थोड़ा सा बादल, थोड़ा सा धुंआ

Posted By Geetashree On 8:31 AM 5 comments
गीताश्री
मेघालय की पहाडिय़ों पर कितना बादल है और कितना धुंआ....इसका अंदाजा अब लगाना मुश्किल है। ठंडी हवाओं में तंबाकू की गंध पैठ गई है।
जहां जाइए, वहां धुंआ उड़ाते, तंबाकू चबाते, खुलेआम तंबाकू बेचते खरीदते लोग..कानून की धज्जियां उड़ाते लोग-बाग। शिलांग की एक तंग गली में भीड़ ठुंसी हुई है। रोजमर्रा की चीजें खरीदने वालो की भीड़ और विक्रेताओं का बिक्री राग जोरो पर है। सब्जी वालो की लंबी कतार में आलू प्याज के साथ कुछ सूखी मछलियां रखी हैं और पास के टोकरे में तंबाकू के सूखे पत्ते। लोगबाग पत्ते ही खरीद रहे हैं। कुछ विक्रेता ऐसे भी हैं जो तंबाकू के चूर्ण बड़ी बड़ी टोकरियों में भर कर रखे हैं। औरते, बच्चे, मर्द अलग अलग क्वालिटी के तंबाकू-चूर्ण खरीद रहे हैं साथ ही सिरगेट बनाने वाला सफेद कागज भी। हाथ से सिगरेट बनाने वाला कागज अलग तरह का होता है जिसे तंबाकू के साथ ही बेचा जाता है। इस बिक्री पर कोई कानून नहीं लागू होता। सचित्र चेतावनी की यहां कोई जरुरत नहीं। केंद्र सरकार ने सचित्र चेतावनी छापने की अवधि बढा कर जहां तंबाकू कंपनियों को राहत दी है वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में खुलेआम तंबाकू बिना किसी पैक और चेतावनी के बिक रहे हैं।
तंबाकू बिक्री और इस्तेमाल के मामले में मेघालय में तो खुल्लमखुल्ला नियमों का उल्लघंन हो रहा है और राज्य सरकार इसकी अनदेखी कर रही है। वोलेंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया से जुड़े रोनाल्ड दोरजे तंबाकू की खुली बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध की हिमायत कर रहे हैं। वह चाहते हैं इस पर रोक लगे और इसे पैकेट में सचित्र चेतावनी के साथ बेचा जाए। इस पर रोकथाम के लिए वह डायरेक्ट्रेट ऑफ हेल्थ सर्विसेज के पास गए थे, पुलिस को पास गए, एक्साइज विभाग के पास गए। सबके सामने मुद्दा उठाया। तंबाकू की कुली बिक्री पर कानून में कोई रोक नहीं है। सूचना के अधिकार के तहत आवेदन भी किया। एक साल हो गए, इस पर कोई जवाब नहीं आया। रोनाल्ड कहते हैं, खुला बिकने वाले तंबाकू का कोई रिकार्ड नहीं रखा जा सकता। इसके विक्रेता टैक्स भी नहीं भर रहे। इसे कानून के दायरे में लाना चाहिए, तभी इसकी पैके जिंग होगी और सचित्र चेतावनी की योजना सफल हो पाएगी और सरकार को टैक्स भी मिलेगा।
शिलांग शहर में तो लोग खुलेआम, बेखौफ धुंआ उड़ाते हैं, किसी का चालान नहीं कटता। रोनाल्ड बताते हैं कि यहां कोई चालान सिस्टम नहीं है। पुलिस अधिकारी से पूछो तो बताते हैं कि अभी तक उन्हें ना चालान बुक मिले हैं ना कोई निर्देश। इसीलिए वे सार्वजनिक जगहो पर किसी को धुंआ उड़ाने से नहीं रोक सकते। रोनाल्ड निराश नहीं हैं। वह इस बात पर आमादा हैं कि जल्दी ही इसे मुद्दा बनाएंगे और सभी स्वंय सेवी संगठनों की मदद से राज्य सरकार पर दबाव बनवाएंगे। वह बताते हैं कि हम सभी महिला सगठनों, सामाजिक कार्यकत्र्ताओं और सरकार के नुमाइंदो को भी आमने सामने बिठा कर बात करेंगे और उन्हें ये घोषणा करने के लिए मजबूर कर देंगे कि अमुक तारीख से चालान सिस्टम लागू हो जाएगा। इससे शिलांग तंबाकू रहित हो ना हो, धुंआरहित तो हो ही जाएगा। रोनाल्ड इस सच को जानते हैं कि धुंआरहित कराने में भले उन्हें सफलता मिल जाए, तंबाकू रहित कभी नहीं हो पाएगा। फिर भी वह सरकार पर दबाव बनाना जारी रखेंगे। उनकी चिंता च्विंग टोबैको को लेकर ज्यादा है। स्कूली बच्चों से लेकर घरेलू औरते तक इस आदत का शिकार हैं।
तांबूल उनकी संस्कृति का हिस्सा है। लगभग 99 प्रतशित औरते, शहरी हो या ग्रामीण, तांबुल, कच्ची सुपारी चबाना उनकी आदत में शामिल है। धीरे धीरे उसमें तंबाकू के पत्ते शामिल हो जाते हैं। इसीलिए मेघालय में सबसे ज्यादा मुख कैंसर और आंत कैंसर के रोगी पाए जाते हैं। शिलांग में एंटी टोबैको लॉबी ने जागरुकता जगा कर कुछ काम जरुर किया है जिसके निशान शहर में इधर उधर दिखाई दे जाते हैं। चौराहो पर, सरकारी इमारतो पर तंबाकू के खतरे वाले पोस्टर लगे हुए दिख जाते हैं। सरकारी बाबुओ ने अपने दफ्तर में नो स्मोकिंग जोन लिख कर टांग दिया है। इनके प्रयासो से ईस्ट खासी हिल्स में टोबैको कंट्रोल सेल बन गया है भले ही वह निष्क्रिय है।

कई बार प्रतिबंध भी आजादी देता है...

Posted By Geetashree On 4:35 AM 5 comments
गीताश्री
मैं पिछले साल सीरिया की यात्रा पर गई थी। 10 दिन वहां रही और वहां के समाज को करीब से देखा समझा. खासतौर से औरतो को। ब्लाग के पुराने पोस्ट देखे तो वहां के समाज पर मैंने कई पोस्ट लिखे मिल जाएंगे। आज फिर से मन हुआ कि वहां के बारे में लिखे। बीच बीच में सीरिया मुझे लिखने को उकसाता रहता है।
पिछले कुछ दिनों से बुर्का प्रकरण खबरो में छाया हुआ है। हमने भी लिखा था, ब्लाग और अखबारो में. फ्रांस के कारण यह मुद्दा बना हुआ था। फ्रांस ने अपने देश में बुर्का पहनने पर रोक लगाई और इसके लिए जुर्माना का प्रावधान भी रखा। इसके साहसिक फैसले के बाद इस्लामिक देशो में रिएक्शन जरुर हुए होंगे। सुखद खबर ये कि सीरिया ने अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखने के लिए विश्व विधालयो में बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया। एक तरफ यूरोप में एसे कदमो पर मुस्लिमों के खिलाफ भेदभाव करने के आरोप लग रहे हैं, वहीं सीरिया के शिक्षा मंत्रालय ने नकाब पर प्रतिबंध लगा दिया। ये प्रतिबंध सरकारी और निजी विश्वविधालयो में लगाए गए हैं। इसका सीधा सीधा मकसद अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखना है। हालांकि इसमें सिर पर बांधे जाने वाले स्कार्फ शामिल नहीं है। जिसे वहां की ज्यादातर महिलाएं बांधती हैं। हमने देखा है कि वहां पर बुर्का का चलन पहले से ही कम है। परदा के नाम पर ज्यादतर महिलाएं स्कार्फ बांधती हैं। कुछ समुदायो में बुर्का का चलन दिखा था। लेकिन जब हम कई शिक्षा संस्थानों में गए तो वहां स्कार्फ पहनी लड़कियां नजर आईं, बुर्का पहने शायद ही दिखी हों। बाजार में जरुर एकाध बुजुर्ग महिलाएं दिखी थीं। इस फैसले से कठमुल्लों के पेशानी पर बल जरुर पड़ गए होंगे। लेकिन सीरिया ने कभी खुद को इस्लामिक देश नहीं माना है। अत्यंत आधुनिक देश के तौर पर उभरने वाला यद देश बेहद अन्य इस्लामिक देशो के लिए एक उदाहरण बन सकता है। पोस्ट से साथ जो फोटो है, ये एक शिक्षा संस्थान का ही है। यहां के माहौल को देख कर कुछ कुछ दिल्ली विश्वविधालय की मस्ती याद आ गई। थोड़ा फन..थोडी पढाई। यहां तक कि स्कार्फ भी गायब थे लड़कियो के सिर से।
अब जिन घरो में लड़कियो को नकाब पहनने को मजबूर किया जाता होगा, वे अब मुक्त हुईं। कमसेकम शिक्षा प्रांगण में इस बंदिश से आजाद होंगी। जिन्हें पढना है उन्हें इस प्रतिबंध को मानना ही होगा।
मुझे लगता है कि इस्लामिक देशो में धीरे धीरे ही सुधारवादी फैसले लिए जाएंगे। काले चोगे से औरतो की रिहाई का वक्त आ गया है। कुछ हिम्मत औरतो को भी जुटानी होगी। प्रशासन बहरा हो तो चोट इतनी जोर से करनी चाहिए कि कान के परदे झनझना जाएं।
सीरिया ने मन खुश कर दिया। वाह सीरिया।
इस खबर के साथ एक और खबर आई कि एक ब्रिटिश मंत्री ने मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने के अधिकारो का बचाव करते हुए तर्क दिया है कि बुर्का पहनने की स्वतंत्रता से महिलाएं सशक्त होती हैं। यह बयान एसे समय में आया है जब पूरे यूरोप में महिलाओं के सावर्जनिक जगहो पर बुर्का पहनने पर बहस छिड़ी है...। मंत्री का तर्क है कि प्रतिबंध ब्रिटिश संस्कृति के खिलाफ होगा और सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान की परंपरा वाले समाज के विपरीत होगा।
मंत्री महोदय के इस मासूम तर्क पर क्या कहें। इतना वाहियात तर्क हमने आज तक नहीं सुना। क्या पारस्परिक सम्मान के नाम पर हम बबर्रता की इजाजत दे सकते हैं। कैद में रखने वाले रिवाज को कायम कैसे रहने दे सकते हैं। ये महज राजनीतिक बयान है..शिगूफा है खुद को एक खास समुदाय में लोकप्रिय़ बनाने का। इससे किसी का भला नहीं होने वाला। बेहतर हो वे अपना ध्यान किसी और दिशा में लगाए।मुक्ति के रास्ते में रोड़े ना अटकाएं।

