प्रतिभा की दुनिया से चंद सांसे

Posted By Geetashree On 5:26 AM 6 comments
सीरिया की गाथा के बीच प्रतिभा की यह कविता मेरे हाथ लगी। उन्होंने लिखा था-जरा देख कर बताइए..पढने के बाद मैं खुद को रोक नही पाई। ये कविता वो आईना है जिसमें दुनिया, समाज का प्रेम से डरा हुआ लेकिन खौफनाक चेहरा दिखाई पड़ता है।--गीताश्री
किस कदर उलझे रहते हैं वे
एक-दूसरे में,
किस कदर तेज चलती हैं उनकी सांसें
किस कदर बेफिक्र हैं वे दुनिया के हर खौफ से
कि दुनिया को उनसे ही लगने लगा है डर,
कि उन पर ही लगी हैं सबकी निगाहें
वे कोई आतंकवादी नहीं,
न ही सभ्यताओं के हैं दुश्मन
न ही उनके दिमाग में है कोई षडयंत्र
फिर भी दुनिया को लग रहा उनसे डर.
पंचायतों की हिल गई हैं चूलें
पसीने आ रहे हैं समाज के मसीहाओं के
कैसे रोकें वे उन दोनों को
कैसे उलझायें उन्हें दूसरे कामों में
कि उनकी दिशायें ही बदल जायें
कौन से जारी किये जाएं फरमान
कि खत्म हो सके उनका प्रेम
कितने खतरनाक हैं
वे इस दुनिया के लिए, सचमुच?

प्रतिभा कटियार

या हबीबी की तलाश में

Posted By Geetashree On 5:25 AM 11 comments

सच कहते हैं बड़े बजुर्ग कि अगर किसी देश की संस्कृति और सभ्यता को समझना हो तो वहां की औरतो की स्थिति को जानो. सीरियाई औरतों के देखने के बाद यह यकीन हो गया. परंपरा और आधुनिकता का ऐसा मेल कहीं और नहीं देखा. आधी-आधी रात तक बेखौफ घूमती लड़कियां हुक्के के नशे में झूमती हुई सर्र से गुजर जाती हैं.

सीरियाई लड़कियों से मिलने के बाद देर तक उनकी कजरारी आंखें आपके जेहन में धंसी रहती हैं. काजल प्रेमी सीरियाई लड़कियों के बारे में वहां खूब मजाक चलते हैं. गोरे गोरे चेहरे पर काजल की गहरी रेखाएं बाकी सारे ऐब को ढंक देती हैं. शायद इसी लिए वे बिना काजल लगाएं बाथरुम तक नहीं जाती. हमारी सीरियल की नायिकाओं जिस तरह मेकअप और गहने से लदी रहती हैं, वैसे ही सीरियन लड़कियां अपनी आंखों के सौंदर्य और उनकी मारक क्षमता के प्रति बहुत सजग रहती हैं. 

कजरारी आंखों के कहर के बारे में दमिश्क के सबसे बड़े धार्मिक नेता जिन्हें मुफ्ती कहा जाता है का एक कथन बहुत दिलचस्प है. भारतीय महिला पत्रकारों से मुलाकात में वे बहुत मस्ती से भरे दिखाई दिए. उनका कथन सुनिए और आनंद उठाइए-हमारी मदर ईव ने भी आदम को अपनी आंखों से मारा था. इसीलिए हम अपनी महिलाओं से गुजारिश करते हैं, आप लोग काजल और मस्करे का इस्तेमाल कम करिए और पुरुषों को मारना बंद करिए. 

यहां एक गाना याद आ रहा है...नैन लड़ जइहें त मनवा मा कसक होइबे करी..., हर मौके पर एक गाना याद आ जाने पर हमारी मित्र सुहासिनी हैदर बहुत दिलचस्प तरीके से रिएक्ट करती थीं. चीन यात्रा के दौरान जब भी कोई बात हो मैं एक गाना पेश कर दूं वह ठठा कर हंस पड़े. कभी कोई दिलचस्प बात कहके कई बार सुहासिनी मेरी तरफ देखती और कहती इस पर एक गाना हो जाए. बाद में यह मजाक के तौर पर चल पड़ा है. मेरी याद उसे कोई ना कोई गाना याद दिला देती है. क्या करें. दुनिया गुनगुना रही है हमारे गाने. खैर... 

फिलहाल सीरियन लड़कियों के बारे में कई कई गाने याद आ रहे हैं. किनका किनका जिक्र करुं. गोरी चिट्टी छरहरी, सजी संवरी, फैशनपरस्त लड़कियां इत्र की खूशबू और मुस्कान बिखेरती जब पास से गुजरती हैं तो अंदाजा हो जाता है कि कहीं किसी की शामत आई है या 'या हबीबी' की तलाश जारी है. 

