को चरित्र-प्रमाण पत्र बांटने में जुटे ये लोलुप किसी औरत को साफगोई से देखना जानते ही नहीं! मनोविज्ञान चीख-चीख कर अब कहता है कि पुरुषों के दिमाग में हर छठे मिनट पर सेक्स घूमता है। अपनी इस कामुकता पर उन्हें लगाम लगाने की जरूरत महसूस नहीं होती। मेरी एक पत्रकार मित्र बड़ी आहत हैं, ऐसे ही कुछ उद्दंडी पुरुषों की टिप्पणियों से।
हिंदी की एक बड़ी उपन्यासकार भी आहत हो जाती हैं, ऐसी ही छींटाकशी से। ये प्रबुद्ध औरतें हैं। इनकी समाज-परिवार में अपनी पहचान है। अपनी बात भी उचित ढंग से रखने में सक्षम हैं ये। बावजूद इसके, ये उन्हीं दकियानूस जंजालों में उलझ जाती हैं। कोई (पुरुष) हमारे चरित्र का निर्माता कैसे हो सकता है? ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो उन्हें निर्णायक मानने पर मजबूर करती हैं? जो पुरुष किसी भी औरत को कपड़ों की तमाम परतों में लिपटी होने के बावजूद अपनी नजरों से नग्न ही निहारता है, उसके बारे में क्या कहा जाए? हम सब औरतों को यह अहसास नहीं है कि पुरुष जब औरतों को देखते हैं तो सबसे पहले उनकी नजरें छाती पर अटकती हैं। वे जुबान से कुछ भी बोलें, पर उनके चेहरे के हाव-भाव पढ़ कर हम समझ ही लेते हैं कि पुरुष मन में क्या चल रहा है।

औरत का पर-पति की तरफ देखना भी पुरुषावली के अनुसार घृणित है परंतु पर-स्त्री को प्रणय-निमंत्रण देने को वे विजेता के तौर पर देखते हैं। पुरुषों को भ्रम है कि उनके जीवन में जितनी औरतें (अंतरंग) आती हैं, उनका पौरुष उतना ही स्ट्रांग होता जाता है। इसकी महिमा बखानते समय उनको ना तो अपने चरित्र के तार-तार होने का भय होता है, ना ही अपने यौन उच्छृंखलताओं पर किसी तरह की कोई ग्लानि ही। पुरुषों को हमेशा से भ्रम रहा है कि औरतों का वजूद उनकी दया के भरोसे ही धरती पर शेष है। वे औरतों को अपना शिकार मानते हैं और अपने पौरुष को परखने के लिए उसकी देह का इस्तेमाल शौक से करते फिरते हैं। चरित्र को केवल यौन शुचिता से जोडऩे की नासमझी रखने वालों की माफ करके हम महानता के खांचे में नहीं बने रह सकते। हमको जबरन उनके भ्रम को चकनाचूर करना होगा। उनकी दया को दुत्कारना होगा। साथ ही, उनके झूठे पौरुषेय दंभ को कुचलने में कोई संकोच नहीं करना होगा। सुविधाजनक स्थिति में जीने की इसी आदत के चलते निन्दा-रस के साथ-साथ चरित्र उधेडऩे की रसीली बातों से वे खुद को बचा नहीं पाते। अपने पास यह अधिकार सुरक्षित रखने को लालायित पुरुष ‘बुरी’ औरतों की श्रेणी में उन्हीें औरतों को रखते हैं, जो उनकी पहुंच से बाहर नजर आती हैं। अदभूत तर्क तो यह है कि हर मर्द मानकर चलता है कि वे औरतों का चरित्र प्रमाण-पत्र चुटकियों में खड़े-खड़े ही दे सकते हैं। चरित्र चाशनी का यह भ्रम-रस औरतों के दिमाग में इस कदर ठूंस दिया जाता है कि वे इस पर जरा सी खरोच से भी घबरा जाती हैं। यह जानते हुए भी कि इन बातों में तनिक भी दम नहीं है, औरतें कछुए के इस छद्म खोल मे खुद को छिपाने की हर पल कोशिश करती हैं। चरित्रवान औरतों की काबिलियत के कशीदे पढऩे वाले ही कीचड़ उछालने का काम भी करते हैं।

पौरुषेय उद्दंडताओं से त्रस्त औरतों की संख्या अकेले दिल्ली में 80 फीसद है जो घर से बाहर निकलने में ही खुद को असुरक्षित मानती हैं। नन्हीं-नन्हीं बच्चियों को पुरुषों की यौन कुंठाओं से बचाने में हमारी तमाम ऊर्जा लग जाती है, बावजूद इसके रोजाना पुरुष उनको हवस का शिकार बनाते हैं। चारित्रिक दोषों से घबराने वाली हमारी मानसिकता कब खत्म होगी, कहना मुश्किल है क्योंकि इसके लिए ना तो सरकारें काम करेंगी और ना ही कोई आरक्षण काम आएगा। यह मानसिक दशा है, प्रेशर बनाने की साजिश। जिससे बचने का काम ऊर्जावान, सक्षम स्री को ही करना होगा। मर्दों के गढे पैमानों/ पैटर्न को उखाड़ फेंकना होगा और भयभीत हुए बिना ही उनको ललकारना होगा।
यह आज की समस्या नहीं है, भगवान राम पीढिय़ों से पुरुषोत्तम हैं यानी समस्त पुरुषों में उत्तम, पर उन्होंने भी अपनी गर्भवती पत्नी सीता के चरित्र पर लगे दोष के आधार पर उन्हें घर से निकाला दे दिया था। औरत के ‘चरित्र’ का पैमाना कौन तय करेगा और कैसे करेगा, यह सब पुरुष की निर्णय करते रहे हैं। चरित्र को दूध पर पड़ी मलाई बना दिया गया है, जिसको जो चाहे, आकर उतार दे? यह कोई आवरण तो नहीं है ढक कर रखा जाए।

