संतानविहीनता नहीं, संतानमुक्तता

Posted By Geetashree On 7:54 PM 5 comments

ब्रसेल्स(बेल्जियम) से लौटकर गीताश्री
चॉकलेट के स्वाद, रहस्यमय सन्नाटे और ऐंद्रिक ठंडेपन में डूबे इस देश में संतान न होना उनके लिए अभाव नहीं, एक किस्म की आजादी और जिम्मेदारियों से मुक्ति है। वे खुद को संतानविहीन नहीं संतानमुक्ति समझती हैं। ऐसी ही हैं बेल्जियम की स्त्रियां। सरकार चिंतित हों तो होती रहे। घरवाले उत्तराधिकारी मांगें तो मांगते रहे। जनसंख्या घटती है तो घटे, उन्हें परवाह नहीं क्योंकि बच्चा न पैदा करना उनकी निजी स्वतंत्रता से जुड़ा है।उन्हें अपने कॅरिअर पर ध्यान देना है इसलिए अक्सर मातृत्व और करियर में से किसी एक को चुनना है। इनमें करियर का पलड़ा ज्यादा भारी है।

इस परिस्थिति को बदला नहीं जा सकता। दुनिया के बाकी हिस्सों की तरह बच्चों का लालन पालन सिर्फ महिला की समस्या है। कोई समाज इस बोझ को साझा नहीं करता। क्रेच का अभाव है इसलिए बच्चे को जन्म देते ही इनके करियर पर विराम चिन्ह लग जाता है।राजकोषीय अध्ययन संस्थान के शोध के अनुसार बच्चे पैदा करने से पहले महिला कर्मियों के लिए प्रति घंटा औसत वेतन पुरुष के औसत का 91 प्रतिशत होता है। यह नौकरियों और बच्चों की देखभाल के बीच बाजीगरी कर रही कामकाजी माओं के लिए 67 प्रतिशत तक गिर जाता है। और यह कभी वापस पहले के स्तर पर नहीं आ पाता-तब भी जब बच्चे बड़े होकर स्कूल जाने लगते हैं।

इसे मीडिया में खासतौर से मम्मी मार्ग की उपाधि दी जाती है-एक ऐसा रास्ता जो कम वेतन और कम संभावनाओं की तरफ ले जाता है। कुछ साल पहले तक उन महिलाओं को बच्चा न होना खलता था। अब 30 वर्ष की उम्र के दौर वाली बहुत सी महिलाएं संतान पैदा करने और उनकी परवरिश करने को इस रूप में देखने लगी हैं कि इससे उनकी आजादी छिनती है, कॅरिअर की संभावनाएं कम होती हैं और वित्तीय जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। यह हालात यूरोप के बहुत से देशों में हैं जहां लगभग 10 प्रतिशत महिलाएं ऐसी होती हैं जो 45 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते बेऔलाद हो जाती हैं।

कुछ तो देर से शादी भी करती हैं।इस तथ्य की पुष्टि ब्रसेल्स में रहने वाली पामेला मोरनेयर करती हैं, ‘इनमें वे महिलाएं भी शामिल होती हैं जो अपनी मर्जी से बेऔलाद रहना पसंद करती हैं- और जो बच्चे पैदा करना टालती हैं या बच्चे पैदा करने में समस्याओं का सामना करती हैं या कुछ ऐसी भी हैं जो मां नहीं बन सकतीं।’पामेला के अनुसार ऐसी महिलाएं या उनका परिवार जरुरत पडऩे पर बच्चे गोद लेना पसंद करते हैं। इसके लिए सबसे बेहतर जमीन है भारत की। भारत में बढती हुई जनसंख्या सबसे बड़ी समस्या है। इन पर रोकथाम के लिए सरकार क्या क्या उपाय नहीं कर रही है।

एक जानकारी के मुताबिक बेल्जियम में प्रति वर्ष 6-7 हजार बच्चे भारत से गोद लिए जा रहे हैं। जब वे बच्चे बड़े होते हैं तो अपनी जड़ें खोजने भारत आते हैं। पहचान के संक्रमण से गुजरने वाले इन बच्चों की पीड़ा कुछ महीने पहले भारत में देखी गई जब बेल्जियम से आई दो लड़कियां हरियाणा में अपने मां-बाप की तलाश करती पाई गईं।

ऐसे पता नहीं कितने युवा भारत आते हैं असली मां-बाप को ढूंढऩे। भारत से गोद लेने की यह प्रक्रिया लंबे समय से चली आ रही है। इधर भारत सरकार ने थोड़ी सख्ती कर दी है तो बेल्जियम वालों ने रूस, बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया जैसे आर्थिक रूप से कमजोर देशों की तरफ देखना शुरू कर दिया है।यहां की जनसंख्या घटने की एक वजह समलैंगिकता भी है। लगातार इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। जब से ऐसे संबंधों को कानूनी मान्यता मिली है, ऐसे लोग खुलकर अपने संबंधों को जाहिर करने लगे हैं। आदमी आदमी साथ रहते हैं और बच्चा पाल लेते हैं।

इस वजह से कई घर टूट रहे हैं, तलाक की दर बढ़ रही है। ऊपर ऊपर शांति पसरी हुई दिखाई देती है पर अंदर अंदर गहरा तनाव है। वहां रहने वाले एक भारतीय ने बताया कि यहां मां-बाप छुटपन में ही बच्चों को सिखा देते हैं कि पहले लडक़ी के साथ 6 महीने रहो फिर शादी करो। 18 साल का होते-होते लडक़ा घर से बाहर हो जाता है। परिवार का महत्व वे समझे तो कैसे?

यहां कुछेक प्रमुख चौराहो पर विचित्र वेशभूषा में विद्रोही युवक-युवतियों की फौज घूमती रहती है। इसे वे अपने समाज के खिलाफ अपना विरोध प्रदर्शन मानते हैं। एक स्थानीय व्यक्ति ने इसे एक किस्म का युवा आंदोलन करार देते हुए बताया कि इनकी अपने अभिभावको से नहीं पटती। इसीलिए जीने का ऐसा तरीका अपना लिया है।

फ्रांस रेडियो में कार्यरत अन्नाबेले मोपास कहती हैं, ‘अमेरिकन संस्कृति और यूरोपियन संस्कृति एक जैसे ही हैं। इसीलिए यहां पारिवार का महत्व अपेक्षाकृत कम हैं।’एक शोध के मुताबिक यहां पांच में से एक स्त्री घरेलू हिंसा का शिकार है। यह बात भले हम भारतीयों के गले उतारना मुश्किल नजर आता है कि महिलाएं इन्हीं सारी वजहों से अब यह विकल्प चुनने लगी हैं कि वे बच्चे पैदा नहीं करना चाहतीं। फ्रांसीसी महिलाएं भी भारतीय महिलाओं की तरह बिना बच्चे के जिंदगी की कल्पना नहीं कर सकतीं। हालांकि भारत में भी बड़े शहरों में संतानमुक्त स्त्रियों की संख्या बढ़ रही है।

ब्रसेल्स की 33 वर्षीय शादीशुदा महिला ग्रेसी कहती हैं, ‘मैंने बच्चे नहीं पैदा करने का फैसला कॅरिअर की वजह से नहीं किया बल्कि यह एक जीवनशैली का मुद्दा है। मैं अपने जीवन का आनंद अपनी तरह से उठाना चाहती हूं।’ लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस में समाज विज्ञानी डॉ. कैथरीन हकीम ने इस बारे में एक दिलचस्प अध्ययन किया है। वह कहती हैं-इसमें जरा भी शक नहीं कि ऐसे लोगों की संख्या बढ रही है जो संतान नहीं चाहते। बहुत से देशों में ऐसे लोगों की संख्या बढ कर 20 प्रतिशत हो जाएगी जो बेऔलाद रहना पसंद करते हैं और। जर्मनी में ऐसे लोगों की संख्या पहले ही 30 प्रतिशत हो चुकी है। क्योंकि इसे एक ऐसा देश माना जाता है जहां की ज्यादतर नीतियां पारिवारिक जीवन के लिए सहयोगी नहीं हैं।

