मेरी भूटान-यात्रा

Posted By Geetashree On 2:32 AM 4 comments


गीताश्री
.तस्वीर से ज्यादा सुंदर


एक पुरानी भूटानी कहावत के अनुसार भूटान एक ऐसी पुण्यभूमि है जहां साम्राज्य का कोई भी ऐसा चप्पा नहीं है जिसे गुरु रिम्पोचे का आर्शीवाद प्राप्त ना हो। जैसे हिमालय की गोद में धरा हुआ, तांत्रिक रहस्यमयता से लिपटा एक सुंदर और शांत शहर। लोग इसलिए धीमे बोलते हैं मानो बुद्ध अभी किसी पहाड़ी पर ध्यानरत हैं। जोर से बोलेंगे तो खलल पड़ जाएगा। पड़ोसी देश के एक महान दार्शनिक कन्फ्यूसिएश ने कहा था कि आओ खामोश रहें ताकि देवताओं की कानाफूसी सुन सकें। भूटानी यानी स्थानीय भाषा में द्रूपका लोगो ने सुन लिया पड़ोस से आए इस दर्शन को। तब से लोग यहां चिल्लाते कम हैं। कहीं कोई पुकार तक नहीं सुनाई देती। हवा का शोर ना हो तो अपनी धडक़न भी सुन सकते हैं। ट्रेफिक लाइट के बिना ट्रेफिक चलती है। पुलिस कहीं दिखती नहीं। मैंने मुनीरा से पूछा। उसने मुस्कुरा कर कहा-पुलिस है, उसकी आंखें आपको देख रही है। गल्ती करेंगे तो सामने जाएगी। ना पुलिस की सीटियां ना व्यर्थ के हॉर्न बजते हैं। दिल्ली के कोलाहल से भाग कर वहां जाएंगे तो तेज और कानफोड़ू आवाज के लिए तरस जाएंगे। धुली धुली पहाडियां, कुंवारी और शादीशुदा नदियो का कल कल दूर से सुनाई देता है। यहां एक शादीशुदा नदी भी है। पुनाखा घाटी में अलग अलग रंगो की एक पुरुष नदी और एक स्त्री नदी आपस में मिलते हैं और एक होकर सफर करते हैं। गाइड फुंगशू मजाक करता है..देखा है कहीं मैरिड नदी.. रास्ते में झरने ही झरने। खेतो में धान ललहाते हुए। बादल जैसे ठिठके से घरो की छतो पर। हवा भी जैसे पत्तो पर ठहरी सी। बच्चो के चेहरे फूल से या फूल बच्चो से, आप र्फक ही नहीं कर पाएंगे, इतने गुलाबी और खिलखिलाते। ये सब कुछ किसी तस्वीर सा सुंदर है जो आपकी बेचैनी को आराम दे देता है।


.थोड़ा है थोड़े की जरुरत है


उनके लिए खुशहाली सर्वोपरि है, विकास का वही पैमाना भी। भूटान को अपनी सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक विरासत से बहुत लगाव है। आर्थिक प्रगति की दौड़ में इनसानी मूल्य, संस्कृति, अतीत की धरोहर नष्ट ना हो जाए, लोग अपनी जड़ो से ना कट जाएं, इसके प्रति बेहद सजग है। नेपाल के हश्र और चीन के व्यापार से डरे हुए इस देश ने विकास की राह पर चलने की अपनी अलग नीति बनाई गई है। उनकी नीति दुनिया की आंखें खोलने का माद्दा रखती है। सकल राष्ट्रीय खुशी (ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस) शब्द एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है। भूटान के चौथे राजा जिगमे सिगवे वांगचुंग ने इस अवधारणा की नींव रखी। ये शब्द भी उन्हीं का अविष्कार है। इसमें आर्थिक निर्भरता, पर्यावरण, भूटानी संस्कृति और सभ्यता के संरक्षण जैसी चिंताएं शामिल थीं। इसके लिए एक आयोग का भी गठन किया गया है। इसीलिए आज भी वहां मकान के डिजाइन पारंपरिक रखे जाते हैं। सरकारी-प्राइवेट सभी ऑफिस में पारंंपरिक पोशाक (स्त्री-टेगो और कीरा, पुरुष-घो) पहन कर जाना अनिर्वाय है। सूचना और संचार मंत्रालय के सचिव दाशो किनले दोरजी एक विशेष मुलाकात में बताते हैं, इस बड़ी सी दुनिया में भूटान एक छोटा सा देश है। हमारे पास अर्थव्यवस्था की ताकत नहीं है। सांस्कृतिक पहचान ही हमारी असली ताकत है। सरकार की जिम्मेदारी है इसे संरक्षित करने की। भूटान के प्रधानमंत्री बताते हैं, हमारी कोशिश है कि हम भौतिक रुप से नहीं, दिल से खुश रहें। वित्तीय समस्या होने के बावजूद संतुलित रहें। जीवन में हमने क्या पाया, हमें कितनी संतुष्टि मिली, ज्यादा महत्वपूर्ण है। हम इच्छाएं ज्यादा नहीं रखतें। इसीलिए हमने भौतिक स्वरुप के बजाए संतुष्टि का मानक रखा है। दस साल बाद किसी भूटानी नागरिक को रोटी के लिए मशक्कत ना करनी पड़े, ये हमारा लक्ष्य है। भूटान सरकार यह भी दावा कर रही है कि उनका पैमान दुनियाभर में लोकप्रिय हो रहा है। उन्हें अंतराष्ट्रीय समुदाय में खूब वाहवाही मिल रही है।