यह पुरुषवादी प्रपंच की देन है जिसने औरतों को मुटï्ठी में भींचे रखने की चतुराई में गढ़ा है। पांच पतियों के साथ रहने वाली द्रोपदी चरित्रवान है, मॉडल से हीरोइन बनी पायल रोहतगी ने ज्यों ही फिल्म डायरेक्टर दिबाकर बनर्जी पर कास्टिंग काउच का आरोप लगाया तो सारा मीडिया (पुरुषवादी) अचानक फायर-बैक करने में जुट गया। सुधीर मिश्रा जैसा संवेदनशील नजर आने वाला गंभीर फिल्मकार बनर्जी की तरफदारी करने लगा। यह सच है कि आज की तारीख में पायल जाना-माना चेहरा है, वह चतुर है। उसको काम पाना आता है पर इसका यह मतलब तो नहीं कि उसके साथ जो हुआ, वह सिर्फ स्टंट था। फिल्म वाले तो प्रचार के नाम पर जाने क्या-क्या करने को पहले से ही तैयार रहते हैं। कुल मिलाकर, सारे आरोप अकेली लडक़ी पर मढऩे की यह घिनौनी सोच कब बदलेगी? लड़कियों को अपना चरित्र संभाल कर रखना चाहिए, पर लडक़ों को यह पाठ पढ़ाने की जरूरत क्यों नहीं होनी चाहिए? ठंडा पेय बेचने वाली मल्टीनैशनल कंपनी विज्ञापन करती है कि अपनी गर्लफैंड के सामने लड़कियों को कैसे ताको, पर उनमें इतना साहस है कि वे कहें कि किसी दूसरे मर्द को कोई ब्याहता कैसे देखेगी, क्योंकि यह फार्मूला पुरुष-विरोधी है, प्रोडक्ट की बिक्री पर इसकी निगेटिविटी दिख जाएगी। टीवी पर आने वाले सारे सीरियल्स यही बेचते हैं ना कि बुरी औरतें दूसरों के पतियों का शिकार करती हैं, जबकि भली औरतें पति से प्रताडि़त होने के बावजूद भी रोती-बिसुरती घुटती रहती है। यह सच है कि पुरुषों को छलने, उनको प्रलोभन देने, अपना काम बनाने और उनको बेवकूफ बनाने की उतावली में जनाना चालबाजी आम है। पर यह दुतरफा खेल है, यहां ना कोई कीचड़ है ना कमल। यहां दोनों रोग (एक)चरित्र हैं। 50-50, आपसी सहमति से बनाया गया कोई भी संबंध बेमानी नहीं होता। हां, ये गेट टू गेदर होता है, लाभ-अलाभ इसी में शामिल होते हैं। इसमें दोनों बराबरी से भागीदारी करते हैं इसलिए चरित्र केवल स्री का ही धूमिल हो, यह बात जमती नहीं। स्री को चरित्र में उलझाकर, पुरुष के भाग्य भरोसे छोडऩे वाली चतुराई के दिन पूरे हो चुके हैं।
पुरुष को चरित्र प्रूफ बनाये रखने की साजिश और परिवार का भाग्यविधाता होने का भ्रम अब खत्म हो चुका है। औरतें बेहद चतुराई से पुरुषों का चरित्र हरण करके अपना भाग्य बनाने की राह पर निकल चुकी हैं। उनको खोने के दर्द से ज्यादा आनन्द ‘झपटने’ का है।

(मनीषा दिल्ली के राष्ट्रीय सहारा अखबार में फीचर एडीटर है और स्त्री विमर्श पर धारदार लेखन के लिए जानी जाती हैं।)

अन्ना की आंधी में हम भी उड़े, आप भी जुड़े

Posted By Geetashree On 6:41 AM 6 comments


गीताश्री

दोस्तो, जल्दी में थोड़ी सी बात...आज अन्ना की आंधी में मैं भी उड़ी। दिन भर एसएमएस भेजे..दोस्तो से अपील की कि वे जंतर मंतर जाए..भले थोड़ी देर के लिए। एक इतिहास वहां रचा जा रहा है, उसके हिस्से बनें, अपना योगदान दें। जो लोग व्यक्ति केंद्रित प्रलापो विलापो में जुटे हैं उन्हें सदज्ञान आए कि इस वक्त मुद्दे कितने महत्वपूर्ण हैं। आप दूर हैं, कोई बात नहीं..हुक्मरानों को हिला देने वाले एक आंदोलन को अपना नैतिक समर्थन तो दे ही सकते हैं। तरीका कोई भी हो सकता है। लेकिन वक्त आ गया है कि आप जाग जाएं..अपने लिए ना सही..भावी पीढी के लिए जो एक भष्ट्राचार मुक्त समाज में सांस ले सकेगी। अपनी भावी पीढी को आप कुछ तो दे जाएं।
जंतर मंतर पर एक तरफ भूख हड़ताल पर बैठे अन्ना और उनके कुछ समर्थक..भूख हमें लगी थी। वहां खाने पीने का छोटा सा ढाबा है जो बहुत साल पहले रिपोर्टिंग के दौरान रोज खाने का हमारा अड्डा हुआ करता था। खाना टेस्टी होता है। दूर दूर से लोग खाने आते हैं। आज भी कुछ लोग खा रहे थे...ये वो लोग थे जो बहुत दूर से अन्ना के समर्थन में चल कर आए थे और जिनका खाना जरुरी था कि बहरी सरकार के कान के परदे फाड़ सके उनकी बुलंद आवाज।

मन हुआ कि कुछ खा लूं..खाया नहीं गया। दूर मंच पर बैठे अन्ना दिखाई दिए.खाना तो घर पर भी खा लेंगे लेकिन नारा लगाने और तालियां बजा कर हौसला बढाने का अवसर फिर ना मिलेगा। रोज के काम निपटाने ही हैं, आफिस जाना ही है, घर लौटना ही है। विनोद शुक्ल याद आते हैं...घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता, जितना लौटने के लिए होता है....

गरमी है इन दिनों। सिर पर धूप चमकती है। सफेद रंग के शामियाने तने हैं सिर पर। पर गरमी सारे बंधन तोड़ कर सिरो को जलाती है। आंदोलनकारियो को इसका एहसास नहीं। कोई केरल से चला आ रहा है तो अलीगढ मुस्लिम विश्वविधालय से छात्रों का हुजुम चला आ रहा है। एनआरआई मेहमान भी टीवी पर खबरे देख मुहिम को समर्थन देने चले आए। एक 78 साल का बूढा, कैसे देश के नौजवानो को झकझोर रहा है..यहां देखिए।

एक पल के लिए भीड़ का चेहरा एक सा हो जाता है। सब एक से हैं..क्योंकि सबका मकसद एक है। ललकार में सबकी आवाज एक सी होती है। इस आंदोलन का किसी राजनीतिक पार्टी से कोई लेना देना नहीं है। राजनीतिक दलो को यहां रोटियां सेंकने का मौका नहीं मिलेगा।

जेपी आंदोलन की हल्की सी याद है। याद करुं तो कोलाहल सा उठता है जेहन में। स्मृतियो के धुंधले आकाश में एक बूढा चेहरा चमकता है। एक भीड़ दिखाई देती है। सायरन और भगदड़ सी सड़को पर.पूरा याद होतो आज से तुलना करें। लेकिन आज जो कुछ देखा..वह कितना आश्वस्तिदायक है। लोग अपने आप आ रहे हैं। खुद ही अपील कर रहे हैं। किसी का निजी स्वार्थ नहीं। एक ही एजेंडा। मीडिया की सकारात्मक भूमिका। वहां खड़े होकर आप टीवी चैनलो के रिपोर्टर का पीटीसी सुनें तो अंदाजा हो जाएगा। मगर सरकार हिल कर भी हिलती दिखाई नहीं दे रही। और कितने दिन अन्ना को बिना अन्न के रहना पड़ेगा।
मन अजीब सा हो रहा है। कुछ खाओ तो अपराध सा लगता है। आज रात सोच रहे हैं वहां डेरा डालें। कमसेकम देर तक रुका तो जा सकेगा। हाथ में कैंडिल लेकर रोशनी तो जलाई जा सकती है। देखें, क्या होता है। फिलहाल खबरो पर गहन नजर है। अन्ना का चेहरा गांधी की तरह होता जा रहा है...