प्राइवेट फर्म में काम करने वाली मरिया कहती हैं, ‘मैंने 25 साल की उम्र में नसबंदी करा ली थी और बच्चे पैदा नहीं करने का फैसला करके मुझे अफसोस नहीं है।’ कैथरीन ऐसी ही महिलाओं की तरफ संकेत करती हुई कहती हैं-अब लोगों ने यह सोचना शुरु कर दिया है कि संतानविहीनता कोई अभाव नहीं, बल्कि परिवर्तित जीवन शैली का एक नमूना है।यूरोप में भी अब अमेरिका की तरह ऐसे गुट बनने लगे हैं जो संतानविहीन होने के समर्थन में अपनी बात रखते हैं।

ब्रिटेन में बाकायदा एक संतानमुक्त संगठन है-किडिंग एसाइड। इस तरह के संगठनों को इस बात की बेहद चिंता होती है कि प्रवासी लोग इतने बच्चे पैदा क्यों कर रहे हैं। बेल्जियम सरकार प्रवासी तुर्की और प्रवासी भारतीयों के बच्चों की बढ़ती संख्या पर चिंतित दिखाई देती हैं। तुर्की के लोग बच्चे पैदा करने में अव्वल हैं। ब्रसेल्स से सटे उपनगर एन्टवर्प में लगभग 400 गुजराती परिवार रहते हैं जिनका मूल व्यवसाय हीरे का व्यापार है। इनके परिवारों को संतान के मामले में यूरोप की हवा नहीं लगी है।इधर जनसंख्या की घटती दर से बेल्जियम समेत अन्य कई देश जैसे जापान और आस्ट्रेलिया भी चिंतित है। जनसंख्या को संतुलित करने के लिए समृद्ध देशों की सरकारों को काफी मशक्ïकत करनी पड़ रही है। जापान सरकार ने अपनी जनसंख्या नीति में आमूलचूल परिवर्तन कर लोक लुभावन घोषणाएं कर दीं ताकि लोग अधिक से अधिक बच्चे पैदा कर सकें। आस्ट्रेलिया में शिशु जन्म दर बढ़ाने पर सरकार द्वारा बोनस दिए जाने की योजना के सकारात्मक परिणाम नजर आए हैं।

वहां जब से ‘एक बच्चा मम्मी का, एक बच्चा डैड का और एक बच्चा देश का’ जैसा नारा शुरू किया है, तब से लोगों में बच्चा पैदा करने के प्रति उत्साह बना है।

बेल्जियम में भी सरकार संतान वाले परिवारों को बहुत सारी सुविधाएं देती हैं। संतानमुक्त लोग इस तरह सरकारी सुविधाओं का बंटवारा सही नहीं मानते हैं।

लेकिन क्रेच(डे केयर सेंटर) की मांग को लेकर महिलाओं की जंग जारी है।

बेवफाई विशेषांक-एक घिनौवनी मानसिकता का परिचायक

Posted By Geetashree On 3:34 AM 1 comments

गीतांजलिश्री
सबसे पहले मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि कालिया और राय की बर्खास्तगी के कागज पर हस्ताक्षर नहीं दे रही हूं। मगर इस मुद्दे पर सारी औरत विरोधी नजर और मानसिकता पर अपना प्रोटेस्ट दर्ज कर रही हूं।
जिस तरह के उल-जलूल शीर्षक के सहारे नए ज्ञानोदय को लोकप्रियता दिलाए जाने का प्रयास किया जाता रहा है। और जिस छद्म भाषा में ये निंदनीय साक्षात्कार दिया गया है, दोनों उसी गहरे पैठी पुरुष मानसिकता के प्रतिमान हैं जो सदियों से चली आ रही है। न जाने दंभ में या की बेवकूफी में, ये बाते कही गई, मगर इससे फर्क नहीं पड़ता। बल्कि इरादा क्या था या है उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि जब तक आपकी मनसिकता नहीं बदलेगी और औरत के प्रति ‘नजर’ वही पुरानी चलेगी, तब तक आप उसके पक्ष में हों या विपक्ष में, आपकी भाषा यही रहेगी। क्योंकि आपके पास कोई और भाषा है ही नहीं। मजाक, गंभीर विवाद, गाली, तारीफ, सबके लिए शब्द-संपदा एक होगी। भद्दे शब्द, बेहूदा शैली, फूहड़ अंदाज।
इसमें नया कुछ नहीं है। और बोल्ड तो सिरे से ही नहीं। यह वही भाषा है। वही रस-प्रसंग जो कबसे पुरुष इस्तेमाल कर रहे हैं।
(हिंदी अकादमी अश्लील क्या होता है का सबक यहां पढ़ें।यह है अश्लील, न की हमारे कृष्ण बलदेव वैद्य) मुद्दा यही है - कि जेंडर सेंसटिविटी और जेंडर इक्विलिटी का अहसास पुरजोर नारीबाजी और रेडिकल फैमिनिस्ट वक्तव्यों के बावजूद आप की चेतना को अछूता छोड़ सकता है।
नजर वही है, पुरुष-प्रधान, और पैमाना वही है औरत को आंकने का, तो आप पक्ष में हों, विपक्ष में, दोनों सूरत में, यही साक्षात्कार देगा, यही शीर्षक चुनेगा, यही बयानबाजी होगी, यही बवाल उठेंगे।
अफसोस यह की ये नजर और मानसिकता इस कदर फैली हुई है कि जब सफाई अभियान चलाने की बात है, तो कतार-दर-कतार उसी किस्म के लोग नजर आते हैं जिन्हें बर्खास्त करा देना चाहिए। किस-किस को बर्खास्त करना चाहिए? बर्खास्तगी का कायदा क्या होना चाहिए? मैं कम से कम, इसको लेकर आश्वस्त नहीं हूं।
दोनों शख्स अपनी गलती मान के, जिस ओहदे पर आसिन हैं वहां से हट जाएं तो कुछ इज्जत पाएंगे? या फिर माफी मांग कर विनम्रता से कुछ सही और संवेदनशील करें? शायद यह मौका तो उन्हें मिलना चाहिए? (यह भी न भूलें की विभूति ने किसी और क्षेत्र में, संप्रदायों और जातियों के बीच, सराहनीय और हिम्मती काम किया है।)
यह भी हमारी जिम्मेदारी है कि इस मुद्दे से इतर कोई राजनीति यहां शामिल न हो। मैं गलत हो सकती हूं पर यह सारे सवाल मुझे जरूरी लग रहे हैं।
बर्खास्तगी की मांग करने वालों में यह समझ पाने का विवेक होना चाहिए, कि इस मांग से न जुडऩा उस गंदगी की तरफ होना कतई नहीं है, जिसका सिर्फ विरोध ही हो सकता है, और मैं कर रही हूं।
न केवल एक साक्षात्कार, बल्कि बेवफाई का पूरा तस्व्वुर - बेवफाई को एलानिया प्रेम से अलग कर प्रेम विशेषांक के बाद बेवफाई विशेषांक निकालने का सारा आयोजन-- एक घिनौनी मानसिकता दर्शाता है।

सड़ांध मार रहे विभूति के विचारो पर थू थू..