.सच्चे किस्से


हिमालय पर्वत की सुंदर वादियों में बसे छोटे से देश के एक गांव में एक परिवार बरसों से सामाजिक बहिष्कार झेल रहा था। पूरे गांव तो क्या पूरे इलाके में कोई उनके घर का अन्न जल नहीं खाता था। इस परिवार पर जादू टोने करने का कलंक लगा था। पूरे इलाके में अपवाह थी कि इस परिवार के घर को अन्न जल जो भी ग्रहण करेगा, वो मर जाएगा। ये परिवार एक शापित जिंदगी जी रहा था कि एक दिन इस देश का राजा अचानक उनके द्वार पर पहुंचा। घर के मालिक को कहा कि अपनी पत्नी से मेरे लिए खाना बनवाओ, आज मैं तुम्हारे घर खाना खाऊंगा और यहीं रात बिताऊंगा। पूरे इलाके में राजा के आने की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई लोग इक्कठे हो गए और राजा को समझाया कि इस घर का पानी भी नहीं छूना चाहिए। राजा नहीं माने। राजा ने उस घर में खाना खाया और वहीं रात बितायी। वो राजा आज भी जिंदा हैं, भला चंगा है और अपने देश का युवा राजा है। शापित परिवार के माथे से जादू-टोने का कलंक धुल गया अब पूरा गांव उनके साथ अच्छे संबंध रखता है। ये किस्से कहानियों की बात नहीं ,ना ही नानी दादी की कहानियां हैं। ये सच्ची घटना है। ये वर्तमान राजा हैं, जो नहीं चाहते कि उनकी प्रजा अंधविश्वास और रुढियो में जकड़ी रहे।
एक घटना और..वहां राजा प्रजा के बीच संवादहीनता नहीं है, इसका एक उदाहरण है। चौथे राजा ने चार शादी की। चारो सगी बहने हैं। वर्तमान राजा दूसरी बहन के बेटे हैं। एक बार चौथे राजा किसी पब्लिक मीटिंग में भाषण देने के बाद लोगो के सवालो के जवाब दे रहे थे। एक व्यक्ति ने उठकर पूछा-आप राजा हैं, आपने चार शादियां क्यो की? राजा ने शांत उत्तर दिया--आप चिंता ना करें, आपका अगला राजा एक ही शादी करेगा।




कुछ कुछ होता है..