बोल कि लब आजाद हैं तेरे...

Posted By Geetashree On 8:42 PM 10 comments

महिला दिवस पर विशेष....कुछ कविताएं, कुछ टुकड़ें..
गीताश्री

तुम इलाहाबाद के पथ पर
पत्थर तोड़नेवाली बाला नहीं
जिसे निराला ने देखा था

तुम शरत के उपन्यासों की नायिका नहीं,
लारेंस,काफ्का, मंटो और राजकमल की लेखनी ने तुम्हें नहीं रचा,
भीष्म साहनी की बासंती
या आलोकधन्वा की भागी हुई लड़कियों में भी
तुम्हारी गिनती नहीं हो सकती
तुम्हें मैं नारी मुक्ति आंदोलन की नायिकाओं की श्रेणी में भी नहीं पाता
तुम्हें पेट भरने के लिए फलवाले किसी पेड़ की तलाश भी नहीं
लेकिन उड़ने की कद्र की है तुमने
श्रम मूल्य है तुम्हारा पसीना
पसन्द है तुम्हे
यही मुझे अच्छा लगता है सोनचिरैया,यही।
(वेद प्रकाश वाजपेयी की कविता "सोनचिरैया" का अंश)

....बोए जाते हैं बेटे
उग आती है बेटियां
एवरेस्ट की चोटी तक ठेले जाते हैं बेटे
चढ जाती है बेटियां....(कवि का नाम पता नहीं)

महिला सशक्तिकरण के 100 साल पूरे हो गए। 1910 में महिला दिवस की घोषणा के बाद सबसे पहले 19 मार्च 1911 को आस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी, स्वीटजरलैंड में यह पर्व मनाया गया।
1975 में अंतराष्ट्रीय महिला वर्ष के दौरान यूएन ने 8 मार्च को महिला दिवस के रुप में मनाना शुरु किया।
इतना लंबा सफर तय करने के बाद भी हमारा लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया है..मुक्ति स्वप्न नहीं है..यहां लोहिया का एक कथन सटीक बैठता है..वह कहते हैंकि पुरुष स्त्री को प्रतिभासंपन्न और बुद्दिमति भी बनाना चाहता है और उसे अपने कब्जे में भी रखना चाहता है, जो किसी कीमत पर नहीं हो सकता...जब तक यह गैरबराबरी खत्म नहीं होती....स्वप्न अधूरा, क्रांति अधूरी....
बोल बोल कि लब आजाद हैं तेरे....

लोकगीतो में स्त्रीमुक्ति का नाद

Posted By Geetashree On 7:55 PM 5 comments
यह खबर मुझे बहुत अच्छी लगी.यह चीज हरेक लोकभाषा में मिलेगी.


....महिला समाख्या द्वारा संकलित किए जा रहे हैं स्त्री मन की थाह लेने वाले गीत

....गीतो के जरिए महिलाओं के दुख-दर्द समझ कर इन्हें दूर किए जाने का होगा प्रयास
...अबतक नैनीताल से 20, टिहरी से 75, दून से 25, उत्तरकाशी और पौड़ी से दस दस लोकगीत एकत्रित
लोकगीत पहाड़ के आम जनजीवन की थाह पाने का सटीक जरिया है।इनमें वर्णित पहाड़, नदियां, मेले, खेतीबाड़ी, मौसम, शादी, बारात वहां की विशेषताओं को सामने लाते हैं। लोकगीतो ने पहाड़ की उन विद्रूपताओं और कष्टो को भी सुर दिए हैं जिनका शिकार वहां की अधिसंख्य महिलाएं हैं। महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले एसे ही लोकगीतो को संग्रहीत करने का बीड़ा उठाया है, महिला समाख्या ने। महिला समाख्या का कहना है कि इन गीतो के जरिए महिलाओं के मन की थाह पाकर उनके मुद्दों को आवाज देना इस कार्य का उद्देश्य है।

महिला समाख्या की राज्य परियोजना निदेशक गीता गैरोला बताती हैं कि राज्यके ग्रामीण अंचलो से सैंकड़ो एसे गीत संकलित कर लिए गए हैं जो अभी तक जंगलो और खेती खलिहानों में गूंजते रहे हैं। अब तक नैनीताल जिले से कई गीत जुटा लिए गए हैं। गैरोला कहती है कि महिलाओं की भूमिका घर, जंगल, खेती बाड़ी में पुरुषो से ज्यादा है। फिर भी समाज में उनको वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वे हकदार हैं। समाज में महिलाओं की भूमिका और उसकी स्थिति से परदा उठाने के लिए लोकगीतो का सहारा लिया जा रहा है।

वह कहती हैं कि अबतक संकलित गीतो में महिलाओं की कई तरह की अभिव्यक्तियां पाई गई हैं। उनकी वेदना, यातना, मुक्ति की कामना,पुरुषो से कमतर आंके जाने की पीड़ा और उसके अंतरंग निजी क्षणों की गाथा इन गीतो में झलकती है।

इस अभियान से जुड़े सामाजिक कार्यकर्त्ताओं का कहना है कि साहित्य में तो स्त्री विर्मश खूब होता है लेकिन लोकगीतो के नजरिए से महिलाओं को अभी तक नहीं देखा गया है। महिलाओं को समझने के लिए लोकगीतो से बेहतर कोई और जरिया नहीं हो सकता।

(हिंदुस्तान अखबार से साभार)

प्यार से भी जरुरी कई काम है..