Posted By Geetashree On 3:25 AM 1 comments

मनीषा
‘लेखिकाओं को छिनाल’ बताकर विभूतिनारायण ने अपने सारे किये-कराये पर खुद ही तेजाब डाल दिया। क्या पता ये बैंक ऑफ-द-माइंड पड़े सड़ांध मार रहे उनके घिनौने विचार हों या अपनी गुस्ताखियों का पुलिंदा खुलने से भयभीत बचाव में की गई बयानबाजी। मैं राय से यह जरूर जानना चाहूंगी कि अगर यही ‘टर्म’ पुरुष के लिए में इस्तेमाल करना चाहूं तो कैसे और क्या होगा?यह घटिया शब्द किसी सभ्य व्यक्ति की जुबान पर तब भी नहीं आ सकता, जब वह क्रोधित हो या बदले की भावना से किसी ‘खास’ को गरिया रहा हो। इस तरह की तमाम स्त्रियोचित गालियां पुरुषों की कुंठाओं का प्रतिफल हैं, जिनका इस्तेमाल वे शेखी बघारने के लिए कितना ही करते फिरें पर सच्चाई यही है कि ढलान पर जाती मर्दानगी और शिथिलता उनके दिमाग को इस कदर कब्जिया लेती है कि सोचने-समझने की क्षमता ही वे खो बैठते हैं।
औरतों के जननांगों पर अपना निशाना साधने वालों की कूवत पर अब तक स्त्रियों ने प्रश्नचिन्ह नहीं लगाए, इसीलिए मूंछों पर ताव देकर ये अनर्गल प्रलाप सार्वजनिक रूप से कर पा रहे हैं। चरित्र-प्रमाण-पत्र बांटने को लालायित रहने वाले मर्दों का दिमाग ही नहीं खराब है, इनमें अपनी कारस्थानियों का ठीकरा औरतों के सिर फोडऩे की आदत भी जबर्दस्त है। काफी समय बेमजा काटने के बाद आखिर हिंदी वालों ने विभूति की जबान से फिसले विशेषण को स्यापा है। यह कहते हुए मुझको जरा भी संकोच नहीं हो रहा कि स्त्री हर हर एंगेल से शोषण करने वाले उनके विरोधी भी अब एक हो चले हैं।
राय के यह कहने पर कि हमारे यहां जो स्त्री विमर्श हुआ है, वह मुख्य रूप से शरीर केंद्रित है... मैं तो हमेशा से पूछती आई हूं कि स्त्री विमर्श को देह से कैसे मुक्त करेंगे, इसका कोई नुस्खा है तो बताएं। यह संकीर्ण और बीमार मानसिकता है, जो औरत की देह का तो बढ़-चढ़ कर इस्तेमाल करने में कोई संकोच नहीं करती। लेकिन जब वही स्त्री मुक्ति की आवाज उठाती है तो उसको जलील करने, नीचे ढकेलने और कमजोर बनाने में कोई कोताही नहीं बरती जाती। औरत यदि शरीर ही छोड़ दे तो उसके पास बचता ही क्या है, वंशबेल पर पुरुषों का कब्जा, कुलनाम पर पुरुषों का कब्जा, घर/ परिवार की मुखियागिरी पर पुरुषों का कब्जा, कोख और चरित्र पर पुरुषों की बपौती। फिर बचा क्या है?
यह देह ही है, जिस पर अतिक्रमण करने को आमादा पुरुष तरह-तरह के स्वांग रचाता है। यह औरत की देह ही है, जो उस पुरुष को कोख में पोषती है, जो उसकी ‘शुचिता’ के प्रमाण-पत्र देता फिरता है। स्त्री सिर्फ देह है, मान्यवर। जिसके बिना ना तो आपका काम चल सकता है, ना ही हम औरतों का। नख से शिख समूची औरत को उसकी संपूर्णता के साथ जीने का अधिकार चाहिए। यह देह ही है, जिसके पीछे फिरता पुरुष दिमागी दीवालियेपन की स्थिति में पहुंच जाता है। ज्यादा दर्शन बघारने की जरूरत इसलिए भी नहीं है कि इस वाहियात जवाब में कही गई सारी बातें/ सारे तर्क स्त्री की देह को लेकर की हैं। जब आपका विचार ही देह मुक्त नहीं हो पा रहा तो हम अपनी देह (का विचार) त्यागने की बात सोच भी कैसे सकते हैं। आगे वे कहते हैं - यह भी कह सकते है कि यह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सवकी तरह है। ‘बेवफाई’ पर भी क्या मर्दों का आधिकारिक जोर है। ‘वफा’ बात पुरुषों की जुबान पर वैसे भी शोभती नहीं। स्त्री विमर्श तो अभी अपने यहां शैशव में ही है। खुलकर लिखने की बात तो दूर, अभी तमाम पुरुषों के साये में पलने को मजबूर लेखिकाओं को ‘स्त्रीवाद’ शब्द ही डरावना लगता है।
स्त्रीविमर्श के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे शिकारी स्त्रियों की देह को लेकर लार टपकाऊ बने फिर रहे हैं। इक्का-दुक्का पत्रकारों की हिम्मत और लेखिकाओं द्वारा किये जा रहे स्त्री विमर्श को उनके जैसे किसी पुरुष की छत्रछाया नहीं चाहिए, यह उनके लिए ही काफी है, जो अपनी नायिकाओं के भरोसे एकाध सीन रचने की कोशिश करके खुश हैं। रही बातें बिस्तरों की, तो क्या बिस्तरी उन्माद पर केवल पुरुषों का ही एकाधिकार है, क्या उनकी लतरानियों को रचने का साहस करने वाली स्त्री स्यापा करती ही उनको भाती है। यह याद रखना होगा कि आपसी सहमति से बने किसी के रिश्तों पर राय का प्रलाप, ‘अंगूर खट्टïे हैं’ जैसी लोमड़ी का रोदना नहीं लगता क्या। जिन लेखिकाओं की होड़ लगी है उनमें से जो प्रतिष् िठत पुरुषों की गोद में बैठकर वैचारिक वमन करती हैं, वे इनके चंगुल में नहीं आई होंगी, यह भी स्वीकारते चलना था इनको। अपनी सफलताओं का सेहरा जब तक पौरुषेय दंभ के हाथों बंधवाते रहेंगे हम, तभी तक इनके बीमार मगज हमें ‘साबित’ करने की चेतावनियां देने का साहस कर पायेंगे
...दरअसल स्त्री मुक्ति के बड़े मुद्दे पीछे चले गये हैं... माफ करें, पर पुरुष तो कम से कम ऐसी बातें बोलने का मंूह की नहीं रखते, जल्लाद की जुबान से बकरे की खैरीयत जमती जो नहीं। आप इस तरह के वाहियात विशेषणों से शोभना बंद कर दीजिए, हमको मुक्ति खुद-ब-खुद मिल जाएगी। मुक्ति कोइ अमर फल नहीं है, जिसको खोज कर हमें खाना है। मुक्ति इसी खौफनाक दरिंदी मर्दवादी मानसिकता से चाहिए। यह भी वही मॉरल पुलिसिंग है, जो बजरंगे करते फिरते हैं। इस तरह के मर्दाना विचारों को मैं किसी खाप से कू नहीं मानती, जो लैंकिग विषमता का वमन करते हैं, वह भी वैचारिकता काचोंगा पहन कर। जिस दरिद्र विचार को उखाड़ फेंकने के लिए हम स्त्रीवादी वैचारिक आंदोलन चला रही है, उसका गला रेतने वाले किसी भी मर्दाना सोच को कुचलना खालिस मानवतावादी कदम कहलाएगा, क्योंकि ये सनकी खुराफातें भी इतिहास का हिस्सा होंगी, थू-थू के लिए ही सही।
... औरतें भी वही गलतियां कर रही है, जो पुरुषों ने की थी... पुरुषों की गुंडागर्दी और लिजलिजेपन को छिपाने का कितना मासूम तर्क लाए हैं, हमको रास्ते मत सुझाइए। जाइए अपनी सोच का इलाज कराइए। अपनी आनेवाली पीढिय़ों को मानवता का पाठ पढ़ाइए, ताकि वे आपकी मांओं/ बहनों को उनके गोपन अंगों के नाम से पुकारने से पहले थोड़ा झिझकें।... बेवफाई को समझने के लिए व्यक्तिगत संपत्ति, धर्म या पितृसत्ता जैसी संस्था को ध्यान रखने की बात करने से पहले ठीक से समझ तो लीजिए, दरअसल आपको चाहिए क्या। स्त्री मुक्ति के नाम पर स्त्री भक्ति करने वाले पुरुषों से भरे आपके साहित्य समाज में बैठे दरिंदों को आईना दिखाना शुरू भीतो नहीं हो पाया है अभी। हिंदी जगत में तो हिम्मत वाली औरतों की खोज इसलिए नहीं हो रही कि उनके कंधे पर रखकर बंदूक चलाई जा सके, बल्कि इसी डर से हो रही है कि उनकी धार को सामूहिक रूप से कुंद किया जा सके और उनको भोथरा करके अपनी जमात में शामिल करने में सफलता मिल सके।

वरिष्ठ साहित्यकार गिरिराज किशोर का पत्र

Posted By Geetashree On 6:12 AM 2 comments

दो दिन पहले शाम को अचानक कानपुर से गिरिराज किशोर जी का फोन आया। वे विभूतिनारायण के साक्षात्कार पर बेहद कुपित थे. जैसे पूरा महिला समाज है. उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री को पत्र लिखने जा रहे है. वे चाहते कि महिला लेखिकाओं को छीनाल का दर्जा देने वाले विभूति के खिलाफ सभी एकजुट होकर विऱोध करें। वो हो भी रहा है.,,,लोग अपने अपने स्तरो पर कर रहे हैं. दो दिन से अखबारो में ये मामला खूब उछल रहा है। उन्होंने पत्र की वो कापी हमें मेल कर दी है। हम ज्यो त्यो यहां लगा रहे हैं। साथ में वरिष्ठ कहानीकार प्रियंवद का भी हस्ताक्षर है...पढिए...