इतनी उन्मुक्तता कि खुले कैफे में बैठी लड़कियों का झुंड ठाठ से हुक्का पी रहा होता है और मस्ती के तराने गा रहा होता है. किसी की फिक्र नहीं, कौन देख रहा है या सुन रहा है. नैतिक पुलिस जैसी कोई शय नहीं यहां. हुक्का उनकी संस्कृति का अंग है इसीलिए ऐसा नजारा आम है. हुई शाम उनका ख्याल आ गया..की तर्ज पर शाम होते ही कैफे में लड़को की तर्ज पर लड़कियों की भीड़ जुटने लगती है, चाय की प्याली से उठती गर्म भाप के साथ हुक्के का धुंआ बतकहियों के बीच खो जाता है. यहां परदानशीं लड़कियां भी बेखौफ-खुलेआम हुक्का पीती रहती हैं, अपने पार्टनर के हाथों में हाथ डाल कर देर रात तक घूमती रहती हैं. काले स्कार्फ में कसा माथा और गोरा चेहरा जब धुंआ उगलता है तो सोचिए क्या नजारा बनता होगा. चांद जैसे धुंए से घिरा हो. हंसी तो जैसे होठो पर बिजली की तरह खेलती रहती है. 

एलेप्पो शहर में किले की सीढियां चढते उतरते मस्त लड़कियों का एक ग्रुप मिला. साथ में मेरी मित्र मंजरी थीं. उसने बिंदी लगा रखी थी. लड़कियां अचानक पलटी और अरबी-इंगलिश मिक्स भाषा में पूछने लगीं, ये क्या है? मैंने बताया--ये साइन है कि आप गॉड से ब्लेसड हैं. मैं जानबूझ कर बिंदी को सुहाग से नहीं जोड़ा. वैसे भी बिंदी अब फैशन स्टेटमेंट हो गई है. मंजरी ने साफ बता दिया, ये सुहाग की निशानी है और शादीशुदा औरतें लगाती हैं. पता नहीं उनकी समझ में अंग्रेजी कितनी आई, लड़कियों में बिंदी लगाने की होड़ मच गई. समूह में सिर्फ एक लड़की काली स्कार्फ (सीरियन लड़कियों को काले रंग से बहुत मोहब्बत है) पहने थी. उसने मना कर दिया. फिर कहा गया-लगा लो, उसने बहुत गंभीर होकर कहा-नो, थैंक्स, हमारे यहां अलाउड नहीं है. 

ये लड़की उस वर्ग से आती है जो अभी भी अपनी पंरपरा को ढो रहा है. सीरिया का एक पारंपरिक वर्ग ऐसा है जहां परदा प्रथा अभी तक है. कुछ तबके की महिलाएं बुर्का भी पहनती हैं, कुछ सिर्फ स्कार्फ लगाती हैं. एक स्कार्फ वाली महिला ने हमें बताया कैसे उसके प्रेमी से दो साल बाद जब उसकी शादी हुई तब पहली बार प्रेमी-शौहर ने प्रेमिका-पत्नी की खुली जुल्फे देखीं. जब पहली बार देखा होगा काली जुल्फों को तब उसके शौहर को कैसा लगा होगा? वह बताती है, पहले तो वह इतने घने और रेशमी बालों को देख कर सन्न रह गया, फिर आहें भरीं...और करता भी क्या. कभी कहने का साहस ही जुटा पाया कि स्कार्फ उतारो. वह उसकी काली काली आंखों में ही तमाम सौंर्दय तलाशता रहा होगा. दो साल के प्रेम-संबंध में कभी वह अपना स्कार्फ उतारने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. यह बताते हुए उसकी आंखें थोड़े अफसोस से भरी थीं. यह इनके समाज की तरफ से थोपी गई पाबंदी थी ना कि सरकार की तरफ से. यहां ईरान जैसा सलूक नहीं होता. आपकी मर्जी है, परदा मानो या ना मानो.  

या हबीबीः ओ मेरे प्रेम

सीरिया में सूकू सूकू...

Posted By Geetashree On 12:03 PM 13 comments

गीताश्री

सीरिया से कुवैत आते हुए फ्लाइट में सहयात्री अमेरिकी जेरी एल डौडरमैन ने एक सीरियाई यात्री से पूछा कि क्या तुम मेरे आईपॉड से गाना सुनना पसंद करोगे? संगीत प्रेमी सीरियाई ने मना कर दिया. बिजनेसमैन जेरी हंसा और बोला-क्यों, मैं एक अमेरिकी हूं इसलिए. भरोसा नहीं मुझ पर? सीरियाई झेंप गया. जेरी ने कहा, भई बुश का युग गया. अब ओबामा युग है. संबंध बदल रहे हैं. हम इतने बुरे नहीं. जेरी को इस सच्चाई का पता है कि सीरियाई अमेरिका से कितनी नफरत करते हैं और बिना उसकी सहायता के अपनी अर्थव्यवस्था को निरंतर मजबूत बनाए जा रहे हैं. वे उम्मीद करते हैं कि आने वाले दिनों में ये इंप्रेशन बदलेगा.