दे टुक मी एंड टोल्ड मी नथिंग

Posted By Geetashree On 2:17 AM 5 comments
इराकी महिलाओ की सुन्नाह प्रथा पर एक सनसनीखेज रिपोर्ट

सचिन यादव

मानव जाति ने भले ही चांद से लेकर मंगल तक पांव पसार दिए हो पर मानसिकता अभी भी जमीन चांट रही है। मामला मध्य एशिया के एक देश इराक के कुर्दिश्तान प्रांत का है जहां इंसानियत का सरेआम बलात्कार हो रहा है। कुर्दिश्तान में ह्यूमन राइट वाच (एच आर डब्ल्यू) नामक मानवाधिकार संस्था की रिपोर्ट उजागर करती है कि स्थानीय सरकार की नाकामी के कारण यहां की सुन्नाह प्रथा का अंत नही हो पा रहा है।

सुन्नाह प्रथा का मतलब छोटी – छोटी लड़कियो के जननांग काटने से है।

मानवता को शर्मशार कर देने वाली इस फीमेल जेनेटाइल म्यूटीलेशन (सुन्नाह) प्रथा की शिकार बहुत सी इराकी कुर्दिश लड़किया और महिलाए हैं। दे टुक मी एण्ड टोल्ड मी नथिंग- फीमेल जेनेटाइल म्यूटीलेशन इन इराकी कुर्दिश्तान नामक 73 पन्नो की रिपोर्ट उन लड़कियो और महिलाओ के अनुभवो पर आधारित है जो इसकी शिकार है और जो अब कुछ धर्मगुरू एवं स्वास्थ्य कर्मियो के साथ मिलकर इस कुप्रथा के खिलाफ मुहिम चला रही है। रिपोर्ट बताती है उस खौफ को जो लड़कियो और महिलाओ के जननांगो के काटे जाने के पहले और वो असर जो बरसो बाद तक इनकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर पड़ता रहता है। मात्र ये सुनकर कि इन बेगुनाहो को बिना बताए कुछ दाई स्वरूप औरते इनके जननांगो के बाहरी हिस्से को ब्लेड से काट देती हैं, पूरे शरीर में एक सनसनाहट हो जाती है। 17 साल की गोला कहती है कि मुझे याद है कि मेरी मां और मामी हम दो लड़कियो को लेकर कहीं गई। वहां पर चार और लड़किया थी। वे मुझे बाथरुम में लेकर गए और मेरे पैरो को फैलाकर कुछ काट दिया। वे सबको एक एक करके ले गए और एक ही ब्लेड से सबका सुन्नाह कर दिया। मैं डरी हुई थी और बहुत दर्द हो रहा था। जब भी मेरा मासिक रजोधर्म होता है मुझे उस हिस्से मे बहुत तकलीफ होती है।

फीमेल जेनेटाइल म्यूटीलेशन (एफजीएम) शब्द 70 के दशक में चर्चा में आया। वर्ष 1990 में अद्दाबी अबाबा में हुई ‘‘इंटर अफ्रीकन कमेटी ऑन ट्रेडिशनल प्रेक्टिस अफेक्टिंग द हेल्थ ऑफ वूमेन एण्ड चिल्ड्रन’’ के कांफ्रेस में इस शब्द को अपना लिया। लेकिन इसका अस्तित्व के प्रमाण मिस्त्र की पुरातन सभ्यता में मिले हैं। हालांकि आज मिस्त्र में इसको ख़त्म करने के लिए कानून भी बनाया गया है। इस कुप्रथा के मूल में इसाई और इस्लाम धर्म की गलत व्याख्या है। मिस्त्र में इसाई समुदाय के धर्मगुरू का कहना है कि पवित्र बाइबल में इस प्रथा का अस्तित्व ही नही है। यूनिसेफ के कथनानुसार मिस्त्र की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था ‘’अल-अजहर सुप्रीम काउंसिल ऑफ इस्लामिक रिसर्च’’ ने एक बयान जारी किया था कि शरियत में इस प्रथा का कोई आधार नही है।

बात अगर पूरे वैश्विक परिदृश्य की करे तो विश्व के अधिकांश देश इस प्रथा की चपेट में हैं। एम्नेस्टी इंटरनेश्नल के आंकड़ो को माने तो पूरे विश्व में 13 करोड़ महिलाए और लड़किया इससे पीड़ित हैं और हर साल 30 लाख लड़किया पर ये ज़ुल्म ढ़ाया जाता है। सबसे ज्यादा इस घ्रणित प्रथा को अफ्रीका के 28 अलग-अलग देशो में किया जाता है। पश्चिमी अफ्रीका के सेनेगल से पूर्वी तट तक और मिस्त्र से लेकर तंजानिया तक की महिलांए और लड़कियां इसकी शिकार हैं।

अफ्रीका के बारकीनो फासो में 71.6%, सेन्ट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक में 43.4%, डिजीबुआती में 90 –98%, मिस्त्र में 78-97%, इरिट्रिया में 90%, इथियोपिया में 69.7-94.5%, घाना में 9-15%, गुनिया में 98.6%, नाइजीरिया में 25.1%, सिनेगल में 5-20%, सुड़ान में 91%, तंजानिया में 17.6%, टोगो में 12%, युगांडा में 5% से कम एफजीएम से पीड़ित हैं।

ये वे देश हैं जो इस कुप्रथा के शिकार है और ये सभी इस प्रथा के खिलाफ कानून बनाकर लड़ रहें हैं इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, इटली, नीदरलैण्ड, न्यूजीलैण्ड, स्वीडन, युनाइटेड किंगडम और युनाइटेड स्टेट्स जैसे देशो ने अपने नागरिको के हित के लिए एफजीएम विरोधी कानून बना कर उसको सख्ती से लागू करवा रहें हैं। संयुक्त राष्ट्र ने तो 6 फरवरी को इंटरनेशनल डे ऑफ जीरो टॉलरेंस टु फीमेल जेनेटाइल म्यूटीलेशन घोषित कर दिया है। लेकिन एशियाई देशो में इराक के कुर्दिश्तान प्रान्त में एफजीएम से 72.7 फीसदी महिलाओ और लड़कियों के पीड़ित होने के बावजूद इराकी इस कुप्रथा को अपना नसीब मानकर बैठ गए है।

सन् 2008 में स्थानीय इराकी सरकार ने इस प्रथा को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए थे, पुलिस ने भी सुन्नाह करने वालो के ख़िलाफ सख़्त कार्रवाई की थी। कुर्दिश्तान नेशनल असेंबली के बहुसंख्यक सदस्यो ने भी सुन्नाह पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक का समर्थन किया लेकिन इच्छाशक्ति में कमी के चलते यह बिल ठंडे बस्ते में चला गया। वर्ष 2009 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्थानीय एनजीओ के साथ मिलकर फिर से सुन्नाह के खिलाफ एक सुनियोजित मुहिम चलाई लेकिन इस बार भी नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात रहा, मंत्रालय ने अपने कदम खी़च लिए और मुहिम किसी मुकाम तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो गई।

एचआरडब्ल्यू के रिसर्चर्स ने मई और जून 2009 में कुल 31 लड़कियो और महिलाओ (जो कि उत्तरी इराक के हलबजा कस्बे के चार में रहती हैं) का इंटरव्यू किया। नादिया खलीफी जो कि मध्य एशिया में महिला अधिकारो की लड़ाई लड़ रहीं हैं कहती हैं कि इराकी कुर्दिश्तान में महिलाओ और लड़कियो की अच्छी खासी तादाद इस विनाशकारी प्रथा की शिकार है। एच आर डब्ल्यू की रिपोर्ट के मुताबिक स्थानीय सरकार इस ख़तरनाक और समाज को कमजोर करने वाली इस प्रथा को ख़त्म करने में ठोस कदम उठाने में नाकाम रही है। इसके अलावा रिपोर्ट कहती है कि एफ जी एच प्रथा महिलाओ और बच्चो के मौलिक अधिकारो का हनन करने के साथ ही साथ उनके जीवन को भी चुनौती दे रहा है। ऐसे में लाज़िमी है कि कुर्दिश्तान में इस घिनौनी प्रथा को रोकने के स्थानीय सरकार को एक सुनियोजित तरीके से कठोर कानून लागू करना चाहिए।

(सचिन, बिजनेस भास्कर, दिल्ली में पत्रकार हैं।)

मत कहना,हर शहर में एक बदनाम औरत है!