Posted By Geetashree On 9:18 AM 3 comments

गीताश्री
मोबाइल पर आने वाले कुछ एसएमएस बड़े सटीक होतें हैं और उनका सामाजिकयथार्थ आपकी आंखें भी खोल देता है।


एक ताजा संदेश पढिए--
फुलफार्म औफ गर्ल-
जी-गोली देने में सबसे आगे
आई-इनोसेंट सिर्फ शक्ल से
आर-रोने धोने की आटोमेटिक मशीन
एल-लड़ने में सबसे आगे
जागो मुंडया जागो

ये संदेश किसी मर्दवादी कुंठित सोच की उपज है जो लड़की को अपने ढंग से, अपने अनुभव से परिभाषित करती है। ये अपना अपना परसेप्शन भी हो सकता हैलेकिन लागू तो हर लड़की पर किया जा रहा है। इस संदेश के आलोक में हम नईलड़की को पहचान सकेंगे। नई स्त्री के साथ साथ नई लड़की का जन्म हो चुकाहै। समाज इस बदलाव को देखने और स्वीकारने के लिए अगर तैयार नहीं है तोकुछ नहीं किया जा सकता। लेकिन बेहतर हो कि ये विलाप करने के बजाए वे यातो सीधे अपने आसपास गौर फरमाए या नई फिल्में देख आएं। नई स्त्री का नयाअवतार...नई लड़की दिख जाएगी। जो ना तो रोती धोती है ना, ना लड़को को किसीगलतफहमी में रखती है। बदल गई है लड़की। ये वो लड़की नहीं है जो सदियो सेप्रेम के नाम पर ठगी जाती रही है।नई लड़की को आप प्रेम के नाम पर ठग कर चहारदिवारी में सीमित नहीं करसकते। क्या जरुरत है काम करने की, मैं कमा रहा हूं ना..बाहर की दुनियासेफ नहीं है, कितना कमा लोगी, उतना तो मैं ही तुम्हे दे दूंगा, घर मेंमजे से रहे, बच्चो को वक्त दो, कुछ करना हो तो तो घर में ही कर लो, क्याकाम कर पाओगी, तुम्हारे बस का नहीं....आदि आदि..पता नहीं कितने डायलाग।लड़कियां सुनसुन कर खुद को कैदी बना चुकी है, सुख-सुविधाओ की। इसके पीछेजो नीयत काम करती है, वो अब एक्सपोज हो चुका है। आप नई लड़की को बांधनहीं सकते। उसके पास पंख है, हौसला है, उड़ान है और खुद का बुना-चुना अपना आकाश है। उसके पास सपने हैं, इरादे हैं, और योजनाएं है। वो संघर्षसमर में हैं..जहां घमासान मचा है। उसे अवसर की तलाश है, वो खोज में है,वो बराबरी का मंच तलाश रही है..और नया पुरुष वर्ग अब भी वही ओल्ड ट्रिक्सआजमा आजमा कर उसे हलकान किए जा रहा है..
सेंटर फार सोशल रिसर्च की डा. रंजना कुमारी सही कहती हैं कि लड़कियो के प्रति सोच को बदलने के लिए जमीनी प्रयास बेहद जरुरी है। नहीं बदलेंगे तो वैसे ही गच्चा खाएंगे जैसे हालिया रिलीज फिल्म दिल तो बच्चा है जी में तीनों लड़के खाते हैं।
तीन लड़के, अलग अलग उम्र के। एक चालीस के करीब पहुंच रहा है, दूसरे अपेक्षाकृत युवा हैं और शिकारी की तरह लड़कियो की टोह में हैं। अधेड़ पुरुष तो क्या युवा लड़के भी लड़कियो के ऊपर वही ओल्ड ट्रिक्स आजमाते हैं और सोचते हैं लड़कियां किसी उपयोगी सामान की तरह उनके हाथ आ जाएंगी। अधेड़ पुरुष को डांस के लिए क्या युवा लड़की ने आमंत्रित कर लिया, उनकी बाजूएं फड़कने लगीं। लड़की तो लाइन दे रही है..पंसी रे भईया..फंसी..लड़की स्वभाविक है..अपनी रौ में किसी पहाड़ी नदी सी बही जा रही है..वो ना प्रेम कर रही है ना पुरुषो के साथ टाइम पास (वैसे इन दिनों पुरुष महिलाओं, लड़कियो को टाइम पास ही मानते हैं) कर रही है। वह अपनी स्वभाविक गति से जीवन जी रही है। ये नई लड़की है जो फिल्म में तीन रुपो में दिखती है। तीन लड़कियो का अलग अलग किरदार है जो एक ही नई लड़की का प्रतिनिधित्व करती है। तीनों को पुरुषो का साथ पसंद है मगर उन्हें लेकर कोई गलतफहमी नहीं है। जबकि पुरुष बहुत जल्दी गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं। इन लड़कियो के सामने अपना पूरा भविष्य चमचमा रहा है, उनकी अपनी पसंद है, अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष भरे रास्ते हैं। उसके जोखिम हैं..इनके बीच मस्ती के कुछ पल हैं जिन्हे वो पुरुष साथियो के साथ बांट लेती है। ये नई लड़की वन नाइट स्टैंड को भी कोई बड़ी घटना नहीं मानती। उसे सामान्य घटना की तरह भूल कर आगे बढ जाती है। वे जानती हैं कि ये वक्त प्रेम करने का नहीं..अपनी पहचान कायम करने का वक्त है।
उनकी सारी लड़ाई प्रेम करने और उसे पाने पर खत्म नहीं होती। फिल्मकार मधुर नई लड़की को अच्छी तरह पहचानते हैं। फिल्म की कहानी में और भी बहुत कुछ है। मगर सबसे ज्यादा नोटिस करने लायक नई लड़की है जिसकी राहें प्रेम की ठगिनी दुनिया से आगे जाती है। एक प्रबंधन गुरु का कथन यहां बताने लायक है...प्रेम करने से पहले दूसरे के अस्तित्व का महत्व समझना जरुरी है। दूसरे के दिल में जगह बनाना और उसके जीवन का अहम हिस्सा बनना वास्तविक प्रेम है न कि उसके दिल को बंधक बनाना और उसके जीवन को सीमाओं में बांध देना...।
नई लड़की इस मंत्र का पालन करती है, इसका मर्म समझती है। उसके लिए प्यार से भी ज्यादा जरुरी कैरियर है, अपनी पहचान है। फिल्म में तीनों लड़कियां कैरियरिस्ट हैं। एक नायिका बनना चाहती है। उसके पीछे एक युवक पड़ा है, एक फैशन डिजाइनर है, उसे भी एक लड़का घेरे हुए है। ये दोनो लड़कियां इन्हें स्पष्ट बता देती हैं कि उन्हें पहले अपना कैरयिर बनाना है, प्रेम के लिए फिलहाल कोई जगह नहीं है। एक लड़की के पीछे उसका अधेड़ बौस पागल है। लड़की की हरकतो से उसे लगता है कि वह उससे प्रेम करने लगी है। जबकि लड़की अपनी ही दुनिया में खोई है। नई लड़की के खुलेपन को अब तक पुरुष समाज समझ नहीं पाया है। बार बार ठोकर खाता है, गालियां बकता है, बदला लेने की फिराक में रहता है, और अपने को दुनिया का महान प्रेमी साबित करना चाहता है।
एसे ही पुरुषो को वो खम ठोक कर कह रही है...तेरे हाथ कभी ना आनी। देसी मुन्नी बदनाम होती रहेगी लेकिन शहरी शीला का रवैया अभिमानी ही रहेगा। आप उसे बिगड़ैल लड़की कह सकते हैं मगर वह अपने बदले हुए रवैये के साथ अपना मुकाम तय करके ही प्रेम के द्वार तक पहुंचेगी।