 
मैं पास में बैठी यह सब देख सुन रही थी. जेरी मेरी तरफ घूमा. सीरिया के बारे में वो मेरा अनुभव जानना चाहता था. बिजनेस के सिलसिले में वह दुनिया भर में घूमता रहता है. वह सीरियाई लोगों के उदार स्वभाव और दोस्ताना रवैये की देर तक मुझसे चर्चा करता रहा. मैं उसके इंप्रेशन से सौ फीसदी सहमत थी. सीरियाई लोग बेहद खुले दिल वाले और हमारी तरह मेहमान नवाज होते हैं. हम शायद अजनबियों को देख कर ना मुस्कुराए या हेलो ना कहें मगर आप सीरिया के किसी भी शहर की गलियों से गुजरेंगे तो इतनी मुस्कुराहटें राहों में मिलेंगी कि आपके होठ बंद होना भूल जाएंगे. वे आपसे पूछेंगे...पाकिस्तान...आप कहेंगे नहीं इंडिया. वे कहेंगे--हिंदिया...मरहबा..मरहबा.... किसी कोने से ये आवाज आएगी, शाम्मी कापूर(शम्मी कपूर).... गाने के बोल आपके कानों से टकराएंगे....अई अईया करुं मैं क्या..सूकू सूकू.... 

सीरिया में शम्मी कपूर की इतनी लोकप्रियता देख कर हम दंग रह गए. अब तक जहां गए वहां राजकपूर, सलमान खान, शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय, अमिताभ बच्चन सरीखे सितारों के प्रति दीवानगी देखी. शम्मी कपूर को चाहने वाला ये देश उन्हीं की तरह मस्त और सूकू सूकू(जापानी शब्द, हिंदी में बहुत बहुत प्यार)वाला निकला. हमनें दमिश्क की गलियों में एक दिन बिताया.
 
वह शुक्रवार की शाम थी. छुट्टी का दिन और मस्ती की शाम. एक कैफे है 'अल-नौखारा.' वहां की पारंपरिक किस्सागोई 'हाकावती' करने वाले किस्सागो राशिद अल-हलक अबू सादी जिस मजे से अरबी संस्कृति और वीरता की कहानियां सुनाते हैं उतने मजे से भारतीय पर्यटको को हिंदी गाना सुनाते और सुनते हैं. एक हाथ में अरबी इतिहास का छोर थामे हैं दूसरे में भारतीय गीत-संगीत. भारतीय पर्यटकों को देखकर उनके हाथ से किस्सों की किताब छूट जाती है और वह अपनी मुद्राएं शम्मी कपूर की तरह बना लेते हैं. कैफे में भरे चिलम के धुंए के बीच शम्मी कपूर अगर उन्हें अई-अईया... सूकू सूकू गाते हुए सुन लें तो उन्हें नशा आ जाए. इस किस्सागो के लिए हरेक भारतीय पर्यटक शम्मी कपूर है और सूकू सूकू... गाना उसका परम कर्तव्य. सीरिया के इस इकलौते किस्सागो की कहानियां सुनने के लिए सीरियाई लोग शाम को यहां इकट्ठे होते हैं वही अरबी तलवार बीच में छोड़कर रोमांटिक मुद्रा अख्तियार कर लेता है. भारतीय पर्यटकों से गाना सुनाने का अनुरोध करता है, उनकी तस्वीरे उतारता है, गाने रिकार्ड करता है, अपनी अकेली और अंधेरी रातों के लिए.  

यही हाल और नजारा पूरे सीरिया का है. हर दुकान, हर चौक चौराहे पर सीरियाई लोगों की नजर आप पर पड़ी नहीं कि मुस्कुराएंगे-कहेंगे..मरहबा मरहबा(स्वागत है स्वागत है) और तत्काल हिंदी गाना गाकर आपको खुश कर देते हैं. मिथुन चक्रवर्ती भले ही भारतीय समाज के एक खास सिने प्रेमी वर्ग में ना सराहे गए हों, सीरिया में वे आज भी अपने डांस पर बूढे- नौजवान को थिरका रहे हैं. 'आया मैं डिस्को डांसर...पुरानी और नई पीढ़ी दोनों को जवां बनाए हुए है.
एलेप्पो सीरिया का ऐतिहासिक शहर है. वहां का ओल्ड सूक बहुत फेमस है. 

मैं जब वहां शापिंग कर रही थी तब शम्मी कपूर के दीवाने दूकानदारों ने आवाजें लगानी शुरु कर दी. पूरा बाजार जैसे हमारी तरफ घूम गया. मैं सूकू सूकू गा गा कर बोर हो गई मगर वे ना माने. मैं गाती और वे तालियां बजा बजा कर झूमते. ना जाने कितने लोगों ने मेरा गाना रिर्काड किया. एक दीवाना ऐसा मिला जो जीनत अमान का फैन था. उमर अक्कद नाम है. उसने अपना इमेल दिया और आग्रह किया कि मैं उसे शम्मी कपूर, जीनत अमान और दारो मंदारा (मैं तलाश नहीं पाई)की तस्वीरें भेजूं. पता नहीं दारो...कौन है? किसी को पता चले तो बताए. मैं उमर की सहायता करना चाहती हूं. फिलहाल मैं उसको शेष फोटो मेल करने वाली हूं. उसी बाजार में एक और दिलचस्प दृश्य ने हम सबको हंसा हंसा कर लोट पोट कर दिया. एक शॉल और स्टोल की दूकान थी. जब हम वहां से गुजरे, देखा दूकानदार महोदय हाथ में एक पोस्टर और चाकू लिए खड़े हैं. पोस्टर पर हिंदी में लिखा था-सास के लिए. 