मामला काफी तूल पकड़ चुका है. मैंने कुलपति महोदय से भी बात की। कल तक वे अपने बयान के बचाव में टिक कर खड़े थे...आज उन्होंने अलग एंगल दे दिया. आज वे कतरा गए। वह कहते हैं कि मैंने इंटरव्यू में छीनाल शब्द बोला ही नहीं है. मैंने सिर्फ बेवफाई शब्द बार बार बोला है। ये शब्द वहां कहां से आया, मुझे नहीं मालूम। कुलपति महोदय को नया ज्ञानपीठ के संपादक रवींद्र कालिया का इंतजार है. उनके दिल्ली लौटने पर वे बात करेंगे कि कैसे और कहां से ये शब्द इंटरव्यू में घुसा। विभूति आशंका जताते हैं कि मैगजीन के डेस्क पर ये शरारत हुई है। मजे की बात ये कि इस विवादास्पद इंटरव्यू का कोई रिकार्ड किसी के पास मौजूद नहीं है। ना लेने वाले के पास ना देने वाले के पास.अब ये दोनो ही जानते होंगे कि सच कौन बोल रहा है. रवींद्र कालिया खलनायक हैं या विभूति...दोनो जल्दी फैसला करले और जनता के बता दें, तो अच्छा होगा. दोष तो तय करना ही होगा। बात अब तक इतनी बिगड़ चुकी है कि विभूति की पत्नी और ममता कालिया तक पर छीनाल के छींटे पड़ रहे हैं। ये ठीक नहीं..हम प्रतिशोध में वही गल्तियां दुहरा रहे हैं..जो मर्दवादी मानसिकता वाले लोग कर रहे हैं. ये लड़ाई अब सीधे सीधे कहीं स्त्री-पुरुष के बीच की लड़ाई ना बन जाए. लेकिन जिस तरह से इस लड़ाई को स्त्रियां कम और पुरुष ज्यादा लड़ रहे हैं वो काबिले तारीफ है. मगर कुछ कुंठित लोग भी हैं जिनकी तड़पती आत्मा को चैन मिला होगा इस बयान से. विभूति उन्हें मौका दिया कि वे अपनी कुंठा शांत कर सके।


वीएन राय से बड़ा लफंगा नहीं देखा..

Posted By Geetashree On 12:42 AM 3 comments
मैत्रयी पुष्पा (लेखिका)

मेरी आत्मकथा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’कोई पढ़े और बताये कि विभूति ने यह बदतमीजी किस आधार पर की है। हमने एक जिंदगी जी है उसमें से एक जिंदा औरत निकलती है, जो लेखन में दखल देती है।

महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति वीएन राय लेखिकाओं को ‘छिनाल’कहकर अपनी कुंठा मिटा रहे हैं और उन्हें लगता है कि लेखन से न मिली प्रसिद्धि की भरपाई वह इसी से कर लेंगे। मैं इस बारे में कुछ आगे कहूं उससे पहले ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया और कुलपति वीएन राय को याद दिलाना चाहुंगी कि दोनों की बीबियां ममता कालिया और पदमा राय लेखिकाएं है,आखिर उनके ‘छिनाल’होने के बारे में महानुभावों का क्या ख्याल है।

लेखन के क्षेत्र में आने के बाद से ही लंपट छवि के धनी रहे वीएन राय ने ‘छिनाल’ शब्द का प्रयोग हिंदी लेखिकाओं के आत्मकथा लेखन के संदर्भ में की है। हिंदी में मन्नु भंडारी,प्रभा खेतान और मेरी आत्मकथा आयी है। जाहिरा तौर यह टिप्पणी हममें से ही किसी एक के बारे में की गयी, ऐसा कौन है वह तो विभूति ही जानें। प्रेमचंद जयंती के अवसर पर कल ऐवाने गालिब सभागार (ऐवाने गालिब) में उनसे मुलाकात के दौरान मैंने पूछा कि ‘नाम लिखने की हिम्मत क्यों न दिखा सके, तो वह करीब इस सवाल पर उसी तरह भागते नजर आये जैसे श्रोताओं के सवाल पर ऐवाने गालिब में।

मेरी आत्मकथा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’कोई पढ़े और बताये कि विभूति ने यह बदतमीजी किस आधार पर की है। हमने एक जिंदगी जी है उसमें से एक जिंदा औरत निकलती है और लेखन में दखल देती है। यह एहसास विभूति नारायण जैसे लेखक को कभी नहीं हो सकता क्योंकि वह बुनियादी तौर पर लफंगे हैं।

मैं विभूति नारायण के गांव में होने वाले किसी कार्यक्रम में कभी नहीं गयी। उनके समकालिनों और लड़कियों से सुनती आयी हूं कि वह लफंगई में सारी नैतिकताएं ताक पर रख देता है। यहां तक कि कई दफा वर्धा भी मुझे बुलाया,लेकिन सिर्फ एक बार गयी। वह भी दो शर्तों के साथ। एक तो मैं बहुत समय नहीं लगा सकती इसलिए हवाई जहाज से आउंगी और दूसरा मैं विकास नारायण राय के साथ आउंगी जो कि विभूति का भाई और चरित्र में उससे बिल्कुल उलट है। विकास के साथ ही दिल्ली लौट आने पर विभूति ने कहा कि ‘वह आपको कबतक बचायेगा।’ सच बताउं मेरी इतनी उम्र हो गयी है फिर भी कभी विभूति पर भरोसा नहीं हुआ कि वह किसी चीज का लिहाज करता होंगे।

रही बात ‘छिनाल’ होने या न होने की तो, जब हम लेखिकाएं सामाजिक पाबंदियों और हदों को तोड़ बाहर निकले तभी से यह तोहमतें हमारे पीछे लगी हैं। अगर हमलोग इस तरह के लांछनों से डर गये होते तो आज उन दरवाजों के भीतर ही पैबस्त रहते,जहां विभूति जैसे लोग देखना चाहते हैं। छिनाल,वेश्या जैसे शब्द मर्दों के बनाये हुए हैं और हम इनकों ठेंगे पर रखते हैं।

हमें तरस आता है वर्धा विश्वविद्यालय पर जिसका वीसी एक लफंगा है और तरस आता है 'नया ज्ञानोदय' पर जो लफंगयी को प्रचारित करता है। मैंने ज्ञानपीठ के मालिक अशोक जैन को फोन कर पूछा तो उसने शर्मींदा होने की बात कही। मगर मेरा मानना है कि बात जब लिखित आ गयी हो तो कार्रवाई भी उससे कम पर हमें नहीं मंजूर है। दरअसल ज्ञोनादय के संपादक रवींद्र कालिया ने विभूति की बकवास को इसलिए नहीं संपादित किया क्योंकि ममता कालिया को विभूति ने अपने विश्वविद्यालय में नौकरी दे रखी है।

मैं साहित्य समाज और संवेदनशील लोगों से मांग करती हूं कि इस पर व्यापक स्तर पर चर्चा हो और विभूति और रवींद्र बतायें कि कौन सी लेखिकाएं ‘छिनाल’हैं। मेरा साफ मानना है कि ये लोग शिकारी हैं और शिकार हाथ न लग पाने की कुंठा मिटा रहे हैं। मेरा अनुभव है कि तमाम जोड़-जुगाड़ से भी विभूति की किताबें जब चर्चा में नहीं आ पातीं तो वह काफी गुस्से में आ जाते हैं। औरतों के बारे में उनकी यह टिप्पणी उसी का नतीजा है।

(अजय प्रकाश से हुई बातचीत पर आधारित)
जनज्वार से साभार

कुलपति वी एन राय ने लेखिकाओं को कहा 'छिनाल'