Posted By Geetashree On 2:39 AM 6 comments
यह लेख सबलोक(संपादक-किशन कालजयी) पत्रिका में छपा है। पाठको को पसंद आ रहा है...खूब सकारात्मक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं...कि बिना वैचारिक बोझ और भाषाई आडंबर के कथ्य स्पष्ट है...सोचा आप दोस्तो को भी पढा दूं... -गीताश्री
जब किसी की किसी की देह में दुकान नजर जाए....
तो फिर सपनों, उम्मीदों और अरमानों के खरीदार कौन होंगे,
क्या कभी सोचा हैं आपने?
अपना पसीना बेचकर खुश हो सकते हैं हम, लेकिन इसी देश में एक ऐसी दुनिया भी है, जहां औरतें दिन रात अपनी जांघ बेचकर भी कुछ नहीं पातीं।
अजीब है ये दुनिया और अजीब है वो मर्दवादी सोच, जहां औरत को एक जिस्म भर से ज्यादा नहीं समझा जाता। एक सच यह भी है कि दुनिया की 98 प्रतिशत पूंजी पर पुरुषों का कब्ज़ा है और अगर औरत की देह भी उसके लिए पूंजी है तो सोचिये, "हर शहर में एक बदनाम औरत रहती है," यह कहने वालों की तादात कितनी होगी?
सालों पहले अज्ञेय की एक कविता पढ़ी थी-
"इस सारी धरती की बेहतरी के लिए
जो कूर हुई बार-बार उसी के लिए
कहां है उस औरत का आकाश?
जिसे अपना मान कर
अथवा न मान कर ही मुक्त हो सके वह! "
मुक्त होती औरत यानी देह और मन पर अधिकार मांगती औरत , यह जानते हुए भी इस दुनिया में अपने देह और मन पर अधिकार मांगने का सपना कितना खतरनाक है, औरत खुद की मुक्ति के लिए आगे बढ़ रही है और दुनिया के कई मुल्कों में मर्दों को पसीना आ रहा है । आज तक औरतों ने यही जाना और औरतों को यही बताया गया कि उसके दर्द का कोई मजहब नहीं होता। उसके जख्मों का कोई देश नहीं होता। उसकी सिसकियों की कोई सरहद नहीं होती । लेकिन औरतों को ये बताने वाले समझाने वाले भूल गए कि दूर देश की स्त्री के दर्द का मर्म किसी भी देश की स्त्री बखूबी महसूस कर सकती हैं । तभी तो औरतें स्त्री प्रश्नों से भी ऊपर उठ रही हैं। अब स्त्री परिधि से निकल आई है, वह अपने लिए एक दुनिया की खोज शुरु कर चुकी है। स्त्री अब देह भर नहीं रही है, उसके हृदय में प्यास है। उसके सपने हैं । उसकी उम्मीदें हैं। नारी औरत या स्त्री पर बात होती है तो मुझे इशरत आफरी की पंक्तियां याद आती हैं-
लड़कियां मांओं जैसे मुक्कद्दर क्यूं रखती हैं

तन सहारा और आँख समुन्दर क्यूं रखती हैं

औरतें अपने दुख की विरासत किसकों देंगी

सन्दूकों में बन्द यह जेवर क्यूं रखती हैं।
औरतें अपने दुख की विरासत किसकों देंगी- इस सवाल में स्त्री अस्मिता के कई प्रश्न उलझे हुए हैं। नारी ने अपने देह के इस्तेमाल का अधिकार अब अपने हाथ में ले लिया है तो मर्द तिलमिला उठे हैं। ये वही मर्द हैं, जो समझते हैं कि शादी लाइसेंस प्राप्त वेश्यावृति है। यानी शादी के नाम पर सामाजिक स्वीकृति की मुहर के साथ दैहिक शोषण का लाईसेंस । स्त्री की इच्छा अनिच्छा बेमानी है। इस मान्यता के बावजूद सिमोन द बोउआर की तरह मैं भी यह मानती हूं कि स्त्री पुरुष के बीच यौन संबंध हमेशा दमनकारी नहीं होते। एसे दैहिक संबंधों को अस्वीकर करने के बजाए उस संबंध में मौजूद दमनकारी तत्वों के विनाश की कोशिश क्यों ना की जाए। एक स्त्री अपने मनपसंद पुरुष के साहचर्य मे अपनी यौनिकता की खोज करती है। दुनिया के सबसे सुंदर रिश्ते में जब जबरदस्ती जैसे तत्व घुस आए तो क्या होगा ?
हाल ही में एक खबर ने औरतों की दुनिया में फिर हलचल मचाई। अफगानिस्तान में वहां औरतो को लेकर बन रहे नए नए कानून उसे डरा रहे है। वहां के नए कानून ने पुरुषों को यह हक दिया है कि अगर बीबी शौहर की यौन संबंधी मांग पूरी नहीं करती, इनकार करती है तो उसका खाना पीना बंद किया जा सकता है। यानी सेक्स नहीं तो खाना नहीं..उनकी भूख मिटाओ नहीं तो अपनी भूख से जाओ..।क्या शानदार कानून है। कानून के नए मसौदे में पिता और दादा को ही बच्चों का अभिभावक माना गया है। अगर महिला को नौकरी ही करनी है तो उसे अपने शौहर से इजाजत लेनी होगी। कानून में बलात्कारी को मुकदमे से बचने का भी एक असरदार तरीका दिया गया है। बलात्कार के दौरान जख्मी हुई लड़की को खून का भुगतान कर बलात्कारी लड़की को खून का भुगतान कर आसानी से बच सकता है।यह विधेयक वहां पहले भी पास हुआ था। इसके मूल स्वरुप का भारी विरोध हुआ था। तब वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करजई ने इसे वापस ले लिया था। मगर मौजूदा संशोधित विधेयक अब भी महिला विरोधी है। सीधे सीधे इसके पीछे वहां की चुनावी राजनीति काम कर रही थी। चुनाव में शिया समुदाय का समर्थन हासिल करने के लिए करजई ने यह बर्बर कानून पास किया था। क्योंकि यह सिर्फ शिया समुदाय पर ही लागू होती है। बर्बरता का आलम ये था कि पहले जो मूल विधेयक बनाया गया था उसके अनुसार शिया महिलाओं को अपने शौहर के साथ सप्ताह में कम से कम चार बार सेक्स करना जरुरी था। मानों औरत ना हुई, सेक्स करने की मशीन हो गई। पति ना हुआ सेक्स को गिनने वाला गणितज्ञ हो गया। गिनना ही पड़ेगा, सरकार चाहती है। हैरानी होती है कि कोई एसा मुल्क भी हो सकता है जहां सरकारें चिंता करें कि शौहर की सेक्स लाइफ कैसे आबाद रहे।लगता है अब पत्नी के नियंत्रित करने के लिए पतिनुमा जीव विस्तर पर विधेयक की कापी लेकर सोएगा। स्त्री को नियंत्रित करने के लिए मर्द कानून का सहारा लेने लगे हैं। वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव सही ही तो लिखते है,---आदमी ने मान लिया है कि औरत शरीर है, सेक्स है, वहीं से उसकी स्वतंत्रता की चेतना और स्वच्छंद व्यवहार पैदा होते हैं, इसीलिए हर तरह से उसके सेक्स को नियंत्रित करना चाहता है। कवि पंत के अनुसार--योनि मात्र रह गई मानवी।यहां एक छोटी सी कहानी का उल्लेख करना जरुरी लग रहा है--एक बार जरथुस्त्र एक बुढिया से पूछता है, बताओ, स्त्री के बारे में सच्चाई क्या है। वह कहती है, बहुतसी सच्चाईयां एसी है जिनके बारे में चुप रहना ही बेहतर है। हां, अगर तुम औरत के पास जा रहे हो तो अपना कोड़ा साथ ले जाना मत भूलना। यह कोड़ा अब विधेयक के रुप में औरतों में खौफ भर रहा है। स्त्री पुरुष दोनों के लिए जो आनंद का पल है, वो खौफ में बदल रहा है। बहरहाल, विधेयक के मूल स्वरुप का वहां इतना विरोध हुआ कि इसमें संशोधन करना पड़ा और चालाकी देखिए कि संशोधित विधेयक को चुपचाप पारित कर दिया गया। वैसे भी अरब देशों में पहले से ही औरतों के विऱुध ढेर सारे कानून और सामाजिक पाबंदियां हैं जहां उनका दम घुट रहा है। लेकिन हिम्मत जुटा कर महिलाएं प्रदर्शन भी कर रही हैं। फिर भी उनकी आवाजें, उनके गुहार अनसुने हैं...वहां रोज महिलाओं के अधिकारो के हनन के नए नए कानून ढूंढे जाते हैं। सामंती उत्पीड़न से अभी तक उनकी मुक्ति नहीं हो पाई है। एसी यंत्रणादायक परिस्थिति से बाहर निकलने के लिए वहां की औरत को सामूहिक ल़ड़ाई लड़नी पड़ेगी। अपने शरीर को लेकर आखिर कितनी यातना झेलेगी औरत। कैसा समाज होगा वह जहां एक कानून औरतों को बीवी से वेश्या में बदल दे वो भी अपने घर में। वेश्याएं तो खुलेआम दैहिक श्रम से अपने लिए खाना पीना जुटाती हैं, घरों में बीबियां भी अपने पेट की भूख मिटाने के लिए शौहर के साथ दैहिक श्रम करेंगी। क्या फर्क है..सिर्फ मर्द ही तो बदल रहे हैं...चरित्र तो वही है...दमनकारी।
इस संदर्भ में भारतीय समाज को याद किया जाना लाजिमी है क्योंकि औरत का दम यहां भई घुटता है । शहर हो या गांव औरत हर जगह सेक्स एक उपादान है। ज्यादातर पतियों का मुंह इसलिए सूजा रहता है कि बीवी ने सेक्स करने से मना कर दिया। मियां का मूड बिगड़ गया। संबंधों में कुंठा और लड़ाई की पहली सीढी यही होती है जो बाद में घरेलू हिंसा में बदल जाती है। लोग लड़ाई की जड़ तक नहीं पहुंच पाते कई मामलो में। झु्ग्गियों में झांके, ज्यादातर औरतों की कुटाई इसीलिए होती है, क्योकि वे रोज रोज अपने शराबी पति की हवस मिटाने से मना कर देती हैं। मध्यवर्ग में सीधे सीधे वजह यह नहीं बनता मगर बड़ी वजह यही होती है। पुरुष कुंठित होने लगता है और औरतें घुटने लगती है..छोटी छोटी बात पर झगड़े हिंसक रुप ले लेते हैं..भीतर में सेक्स-कुंठा इस झगड़े को हवा देती रहती है। लेकिन मर्दों ने अब रणनीति बदल ली है। यौनिक मुक्ति के क्षेत्र में पुरुष ने पूंजीवादी सम्पत्ति के अपने नियमों और विश्व बाजार की तलाश की है जिसके अन्तर्गत नारी देह का एक नया ग्रामर विकसित किया गया है। फिर भी स्त्रियों के भीतर प्रतिरोध की आवाज धीरे-धीरे तेज होती जा रही है। ढह रहे हैं वो मकान, जहां बंद कमरों की खिड़कियों के अंदर औरतों की सांसें घुटती थीं और खिड़कियां खुलने पर जहरीली हवा अंदर आती थीं। बीता हुआ कल एक बुरा सपना था लेकिन आने वाला कल वो सतरंगी ख्वाब है, जिसमें औरतें अपनी देह की ही नहीं, अपने मन की भी मालकिन होगी और एक विदेशी लड़की ने जिस तरह बेव पत्रिका कृत्या की संपादक रति सक्सेना से कहा था, ठीक उसी तरह कहेगी-
मुझे नहीं चाहिए सिगरेट