सीरिया से जुड़ी अभी दिलचस्प यादें अभी कईं हैं. अगले पोस्ट में वहां की लड़कियों के बारे में. तबतक गाइए...सूकू सूकू...

आज फिर जीने की तमन्ना है

Posted By Geetashree On 8:48 AM 10 comments

हिंदी सिनेमा के किन किन गानो में स्त्री मुक्ति की ध्वनि आती है..ये इन दिनों मेरे शोध का विषय बन गया है.ये दिलचस्पी जगाने वाले कथाकार मित्र तेजिंदर शर्मा हैं. उन्होने ये नहीं सोचा होगा कि बहस इस दिशा में भी मुड़ सकती है. अब आप किसी मुक्तिकामी स्त्री से बहस करेंगे तो संभव है कि बहस वहां तक जाएगी. वे हमें बता रहे थे कि जिन गानों की धुने अच्छी होती हैं उनके बोल पर कोई ध्यान नहीं देता, वो अननोटिसड रह जाते हैं.

जैसे 1965 में आई 'गाइड' फिल्म का गाना सुनें...कांटो से खींच के ये आंचल...तोड़ के बंधन बांधी पायल...कोई ना रोको दिल की उड़ान को...दिल वो चला..। मैंने मित्रवर को वहीं रोका...अरे हां..मैंने भी कभी गौर नहीं किया था...ये तो स्त्री मुक्ति का गान है...संभवत पहला गाना. शैलेंद्र आज से 40 साल पहले जो कुछ रच रहे थे, वह महज गीत भर कहां था ! "सजन रे झुठ मत बोलो" लिखने वाले शैलेंद्र यहां दर्शन का एक ऐसा संसार रच रहे थे, जो अब तक अपने यहां अलक्षित किया गया था. विवाहेत्तर संबंध तो हमने देखा था और एक धनाढय, विवाहित नायिका का एक कुंवारे गाइड के साथ रोमांस भी...अपने नपुंसक पति को वो अंधेरे से बाहर आने जैसा मानती है और गाने में आगे गाती है..कल के अंधेरों से निकल के, देखा है आंखें मलते मलते, फूल ही फूल, जिंदगी बहार है...तय कर लिया....।
पहले तो नायिका कांटों से अपने आंचल को खींच निकालती है और बंधन वहीं झनझना कर टूट जाते हैं. बंधन तोड़ती है, सायास और अपने पांव में फिर से पायल बांध लेती है...इसके बाद उसकी जिंदगी में उड़ान ही उड़ान है...एक स्त्री की उड़ान है..सामाजिक, पारिवारिक बंधनों से मुक्ति की उड़ान...इसके बाद उसकी इच्छाओं का नीला आकाश है, सीमाहीन..एक ऐसे पुरुष का साथ है, जिसे वह अपनी मर्जी से चुनती है. 
सच कहूं, आज पहली बार मुझे पायल थोड़ी ठीक लगी. मैं अब तक उसे गुलामी, बेड़ी के प्रतीक के तौर पर देखती थी, उसकी खनक से भी मुझे गुलामी की धुन सुनाई देती थी. पायल के खिलाफ मेरी आवाज दोस्तों को अक्सर सुनाई देती रही है. स्त्री के पांव में बेड़ी कितनी लयात्मक हो सकती है, मैं सोचती. मेरी राय बदल गई. आज से उसे उड़ान का प्रस्थान बिंदू और आजादी की लय मानूंगी.
नायिका की मनस्थिति की कल्पना कर रही हूं. जिसे हर गूंज में फिर से जीने मरने की तमन्ना सुनाई देती है..। तय कर लिया है...मुक्ति के रस्ते में जिंदगी बहार है, इसके लिए कांटो से दामन छुड़ाना जरुरी है. इन कांटों के बारे में और स्त्री मक्ति के और गानों के बारे में कुछ और बातें अगले पोस्ट में..तब तक मेरी खोज जारी है.