हिंदी सिनेमा के नाम पर भूटान में युवाओ को कुछ कुछ होता है.. . जिसे देखो, उसके ऊपर शाहरुख खान और काजोल का नशा छाया हुआ है और गाने के बोल फूटते हैं..क्या करुं हाय, कुछ कुछ होता है..।इस गिरफ्त में युवा राजा भी हैं। वैसे बॉलीवुड के और भी सितारे यहां पसंद किए जाते हैं, लेकिन काजोल के प्रति दीवानगी के क्या कहने। हिंदी सिनेमा और सास बहू वाले धारावाहिको ने यहां के नागरिको को हिंदी बोलना सीखा दिया है। दाशो किन्ले हंस कर कहते हैं, बॉलीवुड ने हमारे युवाओं को अपने प्रभाव में ले लिया है। उनकी तर्ज पर उनके हाव भाव, चाल ढाल बदल रहे हैं। नई फिल्मों के शौकीन लोग राजधानी थिंपु से तीन चार घंटे की यात्रा करके भारत-भूटान बार्डर पर स्थित शहर फुंसलिंग शहर जाकर फिल्म देख आते हैं। दबंग का नया नया नशा वहां की हवाओं में बदनाम हो रहा है।टीवी की तरह भूटानी फिल्मों का इतिहास भी महज एक दशक पुराना है। वहां हर साल 17-18 फिल्में बनती हैं। भूटानी फिल्मों की प्रेरणा बॉलीवुड है। इसके अनेको उदाहरण है। जैसे हिंदी फिल्म कहो ना प्यार है का भूटानी वर्जन बनता है सेरेगिल नाम से। मुन्नाभाई का भूटानी भूटानी वर्जन कुजू(भूटानी में अर्थ हैलो) नाम से रिलीज होता है। हिंदी फिल्मों की पाइरेटेड डीवीडी के लिए भूटान अच्छा बाजार है। वहां के युवा नई फिल्में जल्दी देखना चाहते हैं। उनतक पाइरेटेड डीवीडी आसानी से पहुंच जाती है।
पर्यटको के प्रति रवैयाभूटान के व्यस्त बाजार में आप घूमे तो एक सामान्य नजारा दिखेगा। कहीं स्टार प्लस के सीरियल रहे हैं तो कहीं सोनी टीवी के सीरियल तो कहीं सिनेमा चैनल पर फिल्में चल रही हैं। दूकानो पर ज्यादातर लड़कियां बैठी होती हैं। उनमें सामान बेचने की वो आतुरता नहीं जो चीनी बाजार में दिखाई देती है। वे आपको बुलाती भी नहीं हैं। हैंडीक्राफ्टस के दूकानो की भरमार है। बेहद महंगे सामान कि खरीदने से पहले कुछ देर सोचना पड़े। ऐसे ही एक दूकान पर बैठी प्रतिमा से बातचीत होती है. उससे पूछती हूं कि चीजें यहां इतनी महंगी क्यों हैं, तुम लोग बेचने के प्रति इतने उदासीन क्यो हो? प्रतिमा की मां बंगाली है पिता भूटानी। इसीलिए वह हिंदी, बांगला और भूटानी भाषा जोंगखा अच्छे से बोल लेती है। वह बताती है, हमें पता है जिन्हें खरीदना है, वे खरीदेंगे। महंगी होने के कारण ज्यादा लोग विंडो शॉपिंग करके चले जाते हैं। हम किसी पर दवाब नहीं बनाते। यहां टैक्स बहुत देना पड़ता है इसलिए चीजें महंगी हो जाती है। भारतीय लोगो के लिए हम चीजें सस्ती कर देते हैं, अगर वे लोग मोलभाव करें तो। यहां बता दें कि भूटानी मुद्रा नोंगत्रुम और भारतीय रुपया एक समान है और आप वहां भारतीय रुपयो से खरीदारी कर सकते हैं। प्रतिमा पर्यटको के कम आमद से थोड़ा हताश दिखी मगर अपनी सरकार की नीतियों का सर्मथन भी किया। उसे एहसास है कि उसका देश सुंदर है, टूरिस्ट यहां आना चाहते हैं मगर सरकार उन्हें परमिट या वीजा नहीं देती। विदेशियो का आगमन यहां नियंत्रित है। ये भूटान के भले के लिए है। प्रतिमा के साथ खड़ी डोलमा कहती है, हमें टूरिस्ट की क्वांटीटी नहीं, क्वालिटी चाहिए। संकेत हमें साफ समझ में रहा था। सरकार की नीतियां जनता के दिमाग में बैठ गई है। कारोबार से ज्यादा संस्कृति बचाने की चिंता है। मुझे वहां के प्रधानमंत्री का एक स्लोगन याद आया-हाई क्वालिटी, हाई कॉस्ट। बाजार में एक बंगाल की गाड़ी दिखी। उसका ड्राइवर उपेन दत्ता बेहद मुखर है। अक्सर थिंफू आता जाता रहता है। बातचीत के क्रम में वह टिप्पणी करता है--भारतीय को भी ये लोग 6 या सात दिन से ज्यादा का परमिट नहीं देते। खासकर मजदूर या किसान जैसे दिखने वाले भारतीय पर्यटक से बहुत डरते हैं। उन्हें लगता है कि ये लोग यहां आकर बस जाएंगे, काम करने लगेंगे जिससे संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। भूटान की खुशकिस्मती है कि वह कभी किसी देश का उपनिवेश नहीं बना। इसीलिए बाहरी प्रभाव से बचा रहा। बना होता तो आज कहानी दूसरी होती। भूटान 1974 में आम पर्यटको के लिए खुला है।