Posted By Geetashree On 12:30 AM 7 comments

नई दिल्ली, 31 जुलाई। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति और भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी वीएन राय ने हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में कहा है कि हिंदी लेखिकाओं में एक वर्ग ऐसा है जो अपने आप को बड़ा ‘छिनाल’साबित करने में लगा हुआ है। उनके इस बयान की हिंदी की कई प्रमुख लेखिकाओं ने आलोचना करते हुए उनके इस्तीफे की मांग की है।
भारतीय ज्ञानपीठ की साहित्यिक पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’को दिए साक्षात्कार में वीएन राय ने कहा है,‘नारीवाद का विमर्श अब बेवफाई के बड़े महोत्सव में बदल गया है।’भारतीय पुलिस सेवा 1975बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी वीएन राय को 2008 में हिंदी विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया था। इस केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना केंद्र सरकार ने हिंदी भाषा और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए की थी।
हिंदी की कुछ प्रमुख लेखिकाओं ने वीएन राय को सत्ता के मद में चूर बताते हुए उन्हें बर्खास्त करने की मांग की है। मशहूर लेखक कृण्णा सोबती ने कहा,‘अगर उन्होंने ऐसा कहा है तो,यह न केवल महिलाओं का अपमान है बल्कि हमारे संविधान का उल्लंघन भी है। सरकार को उन्हें तत्काल बर्खास्त करना चाहिए।’
‘नया ज्ञानोदय’ को दिए साक्षात्कार में वीएन राय ने कहा है,‘लेखिकाओं में यह साबित करने की होड़ लगी है कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है...यह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सव की तरह है।’ एक लेखिका की आत्मकथा,जिसे कई पुरस्कार मिल चुके हैं,का अपमानजनक संदर्भ देते हुए राय कहते हैं,‘मुझे लगता है इधर प्रकाशित एक बहु प्रचारित-प्रसारित लेखिका की आत्मकथात्मक पुस्तक का शीर्षक हो सकता था ‘कितने बिस्तरों में कितनी बार’।’
वीएन राय से जब यह पूछा गया कि उनका इशारा किस लेखिका की ओर है तो उन्होंने हंसते हुए अपनी पूरी बात दोहराई और कहा,‘यहां किसी का नाम लेना उचित नहीं है लेकिन आप सबसे बड़ी छिनाल साबित करने की प्रवृत्ति को देख सकते हैं। यह प्रवृत्ति लेखिकाओं में तेजी से बढ़ रही है। ‘कितने बिस्तरों में कितनी बार’का संदर्भ आप उनके काम में देख सकते हैं।’
वीएन राय के इस बयान पर हिंदी की मशहूर लेखिका और कई पुरस्कारों से सम्मानित मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं,‘राय का बयान पुरुषों की उस मानसिकता को प्रतिबिंबित करता है जो पहले नई लेखिकाओं का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं और नाकाम रहने पर उन्हें बदनाम करते हैं।’ वे कहती हैं, ‘ये वे लोग हैं जो अपनी पवित्रता की दुहाई देते हुए नहीं थकते हैं।’पुष्पा कहती हैं,‘क्या वे अपनी छात्रा के लिए इसी विशेषण का इस्तेमाल कर सकते हैं?राय की पत्नी खुद एक लेखिका हैं। क्या वह उनके बारे में भी ऐसा ही कहेंगे।’पुष्पा,वीएन राय जैसे लोगों को लाइलाज बताते हुए कहती हैं कि सरकार को उनपर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाना चाहिए।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति के इस बयान को ‘घोर आपराधिक’करार देते हुए ‘शलाका सम्मान’ से सम्मानित मन्नू भंडारी कहती हैं,‘वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी एक सिपाही की तरह व्यवहार कर रहा है।’वे कहती हैं कि वे एक कुलपति से वे इस तरह के बयान की उम्मीद नहीं कर सकती हैं। भंडारी कहती हैं,‘हम महिला लेखकों को नारायण जैसे लोगों से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं है.'
(जनसत्ता से साभार)