ओ मेरे वसंत के वर्ष

Posted By Geetashree On 3:12 AM 5 comments
तुझसे मुझे शिकायत नहीं,
मेरे वसंत के वर्ष,
जो बीत गए प्रेम के व्यर्थ सपनों में-
तुझसे मुझे नहीं है शिकायत,
मादक बांसुरी-से-संगीतमय
ओ रातों के रहस्य।
मुझे तुमसे नहीं है शिकायत
प्याले लिए पंखों का मुकुट पहने जंगल की
घुमावदार पगडंडियों पर मिलने वाले
ओ धोखेबाज साथियों,
युवा देशद्रोहियो-
नहीं है शिकायत मुझे तुमसे
और मैं इस खेल से, चिंता भरा।
किंतु कहां गए वे, भावुक पल,
जवान उम्मीदों और
हृदय की शांति के पल
कहां है प्रेरणा के आंसू
पहले की सी उष्मा कहां गई,
मेरे वसंत के वर्ष
फिर आना.....
रुसी के महान कवि अलेक्जेंडर पूश्किन की एक प्रेम कविता(अनु-कुमार कौस्तुभ)
जैसे पुश्किन की कविताओं में प्रेम और क्रांति दोनों साथ साथ, अगल बगल रहते है, उसी तरह हम अतीतजीवियो की चेतना में अतीत और वर्त्तमान दोनों साथ साथ चलते रहते हैं। हम वर्त्तमान में रहते हुए अपने अतीत की गीली जमीन नहीं छोड़ पा रहे हैं। बहुत आसान नहीं होता स्मृतियों को टटोलना, डूबना और बाहर आना. बहुत मुश्किल होता है बाहर आ पाना. ये आवाजाही होली जैसे मौको पर बेहद मारक होती है. ...हमें याद है, वसंत-होली के आने का पता छोटे शहरों और कस्बों में कैसे चलता था. वो पता स्मृतियों में दर्ज है...खुली-धुली--गंधाती हवा..किसी की देह से होकर गुजरती...रसिक प्रिया बजाता, फगुआ गाता कोई पीछे की गली से गुजर जाता तो कई जोड़ी घूंघटवाली आंखें खिड़कियों पर जम जाती. अब तो आप ऊंची उंची अट्टालिकाओं पर कबूतर से टंगे हैं, बालकोनी से दुनिया को निहारिए..शहर के कचरे से उठती गंधीली हवा को सूंघ सूंघ कर कोफ्त होइए. लाउडस्पीकर पर और हाइवे से गुजरती गाड़ियों से निकलती कानफोड़ू शोर से आजीज आकर टीवी चैनल आन कर लीजिए..कर भी क्या सकते हैं. जाने कहां गए वे दिन..बचपन की यादें करिश्मा हैं, आपको पुर्ननवा करती हैं. रंगों की पूरी बारात घुमड़ रही है.आज भी फगुआ अपने पारंपरिक रुप में मेरी स्मृतियों में जिंदा है....भर फागुन ससुर जी देवर लागे....। मैं चाह कर भी पुश्किन की तरह नहीं कह पा रही हूं...दूर भागो, ओ मेरी स्मृतियों...सो जाओ ओ मेरे अभागे प्रेम।
गीताश्री

होली की शुभकामनाएं

Posted By Geetashree On 1:38 AM 11 comments
वही आदर्श मौसम
और मन में कुछ टूटता सा
अनुभव से जानता हूं कि यह वसंत है
- रघुवीर सहाय

वेलेंटाइन डे समझ में आने से बहुत पहले की बात है। होली पर प्रेम का इजहार होता था हमारे मोहल्ले में। कोई चौदह फरवरी का इंतजार नहीं करता था। सभी को होली का इंतजार रहता था कि कब होलिका दहन की रात आए और पूरी रात उसका दीदार हो पाए, जिसे देख पाना सपने की तरह होता है। पूरी रात लकड़ियां चुराना, क्योंकि उन दिनों खरीदने के पैसे नहीं हुआ करते थे, रंगीन ताव की झंडियां बना कर लई से सुतली पर चिपकाना और एक किनारा पकड़ कर दूसरा किनारा पकड़ने के बहाने हौले से उसका हाथ छू लेना और सुबह गुलाल लगाने के बहाने उसकी मांग लाल कर देने का शौक पूरा कर लेते थे। वही एक रात होती थी जब लड़कियों को घर से बाहर रहने की इजाजत होती थी। भाई बेशक साथ होते थे, लेकिन बहनों को छूट देने में उस दिन कोई कंजूसी नहीं। आखिर उन्हें भी तो किसी का इंतजार रहता था। सुबह चार बजे होलिका दहन की आंच में चमकते चेहरों को देख कर किसी भी मुड़े-तुड़े कागज पर लिखी गई शायरी शायद आज भी कहीं किसी डायरी में महफूज होगी। अब याद करती हूं तो लगता है, पता नहीं कौन सी वह दुनिया थी और कौन सी होली। बस याद है तो कुछ बातें. किसी की कोई हो...ली और कोई उन दिनों को याद कर बस रो...ली।
आकांक्षा पारे