यौन उत्पीडऩ विधेयक उम्मीदों पर खरा नहीं

Posted By Geetashree On 12:58 AM 11 comments
मनीषा भल्ला

आओ, बैठो, नाड़ा खोलो..,
पंजाब राज्य समाज कल्याण विभाग का एक उच्च अधिकारी काम के सिलसिले में महिला कर्मियों को अपने कैबिन में बुलाकर यही कहता था। महिला कर्मचारियों का फक्क पीला चेहरा देखकर अधिकारी मुस्कुराते हुए कहता-ओह यानि अपना नहीं, फाइल दा नाड़ा खोल (अपना नहीं यानि फाइल का नाड़ा खोल)।
नाड़े से अधिकारी का मतलब फाइल का टैग था। दस साल पहले जब सरकारी कार्यालयों में यौन उत्पीडऩ संबंधी स्टोरी के तहत यह घटना एक दैनिक अखबार की सुर्खियां बनीं तो उत्पीडऩ का शिकार महिलाओं को पता भी नहीं था कि उनके घरों में उनके साथ क्या होगा। कार्यालय की तमाम महिलाएं अगले दिन अखबार के ऑफिस आ गईं और उनमें से कुछ रोने लगीं तो कुछ झगडऩे लगीं। महिलाओं ने कहा उनके पतियों ने उन्हें नौकरी छोडऩे के लिए कह दिया है। कुछ का कहना था कि उनके पति उनपर शक करने लगे हैं। कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ की इस घटना से महिलाओं के घर में बवाल हो गया लेकिन संगठित और असंगठित क्षेत्र में महिलाएं इससे कहीं ज्यादा यौन उत्पीडऩ का शिकार हो रही हैं। लेकिन वे न के बराबर ही मुंह खोलती हैं।
आखिरकार 13 साल के संघर्ष के बाद शीतकालीन सत्र में महिला यौन उत्पीडऩ रक्षा विधेयक 2010 पेश हुआ जो केंद्रीय मंत्रीमंडल की मंजूरी के बाद लोकसभा की स्थायी समिति के पास जा चुका है। लेकिन इसमें कई खामियां हैं। कई वर्ष पहले राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस विधेयक पर काम कर महिला संगठनों और वकीलों से व्यापक विचार विमर्श कर इसके कई प्रारूप तैयार किए थे लेकिन विधेयक जो कानून बनने जा रहा है उसमें उन विचार-विमर्शों की झलक दिखाई नहीं दे रही।
वर्तमान में कार्यस्थल पर यौन उत्पीडऩ के मामलों की सुनवाई यौन उत्पीडऩ के विशाखा बनाम राजस्थान सरकार (1997) मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के तहत की जा रही है। जिनके तहत यौन उत्पीडऩ की परिभाषा तय की गई थी। इसी आधार पर इस विधेयक का मसौदा तैयार किया गया है। कार्यस्थल पर यौन शोषण रोकने के लिए इस विधेयक का महिला संगठनों ने स्वागत तो किया लेकिन विधेयक के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई है।
इस बारे में अखिल भारतीय जनवादी महिला संगठन (एडवा) ने गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव के.सी जैन को एक सुझाव पत्र भी दिया है। संगठन की कानूनी संयोजक कीर्ति सिंह का कहना है कि विधेयक में कार्यस्थल पर यौन शोषण की झूठी और दुर्भावना से की गई शिकायतों को शिकायत करने वाली महिला के लिए दंडनीय बनाया गया है। यह विशाखा बनाम राजस्थान सरकार के निर्णय के एकदम विपरीत है जिसमें साफ लिखा है कि शिकायत करने वाली महिला के खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं की जाएगी। यौन शोषण से संबंधित सभी कानून इस भावना से बनाए जाते हैं कि यौन उत्पीडऩ की शिकायत करने वाली महिला को ऐसा वातावरण दिया जाएगा कि वह भयमुक्त होकर अपनी शिकायत दर्ज करा सके। क्योंकि अमूमन महिलाएं डर और अपमान की वजह से शिकायत नहीं करती हैं।
यौन उत्पीडऩ की शिकार महिला के बारे में आसानी से कह दिया जाता है कि महिला झूठ बोल रही है। उसके चरित्र पर लांछन लगाए जाते हैं। इन वजहों से महिलाएं शिकायत नहीं करती हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि विधेयक के अनुसार यदि महिला की शिकायत झूठी पाई गई तो महिला के ही खिलाफ कार्यवाई होगी। प्राकृतिक नियम है कि बिना सुबूत के किसी को सजा नहीं मिल सकती। यह नियम यहां भी लागू होता है।
अगर शिकायत करने वाली महिला के पास सुबूत नहीं है तो या वह यौन उत्पीडऩ साबित नहीं कर पाई तो उसके ही खिलाफ कार्रवाई होगी। इस भय से तो कोई महिला कभी शिकायत करेगी ही नहीं। महिला संगठनों का भी कहना है कि कम से कम महिलाओं को शिकायत करने के लिए भयमुक्त माहौल दिया जाए और यदि वह सुबूत नहीं जुटा पाती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। यौन मांगों के साक्ष्य जुटाना अक्सर मुश्किल होता है।
विधेयक की दूसरी कमजोरी यह है कि वह घरेलू कामगार महिलाओं पर लागू नहीं होता। इतने बड़े तबके को विधेयक में छोड़ दिया गया है।
तीसरा विधेयक में जिला अधिकारियों द्वारा स्थानीय स्तर पर सरकारी दफ्तरों में समितियों बनाए जाने का प्रावधान है। कमेटी बनाने का प्रावधान और निर्णय जिला अधिकारी के विवेक पर छोड़ा गया है। जिससे अधिकारी के निरंकुश होने का अंदेशा है।

क्या है यौन शोषण
अप्रिय यौन आचरण
अश्लील मौखिक टिप्पणी,
शारीरिक संपर्क यौन अग्रिम,
द्वीअर्थीय बातछेड़छाड़,
यौन सूक्ष्म इशारे,
अश्लील मजाक, चुटकुले,
महिला को अश्लील साहित्य दिखाना (शाब्दिक, इलेक्ट्रॉनिक, ग्राफिक),
यौन अहसान की मांग या अनुरोध अन्य कोई अप्रिय शारीरिक, मौखिक या गैर मौखिक क्रिया