लोकतंत्र के खतरे या अनजाना भय


भूटान के सामने नेपाल का ताजा उदाहरण है। राजशाही के अंत के बाद वह देश किस तरह बरबाद हो रहा है। भूटान का लोकतंत्र नया नया है। दाशो केनली दोरजी कहते हैं, लोकतंत्र कई देशो में आंतरिक-बाहरी समस्याओं से जूझ रहा है। हम अपनी तरह के अलग हैं, यूनिक हैं, हमारे लोकतंत्र का फारमेट अलग है। हम किसी और की तरह नहीं होना चाहते। राजशाही हमारे यहां जनता की ख्वाहिश है। ये लोकतंत्र हमारे राजा की ओर से प्रजा को उपहार में मिला है। किसी संघर्ष की देन नहीं है। भूटान के प्रधानमंत्री ल्योनचेन जिगमी वाई. थिनले भी एक विशेष मुलाकात में ऐसी ही बात करते हैं। वह कहते हैं, आसपास के देशो का हाल देखते हुए तो लगता है कि हमारे यहां भी डेमोक्रेसी उसी रास्ते पर चलने लगे या लोग उसका दुरुपयोग ना करने लगे। वे अपने इस भय को हमारे सामने छिपाते नहीं, जाहिर करते हैं। भूटान शायद इसीलिए चीन से कोई ट्रेड का रिश्ता नहीं रखता। भारत या थाईलैंड दो मुख्य व्यापार के लिए मफीद हैं। यहां बाजार में चीनी समाना कम मिलते हैं जो मिलते भी हैं वे तस्करी होकर आते हैं। ये बात वहां के अधिकारी भी स्वीकारते हैं। प्रधानमंत्री चीन के साथ संबंधो के मामले में दो टूक कहते हैं, हम नहीं चाहते कि दो देशो के बीच कोई गलतफहमी हो। आपसी समझदारी से हम एक दूसरे के प्रति सम्मान भाव रखते हैं और संप्रभुता को स्वीकार करते हैं।

यह धरती के आराम करने का समय है

Posted By Geetashree On 3:08 AM 6 comments
इस ऋंखला में कवि अनिल करमेले की कविता. 12 सितंबर के दैनिक भास्कर अखबार(फीचर पेज) में छपी थी. वहां से साभार ले रही हूं दोस्तो के लिए. वो भी एक कवि की कविता. यहां स्त्री होने की विडम्बना देखिए..कितनी करुणा और कितना क्षोभ। आनर किलिंग वाले समाज की मानसिकता पर चोट करती हुई ये कविता स्त्री के चोटीले मन को हौले से एक आश्वस्ति के साथ सहलाती है...गीताश्री

कहीं कोई आवाज नहीं है
जैसे मै शून्य में प्रवेश कर रहा हूं
जैसे एक नवजात शिशु के रुदन स्वर से
दुनिया के तमाम संगीत आश्चर्य के साथ
थम गए हों

मेरी देह का संतुलन बिगड़ गया है
और वह लगातार कांपती हुई
पहली बारिश में अठखेलियां करती
चिड़ियों की तरह लग रही है

मैं चाहता हूं इस वक्त दुनिया के
सारे काम रोक दिए जाएं
यह धरती के आराम करने का समय है
न जाने कितने जन्मों की प्रतीक्षा के बाद
अनंत कालों को लांघता हुआ
मुझ तक आ पहुंचा है यह
मैं इसके शब्दों को
छू कर महसूस करना चाहता हूं...

*************

तीनो लोको में फैल गया है घोर आश्चर्य
सारे देवता हैरान परेशान
दांतो में उंगली दबाए भाव से व्याकुल
मजबूती से थामे अपनी अपनी प्रिया का हाथ
निहार रहे हैं पृथ्वी की ओर..

कि जब संग संग मारे जा रहे हैं प्रेमी
लगाया जा रहा है सम्मान पर पैबंद
प्रेम करती हुई स्त्री की खाल से
पुरुष कर रहे हैं पलायन
उनकी कोख में छोड़कर बीज

और एक क्रूर हत्यारा अट्टाहास
फैला है प्रेम के चहुंओर
कैसे संभव हुआ एक स्त्री के लिए
इस पृथ्वी पर प्रेम...