नहीं चाहिए सूरज की रोशनी

नहीं चाहिए मुझे आजादी

बस कह दो उन्हे कि

दें दे मुझे कागज और कलम

जिससे मैं बात कर सकूं

अपने आप सेजिससे

मैं बुन सकूं एक खूबसूरत प्रेम कविता

मेरे प्यार की आत्मा के लिए,

सर्दियाँ करीब आ रहीं हैं।

काश! ऐसा हो जाए तो फिर शायद किसी को ये कहने की जरूरत न हो कि

देश के हर शहर में रहती है एक बदनाम औरत ।





पहले मुक्ति, अब गुलामी की गोली

Posted By Geetashree On 9:57 AM 3 comments
गीताश्री


पिल का खेल सबको समझ में आ गया है। इनका बहुत बड़ा बाजार है। इसने औरतों को टारगेट किया। पुरुषो ने अपने स्पर्श के आनंद के लिए औरतो को गोली ठुंसाई। वे कंडोम को अपनी राह का रोड़ा मानते हैं। इसीलिए औरतो को मानसिक रूप से तैयार करते हैं कि वे पिल को अपना लें। औरतें ही गोली क्यो खाएं? इससे बेहतर है कि हम पचास साल की गुलामी से बाहर आएं।
-एक स्त्रीवादी लेखिका
बहुत योजनाबद्घ तरीके से पुरुष नियंत्रित कंपनियों और समाज ने पिल को प्रोत्साहित किया। जबकि हमारे पास उसका विकल्प कंडोम के रूप में मौजूद था। अब महिलाएं कंडोम के पक्ष में हैं। -- एक स्त्रीवादी उपभोक्ता
एक शांत-सा विज्ञापन- टेलीविजन पर आता है इन दिनों। कोई शोर शराबा नहीं, पति पत्नी के बीच आंखों-आंखों में बातें होती है और उसके बाद ‘आई-पिल’ का जिक्र।ऐसा नहीं कि इससे पहले कोई गर्भ निरोधक दवाई बाजार में नहीं आई। सिप्ला कंपनी की यह गोली शायद कुछ ज्यादा ही खास है। इसे गर्भधारण के 72 घंटे बाद लेने से भी काम चल जाता है। यही इसकी सबसे खास बात है। कंपनी ने इस के प्रचार में गुलाबी रंगों से लिखा है, ‘इसका उपयोग बिना डॉक्टरी सहायता के भी किया जा सकता है। साथ ही यह भी लिखा है कि यह गोली गर्भपात की गोली नहीं है।’पचास साल पहले जब गर्भनिरोध· गोली अस्तित्व में आई तब औरतों की दुनिया बदलने का अंदाजा शायद किसी को न रहा होगा। अनचाहे गर्भ का बोझ ढोती और साल दर साल बच्चे पैदा करती औरतें असमय बूढ़ा जाती थीं। आधी जिंदगी रसोई और आधी कोख यानी बच्चे पैदा करने में गुजर जाती थी। अपने साथ दैहिक आजादी का अहसास लेकर आई ‘जादुई पिल’ ने जब पश्चिम की औरतों को पहली बार उनकी आजादी का अहसास कराया होगा, तब औरतों ने ईश्वर के बदले वैज्ञानिको को धन्यवाद दिया होगा। औरतों की इस बेचारगी के बारे में मार्क्सवादी विचारक शुलामिथ फायर स्टोन ने भी स्पष्ट किया था कि जब तक स्त्री को गर्भाशय से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक उसकी वास्तविक मुक्ति संभव नहीं। इन गोलियों ने पश्चिम में 50 वर्ष पहले महिलाओं के लिए मुक्ति की दिशा में कदम बढ़ा दिए। आई पिल के पैकेट पर ऐसी औरतों का ही सूरते हाल छपा हुआ है। एक उदास औरत शून्य में देख रही है। उसके नीचे लिखा है, ‘असहजता, दुश्चिंता, क्रोध, खुद से खफा, भय, ग्लानि, क्षोभ, शर्म, अकेलापन... ऐसे अनेक तरह के संशय बोध से घिरी एक औरत अनचाही गर्भ का बोझ ढोने को खुद को तैयार नहीं पाती तो इससे उबार लेने के लिए ‘आई-पिल’ मदद करने आया।’ मदद के नाम पर स्त्रियां इनके जाल में फंसती चली गईं। जो चीज 50 साल पहले शुरुआती वर्षो में आजादी का प्रतीक थी, वह धीरे धीरे जबरन गुलामी का प्रतीक बन गई। अब पता चल रहा है कि जादुई पिल सेक्सुअल आजादी की सारी कीमत सिर्फ महिलाओं से वसूलता है, पुरुषों से नहीं। कोख से मुक्ति देने के नाम पर कंडोम की उपलब्धता के बावजूद स्त्रियां पिल की जादुई गिरफ्त में फंसती चली गईं। जबकि सच ये हैं कि पिल कंडोम की तरह यौन सुरक्षा नहीं दे सकता। बल्कि सिर्फ इस पर निर्भर रहे तो यौन संबंधी कई बीमारियां हो सकती है। कंपनियां भी इसे स्त्रियों की आजादी से जोड़कर प्रचारित करती हैं। इस दौर में पिल को स्त्री की आजादी से जोड़कर देखने को मैं मर्दवादी सत्ता की साजिश मानती हूं। ये ठीक है पिल ने मुक्ति दी थी। लेकिन 50 साल से स्त्रियां ही बचाव क्यो करें। आजादी के नाम पर उन्हें लुभाना बंद कर देना चाहिए। क्यों खाती रहें गोली। आप क्यो ना यह जिम्मेवारी उठाओ। अब मुक्ति दो गोली की गुलामी से। अपने लिए उपाय तलाशो और उन्हें आजमाओ। पिल के महत्व से हमें इनकार नहीं। दुनिया बदलने में उसका बहुत बड़ा हाथ रहा है। एक पुरानी फिल्म का संवाद यहां सटीक बैठता है, जिसमें लंपट नायक कुंवारी, गर्भवती-नायिका से कहता है, ‘ईश्वर ने तुम स्त्रियों को कोख देकर हम मर्दों का काम आसान कर दिया।’ लेकिन पिल ने आकर ईश्वर के काम में दखल दे दिया। ये गोलियां धार्मिक वर्जना के विरुद्ध एक औजार की तरह आईं जिसे स्त्रियों ने अपने बचाव के लिए इस्तेमाल किया। पचास साल पहले जब इन गोलियों का अस्तित्व सामने आया तब पश्चिमी विचार· मारग्रेट सेंगर ने टिप्पणी की थी, ‘गर्भ पर नियंत्रण वह पहला महत्वपूर्ण कदम है जो स्त्री को आजादी के लक्ष्य की ओर उठाना ही चाहिए। पुरुषों की बराबरी के लिए उसे यह पहला कदम लेना चाहिए। ये दोनों कदम दासता से मुक्ति की ओर हैं।’ मुक्ति का दौर आज भी जारी है। इस एक छोटी सी गोली ने औरतों की बड़ी दुनिया का नक्शा बदल दिया। औरतें खुदमुख्तार हुईं और देह पर उनका पहला नियंत्रण यही से आरंभ हुआ। उन्होंने तय किया कि उन्हें ‘महाआनंद’ की कीमत अनचाहे गर्भ से नहीं चुकाना है। बेखौफ औरतें पुरुषों के अराजक साम्राज्य से बाहर निकलीं। बस अब नई राह पर चलना है...आप समझ रही हैं ना..।
अब पुरुषों के लिए भी गोली
दौर में महिलाओं के लिए राहत की कई खबरें हैं। अब जो खबर है वह उन महिलाओं को खुश कर देगी जो इन गर्भनिरोध· गोलियों के इस्तेमाल से स्तन कैंसर और इसकी बीमारियों के खतरे को लेकर आशंकित रहती हैं।
ब्रिटेनमें एक ऐसी गर्भनिरोधक गोली का परीक्षण किया जा रहा है जो खासतौर से पुरुषों के लिए तैयार की गई है। ब्रिटिश प्रोफेसर रिचर्ड एंडरसन के अनुसार, ‘मौजूदा दौर में ज्यादातर महिलाओं का मानना है कि पुरुषों के लिए कोई गर्भ निरोधक गोली होनी चाहिए। महिलाओं की इसी चाहत को अमल में लाने की कोशिश की जा रही है।’ बतौर परीक्षण दो साल तक पुरुषों पर इन गोलियों के प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा।