तंबाकू मुक्त पहला देश भूटान

Posted By Geetashree On 11:53 PM 9 comments
गीताश्री

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक बैठक में 172 देशो के प्रतिनिधि तंबाकू उत्पादो की बिक्री और इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए सहमत होगए हैं।
इससे जहां तंबाकू के खिलाफ अभियान चलाने वाली एजेंसियों को काफीराहत मिली है, वहींभारत में केंद्र सरकार के इस मसले पर ढीले ढाले रवैयेपर खासी नाराजगी भी है। ऐसे में यह खबर सूकूनदायक है कि भारत का पड़ोसी देश, दुनिया का पहला तंबाकूमुक्त राष्ट्र बन गया है।
अपने बगलगीर से मिले तंबाकू के धुंए से परेशान, सब्जी बाजारों, पार्कोंऔर स्टेशनों में तंबाकू-गुच्छे के पाउचों के सताए आप अगर वाकई किसी ऐसीजगह की तलाश में हैं जहां स्वच्छ हवा फेफड़ों तक पहुंचे, तो हिमालय कीगोद में बैठा ‘भूटान’ आपकी राह देख रहा है। दरअसल, यह देश अपनेमूल्यों के अनुरूप नीतियां बनाने का रिकॉर्ड बनाता जा रहा है। स्वच्छ पर्यावरण और नागरिक स्वास्थ्य के साथ ‘सकल राष्ट्रीय खुशी’ के प्रतिअपनी प्रतिबद्धता जताते हुए भूटान ने तंबाकू नियंत्रण कानून 2010 इसीवर्ष जून में ही पारित कर दिया। तारीफ इस कानून की तो होनी ही चाहिए पर उससे कहीं अधिक भूटान शासन के उस जज्बे की भी दाद दी जानी चाहिए जिसने एकबार तंबाकू निषेध की दिशा में असफल होने के बाद दोबारा प्रयास करने की ठानी।
सर्वेक्षण बताते हैं कि 1960-70 में करीब 50 प्रतिशत भूटानी शहरीजनता तंबाकू उत्पादों का सेवन करती थी। फिर बौद्ध धर्म के साथ जोडक़र एक उग्र आंदोलन तंबाकू सेवन के खिलाफ चलाया गया जिससे तंबाकू सेवन करनेवालों की संख्या में कुछ कमी देखी गई। फिर यकायक दिसंबर 2004 में दुनिया का ध्यान भूटान की ओर तब गया जब यहां के कानून ने तंबाकू उत्पादन के सेवन और बिक्री पर पूरी तरह रोक का कानून बना दिया और भूटान, तंबाकू पर पूर्णप्रतिबंध लगाने वाला पहला राष्ट्र घोषित हुआ। थिंपू में सिगरेट के पैकेट सावर्जनिक तौर पर जलाकर धूम्रपान का विरोध दर्ज किया गया। इन सबके बीच सरकार ने पाया कि अचानक बाजार में सिगरेट का दाम चौगुना हो गया और कालाबाजारी बढ़ती गई। परेशान होकर भूटान सरकार ने उस निषेध को वापिस लेलिया ताकि पूर्ण तैयारी के साथ एक बार फिर तंबाकू मुक्त भूटान की दिशामें नए प्रयास किए जा सकें। करीब ढाई साल की जमीनी चर्चाओं, सर्वेक्षणों और तीन बार भूटानी संसद में बहस के उपरांत जून 2010 में तंबाकू नियंत्रण कानून भूटानी संसद में बहुमतसे पारित हुआ। इस कानून की विशेषता इसका सीधा और स्पष्ट दृष्टिकोण है,साथ ही जिस तरह से इसमें सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों कीजिम्मेदारियां बताते वक्त स्पष्टता बरती गई है वो किसी भी कानून के सफल क्रियान्वयन के लिए बेहद आवश्यक है।
‘तंबाकू नियंत्रण कानून 2010’ भूटान के इस नए कानून के तहत, सभीव्यवसायिक केंद्रों, मनोरंजन केंद्रों, संस्थानों, कार्यालयों,मोनेस्टरीज, म्यूजियम, जोंग, स्कूल और कॉलेज, सार्वजनिक स्थानों,पारंपरिक उत्सवों, सब्जी बाजार, गाडिय़ों, टैक्सी स्टैंड पर धूम्रपान या उत्पादों के सेवन को जुर्म करार दिया गया है। इतना ही नहीं, इनजगहों पर देखरेख करने वाले अफसरों पर उन स्थानों को तंबाकू उत्पादों सेमुक्त रखने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है।पर्यटकों और धूम्रपान के आदि लोगों को ध्यान में रखते हुए इस कानून नेसार्वजनिक व्यवसायिक क्षेत्रों के मालिकों को उनके लिए एक धूम्रपान विशेष स्थल का इंतजाम करने के निर्देश भी दिए है ताकि आम जनता को उस धुंए से बचाया जा सके। यह कानून तंबाकू सेवन करने वालों से कहीं ज्यादा तंबाकू मुहैया कराने वालों पर सख्त नजर आता है। हालांकि इसके तहत धूम्रपान केआदी व्यक्ति को सभी प्रकार के कर चुकाने के बाद अपने निजी इस्तेमाल के लिए तंबाकू आयात की स्वतंत्रता प्रदान की गई है पर साथ ही वित्त मंत्रालय को भी अयाजित तंबाकू की मात्रा पर नजर रखने को कहा गया है। भूटान का यह नया कानून तंबाकू की खेती और बिक्री को तस्करी के बराबर का जुर्म मानताहै और दोनों ही जुर्मो की वही सजा नीयत की गई है जैसी सजा तस्करी के लिएहै। भूटान के इस कानून में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि तंबाकू उत्पादनसे जुड़ी कोई भी कंपनी अपने लोगो के साथ न तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षविज्ञापन कर सकती है और न ही किसी आयोजन का प्रायोजक बन सकती है।तंबाकू मुक्त जीवन शैली के प्रचार की जिम्मेदारी जहां शिक्षा मंत्रालय को सौंपी गई है, वहीं तंबाकू से स्वास्थ्य को होने वाले नुकसानों के प्रतिजागरुकता फैलाने की जिम्मेदारी स्वास्थ्य मंत्रालय को दी गई है। इन सबसेअलग पुलिस के साथ-साथ गृह मंत्रालय को कानून के सफल कार्यान्वयन कीजिम्मेदारी सौंपते हुए विभिन्न नियमों, सर्वेक्षणों, कार्यक्रमों औरअभियानों के लिए तंबाकू नियंत्रण बोर्ड स्थापना भी कर दी गई है।
भूटान में हालांकि अब तक इस कानून को लेकर कुछ संशय जाहिर किए जा रहे हैंऔर इसमें बरती गई सख्ती पर सवालों के बादल भी आते दिखाई पड़ते हैं, पर यह बात काबिले गौर है कि एकाएक आपको किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र पर स्मोकिंग करता हुआ नजर नहीं आएगा।भूटान में जगह-जगह पर स्पष्ट अक्षरों में तंबाकू सेवन के विरूद्घ संदेश दिखाई दे जाएंगी। सरकार का नजरिया बिलकुल स्पष्ट है कि मुक्त स्वास्थ्यसेवाओं को वो तंबाकू का सेवन करने वाले पर बल भी प्रयोग करने से बच रहीहै बल्कि वो चाहती है कि लोग स्वयं तंबाकू से किनारा करें, फिर कारण चाहे स्वास्थ्य की चिंता हो या फिर तंबाकू का सुलभ न होना हो। वैसे भी यहांअन्य देशो की तरह कोई मॉनिटरिंग एजेंसी नहीं है। इसीलिए चालान भी नहीं कटता।
थिंफू के एक कैफे की दीवार पर लगा पोस्टर बेहद दिलचस्प और मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने वाला है। पोस्टर में दो लडक़े सिगरेट पी रहे हैं।
दो लड़कियां अलग खड़ी हैं।
लडक़े उनसे पूछते हैं, हे लड़कियों, क्या तुम हमारे साथ कॉफी पीना पसंद करोगी?
लड़कियां-सॉरी, हम उन लडक़ो को पसंद नहीं करते जो सिगरेट पीते हैं।