जब हम ही हो जाते हैं अपने खिलाफ

Posted By Geetashree On 12:33 AM 5 comments

गीताश्री
सायमा वैद अपने ताजा-ताजा दोस्त के साथ लंच करके लौटी तो बेहद प्रफुल्लित थी- आज मैंने अरविंद के साथ लंच किया। बहुत अच्छी कविताएं लिखता है। लंच करते हुए उसकी कविताएं सुनकर मजा आ गया। सायमा ने अपनी सहेली को गदगद कंठ से यह सब बताया। सहेली ने चुटकी लेते हुए सत्य का उदघाटन किया। तुम्हें पता है, अरविंद ‘दलित’ है। ‘क्या?’ नहीं... सायमा ने प्रतिवाद किया। हां, ‘वह दलितों में भी वो है जिसका पानी नहीं चलता।’सायमा धाराशायी। लंच और कविता का खुमार झट से उतर गया।
‘ओह...’ कोई बात नहीं। उसने थाली नहीं छुई। आमने सामने बैठे थे। बच गए। धर्म भ्रष्ट ना हुआ। उसने राहत की सांस ली। इस घटना के बाद से सायमा ने अपने कवि मित्र अरविंद से एक सम्मानजनक दूरी बना ली। पनपने से पहले एक अच्छी दोस्ती जाति व्यवस्था की भेंट चढ़ गई। सायमा प्रगतिशील होते हुए भी अपनी संकीर्ण मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाई है। उसने बचपन से अपने घर, समाज में जो देखा, जो उसे समझाया गया था, उसके दिमाग में वे छवियां और वे पूर्वा ग्रह बुरी तरह पैठ चुके हैं। सायमा जैसी हजारों लड़कियां मौजूदा दौर में प्रगतिशीलता और संकीर्ण मानसिकता के बीच जूझ रही हैं। ये उनके विचारों का संकट काल है।दिल्ली के जमुनापार इलाके में आरती ने नई सोसाइटी में घर खरीदा। वहां कामवाली की तलाश शुरू की। हर रोज कामवालियां आने लगीं। आरती पैसे के साथ साथ उसकी जाति जरूर पूछती थी। जिन जातियों का छुआ खाने में कोई हर्ज नहीं, इसका ज्ञान आरती को बचपन से है। कई दिन तक वह जाति के आधार पर कामवालियों को भगाती रही।
एक दिन कामवाली मिल ही गई। रीना नामक कामवाली ने अपनी कोई ठीक-ठाक जाति बताई और आरती के यहां सेट हो गई। आरती ने चैन की साथ ली।
कुछ दिन बाद दिल्ली के अंग्रेजी अखबार में एक खबर छपी- ‘कभी सीमा कभी सलमा।’ इसमें उन कामवालियों की दास्तान लिखी थी जो मजबूरी में जाति बदल-बदल कर घरों में काम कर रही थीं। आरती के होश उड़ गए। रीना को टाइट किया तो रहस्य खुल गए। वो कभी रीना थी तो कहीं रेहाना।
जबकि वह ‘रेहाना’ थी।
सायमा, आरती.. जैसी और भी हैं समाज में। ये फैशनपरस्त महिलाओं की वो जमात है जो पबो, क्लबो में जाती तो हैं, विवाहेत्तर संबंध बनाती तो हैं, मगर जाति के सवाल पर इनके विचारो में कोई आधुनिकता नहीं है। ऐसी महिलाओं पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव दो टूक कहते हैं, अपने तो स्वीकृत कराने के लिए महिलाएं सबसे ज्यादा पुरुष मूल्यो को आत्मसात करती हैं। जबकि मूलत स्त्री की कोई जाति नहीं होती, पुरुष की होती है। जाति की रक्षा स्त्रियां कस्टोडियन बन कर कर रही हैं। इनके खून में इतनी ज्यादा है जाति व्यवस्था कि कभी बदल नहीं पाएंगी खुद को। बहुत हद तक राजेंद्र यादव की बात सही लगती है।
मनोविज्ञान में एक स्थिति मानी गई है कि लंबी कैद के बाद कैदी अपने को कैद रखने वाले के साथ सहानुभूति रखने लगता है। जरुरत पडऩे पर वह अपने कैदी साथी के बजाए खुद को यातना देने वाले का साथ देता है और उसकी नजर से दुनिया को देखने लगता है। स्त्रियो के मामले में यही मानसिकता काम करती है। जाति व्यवस्था का शिकार होते हुए भी वे इसके प्रति सदय हैं। उसे पूरी कट्टरता के साथ पाल पोस रही हैं। यातनादायक जाति व्यवस्था के प्रति उनका नजरिया उस कैदी सरीखी हो जाता है।
राजेंद्र यादव की मान्यता का समर्थन करता हुआ नारीवादी चिंतक दीप्ता भोग का बयान एक बेबसाइट पर उपलब्ध है--पितृसत्ता केवल वैचारिक व्यवस्था भर नहीं है, यह ठोस भौतिक रुप और आधार रखती हैं। यह स्त्रियों के सामने परिस्थितियां बनाती है कि अगर स्त्रियां अमुक कार्य व्यवहार और भूमिकाएं करेंगी तो वे अच्छी, चरित्रवान. योग्य और देवी सदृश्य होंगी। सायमा, आरती सरीखी महिलाएं इसी जाल में फंसी हुई हैं। जाने अनजाने जाति के नाम पर समाज के ठेकेदारो की साजिश को पालने पोसने का औजार भी बन गई हैं साथ ही जातियों के बीच विभाजन सीमाएं बनाए रखने के लिए में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा रही हैं।
आखिर क्या वजह है कि पुरुष सत्ता की मारी महिलाएं उनके जाल से बाहर नहीं आ पा रही हैं? इसके पीछे असली वजह क्या है? इसका जवाब देते हैं धर्मशास्त्र पढाने वाले दलित लेखक अजय नावरिया। उनके अुनसार स्त्रियों का समाजीकरण समाज के कायदे कानून के हिसाब से ही होता है। हम उनसे यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे समाज के नियमों से बाहर जाएंगी। भारतीय समाज, जाति आधारित समाज है और स्त्रियां भी वैसी ही जातिवादी हैं, जैसा कि पुरुष होते हैं। कुछ मामलों में स्त्रियां अधिक जातिवादी हैं क्योंकि वे पुरुषों की तुलना में अधिक धार्मिकवृति की होती है। स्त्रियां जातिवाद का धार्मिक रूप से भी पालन करती है। जब कोई प्रथा या रिवाज, धार्मिक और सामाजिक प्रथा के रूप में वैधता प्राप्त कर लेता है, तब वह लगभग अकाटय हो जाता है।
यहां एक तर्क दिया जा सकता है कि जब स्त्रियो की कोई जाति नहीं होती तो वे क्यो इसे पाल पोस रही हैं। कई बार यह मानना मुश्किल हो जाता है कि स्त्रियों की कोई जाति नहीं होती। भारत में स्त्री भी एक धन या संपत्ति समझी जाती है। स्त्री धन को छिपाए रखने अर्थात पर्दे में रहने के अक्सर निर्देश दिए जाते हैं। अगर स्त्री की जाति नहीं है तो आए दिन होने वाली ऑनर किलिंग्स क्यों हो रही है? खाप पंचायतें क्यों इतनी शक्तिशाली हो गई हैं। कहीं ना कहीं उन्हें स्त्रियों का समर्थन हासिल है। पुरुषों के इस खेल में वे भी शामिल कर ली गई हैं। कहीं अच्छा बनने के लिए खेल का हिस्सा हो गई हैं तो कहीं जबरन शामिल कर ली गई हैं।
जाहिर है, सोच में बदलाव की जरुरत है। मगर आएगी कैसे? प्रमुख चिंतक गोविंदाचार्य अपने लेख में लिखते हैं, भारत में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए केवल लैंगिक असमानता को ध्यान में रखने से बात नहीं बनेगी। इसका जो सामाजिक आयाम है जिसे हम जाति कहते हैं, उसे भी समझना होगा। कई बार यह लिंग की तुलना में ज्यादा प्रभावकारी होती है।
दरअसल जाति व्यवस्था के सबसे नीचले पायदान पर स्त्रियां शूद्रो के साथ खड़ी हैं मगर वे इस सच को ना देख पा रही हैं ना समझ पा रही हैं। इन दोनो को काम पारंपरिक रुप से सेवा करना है। दोनों को समय समय पर अछूत बना दिया जाता है। क्योंकि मुंडन(कुछ प्रदेशों और जातियों में) और यज्ञोपवित जैसे संस्कारो से वंचित स्त्रियां द्वीज नहीं होतीं। जैसे दलितो के कान में वेद पढना वर्जित है वैसे ही स्त्रियो के कान में वेद नहीं पढते। ब्राहम्ण भोज के दौरान ब्राहम्ण स्त्रियां शामिल नहीं की जाती, वहां भी पुरुष ही जाते हैं। ये हालात अब भी नहीं बदले हैं, बस नई पीढी की लड़कियो की सोच में हल्का बदलाव दिखाई दे रहा है। मगर प्रतिशत कम है। जिन घरो में कामवालियां रखी जाती हैं, वहां घर के पुरुषो का दखल नहीं होता ना ही वे उनकी जाति के प्रति आग्रही होते हैं। जाति ही पूछो साधो की- की तर्ज पर यहां स्त्री ही स्त्री के विरुध्द तन कर खड़ी हो जाती है। उन्हें ये अहसास ही नहीं होता कि किस कदर पुरुषसत्ता ने उन्हें मानसिक विकलांगता की तरफ ढकेल दिया है। औरत होने के नाते एक तरफ पहाड़ जैसी मुश्किल लड़ाईयां हैं तो दूसरी तरफ मानसिक विकलांगता।
विचारक जॉन स्टुर्अट मिल ने कहा है, जब हम पृथ्वी की आधी आबादी के ऊपर अनचाही विकलांगता गढने के दोहरे दुष्प्रभावों को देखते हैं तो एक तरफ उनसे जीवन का सबसे सहज स्वभाविक और ऊंचे दर्जे का आनंद छिन जाता है और दूसरी तरफ उनके लिए उकताहट, निराशा और गहरी असंतुष्टि का पर्याय बन जाता है। .. ..पुरुषों के खोखले भय सिर्फ स्त्रियों को बंधनग्रस्त किए हुए है।