बुर्का से मुक्ति का समय

Posted By Geetashree On 7:57 AM 10 comments
एक कविता की पंक्तियां याद आ रही है...तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है, तू इस आंचल का एक परचम बना लेती तो अच्छा था....।

यह पृथ्वी पर बुर्का से मुक्ति का समय है। हमने अपने घूंघट उतार फेंके हैं। हमारे सिरों से आंचल खिसकर हमारी मुक्ति का परचम बन गया है। वक्त आ गया है। दुनिया की बुर्कानशीनों...समझो..सुनो..देखो...कि अब तक किस साजिश के तहत हम काले कपड़ो में लपेट कर छुपा दिए गए थे। हमारे सिऱ तपती गरमी में भी काले कपड़ो में जकड़े रहते थे। ये लबादा नहीं, हमारी पहचान छुपाने की साजिश थी। एक सुंदर लड़की सड़क पर चलती फिरती काली आत्माओं में बदल जाती थी। कहीं हिजाब, कहीं नकाब तो कही बुर्का...। परदानशीं हुए हम और आप बेपरदा होकर घूमते रहे। पोशाक से लेकर आत्मा तक गुलाम बना दी गई। हमें पाठ पढाया गया कि पोशाक भी हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। हमें उन्हें बचाना है तभी हमारी पहचान, हमारी संस्कृति बचेगी। हम इससे बाहर गए तो हमारा धरम खतरे में।
मैंने दुनिया के कई मुसलिम देश देखे हैं...वहां की लड़कियों को करीब से देखा है। हिजाब और बुर्के से मुक्ति की उनकी छटपटाहट देखी और महसूस किया है। सीरिया जैसे आधुनिक देश में भी आधुनिक लड़कियां हिजाब में लिपटी हुई मिलीं। उनकी पीड़ा ये थी कि उनके प्रेमियो ने लंबे समय तक उनके खुले गेसू नहीं देखें। जब तक निकाह नहीं हुआ तब तक क्या मजाल कि एकांत में भी वे गेसुओं को देखने की हिमाकत कर जाएं। ईरानी फिल्मों का तो अब तक ये हाल है कि परदे पर स्त्रियां खुले बालों में दिखाई ही नहीं जा सकती। चाहे घर के अंदर का दृश्य हो या खेल के मैदान का। इसके खिलाफ मुसलिम महिलाओं को ही क्रांति करनी होगी। प्रतिबंध की नौबत ही क्यो आए। काफी हद तक शहरी महिलाओं ने क्रांति की है,कठमुल्लों को कोप झेला है, झेल रही है, विरोध के आगे वे डट कर खड़ी हैं। देखादेखी हिम्मत आ रही है। मगर बहुसंख्यक अभी भी काली पोशाक की गिरफ्त में है।
जहां महिलाएं पहल नहीं कर रही वहां सरकार को दखल देना पड़ रहा है। हाल ही में फ्रंस सरकार ने क्रंतिकारी कदम उठाया और बुर्के पर रोक के विधेयक को मंजूरी दे दी। जिसमें सार्वजिनक जगहो पर मुसलिम महिलाओं के बुर्का पहनने पर पाबंदी का प्रावधान है। इसस जुलाई में इसे संसद में रखने का रास्ता साफ हो गया है। वहां की सरकार का तर्क है कि सावर्जनिक जगहो पर वैसे कपड़े पहनने की इजाजत नहीं होगी जिनका उद्देश्य चेहरा छिपाना हो। कानून के मसौदे केअनुसार यदि कोई महिला बुर्का या नकाब पहनती है तो उसे 150 यूरो का जुर्माना देना होगा। यही नहीं तालिबान की नजर में शाबाशी लायक काम करने वाले शख्स को फ्रांस जेल भेजने के लायक समझता है। कानून में साफ किया गया है कि किसी महिला को जबरन बुर्का पहनाने वाले व्यक्ति को एक साल की कैद और 20 हजार डालर के जुर्माने का प्रवधान किया गया है।
बुर्कानशीन महिलाओं को आर्थिक दंड इसलिए कम दिया जाएगा कि लोग यह मानतो हैं कि महिलाओं को बुर्का पहनाने के लिए मजबूर किया जाता है। जैसे ही लड़की बड़ी होती है उस पर परदा थोप दिया जाता है। बंद समाज की औरते क्या करें..उन्हें समाज की पाबंदी के साथ जीने की आदत डाल लेना पड़ता है।

वहां से आई एक अन्य खबर के अनुसार पकड़े जाने पर महिलाओं को जुमार्ना भरने के स्थान पर नागरिकता का पाठंयक्रम पूरा करना होगा। फ्रांस सरकार मुसलिम समुदाय से कह रही है कि वे इस कानून को दिल पर ना लें और इस प्रतिबंध को सकारात्मक दृष्टि से देखें।
लेकिन इस पर दुनिया भर में प्रतिक्रियाएं होंगी। कठमुल्ले बौखलाएंगे। स्त्रियों को राहत मिलेगी। अपनी देह पर संस्कृति के नाम पर अतिरिक्त पहरा लेकर चलने से आजादी मिल जाएगी। सवाल ये है कि क्या इस तरह के प्रतिबंध की जरुरत भारत में नहीं है। समाज अगर खुद को बदल ले तो सरकार को एसे कानून बनाने की जरुरत ही क्यो पड़े। सदियो से चली आ रही रुढियो को अब तक ढोए जाने का कोई अर्थ नहीं बचता। वो भी इस दौर में...जब लड़कियां जीवन के सभी वर्जित क्षेत्रो में सेंध लगा रही हैं, आगे बढ रही हैं। सारे बैरियरस तोड़ रही है। एसे में उन्हें लपेट कर रखना कहां तक जायज है। भारत में एसा प्रतिबंध तभी नहीं लगाया जा सकेगा। यहां संभव ही नहीं। हमारी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं. धर्मभीरुता और रुढियों के प्रति हमारा अतिरिक्त मोह कभी संभव नहीं होने देंगा। इस पर सोचना तक दुश्वार है। यह यूरोप में ही संभव है, जहां संसद के 100 प्रतिशत सदस्यो ने पक्ष में मतदान किया। भारत में रायशुमारी करके देख लीजिए...। बहस शुरु हो जाएगी और जातीय अस्मिता का सवाल खड़ा हो जाएगा। तालिबान कही ना कहीं भारतीय मानसिकता में भी जड़े जमा चुका है।

एसा नहीं होता तो गांव की औरते पंचायत की बैठको में सिर पर पल्लू रख कर ना भाषण देतीं। राजनीतिक महिलाएं सल्लज नारी बन कर वोट मांगने ना जातीं। कुछ गांवो में मैंने देखा है कि औरते स्कूटर चला रही है, मगर सिर पर पल्लू कस कर बांधा हुआ है। उसे उतारने की हिम्मत नहीं उनमें। गांव की सीमा में घुसते ही उन्हें अपने खोल में वापस आ जाना है। समाजसेवी भी उन्हें सारी प्रेरणा देते हैं, उन्हें घर की चहारदीवारी से बाहर निकलने को उकसाते हैं, मगर उनके सिर पर पड़े पल्लू से मुक्ति का रास्ता नहीं दिखा पाते। इतनी हिम्मत नहीं कि सामाजिक ताने बाने से टकरा जाएं। भारतीय परिवेश में उनकी एसी मदद कोई और नहीं कर सकता, खुद ही करना होगा। मुसलिम महिलाएं भी चाहे तो शबाना, सईदा हमीद, शबनम हाशमी जैसी अनेक महिलाओं के प्रेरणा लेकर खुद को आजाद घोषित कर दें। बस एक यही बाधा पार करने की जरुरत है...। एक धक्का और...।