मंत्रसिक्त हवाओं में नई राहो की तलाश

Posted By Geetashree On 2:49 AM 4 comments

गीताश्री
तो सुख-दुख, आकांक्षा
और हार,उदासी और उत्साह,
वर्तमान भविष्य के अनुभव को धीमा कर देना
और हर दो तस्वीरों के बीच
नई राहें और नए शार्टकट ढूंढना,मेरे जीवन में सिगरेटों का यही मुख्य उद्देश्य था,
जब ये संभावनाएं नहीं रहती,
आदमी खुद को नंगा जैसा महसूस करने लगता है,
कमजोर और असहाय।
- ओरहान पामुक (तुर्की के नोबेल पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार)
सिगरेट छोडऩे के बाद पामुक का अनुभव ये था।
लेकिन सिक्किम बिना धुआं उड़ाए, बिना तंबाकू चबाए अपने भविष्य की नई राहें चुनने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। वह खुद को पहले से ज्यादा मजबूत और शक्तिशाली पाने लगा है। उसका उद्देश्य अब धुंआरहित उपादानों से जुड़ गया है। पर्यटकों के लिए स्वर्ग सरीखे सिक्किम की फिजां में बौद्ध तांत्रिको की रहस्यमता आपको आसानी से गिरफ्त में ले लेती है। जैसे जैसे गंगटोक के करीब जाते हैं, आकर्षक लामाओं की कतारें उतनी लंबी दिखती हैं। बौद्ध भिक्षुणियों का मौन कितनी आसक्ति पैदा करता है, देखें तो जानें। एक पल के लिए मुस्कान चमकती और बुझती है।
अमोल पालेकर ने शायद इसी से मंत्रासिक्त होकर फीचर फिल्म बनाई थी-वंस अगेन। बौद्ध भिक्षुणी और सामान्य पुरुष का प्रेम और इनके बीच काव्यात्मक उपस्थिति के साथ पसरा सिक्किम का अनछुआ सौंदर्य। बागडोगरा से गंगटोक तक की यात्रा में ड्राइवर भुवन थापा अपने धुंआरहित राज्य को लेकर कुछ ज्यादा ही उत्साहित दिखा। स्वभाव से बातूनी लेकिन निगाहें बेहद पैनी। इकत्तीस मई 2010 को जब से उसका राज्य धुएं के जाल से मुक्त घोषित हुआ, उसने सबसे पहले अपनी गाड़ी में नो स्मोकिंग के स्टिकर चिपकाए। उसके बाद उसे आदत सी हो गई है राज्य में आने वाले हरेक यात्री को विस्तार से जानकारी देने की।
भुवन बताता है, ‘नए माहौल में पर्यटक और जनता तो धीरे-धीरे तालमेल बिठा रहे हैं लेकिन जो प्रतिबंध लगाता है, वही सबसे ज्यादा तोड़ता है।’भुवन का इशारा सिक्किम पुलिस की तरफ था।भुवन के पास अपार जानकारी है कि प्रतिबंध के बाद कौन और कहां चोरी छिपे तंबाकू बेचता है। मगर वह जगह बताने से साफ मना करता है।
बागडोगरा से सिक्किम तक की सडक़ बारिश में बेहद खराब हो जाती है। ये अक्टूबर महीने के शुरूआती दिन थे। पहाड़ी झरनों और अभिमंत्रित हवाओं के बावजूद टूटी-फूटी सडक़ों पर सफर बहुत लंबा और ऊबाऊ हो जाता है।
भुवन मूड भांपते हुए कहता है, ‘शुक्र है, आप चार पांच दिन पहले आ गए। जल्दी लौट जाइए, नहीं तो लौट भी नहीं पाएंगे। गोरखालैंड आंदोलन की तैयारी शुरू हो गई है। लोग सडक़ों पर उतर आएंगे। सडक़े जाम हो जाएंगी। जैसे ही पहाड़ों से बारिश उतरती है, सैलानियों के आने का मौसम शुरू होता है, यहां आंदोलन तेज हो जाता है। वे लोगों का ध्यान खींचना चाहते हैं।’
रास्ते में भुवन सडक़ के किनारे बने ढाबों, रेस्टोरेंट की तरफ इशारा करता है। जगह जगह नो स्मोकिंग, से नो टू टोबैको... जैसे नारों वाले पोस्टर, बैनर लगे हैं। भुवन हरेक यात्री को यह जानकारी देना अपना परम कर्तव्य समझता है। सिक्किम का मुख्य बाजार। जगह-जगह शराब की दुकानें। विक्रेता ज्यादातर बिहारी हैं। हर दुकान के बाहर नो स्मोकिंग जोन का बोर्ड लगा है। एक विक्रेता हैं, छपरा निवासी रामजी साहू। वह बताते हैं, ‘यहां लोग खूब सिगरेट पीते हैं। गुटका भी खाते हैं। बिक्री भी खूब होती है। जितना चाहिए मिल जाएगा। लेकिन उत्पाद दिखाई नहीं देने चाहिए। खासकर बच्चों की नजर न पड़े, इसका ध्यान रखना पड़ता है।’
सिक्किम यूं ही नहीं हुआ ‘तंबाकू रहित’ राज्य।