इरा का पत्र अन्नू के नाम

Posted By Geetashree On 2:25 AM 2 comments
हमारे पेशे की ये चंद कड़वी सच्चाईयां हैं. पर इनमें भटकते हुए मैंने अपना जज्बा नहीं खोया. बल्कि हर घटना ने लड़ने और जूझने का मेरा हौसला बढाया. मेरी तो पूरी उम्र खांटी पत्रकारिता की इन्हीं गलियों में गुजर गई, वह भी पूरी ठसक के साथ. पर कब तक सुशीला बन कर घर के पोतड़े छिपाती रहूं. ये सच्चाईयां रअसल उन मानवियों लिए है जो दुनियाभर की औरतों का दर्द बयान करने का जज्बा लेकर पत्रकारिता की दहलीज में कदम रखने को बेकरार है. मेरी हैसियत इस परिवार के बुजुर्ग जैसी हो गई है. इस नाते उन्हें इस पेशे के लिए मानसिक तौर पर तैयार करना मेरा फर्ज है. कमसेकम मैं एसा मानती हूं. हिंदी न्यूज रुम की पेचिदगियों से और साथिनें शायद मेरे जितनी वाकिफ ना हों. मैंने तो इस जिंदगी को जिया है. पत्रकारिता के इस सागर में मैं डूबते उतराते आज भी तैर रही हूं. इस पेशे की तहों का अंदाज है. जहां तक दीगर पेशे में महिलाओं के संघर्ष की बात है, हम तुम गीता, नीलम, पारुल, सभी ने सच्चाईयों को अपनी कलम से आवाज दे रही हैं. अफसोस इस बात का है कि विचार और अभिव्यक्ति की आजादी के पेशे में हम सभी को यही झेलना पड़ रहा है. अब और नहीं. मत बनी रहो रानी बेटी. सुनाओ देश भर को इस पेशे की दास्तान...। इससे नयी मानवियों के लिए राह बनेगी. वैसे यह लेख मैंने फकत गीताश्री की किताब के लिए लिखा था. संदर्भ कुछ और था. पत्रकारिता की पेचिदगियों पर तो महाग्रंथ लिख सकती हूं. इतना बड़ा अनुभव संसार है.. इस राह पर और ना जाने कितने लोग बेनकाब हो जाएंगे. बस उन्ही की खातिर कलम ठहरी हुई है. पर उसका भी समय आएगा....जल्दी.

तंग गलियों के विरूद्द

Posted By Geetashree On 2:51 AM 5 comments
हाल ही में एक मीडिया पोर्टल में हमारी एक पत्रकार साथी(इरा झा) ने पत्रकारिता के अनुभवों का वर्णन करते हुए लिखा कि पुरूष वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में लड़कियों के लिए पत्रकार होना एक गुनाह है। उनके निजी अनुभवों का सम्मान करने के बावजूद लेख के अंत में यह पढ़कर दुख और आश्चर्य हुआ कि उन्हें लगता है यह पेशा महिलाओं के लिए उचित नहीं। आज जब महिलाओं ने दुर्गम माने जाने वाले पेशों में भी अपना वर्चस्व स्थापित कर दिया है हम पत्रकारिता की गलियों को तंग केवल इसलिए मान ले क्योंकि यहां पुरूषों की मानसिकता जंग खाई है।

ऐसा नहीं साथी, गलियां तंग ही सही पर अभी भी उसमें ठंडे हवाओं के झोकें बहते हैं। इन तंग गलियों में कुछ साहसी मानवियों ने ऐसे झरोखे बनाए हैं कि गलियों के संकरे होने का अहसास ही नहीं होता। ऐसा केवल पत्रकारिता में नहीं कि महिलाओं को पुरूषों की तंग सोच का सामना करना पड़े। घर से बाहर कदम रखने वाली हर महिला हर कदम पर ऐसी संकुचित सोच को झेलती है। किसी भी व्यवसाय में ऐसे अनुभवों से महिलाओं को रूबरू होना पड़ता है। लेकिन महिलाओं ने पत्रकारिता सहित हर पेशे में इन तंग या बंद गलियों के विरूद्द मोर्चे खोल दिए हैं।

यह सब पढ़ कर तो मुझे दिल्ली के एक पत्रकारिता संस्थान में पढने वाली उस लड़की का चेहरा याद आता है जिसके गांव में अभी भी बिजली की रोशनी नहीं पहुंची है और उसके गांव में लड़कियों को स्कूल भेजना अपराध से कम नहीं है। ऐसे में उसका दिल्ली जैसे महानगर में आकर पत्रकारिता की पढ़ाई करना और घर से शुरू हुई अपने अस्तित्व की लड़ाई किसी अजूबे से कम नहीं।

ऐसी बहुत सी लड़कियां पत्रकारिता में प्रवेश कर चुकी हैं जो प्रतिकूल वातावरण में पलने के बावजूद आज पत्रकारिता के गलियारों में अपने पुरूष साथियों से कहीं आगे निकल चुकी हैं। ''पत्रकारिता की दुनिया में लड़की होना ऐसा गुनाह है जिसकी कोई सजा नहीं सिर्फ घुट घुट कर बर्दाश्त करने के'' जैसा कि लेख में बताया गया है, सही नहीं। ऐसा कहना उन बहुत सी युवा पत्रकारों के सपनों को धूमिल कर सकता है जो पत्रकारिता में नए आयाम बनाने की आकाक्षाएं रखती हैं।