शब्दों का सिरा

Posted By Geetashree On 12:54 AM 7 comments
विपिन चौधरी
दिन-रात शब्दों की श्रृंखालाओं से साक्षात्कार के बावजूद कुछ शब्द ऐसे भी हैं जो जब भी सामने आते हैं, हर बार नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर देते हैं। ऐसे ही दोशब्द आते हैं- नारीवादी और शील-अश्लिल के बीच का भेद। तीन चार दिनों
के अंतराल में एक बार फिर इन दोनों शब्दों से मेरा सामना हुआ था।
हाल ही में एक वरिष्ठ आलोचक ने शील या अश्लिल के मसले पर अपनी टिप्पणी देते हुए कहा है कि साहित्य में इसे इतना सतही तौर पर नहीं लिया जा सकता। मंटों ने कभी अपने साहित्य पर लगे आरोपों के बारे में कहा था कि समाज में ही इतनी गंदगी है और दरअसल मैं समाज के सच को ही लिखता हूँ। क्या साहित्य और कला में आकर श्लीलता और अश्लीलता के मायने दूसरे हो जाते हैं या कला -सत्यता की आड में कुछ भी उकेरे जाने की छूट है। यहाँ आकर मेरा 'जड' और 'संस्कारी' मन मुझसे अकसर बहस करने लगता है।इसी तरह फेमिनिज्म या नारीवादी शब्द से भी कुछ समय पहले मेरी मुठभेड हुई। उस दिन दिल्ली से ही प्रकाशित होने वाले एक अखबार में काम कर रही एक महिला छायाकार से मिलने गई। उनसे यह मेरी पहली मुलाकात थी और काफी समय तक याद रखने वाली साबित हुई। जीवन की तमाम परेशानियों को झेलते हुए अपनी अदम्य जिजीविषा के बल पर उन्होनें अपनी राह खुद बनाई जो निश्चय तौर पर काबिले- तारीफ है।कुछ साल पहले जब कादम्बिनी पत्रिका में उनका लेख पढा था, तभी से ही उनसे मिलने का मन था और कुछ रोज़ पहले टेलिविज़न पर उन्हें देख कर एक बार उनसे मिलने की इच्छा बलवती हो उठी। बडी आसानी से उनका फोन नम्बर भी मिल गया। अगले ही दिन मुलाकात तय हुई। हँसते-हँसाते चलती हुई हमारी बातों के बीच में अचानक उनका चेहरा उस वक्त बेहद सख्त हो गया था। एक आम पुरूष के प्रति मेरा नरम रूख उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं आया। समाज में महिलाओं की समस्याओं के बारे में बातें करते-करते आदत के मुताबिक कुछ आधुनिक महिलाओं के आचरण पर मैनें सवाल उठा दिया। इसके बाद उन्होनें अपनी कामान के सारे तीर मुझ पर चला डाले। उनकी बात का समापन इस बात से हुआ किऔर मैंने उन्हें लाख समझाया पर सब व्यर्थ और उस किस्से का समापन इस वाक्य से हुआ कि "तुममें बचपना बहुत है और तुमने अभी दुनिया देखी ही कहां है" ?घर वापिस लौटते समय बार-बार मन में यही ख्याल आ रहे थे कि एक महिला जब समाज में अपनेआप को सार्थक करने की राह पकड़ती है तो इस दौर से गुजरते हुए वह पुरूषों से इतनी नफरत क्यों करने लगती है। क्या खुद की कोशिशों से आगे बढने के इस सारे घटनाक्रम में सामने आये सभी पुरूष उसे छलते हैं।
हमारे यहां यों भी नारीवाद के बारे में अलग-अलग विचारधाराएं बन गई हैं। सवाल है कि नारीवाद अपने असली अर्थों में है क्या?यह सही है कि हमारी इस सामाजिक दुनिया में नारीवादी विचारधारा, लैंगिक भेदभाव के सामने एक चुनौती पेश कर रही है। महिलाओं के सार्वभौमिक दमन को लेकर नारीवाद सामाजिक परिवर्तन के लिए एक प्रतिबद्धता है और समतावादी समाज में ही वह एकमात्र हल दिखाई देता है जो पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना को बदलने में सक्षम है।मेरा मानना है कि नारीवादी होने का मतलब पुरूषजाति के प्रति द्वेष तो बिलकुल नहीं है। स्त्री के हितों की बात करते-करते पुरुषों को दोष देते हुए हम नारी के उत्थान की दिशा से भटकते हुए कहीं ओर निकल जाते हैं। पुरूष क्या केवल इस लिए दोषी है, कि उसे पितृसत्तात्मकता विरासत में मिली है । महिला सशक्तिकरण में नारीवाद की भूमिका तभी सार्थक होगी जब नारी चेतना संपन्न होगी और शिक्षा इस दिशा में सबसे भूमिका निभायेगी। ध्यान देने की बात यह भी है जहाँ पश्चिम में नारीवाद की शुरूआत महिलाओं ने की वहीं भारत में नारीवादी सुधारों की शुरूआत पुरूषों ने की जिसे बाद में महिलाओं ने आगे बढ़ाया और वे इस दिशा में बहुत आगे तक बढती गई।. नारीवादी सिद्धांत पर पश्चिमी बहस भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश पर आज तक हावी रही है। हमारे यहाँ नारीवाद हमेशा विविध रूप धारण कर लेता है। समूचे संसार का भूगोल और इतिहास अलग-अलग है और नारीवाद चूंकि काफि पुराना सैद्धांतिक मॉडल हो चुका है, इसलिए उसमें टूट होना भी स्वभाविक है। यही कारण है कि भारतीय नारीवाद की अनेकों शाखायें हैं और उनके सैद्धांतिक रास्ते भी अलग- अलग हैं। भारत में इस सोच और उसके विकास की दिशा में अब तक कोई ठोस काम नहीं हुआ है।
नारीवाद में शामिल दूसरे विषय जैसे संपत्ति के अधिकार, भत्ते, विरासत, और बच्चे के रखरखाव सब कहीं पीछे छूटते दिखाई देते हैं। आज लगभग हर चीज़ को बाज़ार निर्धारित करता है। जाहिर है, बाजार उस स्त्री के साथ है जो विश्व में उसका उत्पाद बेचेगी। ऐसे में महिलाओं को अपनी गरिमा का ध्यान खुद रखना होगा, अपनी युवा और स्रजनात्मक सोच के साथ क्योंकि युवा होने का मतलब अपने ही द्वारा संशोधित और मानीखेज विचारधारा को साथ लेकर चलना भी है।

त्वरित प्रतिक्रिया, कल्बे जव्वाद के बयान पर

Posted By Geetashree On 10:58 PM 11 comments
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राजनीति नही, घर संभालें महिलाएं

लगता है शिया धर्मगुरु कल्बे साहब का दिमाग खराब हो गया है। तभी वे भयानक किस्म के बयान दे रहे हैं। इनको अपने दिमाग का इलाज कराना चाहिए। उनके मुताबिक औरतें घर संभालें और राजनीति मर्दो की बपौती बनी रहे। सवालिया दिमाग वाले एसी ही बाते करते हैं। आज सभी पेपर में उनका यह खौफनाक बयान छपा है। उस बयान के बाद उन्हें भारत में नहीं स्वातघाटी की राजनीति करना चाहिए या वहां जाकर तालिबानी आंदोलन को मजबूत करना चाहिए। भारत को उनकी जरुरत नहीं...वे गलत मुल्क में हैं। वे हमारी लोकतांत्रिक आधिकारों पर हमला कर रहे हैं। बमुश्किल हासिल की गई आजादी और हको पर हमला बोल रहे हैं। पता नहीं, कोई समाज कैसे बर्दाश्त करता है एसे लोगो को।


पहले तो वह महिला आरक्षण बिल में मुस्लिम महिलाओं के कोटे का विरोध करते हैं फिर बयान देते हैं...महिलाओं को घर गृहस्थी संभालना चाहिए। उन्हें खूबसूरत बच्चे पैदा करना चाहिए। उनका पालन पोषण करना चाहिए। अगर घर में बच्चा रो रहा हो तो वह संसद के गंभीर मुद्दों पर बहस कैसे कर पाएंगी। इसीलिए महिलाओं को चुनाव लड़ने और संसद तक पहुंचने के बारे में सोचना ही नहीं चाहिए।

अकेले यही नही इनसे पहले दारुल ऊलूम देवबंद ने भी राजनीति में जाने की इच्छुक महिलाओं के गैर इस्लामिक व्यवहार पर सजा देने की बात की थी। पांच साल पहले देवबंद ने चुनाव लड़ने वाली महिलाओं के खिलाफ फतवा जारी किया था। कुछ उलेमा एसे हैं जो उदारवादी रवैया रखते हैं। मगर वे भी जमात के विरोध के चलते चुप लगा जाते हैं। उनके अनुसार मुसलिम महिलाएं शरीयत के दायरे में रहकर चुनाव लड़ सकती हैं। क्योकि इस्लाम में महिलाओं के राजनीति में हिस्सा लेने के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं है।