थोड़ा सा बादल, थोड़ा सा धुंआ

Posted By Geetashree On 8:31 AM 5 comments
गीताश्री
मेघालय की पहाडिय़ों पर कितना बादल है और कितना धुंआ....इसका अंदाजा अब लगाना मुश्किल है। ठंडी हवाओं में तंबाकू की गंध पैठ गई है।
जहां जाइए, वहां धुंआ उड़ाते, तंबाकू चबाते, खुलेआम तंबाकू बेचते खरीदते लोग..कानून की धज्जियां उड़ाते लोग-बाग। शिलांग की एक तंग गली में भीड़ ठुंसी हुई है। रोजमर्रा की चीजें खरीदने वालो की भीड़ और विक्रेताओं का बिक्री राग जोरो पर है। सब्जी वालो की लंबी कतार में आलू प्याज के साथ कुछ सूखी मछलियां रखी हैं और पास के टोकरे में तंबाकू के सूखे पत्ते। लोगबाग पत्ते ही खरीद रहे हैं। कुछ विक्रेता ऐसे भी हैं जो तंबाकू के चूर्ण बड़ी बड़ी टोकरियों में भर कर रखे हैं। औरते, बच्चे, मर्द अलग अलग क्वालिटी के तंबाकू-चूर्ण खरीद रहे हैं साथ ही सिरगेट बनाने वाला सफेद कागज भी। हाथ से सिगरेट बनाने वाला कागज अलग तरह का होता है जिसे तंबाकू के साथ ही बेचा जाता है। इस बिक्री पर कोई कानून नहीं लागू होता। सचित्र चेतावनी की यहां कोई जरुरत नहीं। केंद्र सरकार ने सचित्र चेतावनी छापने की अवधि बढा कर जहां तंबाकू कंपनियों को राहत दी है वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में खुलेआम तंबाकू बिना किसी पैक और चेतावनी के बिक रहे हैं।
तंबाकू बिक्री और इस्तेमाल के मामले में मेघालय में तो खुल्लमखुल्ला नियमों का उल्लघंन हो रहा है और राज्य सरकार इसकी अनदेखी कर रही है। वोलेंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया से जुड़े रोनाल्ड दोरजे तंबाकू की खुली बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध की हिमायत कर रहे हैं। वह चाहते हैं इस पर रोक लगे और इसे पैकेट में सचित्र चेतावनी के साथ बेचा जाए। इस पर रोकथाम के लिए वह डायरेक्ट्रेट ऑफ हेल्थ सर्विसेज के पास गए थे, पुलिस को पास गए, एक्साइज विभाग के पास गए। सबके सामने मुद्दा उठाया। तंबाकू की कुली बिक्री पर कानून में कोई रोक नहीं है। सूचना के अधिकार के तहत आवेदन भी किया। एक साल हो गए, इस पर कोई जवाब नहीं आया। रोनाल्ड कहते हैं, खुला बिकने वाले तंबाकू का कोई रिकार्ड नहीं रखा जा सकता। इसके विक्रेता टैक्स भी नहीं भर रहे। इसे कानून के दायरे में लाना चाहिए, तभी इसकी पैके जिंग होगी और सचित्र चेतावनी की योजना सफल हो पाएगी और सरकार को टैक्स भी मिलेगा।
शिलांग शहर में तो लोग खुलेआम, बेखौफ धुंआ उड़ाते हैं, किसी का चालान नहीं कटता। रोनाल्ड बताते हैं कि यहां कोई चालान सिस्टम नहीं है। पुलिस अधिकारी से पूछो तो बताते हैं कि अभी तक उन्हें ना चालान बुक मिले हैं ना कोई निर्देश। इसीलिए वे सार्वजनिक जगहो पर किसी को धुंआ उड़ाने से नहीं रोक सकते। रोनाल्ड निराश नहीं हैं। वह इस बात पर आमादा हैं कि जल्दी ही इसे मुद्दा बनाएंगे और सभी स्वंय सेवी संगठनों की मदद से राज्य सरकार पर दबाव बनवाएंगे। वह बताते हैं कि हम सभी महिला सगठनों, सामाजिक कार्यकत्र्ताओं और सरकार के नुमाइंदो को भी आमने सामने बिठा कर बात करेंगे और उन्हें ये घोषणा करने के लिए मजबूर कर देंगे कि अमुक तारीख से चालान सिस्टम लागू हो जाएगा। इससे शिलांग तंबाकू रहित हो ना हो, धुंआरहित तो हो ही जाएगा। रोनाल्ड इस सच को जानते हैं कि धुंआरहित कराने में भले उन्हें सफलता मिल जाए, तंबाकू रहित कभी नहीं हो पाएगा। फिर भी वह सरकार पर दबाव बनाना जारी रखेंगे। उनकी चिंता च्विंग टोबैको को लेकर ज्यादा है। स्कूली बच्चों से लेकर घरेलू औरते तक इस आदत का शिकार हैं।
तांबूल उनकी संस्कृति का हिस्सा है। लगभग 99 प्रतशित औरते, शहरी हो या ग्रामीण, तांबुल, कच्ची सुपारी चबाना उनकी आदत में शामिल है। धीरे धीरे उसमें तंबाकू के पत्ते शामिल हो जाते हैं। इसीलिए मेघालय में सबसे ज्यादा मुख कैंसर और आंत कैंसर के रोगी पाए जाते हैं। शिलांग में एंटी टोबैको लॉबी ने जागरुकता जगा कर कुछ काम जरुर किया है जिसके निशान शहर में इधर उधर दिखाई दे जाते हैं। चौराहो पर, सरकारी इमारतो पर तंबाकू के खतरे वाले पोस्टर लगे हुए दिख जाते हैं। सरकारी बाबुओ ने अपने दफ्तर में नो स्मोकिंग जोन लिख कर टांग दिया है। इनके प्रयासो से ईस्ट खासी हिल्स में टोबैको कंट्रोल सेल बन गया है भले ही वह निष्क्रिय है।

कई बार प्रतिबंध भी आजादी देता है...

Posted By Geetashree On 4:35 AM 5 comments
गीताश्री
मैं पिछले साल सीरिया की यात्रा पर गई थी। 10 दिन वहां रही और वहां के समाज को करीब से देखा समझा. खासतौर से औरतो को। ब्लाग के पुराने पोस्ट देखे तो वहां के समाज पर मैंने कई पोस्ट लिखे मिल जाएंगे। आज फिर से मन हुआ कि वहां के बारे में लिखे। बीच बीच में सीरिया मुझे लिखने को उकसाता रहता है।
पिछले कुछ दिनों से बुर्का प्रकरण खबरो में छाया हुआ है। हमने भी लिखा था, ब्लाग और अखबारो में. फ्रांस के कारण यह मुद्दा बना हुआ था। फ्रांस ने अपने देश में बुर्का पहनने पर रोक लगाई और इसके लिए जुर्माना का प्रावधान भी रखा। इसके साहसिक फैसले के बाद इस्लामिक देशो में रिएक्शन जरुर हुए होंगे। सुखद खबर ये कि सीरिया ने अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखने के लिए विश्व विधालयो में बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया। एक तरफ यूरोप में एसे कदमो पर मुस्लिमों के खिलाफ भेदभाव करने के आरोप लग रहे हैं, वहीं सीरिया के शिक्षा मंत्रालय ने नकाब पर प्रतिबंध लगा दिया। ये प्रतिबंध सरकारी और निजी विश्वविधालयो में लगाए गए हैं। इसका सीधा सीधा मकसद अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखना है। हालांकि इसमें सिर पर बांधे जाने वाले स्कार्फ शामिल नहीं है। जिसे वहां की ज्यादातर महिलाएं बांधती हैं। हमने देखा है कि वहां पर बुर्का का चलन पहले से ही कम है। परदा के नाम पर ज्यादतर महिलाएं स्कार्फ बांधती हैं। कुछ समुदायो में बुर्का का चलन दिखा था। लेकिन जब हम कई शिक्षा संस्थानों में गए तो वहां स्कार्फ पहनी लड़कियां नजर आईं, बुर्का पहने शायद ही दिखी हों। बाजार में जरुर एकाध बुजुर्ग महिलाएं दिखी थीं। इस फैसले से कठमुल्लों के पेशानी पर बल जरुर पड़ गए होंगे। लेकिन सीरिया ने कभी खुद को इस्लामिक देश नहीं माना है। अत्यंत आधुनिक देश के तौर पर उभरने वाला यद देश बेहद अन्य इस्लामिक देशो के लिए एक उदाहरण बन सकता है। पोस्ट से साथ जो फोटो है, ये एक शिक्षा संस्थान का ही है। यहां के माहौल को देख कर कुछ कुछ दिल्ली विश्वविधालय की मस्ती याद आ गई। थोड़ा फन..थोडी पढाई। यहां तक कि स्कार्फ भी गायब थे लड़कियो के सिर से।
अब जिन घरो में लड़कियो को नकाब पहनने को मजबूर किया जाता होगा, वे अब मुक्त हुईं। कमसेकम शिक्षा प्रांगण में इस बंदिश से आजाद होंगी। जिन्हें पढना है उन्हें इस प्रतिबंध को मानना ही होगा।
मुझे लगता है कि इस्लामिक देशो में धीरे धीरे ही सुधारवादी फैसले लिए जाएंगे। काले चोगे से औरतो की रिहाई का वक्त आ गया है। कुछ हिम्मत औरतो को भी जुटानी होगी। प्रशासन बहरा हो तो चोट इतनी जोर से करनी चाहिए कि कान के परदे झनझना जाएं।
सीरिया ने मन खुश कर दिया। वाह सीरिया।
इस खबर के साथ एक और खबर आई कि एक ब्रिटिश मंत्री ने मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने के अधिकारो का बचाव करते हुए तर्क दिया है कि बुर्का पहनने की स्वतंत्रता से महिलाएं सशक्त होती हैं। यह बयान एसे समय में आया है जब पूरे यूरोप में महिलाओं के सावर्जनिक जगहो पर बुर्का पहनने पर बहस छिड़ी है...। मंत्री का तर्क है कि प्रतिबंध ब्रिटिश संस्कृति के खिलाफ होगा और सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान की परंपरा वाले समाज के विपरीत होगा।
मंत्री महोदय के इस मासूम तर्क पर क्या कहें। इतना वाहियात तर्क हमने आज तक नहीं सुना। क्या पारस्परिक सम्मान के नाम पर हम बबर्रता की इजाजत दे सकते हैं। कैद में रखने वाले रिवाज को कायम कैसे रहने दे सकते हैं। ये महज राजनीतिक बयान है..शिगूफा है खुद को एक खास समुदाय में लोकप्रिय़ बनाने का। इससे किसी का भला नहीं होने वाला। बेहतर हो वे अपना ध्यान किसी और दिशा में लगाए।मुक्ति के रास्ते में रोड़े ना अटकाएं।