मेरा मानना तो यह है कि हम शहरों में पढ़ी लिखी महिलाओं के लिए कार्यालयों और आस -पडोस के माहौल की छोटी सोच कोई चुनौती नहीं बल्कि ऐसी पगडंडी है जिस पर चलने और संभल कर चल अपनी मंजिल पाने की कला हम महिलाएं अपनी परवरिश के दौरान ही सीख लेती हैं। वास्तविक चुनौती तो हमारे लिए भी एक पत्रकार के रूप में बेहतर रिपोर्टर, कापी एडिटर या संपादक बनने के साथ घर परिवार की जिम्मेदारियां को उचित ढंग से निभाने की होती है और लेखिका स्वयं इसे साबित कर चुकी है। फिर तंग गलियों की शिकायत क्यों? गलिया तंग ही नहीं बंद भी थीं और होंगी लेकिन इन बंद गलियों से रास्ते निकल चुके हैं। पत्रकारिता संस्थानों और अखबारों से लेकर चैनलों तक में छोटे छोटे शहरों और गांवो से आने वाली लड़कियों की बढ़ती संख्या इसकी गवाह है।

पेशा कोई भी हो पुरूषों द्वारा लड़कियों को काम में नाबराबर या कमतर आंकना, उनकी उनमुक्तता पर टिप्पणी करना या फिर उसके चरित्र पर आक्षेप लगाकर उसे आगे बढ़ने से रोकना अधिकतर कार्यालयों की प्रवृति बन चुका है। कईं बार तो महिलाएं भी पुरूष साथियों की ऐसी साजिशों का साथ देने लगतीं हैं। ऐसी मिसालों की कमी नहीं। लेकिन इस निराशाजनक चर्चाओं में मुझे उन महिलाओं के अनुभव बेहद बल देते है जो उस माहौल में पैदा होतीं है जहां लड़कियों के जन्म पर ढोल बजाकर या बंदूके चलाकर खुशी नहीं मनाई जाती। पैदाइश से लेकर वह बडे होने तक केवल लड़की होने की खिलाफत झेलती हैं। लेकिन आज वहीं महिलाएं कहीं पुरूषों की चैपाल में बैठकर, पंचायतों की सरपंच बनकर या फिर किसी संगठन का नेतृत्व कर पुरूषों की चैधराहट को खत्म कर रही हैं। इन्होंने साबित कर दिया है कि लड़की होना कोई गुनाह नहीं है। हर प्रकार की विपरीत परिस्थिति का सामना कर अपनी सबलता को मिसाल बनाने वाली ये महिलाएं हमें यही सबक देती है कि गली तंग नहीं।

अन्नू आनंद

शादीशुदा मर्द के प्यार में औरत की गत बुरी

Posted By Geetashree On 9:09 AM 6 comments

रविवार के नवभारत टाइम्स, दिल्ली के संपादकीय पेज पर रंजना कुमारी का यह विचारोत्तेजक लेख छपा है.चांद और फिजा के मोहबब्त का जो हश्र हुआ है, उसके बाद इस तरह के संबंधों पर बहस जरुरी है. हालांकि ऐसा न तो पहली बार हुआ है और ना ही इसे आखिरी माना जा सकता है. बहसें तो चलती रहती हैं. रंजना जी का यह लेख उसी बहस का हिस्सा है.

एक स्त्री जब किसी दूसरी स्त्री का घर उजाड़ रही होती है तो उसके सामने यह सवाल क्यों नहीं आता कि किसी की उज़ड़ी दुनिया की राख से कोई अपने आंगन में कैसे रंगोली बना सकता है..कितनी दुर्दांत कल्पना है..जहां एक चालाक पुरुष एक औरत को दूसरी औरत के खिलाफ औजार की तरह इस्तेमाल कर लेता है. 

रंजना जी ने जो सवाल उठाए हैं मैं उन्ही का जवाब अपने सजग दोस्तो, अनदेखे साथियों से चाहती हूं- गीताश्री

शादीशुदा मर्द के प्यार में औरत की गत बुरी

रंजना कुमारी


 


एक परिपक्व शादीशुदा आदमी जब नया प्रेम संबंध बनाता है तो वह सिर्फ प्रेम को नहीं देखता है. इसमें स्टेटस, फाइनेंशल सिक्युरिटी और फैमिली जैसे फैक्टर भी जुड़े होते हैं. यह भी तय है कि वह व्यक्ति अपने परिवार के प्रति प्रतिबध्द नहीं है और परिवार की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहा है. वह दूसरी महिला से रिश्ता बना तो लेता है, लेकिन उसे निभाना इतना आसान नहीं होता. शुरूआती आकर्षण जल्द ही खत्म हो जाता है और जिंदगी की हकीकत सामने आती है. ऐसे में दोनों के बीच तनाव बढ़ता है और रिश्ता टूटने के कगार पर पहुंच जाता है. इस सबमें बेशक पुरुष को भी दिक्कतें आती हैं लेकिन अंतत: भुगतना महिला को ही पड़ता है. 