निर्मला पुतुल की कविताएं

Posted By Geetashree On 8:06 AM 6 comments
गीताश्री
पर्वत राग का नया अंक पढ रही थी,,,इस अंक में कई सामग्री पठनीय है। मगर मेरा ध्यान खींचा निर्मला पुतुल की कविता ने. मैं अब नयी चीज शुरु करने जा रही हूं...अपने इस ब्लाग पर अपना लिखा बहुत हुआ. अब स्त्री द्वारा स्त्री पर लिखी जाने वाली कविता, कहानी, लेख, साक्षात्कार भी इसमें शामिल करुंगी. खासकर जो चीजें सिर्फ अखबारो या पत्रिकाओं में छप कर रह जाती है..उन्हें यहां अपने दोस्तो को पढवाना मेरा दायित्व है...जो मुझे अच्छा लगता है शायद आपको भी रुचे. ना रुचे तो बताएं..रुचे तो एक कमेंट डाल दें..
मैं जानती हूं...यहां भी मुझ पर घोर स्त्रीवादी होने का आरोप लगाया जाएगा. क्या करें..हम हैं ही एसे. कोई पुरुष साथी की रचना जंची तो शामिल कर लेंगे..फिलहाल दूर दूर तक स्त्री के हक में लिखने वाले ही दिख रहे हैं...शुरुआत कविता से कर रहे हैं..उनकी तस्वीर गूगल में नहीं मिली, ना ही मैं उनसे परिचित हूं,,एक स्त्री का दूसरी स्त्री से अपरिचय भी कैसा..वो जिस स्त्री की बात अपनी कविता मे करती है..शायद मैं हूं..आप हैं..
निर्मला जी जानी मानी कवयित्री हैं, हिंदी-संथाली की. पर्वत राग में साक्षात्कार समूह(निरंजन देव शर्मा, अजेय, प्रतिमा) ने इनके बारे में लिखा है---सचमुच निर्मला पुतुल की कविताएं पाठक से संवाद स्थापित करने के मामले में कविता के क्षेत्र में पसरे सन्नाटे को बखूबी तोड़ती हैं..निर्मला खुद कहती हैं कि वह प्रायोजित कविताएं नहीं लिखतीं...आप पढिए देखिए..निर्मला एक स्त्री जीवन के अंधेरे से कैसे जूझती हैं..
कविता
क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न
एक स्त्री का एकांत

घर-प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी जमीन
के बारे में बता सकते हो तुम.

बता सकते हो
सदियो से अपना घर तलाशती
एक बेचैन स्त्री को
उसके घर का पता.

क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में
किस तरह एक ही समय में
स्वंय को स्थापित और निर्वासित
करती है एक स्त्री.

सपनो में भागती
एक स्त्री का पीछा करते
कभी देखा है तुमने उसे
रिश्तो के कुरुक्षेत्र में
अपने...आपसे लड़ते.

तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के
मन की गांठे खोलकर
कभी पढा है तुमने
उसके भीतर का खौलता इतिहास

पढा है कभी
उसकी चुप्पी की दहलीज पर बैठ
शब्दो की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को.

उसके अंदर वंशबीज बोते
क्या तुमने कभी महसूसा है
उसकी फैलती जड़ो को अपने भीतर.

क्या तुम जानते हो
एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण
बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री -दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा

अगर नहीं
तो फिर जानते क्या हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में......।

स्त्री लेखन में देह घाव की तरह टभकती है...

Posted By Geetashree On 4:34 AM 8 comments
गीताश्री
विमर्शात्मक लेखन में देह बोलती है क्योंकि स्त्री संबंधी सारे अपराधो कीआधार भूमि उसका प्राइम साइट स्त्री देह ही है। स्त्री लेखन में देह टमकतीहै बस घाव की तरह।
--अनामिका
आज जो आत्मकथाएं लिखी जा रही हैं उसमें स्त्री के दैहिक रुप का जश्नमनाया जा रहा है। वहां विमर्श नहीं है।
--मृदुला गर्ग
समाज में जब स्त्रीदेह और उसकी नैसर्गिक जरुरतो के साथ दोयम बरताव जारीहै। वहां अतृप्ति है, शोषण है, बलात्कार है, ब्लैकमेल है, तो क्यो ना लिखेंहिंदी की लेखिकाएं अपनी यौनिकता पर, यौन प्राथमिकताओ पर या फंतासियो पर।
--मनीषा कुलश्रेष्ठ
यौनिकता को खासतौर पर रखना लेखिकाओं का मकसद नहीं था। लिखते हुए पता भी नहीं चला होगा। ये स्वभाविक प्रक्रिया में लिखे गए आख्यान हैं। यौनिकताभरे दिमाग मर्दो के हैं। वे स्त्री की योग्यता नहीं देखते, देह को देखतेहैं।
--मैत्रेयी पुष्पा