दे टुक मी एंड टोल्ड मी नथिंग

Posted By Geetashree On 2:17 AM 5 comments
इराकी महिलाओ की सुन्नाह प्रथा पर एक सनसनीखेज रिपोर्ट

सचिन यादव

मानव जाति ने भले ही चांद से लेकर मंगल तक पांव पसार दिए हो पर मानसिकता अभी भी जमीन चांट रही है। मामला मध्य एशिया के एक देश इराक के कुर्दिश्तान प्रांत का है जहां इंसानियत का सरेआम बलात्कार हो रहा है। कुर्दिश्तान में ह्यूमन राइट वाच (एच आर डब्ल्यू) नामक मानवाधिकार संस्था की रिपोर्ट उजागर करती है कि स्थानीय सरकार की नाकामी के कारण यहां की सुन्नाह प्रथा का अंत नही हो पा रहा है।

सुन्नाह प्रथा का मतलब छोटी – छोटी लड़कियो के जननांग काटने से है।

मानवता को शर्मशार कर देने वाली इस फीमेल जेनेटाइल म्यूटीलेशन (सुन्नाह) प्रथा की शिकार बहुत सी इराकी कुर्दिश लड़किया और महिलाए हैं। दे टुक मी एण्ड टोल्ड मी नथिंग- फीमेल जेनेटाइल म्यूटीलेशन इन इराकी कुर्दिश्तान नामक 73 पन्नो की रिपोर्ट उन लड़कियो और महिलाओ के अनुभवो पर आधारित है जो इसकी शिकार है और जो अब कुछ धर्मगुरू एवं स्वास्थ्य कर्मियो के साथ मिलकर इस कुप्रथा के खिलाफ मुहिम चला रही है। रिपोर्ट बताती है उस खौफ को जो लड़कियो और महिलाओ के जननांगो के काटे जाने के पहले और वो असर जो बरसो बाद तक इनकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर पड़ता रहता है। मात्र ये सुनकर कि इन बेगुनाहो को बिना बताए कुछ दाई स्वरूप औरते इनके जननांगो के बाहरी हिस्से को ब्लेड से काट देती हैं, पूरे शरीर में एक सनसनाहट हो जाती है। 17 साल की गोला कहती है कि मुझे याद है कि मेरी मां और मामी हम दो लड़कियो को लेकर कहीं गई। वहां पर चार और लड़किया थी। वे मुझे बाथरुम में लेकर गए और मेरे पैरो को फैलाकर कुछ काट दिया। वे सबको एक एक करके ले गए और एक ही ब्लेड से सबका सुन्नाह कर दिया। मैं डरी हुई थी और बहुत दर्द हो रहा था। जब भी मेरा मासिक रजोधर्म होता है मुझे उस हिस्से मे बहुत तकलीफ होती है।

फीमेल जेनेटाइल म्यूटीलेशन (एफजीएम) शब्द 70 के दशक में चर्चा में आया। वर्ष 1990 में अद्दाबी अबाबा में हुई ‘‘इंटर अफ्रीकन कमेटी ऑन ट्रेडिशनल प्रेक्टिस अफेक्टिंग द हेल्थ ऑफ वूमेन एण्ड चिल्ड्रन’’ के कांफ्रेस में इस शब्द को अपना लिया। लेकिन इसका अस्तित्व के प्रमाण मिस्त्र की पुरातन सभ्यता में मिले हैं। हालांकि आज मिस्त्र में इसको ख़त्म करने के लिए कानून भी बनाया गया है। इस कुप्रथा के मूल में इसाई और इस्लाम धर्म की गलत व्याख्या है। मिस्त्र में इसाई समुदाय के धर्मगुरू का कहना है कि पवित्र बाइबल में इस प्रथा का अस्तित्व ही नही है। यूनिसेफ के कथनानुसार मिस्त्र की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था ‘’अल-अजहर सुप्रीम काउंसिल ऑफ इस्लामिक रिसर्च’’ ने एक बयान जारी किया था कि शरियत में इस प्रथा का कोई आधार नही है।

बात अगर पूरे वैश्विक परिदृश्य की करे तो विश्व के अधिकांश देश इस प्रथा की चपेट में हैं। एम्नेस्टी इंटरनेश्नल के आंकड़ो को माने तो पूरे विश्व में 13 करोड़ महिलाए और लड़किया इससे पीड़ित हैं और हर साल 30 लाख लड़किया पर ये ज़ुल्म ढ़ाया जाता है। सबसे ज्यादा इस घ्रणित प्रथा को अफ्रीका के 28 अलग-अलग देशो में किया जाता है। पश्चिमी अफ्रीका के सेनेगल से पूर्वी तट तक और मिस्त्र से लेकर तंजानिया तक की महिलांए और लड़कियां इसकी शिकार हैं।

अफ्रीका के बारकीनो फासो में 71.6%, सेन्ट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक में 43.4%, डिजीबुआती में 90 –98%, मिस्त्र में 78-97%, इरिट्रिया में 90%, इथियोपिया में 69.7-94.5%, घाना में 9-15%, गुनिया में 98.6%, नाइजीरिया में 25.1%, सिनेगल में 5-20%, सुड़ान में 91%, तंजानिया में 17.6%, टोगो में 12%, युगांडा में 5% से कम एफजीएम से पीड़ित हैं।

ये वे देश हैं जो इस कुप्रथा के शिकार है और ये सभी इस प्रथा के खिलाफ कानून बनाकर लड़ रहें हैं इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, इटली, नीदरलैण्ड, न्यूजीलैण्ड, स्वीडन, युनाइटेड किंगडम और युनाइटेड स्टेट्स जैसे देशो ने अपने नागरिको के हित के लिए एफजीएम विरोधी कानून बना कर उसको सख्ती से लागू करवा रहें हैं। संयुक्त राष्ट्र ने तो 6 फरवरी को इंटरनेशनल डे ऑफ जीरो टॉलरेंस टु फीमेल जेनेटाइल म्यूटीलेशन घोषित कर दिया है। लेकिन एशियाई देशो में इराक के कुर्दिश्तान प्रान्त में एफजीएम से 72.7 फीसदी महिलाओ और लड़कियों के पीड़ित होने के बावजूद इराकी इस कुप्रथा को अपना नसीब मानकर बैठ गए है।

सन् 2008 में स्थानीय इराकी सरकार ने इस प्रथा को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए थे, पुलिस ने भी सुन्नाह करने वालो के ख़िलाफ सख़्त कार्रवाई की थी। कुर्दिश्तान नेशनल असेंबली के बहुसंख्यक सदस्यो ने भी सुन्नाह पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक का समर्थन किया लेकिन इच्छाशक्ति में कमी के चलते यह बिल ठंडे बस्ते में चला गया। वर्ष 2009 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्थानीय एनजीओ के साथ मिलकर फिर से सुन्नाह के खिलाफ एक सुनियोजित मुहिम चलाई लेकिन इस बार भी नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात रहा, मंत्रालय ने अपने कदम खी़च लिए और मुहिम किसी मुकाम तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो गई।

एचआरडब्ल्यू के रिसर्चर्स ने मई और जून 2009 में कुल 31 लड़कियो और महिलाओ (जो कि उत्तरी इराक के हलबजा कस्बे के चार में रहती हैं) का इंटरव्यू किया। नादिया खलीफी जो कि मध्य एशिया में महिला अधिकारो की लड़ाई लड़ रहीं हैं कहती हैं कि इराकी कुर्दिश्तान में महिलाओ और लड़कियो की अच्छी खासी तादाद इस विनाशकारी प्रथा की शिकार है। एच आर डब्ल्यू की रिपोर्ट के मुताबिक स्थानीय सरकार इस ख़तरनाक और समाज को कमजोर करने वाली इस प्रथा को ख़त्म करने में ठोस कदम उठाने में नाकाम रही है। इसके अलावा रिपोर्ट कहती है कि एफ जी एच प्रथा महिलाओ और बच्चो के मौलिक अधिकारो का हनन करने के साथ ही साथ उनके जीवन को भी चुनौती दे रहा है। ऐसे में लाज़िमी है कि कुर्दिश्तान में इस घिनौनी प्रथा को रोकने के स्थानीय सरकार को एक सुनियोजित तरीके से कठोर कानून लागू करना चाहिए।

(सचिन, बिजनेस भास्कर, दिल्ली में पत्रकार हैं।)