कल्बे के इस बयान के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं। एक बार फिर से मुसलिम महिलाओं की आजादी पर बहस शुरु हो गई है। इस समाज में जब भी औरतो की आजादी की बात होती है तो सारे धर्म गुरु एक सुर में बोलने लगते हैं। सुना है कि उत्तर प्रदेश के कुछ और धर्म गुरु बड़ाबड़ा रहे हैं...महिलाए अपनी हदो से बाहर ना जाएं तो अच्छा होगा...अगर उन्हें राजनीति में आना है तो पहले परदा उतार दें, क्योंकि इस्लाम कही भी परदा उतार कर भाषण देने की इजाजत नहीं देता। इस्लाम मे उन्हें सिर्फ घर में रहकर परिवार और बच्चो की देखभाल करने को कहा गया है... उन्हें पढने लिखने और देशसेवा का अधिकार जरुर दिया गया है लेकिन उन्हें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि पब्लिक प्लेस पर भाषण देने का इस्लाम इजाजत नहीं देता...जो महिलाए चुनाव लड़ती है वे मुसलमान नहीं है...और भी ना जानें क्या क्या...अधिक तापमान में इनसान बड़बड़ता ही है। धर्मगुरुओं का तापमान इन दिनों फिर बढ गया है।
शाइस्ता अंबर के पीछे हाथ धो कर पड़ गए हैं। कहते हैं वे माफी मांगे। माफी तो आप मांगे जनाब...आपने औरत को औरत बनाए रखने की हिमायत और हिमाकत दोनो की है। कब तक धर्म के नाम पर औरतो को बच्चा पैदा करने की मशीन समझते रहेगें। कब तक चहारदीवारी में नकी आत्माएं चित्कारती रहेंगी। आप दस दस बच्चे पैदा करें..चहे जिनती बीबियां अपने हरम में रख लें...औरत को आजादी के सपने भी देखना गुनाह हो जाता है। यह अलग बात है कि कोटे के अंदर कोटा मिले या ना मिले..यह बिल्कुल अलग मुद्दा है। यहां तो आप असली मुद्दे से ही ध्यान हटाया जा रहा है।

मुसलिम महिलाएं अगर राजनीति में आ गईं तो यकीनन इस्लाम खतरे में पड़ जाएगा। जरा जरा सी बात पर क्या कोई धर्म खतरे में पड़ सकता है। समय के हिसाब से जीने की आदत ही नहीं है इन्हें। ढोए चले जा रहे हैं ढोंग को। वक्त कितना बदल गया,,दुनिया बदल गई। हालात और जरुरते बदल गईं। लगभग सारे समाजो की स्त्रियां मुक्त हो रही है...और आप इस्लाम के नाम पर लगाम कसे जा रहे हैं.

ये संयोग है कि आज ही कल्बे का बयान आया और जनसत्ता अखबार में साहित्यकार मित्र मुशर्ऱफ आलम जौकी का एक लेख छपा है जो इस मसले पर बेहद मौजूं है। यहां उसको रख रही हूं...

इस्लाम में औरत को जो भी मुकाम दिया गया हो, मौलवियो ने हर बार धर्म की आड़ लेकर औरत को अपने पैर की जूती बनाने की कोशिश की है। लगातार अत्याचार कई कई पत्नियों का रिवाज, आजादी के पहले तक बीबी की मौजूदगी में दाश्ता रखने और कोठो पर जाने का रिवाज, इस बारे में अपने मर्दाना होने ढेरो तर्क, शहजादों नवाबो और बड़े लोगो के हजारों लाखों किस्मों में औरत सचमुच खेती बन गई थी। मर्द औरत की धरती पर हल चला सकता था, रोलर चला सकता था, धरती को चाहे तो जरखेज या बंजर बना सकता था। क्योंकि वह मर्द की खेती थी। उसे बोलने की बात तो दूर उफ करने का भी कोई हक नहीं था। मर्द उसका कोई भी भी इस्तेमाल कर सकता था। लेकिन बदलते समय के साथ शिक्षित मुसलिम महिलाओं ने स्वंय को पहचानना शुरु कर दिया है, और इसे शुभ संकेत माना जाना चाहिए।

जौकी साहब का लेख बहुत बड़ा है और वे अपने ही समुदाय के धर्मगुरुओं के पाखंड की धज्जी उड़ाते हैं। जिस बदलाव को जौकी साहब शुभ संकेत मान रहे हैं कल्बे उस पर दहाड़ रहे हैं। उन्हें मंच से ललकारती हुई स्त्री डरा रही है। अगर स्त्री के हाथ सत्ता आई तो इनकी दूकाने बंद हो जाएंगी। इनके फरमान कौन सुनेगा। वे अपने आंगन से उठती हुई लहरें देख रहे हैं...डर रहे हैं। एक स्वतंत्र स्त्री सबको मर्दवादी मानसिकता को किसी चुनौती की तरह डराती है। ये सारे पाखंडी जहां तहां मस्जिदो, मदरसो पर कब्जा जमा कर बैठे हैं उनका क्या होगा। सारे रौब तो स्त्री समाज के लिए है। अपनी अय्याशी के लिए सामान की तरह औरते कहां से जुटाएंगे। उनके फरेब में जागरुक औरते नहीं आएगी। ये भयभीत..भीरु मर्दो का विलाप है....इन्हें अनसुना करने की जरुरत है...तभी तो जावेद अख्तर कहते हैं...यह मुसलिम महिलाओं को तय करना है कि वे एसे गुरुओं की बातें माने या फिर खुद फैसला करें।