चांद मोहम्मद और फिजा (पहले चंद्रमोहन और अनुराधा बाली) के मामले में भी अभी तक मिली जानकारी से यही लगता है. वैसे भी धर्म बदल कर दूसरी शादी करने को किसी कीमत पर जायज नहीं ठहराया जा सकता. खुद सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धर्म परिवर्तन करके अगर कोई दूसरी शादी करता है तो वह पहली पत्नी की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता.

इस तरह के मामलों में एक नहीं, बल्कि दोनों महिलाओं के साथ नाइंसाफी होती है. जो लोग ऐसा करते हैं, वे सही सामाजिक और कानूनी व्यवस्था नहीं अपना रहे हैं. सामाजिक इसलिए कि वे पहली पत्नी से पति धर्म नहीं निभा रहे हैं. अगर किसी को दूसरी शादी करनी है तो उसे पहले तलाक लेना चाहिए. ऐसा न होने पर दूसरी महिला को कभी भी पत्नी का उचित दर्जा नहीं मिलता. उसे हमेशा धिक्कार की निगाहों से देखा जाता है. इस मामले में तो चांद मोहम्मद ने अपनी जायदाद पहले ही पहली पत्नी के नाम कर दी. इससे दूसरी महिला की आर्थिक सुरक्षा भी खत्म हो गई. जो प्रेम धोखाधड़ी की बुनियाद पर खड़ा हो, उसकी नींव कितनी मजबूत होगी, यह साफ है. 

लेकिन सच यही है कि इन सब तमाम खामियों के बावजूद लोग इस तरह के संबंध बनाते हैं. इसकी वजह यह है कि प्रेम किसी भी समाज में पनपने वाली सतत भावना है. लेकिन हमारा समाज प्रेम संबंधों के प्रति अनुदार है. प्रेम को जाति और धर्म के दायरे में शादी के बंधन में बांधा जाता है. खासकर लड़कियों को शादी के रूप में जबरन प्रेम (फोर्स्ड लव) के लिए मजबूर किया जाता है. शादी जैसी संस्था प्रेम के लिए नहीं, बल्कि वंश चलाने या यूं कहें कि मानव जाति को बचाए रखने के लिए बनाई गई थी, जबकि शादी के बिना या शादी के बाहर भी प्रेम हो सकता है.

यह बड़ी बात है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों के चरित्रों से लेकर देवताओं तक को प्रेम में लिप्त दिखाया गया है और हम बड़े गर्व से उन्हें स्वीकार करते हैं. कृष्ण की रासलीलाएं खुले प्रेम की स्वीकृति देती हैं. कुंती के बारे में कहा जाता है कि कर्ण की प्राप्ति उन्हें सूर्य से हुई. तो क्या मानें कि कुंती और सूर्य के बीच कोई प्रेम प्रसंग था! हम इन प्रसंगों पर गर्व के साथ बात करते हैं लेकिन जब हकीकत में प्रेम की बात आती है तो विरोधी हो जाते हैं. असलियत यह है कि औरत और मर्द होंगे तो प्रेम होगा.

बहरहाल, इस तरह के मामलों से उपजने वाला सबसे बड़ा सवाल यह है कि महिलाएं इस तरह के रिश्ते में पड़ती ही क्यों हैं? आखिरकार प्रताड़ता तो उन्हें ही झेलनी पड़ती है. उन्हें कोई भी कदम उठाने से पहले सोचना-समझना चाहिए. फिर उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि वे किसी दूसरी महिला की जिंदगी बर्बाद करने की वजह न बनें. यह सच भी स्वीकारना चाहिए कि जो व्यक्ति उसके लिए पहली पत्नी को छोड़ सकता है, वह किसी तीसरी के लिए उसे भी छोड़ सकता है. पहली पत्नी को भी यह समझना होगा कि जबरन किसी को बांधकर नहीं रखा जा सकता, लेकिन उसे आर्थिक रूप से सबल बनना चाहिए और पति से पूरा भरण-पोषण आदि लेना चाहिए.

(लेखिका सेंटर फॉर सोशल रिसर्च में डायरेक्टर हैं.)
बातचीत : प्रियंका सिंह

बैठा रहा चांद

Posted By Geetashree On 1:23 AM 6 comments
अविजीत घोष पिछले 18 सालों से पत्रकारिता में है। इन दिनों टाइम्स आफ इंडिया से जुड़े हैं। कभी कविता लिखने का शौक था। अब उपन्यास लिखने की चाहत है। अंग्रेजी में एक लिखा भी है। नाम है-bandicoots in the moonlight. कोशिश है कि इसका हिंदी अनुवाद भी हो।
इन दिनों भोजपुरी फिल्मों पर किताब लिखने की कोशिश कर रहे हैं। मेरे नुक्कड़ पर इनका स्वागत है। उनकी ताजा कविता पढिए..
बैठा रहा चांद
चबूतरे के करीब
कोई सिहरन कुरेदती रही
रीढ की हड्डी धीरे धीरे
उतार ना सका
तुम्हारे गंध के केंचुल को किसी तरह
तुम बहती रही रात भर
धमनियों में धीरे धीरे