दो साल की लंबी कहानी है। दो साल तक जन जागरण अभियान चलाया गया। सरकारी मशीनरी के साथ मिलकर राज्य में वोलंन्टरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने जीतोड़ मेहनत की, तब जाकर इस काम को अंजाम दिया जा सका। वीएचएआई से जुड़ी हारका मोती सुब्बा बताती हैं कि उनके संगठन को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा।सिक्किम सरकार के नियोजन, निगरानी एवं मूल्यांकन विभाग के उपनिदेशक सी. खेवा बताते हैं, ‘यह विजन हमारे मुख्यमंत्री का था। उन्होंने सोचा, चाहा और सपना साकार हो गया।’ इसके पीछे एक स्वस्थ राज्य ‘हेल्दी सिक्किम’ बनाने का उद्देश्य था। बताते है कि राज्य के ‘स्वास्थ्य विभाग’ ने राज्य सरकार को एक रिपोर्ट दी जिसमें सर्वाधिक मौत का कारण तंबाकू को बताया गया था। राज्य में होने वाली कुल मौतों में पचहत्तर प्रतिशत मौतें इसके इस्तेमाल से होती थीं। इस सर्वे ने सरकार को चौकन्ना कर दिया। खेवा बताते हैं, ‘गुटखा सिक्किम में सात साल पहले ही प्रतिबंधित हो गया था। उसकी बिक्री पर भी रोक लग गई थी। अब सरकार सिगरेट की खुली बिक्री पर प्रतिबंध के बारे में गंभीरता से विचार कर रही है।’वह यह भी बताते हैं, ‘बाकी जगह लोग सार्वजनिक जगहों पर मॉनिटर नहीं कर रहे। हमारे यहां होता है। यहां कोई खुले में सिगरेट पीए तो कोई भी नागरिक आपको टोक देगा कि यहां पीना मना है।’ डॉ. पूर्णोमन प्रधान (अतिरिक्त निदेशक, स्वास्थ्य सेवाएं एवं तंबाकू नियंत्रण का राज्य केंद्र) के पास जब्त की गई सिगरेटों के पैकेट्स हैं जिन्हें वे एक-एक कर हमें दिखाते हैं। किसी पर भी सचित्र चेतावनी नहीं छपी हुई है।
ब्रांड के नाम हैं, खुकरी, सहारा, शिखर, ब्लू रिवर, रॉयल आदि-आदि। प्रधान बताते हैं, ‘वर्ष 2008 से पहले सिक्किम का बाजार इसी तरह के सिगरेटों से भरा पड़ा था। यहां ज्यादातर नेपाल की सिगरेट बिकती हैं जिन पर कोई सचित्र चेतावनी नहीं छपी होती है। जब से प्रतिबंध लगा है, 15 प्रतिशत खपत कम हुई है। हमें राजस्व की हानि से ज्यादा लोगों के स्वास्थ्य की चिंता है। गैरकानूनी तरीके से नेपाल से आने वाली इन सिगरेटों पर रोक लगाने पर हमारा ज्यादा जोर है।’प्रधान तंबाकू अधिनियिम का हवाला देते हुए कहते है, ‘कोटपा’ में स्पष्ट लिखा है कि बिना सचित्र चेतावनी के कोई तंबाकू उत्पाद नहीं बेच सकते। हमने इसी नियम को आधार बनाया और इसकी बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया। पहले जागरूकता अभियान चलाया, फिर कानूनी डंडा। अब समाज की पूर्ण सहभागिता है इसमें।’
बताते हैं, तंबाकू लॉबी ने यहां भी अपना जोर लगाया होगा। लेकिन उसे भनक नहीं लगने दी गई।
राज्य को पूर्णत: धुंआरहित घोषित करने से पहले इसका ज्यादा प्रचार नहीं किया गया। प्रधान कहते हैं, ‘हमने धीरे-धीरे जमीनी स्तर पर काम किया। मीडिया को भी ज्यादा कुछ नहीं बताया। काम होने से पहले उसका ढोल नहीं पिटा।’
वोलन्टरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ सिक्किम के कार्यकारी निदेशक वी.वी. राय इस सफलता से बेहद उत्साहित हैं। उन्हें लक्ष्य मिल गया है। वह बताते हैं कि जो पहले तंबाकू का धंधा करते थे, वह किसी और धंधे में लग गए हैं। सिगरेट पीने वालों पर उनकी बेहद तल्ख टिप्पणी है, ‘मेरी नजरों में सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीने वाले आतंकवादी हैं जो धुंए से दूसरों को मार रहे हैं और खुद भी मर रहे हैं।’वी.वी. राय के टेबल पर आवेदन पत्रों का ढेर लगा है। वह ‘पत्र अभियान’ चला रहे हैं। राज्य भर से पत्र इकठ्टा कर रहे हैं जिसमें केंद्र सरकार से तंबाकू उत्पादों पर सचित्र चेतावनी में देर न करने की अपील की गई है। यह अभियान देशव्यापी चलाया जा रहा है ताकि सरकार पर दबाव बनाया जा सके। तंबाकू लॉबी के दबाव में आकर एक बार सरकार ने घोषणा के बाद अपने कदम पीछे खींच लिए थे।
गंगटोक से पहले रंगपो एक बड़ा कस्बा है।
वहां बिहारी जागरण मंच बेहद सक्रिय है। न सिर्फ अपने राज्य की संस्कृति बचाए रखने के लिए बल्कि तंबाकू उन्मूलन के लिए भी। रंगपो के व्यापारी स्वामीनाथ प्रसाद का इस अभियान ने हृदय परिवर्तन ही कर दिया है। उन्होंने तंबाकू आपूर्ति का धंधा बदल कर राशन का काम शुरू कर दिया है। एक और व्यापारी रतन कुमार हैं। वह बाकायदा अभियान से जुड़ गए हैं। वह लोगों को जागरूक कर रहे हैं। वह बताते हैं, ‘लोग कहते हैं कि हाईवे पर कानून लागू नहीं होता। हमने मैदान संभाला और हाईवे को दुरुस्त कर लिया।’ मंच के एक सदस्य अजित कुमार इस बात से चिंतित हैं कि रंगपो से पं. बंगाल की सीमा मिलती है। एक पुल पार करते ही नेपाल के सिगरेट खुलेआम बिक रहे हैं। लोग वहीं से भर-भर कर ले आते हैं। बंगाल की वजह से हम चुनौतियां झेल रहे हैं।
पश्चिम बंगाल सरकार सुन रही है ना..।