पारो ही पारो है जहां

Posted By Geetashree On 12:20 AM 4 comments

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हाल ही में सहारा में एक खबर पढी, जो देश के बाकी अखबारो के लिए शायद उतनी बिकाउ खबर ना रही होगी। खबर थी, हरियाणा में मिली बालिका वधू नौ दिनों से गायब थी। यह मामला सबसे पहले सहारा समय पर उजागर हुआ तब जाकर मुकदमा दर्ज हो पाया। उसके परिजन कहते फिर रहे हैं कि लड़की मानसिक रुप से विक्षिप्त है। जबकि मामला कुछ और होगा। पुलिस ने मामला दर्ज किया होगा और घरवालो की बात पर यकीन कर लिया होगा। अगर 12 साल की लड़की की शादी 70 साल के बूढे से कर दी जाए, उसके घर वाले उसका सौदा कर दें या कोई दलाल उसे उठा ले आए और बूढे के हाथो बेच दे तो क्या वो नाबालिग लड़की विक्षिप्त नहीं होगी। क्या वह वयस्क दुल्हनो की तरह विहंसेगी। क्या उम्मीद करते हैं आप उससे। कि वह यह सब चुपचाप स्वीकार ले। खेलने कूदने के दिनों में बीबी बन कर घर संभाल ले या एक लालची बूढे के हवस की भेंट चढ जाए।
बिहार से छपरा जिले के मसरक प्रखंड के घोघिया गांव की 12 साल की आरती की शादी हरियाणा के सोनीपत के नूरनखेड़ा गांव के 70 साल के बलराम से होने के मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है। कई दिनों से वह अपने घर से लापता थी। गायब होने की खबर जब सहारा समय चैनल पर चलाई गई तो परिवार वालो ने मामला मसरक थाने में दर्ज कराया। लड़की गायब हो गई और लड़की के नाना को पुलिस का भय सताने लगा। डर से उसने गायब होने की सूचना पुलिस को नहीं दी, एसा उसका कहना है। सच क्या है ये नाना जानता होगा। कौन ले गया होगा उसे। अपने गांव से हरियाणा तक कैसे पहुंची। किसी ने नहीं देखा कि आरती कैसे गई. किसके साथ कई।
लोग तरह तरह की बात करते हैं। आरती की कहानी कम दर्दनाक नहीं है। बताते हैं कि उसकी सगी मां भी उसे गायब करा सकती है। क्योंकि कई साल पहले आरती की मां अपनी बेटी को नाना के पास छोड़कर कहीं चली गई और आज तक वापस नहीं आई है। आरती के पिता से उसकी मां की नहीं बनी। लगभग अनाथ आरती को उसकी किस्मत ने हरियाणा पहुंचा दिया। उसका भी अपनी मां की तरह पता नहीं चलता अगर मामला मीडिया में नहीं उछलता। घरवाले अपने बचाव में कह रहे हैं कि आरती सिर्फ अपना नाम बता सकती है, बस। वह मानसिक रुप से विक्षिप्त है। ना वो बेचने का आरोप लगा रहे हैं ना किसी के द्वारा चुरा कर ले जाने का। नाबालिग लड़कियो गायब होने पर उसके परिजन अक्सर एसे ही स्टैंड लेते हैं। ये कोई नया बहाना तो नहीं।
हरियाणा का कुछ हिस्सा लड़कियों की तस्करी का प्रमुख अड्डा बन गया है। आए दिन वहां बिहार, झारखंड, असम, उड़ीसा के पिछड़े इलाको ले लाई गई बच्चियां, लड़कियां यहां बेच दी जाती हैं। कभी दलाल तो कभी घरवाले तो यहां सौदा करने आते हैं, वे बिकती हैं, बनती है पारो और भूल जाती है हमेशा हमेशा के लिए अपनी मुक्ति का स्वप्न। ना वे यहां से भागकर कहीं जा सकती हैं ना विद्रोह कर सकती हैं। यहां एक बूढे की अय्याशी का सामान बनने के बदले दो जून की रोटी तो मयस्सर हो जाती है। चाहे इसके बदले में इन्हें बच्चा पैदा करने की मशीन बनना पड़े।
इस इलाके में पारो का पता करना लगभग असंभव है। पारो यानी राज्य की सरहद से पार की लाई हुई वह लड़की, बहू, पत्नी जिसे पैसे देकर खरीदा गया हो। मेवात इलाके के खातेपीते परिवारो में भी एसी पारो मौजूद हैं जिन पर परदा डालकर रखा जाता है। उन्हे बाहरी व्यक्ति के सामने आने की इजाजत नहीं है। उनकी व्यथा चहारदीवारी में घुमड़ती है। साधारण परिवारो की पारो भी सामने नहीं पाती। पारो की तलाश में मैं जब वहां भटक रही थी तब मेरे साथ इलाके के कुछ प्रभावशाली सामाजिक कार्यकर्त्ता थे। उन्होंने बताया कि यह इलाका खतरनाक है। अगर उनहें भनक भी लग गई कि आप अखबार में लिखने के लिए उनसे मिलना चाहती है तो आप पर हमला भी कर सकते हैं। मेव समुदाय मरने मारने वाली कौम है। इस भय की वजह से एक स्वांग रचा गया। उन लोगो ने पारो के घरवालो को बताया कि केंद्र सरकार पारो को 500 रुपये का मासिक राशि भुगतान करने की योजना बना रही है। मैंडम पारो का सर्वे करने आई हैं। बिना मिले, बात किए पहचान कैसे होगी। बस...यह स्वांग असर दिखा गया। एक के बाद एक पारो से सामने आने लगी लेकिन तब भी अकेली नहीं। अपने घरवालो से घिरी हुई। जो अकेली मिली उनकी कथा ने झकझोर दिया। मेवात के घासेड़ा कस्बे के बस स्टाप पर हमारी मुलाकात नैंसी से हुई. झारखंड की नैंसी बताती है- “मुझे एक ट्रक ड्राइवर लेकर यहां आया था. उसने 500 रुपये मेरे सौतेले बाप को सौंपा और फिरोजपुर गांव में लाकर किसी के घर छोड़ कर चला गया. वो आदमी मुझसे धंधा करवाना चाहता था. उसने कहा-जा कमा कर ला. मैं यह काम नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसके चंगुल से भाग निकली. मैं पारो नहीं बनना चाहती.”मेवात के इस इलाके में ऐसी सैकड़ों पारो हैं. पारो यानी राज्य की सीमा पार से खरीद कर लाई गई वह लड़की, जिसका मनचाहा इस्तेमाल किया जा सकता है. बीवी बनाने से लेकर बच्चा पैदा करने की मशीन या फिर देह व्यापार कराने तक.दिल्ली से सटे आईटी सिटी गुड़गांव के पास है मेवात का इलाका. आधा हरियाणा और आधा राजस्थान में. 6,662 बूचड़खाने वाले इस इलाके को गोकशी के लिए जाना जाता है, टकलू क्राइम यानी सोने की ईंट बेचने के धंधे के लिए जाना जाता है और पारो की खरीद फरोख्त के लिए.यहां गांव गांव में है पारो। मेव, जाट और अहीर बहुल इस इलाके में ‘पारो’ का खूब चलन है. बेचारगी के साथ दलील दी जाती है कि गरीबों को यहां का कोई धनाढ़य व्यक्ति अपनी लड़की नहीं देता. ऐसे में हमारे पास ‘पारो’ के अलावा कोई विकल्प नहीं है.यहां हर कदम पर पारो मिलेगी. कई गांवों में आधी संख्या पारो की है. ये अलग बात है कि लोग अपने घरों में कैद पारो के मुद्दे पर बात करने से बचना चाहते हैं. थोड़ी चालाकी के साथ बात करें या फिर घरवालों को लगे कि बात करने का कोई लाभ मिल सकता है तो लोग थोड़ा-थोड़ा खुलने लगते हैं. तरह-तरह के किस्से आपके सामने आने लगेंगे. झारखंड, आंध्र प्रदेश, असम, बंगाल और देश के अलग-अलग हिस्सों से खरीद कर, बहला फुसला कर या जबरन उठा कर लाई गई हर पारो के पास अपनी-अपनी कहानी है लेकिन सबके हिस्से का दुख एक जैसा है, पहाड़ सा.सलमबा गांव में एक पारो मिली- रुक्सिना। वह असम की हैं. पिछले सात साल से यही हैं. अपने गांव घर का रास्ता भूल चुकी हैं। किस्मत ने उन्हें एक अधेड़ मर्द अकबर की दूसरी बीबी बना दिया है। जब वह हमें मिलीं तो उनकी गोद में एक बच्चा था। बच्चे को गोद में चिपटाए, बेहद डरी सहमी-सी, घरवालो से घिरी हुई। पूछने पर टुकुर-टुकुर मुंह ताकने लगती हैं. साथ में खड़ी एक मेवाती महिला बताती हैं- “इसका मायका गरीब है. रोटी के लाले पड़ते हैं. वहां जाकर क्या करेगी? यहां दो वक्त की रोटी तो नसीब हो रही है ना.”दो वक्त की रोटी के नाम पर रुक्सिना की जिंदगी कैद में बदल गई. भूख का भूगोल जीवन के सारे पाठों पर भारी पड़ गया.पश्चिम की स्त्रवादी लेखिका एलीन मारगन अपनी किताब डिसेंट आफ वीमेन मे एक पुरानी कहावत का हवाला देती हैं, ईश्वर ने कभी कहा था कि जो तुम्हे चाहिए, वह ले लो, लेकिन इसका मूल्य तुम्हे चुकाना पड़ेगा। स्त्री के संदर्भ में यह बात सौ फीसदी सही लगती है। उसने स्त्री रुप में पैदा होने का मूल्य चुकाया और वस्तु में तब्दील हो गई।
यकीन ना हो तो पारो से मिल लें। स्त्री को मादा में बदलते देख सकते हैं।

नूंह कस्बे में कुछ महीने पहले एक और पारो झारखंड से आई है. नाम है सानिया, उम्र कोई 15 वर्ष. ना वह सामने आई, ना उसके घरवालों ने बात की. पड़ोसियों ने बताया कि गरीबी की वजह से 50 वर्षीय मजलिस के साथ मेवात में किसी ने अपनी बेटी नहीं ब्याही. अंततः वह किसी स्थानीय एजेंट के साथ झारखंड गया और अपने लिए कम पैसे में एक पारो का इंतजाम कर लाया. मजलिस ने अपने अरमान पूरे किए और सानिया के अरमानों पर उम्र के इस फासले ने हमेशा के लिए पानी फेर दिया. अनवरी की उम्र है 20 साल. वह मूल रूप से झारखंड के हजारीबाग की रहनेवाली हैं. पिछले साल उन्हें मेवात जिले के घासेड़ा गांव में लाकर एक अधेड़ व्यक्ति के घर में बिठा दिया गया. उन्हें झारखंड से यह झांसा देकर लाया गया कि दूर के रिश्तेदार के यहां मिलने जा रहे है. यहां आते ही अधेड़ व्यक्ति की ब्याहता बना दी गई. जबरन. डरते-डरते अनवरी बताती हैं, “ एक आदमी ने मेरे पति से मेरे बदले दस हजार रुपये लिए।” ये सिर्फ अनवरी की नहीं उनके जैसी अनेक लड़कियों की कहानी है. अरावली पहाड़ियों से घिरे पूरे मेवात क्षेत्र में ऐसी अनेक लड़कियां हैं, जो तस्करी करके यहां लाई गई हैं. यहां उन्हें या तो किसी खूंटे में बांध दिया जाता है या फिर नीलाम किया जाता है. कहीं-कहीं घर वाले धंधा करवाते हैं या दर-दर भीख मांगने पर मजबूर कर देते हैं. ऊपर से देखने पर मामला सिर्फ शादी और लड़का पैदा करने जैसा दिखाई देता है लेकिन अंदर-अंदर मौज मस्ती और कई तरह धंधे के साथ-साथ तस्करी का बहुत मजबूत तंत्र है जिसमें यहां का एक बहुत बड़ा वर्ग लिप्त है. हरियाणा में जब तक लैंगिक असमानता रहेगी तब तक गरीब लड़कियों की अस्मत का सौदा यहां होता रहेगा। कोमा में सोए और स्त्री को मादा समझने वाले समाज पर इसका कोई असर नहीं होगा।

औरतों की ऐसी-तैसी करने वाले कबीर

Posted By Geetashree On 10:56 PM 8 comments

0 गीताश्री 0 कबीरदास को अब तक हम सब एक संत कवि के रुप में जानते रहे हैं, लेकिन कबीर का एक नया रुप भी है. स्त्रियों को गरियाते, उनकी लानत मलामत करते कबीर... धमकाते हुए कबीर कि अगर तुमने अपनी आजादी या चुनाव या स्वेच्छा की बात सोची भी तो पीट-पीट कर नीली कर दी जाओगी...

स्त्री की सारी आजादी छीन ली क्योंकि उसका कंत बहुत गुणों वाला पहले ही घोषित कर दिया गया है. और बेगुणी, बेलच्छनी, बेशऊर स्त्री को अब उसे ही सर्वस्व मान लेना है......

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