मौजूदा दौर के स्त्री-विमर्श को ‘बेवफाई का विराट उत्सव’ बताने वाले मर्द मानसिकता के ऊपर इस वक्त पूरा स्त्री समुदाय बौखलाया हुआ है। इसके साथ ही साहित्य जगत में नई बहस छिड़ गई है। स्त्री लेखन में स्त्री देह की मौजूदगी को लेकर मर्द समाज चाहे जो सोचे लेकिन स्त्रियां उसे यौनिकता के प्रकटीकरण के रूप में देखती है।


हाल के दिनों में स्त्री विमर्श और लेखिकाओं की आत्मकथा को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। ज्यादातर पुरुष लेखकों का आरोप है कि हमारे यहां स्त्री विमर्श मुख्य रूप से शरीर केंद्रित है। वे मानते है कि आत्मकथाओं में सेक्स प्रसंग जबर्दस्ती ठूंसे और गढ़े गए हैं ताकि किताबों को चर्चा और पाठक दोनों मिल सके। यह लोग अपने तर्कों के समर्थन में जार्ज बर्नाड शॉ के एक प्रसिद्ध लेख का सहारा लेते है जिसमें उन्होंने आत्मकथाओं को झूठ का पुलिंदा बताया है।‘ऑटोबॉयोग्राफिज आर लाइज’ में उन्होंने कई तर्कों और प्रस्थापनाओं से ये साबित करने की कोशिश की है कि आत्मकथा झूठ से भरे होते हैं।यहां लड़ाई फिलहाल सच और झूठ की नहीं है।
लड़ाई स्त्री-विमर्श और आत्मकथाओं में यौनिकता के प्रकटीकरण का है। वरिष्ठï कवियत्री अनामिका इस मुद्दे पर लगभग ललकारती है, ‘कौन माई का लाल कहता है कि स्त्री आत्मकथाओं के यहां दैहिक दोहन का चित्रण पोर्नोग्राफिक है। घाव दिखाना क्या देह दिखाना है?’


जर्मनी की एक फिल्म है पैशन ऑफ लाइफ। पूरी फिल्म एक औरत के आवेग की कहानी है जो अपनी सेक्सुआलिटी की खोज में लगी है, पूरे आवेग के साथ। वह प्रेम और सेक्स को अलग रखती है। नायिका को प्रेम की तलाश नहीं है, वह अपनी कामनाओं की खोज में है। इस खोज में वह यूरोटिक पार्लर में जाकर हर तरह के प्रयोग कर डालती है। अंतत: उसका मोहभंग होता है। लेकिन वह मोहभंग की प्रक्रिया तक अपने प्रयोग और खोज जारी रखती है और जिसका उसे कोई अफसोस नहीं होता। यह फिल्म अपने अनूठे आख्यान की वजह से पोर्नग्राफी होते-होते बची और एक महान फिल्म में बदल गई।फिल्म देखते हुए दर्शक सेक्सुआलिटी की खोज पर सवाल नहीं खड़ा करते बल्कि एक स्त्री की यौनिक आजादी के रूप में देखते हैं। निर्देशक ने दर्शकों से फिल्म शुरू होने से पहले कहा, ‘यह फिल्म थोड़ी जटिल है। समझने में थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। एक गांठ खुल गई तो आप समझ जाएंगे...।’


यह बात हिंदी समाज के मर्दवादियों को कब समझ में आएगी। या तो उनकी समझ में कोई समस्या है जो यौनिकता के चित्रण में ‘महापाप’ देख रहा है या एक स्त्री को यौनिकता की आजादी भोगते-लिखते बर्दाश्त नहीं कर सकता। यह डरे हुए पुरुषों की जमात है जिसे यह डर है कि यौनिकता के इस विस्फोट में कभी भी उनकी धज्जियां उड़ सकती हैं। इससे पहले कि घाव फूटे, उसे टमकते हुए में ही दबा दो। वरिष्ठ साहित्यकार-पत्रकार निर्मला भुराडिय़ा ऐसी मानसिकता को फटकारते हुए एक दिलचस्प किस्सा सुनाती है-निर्देशिका अरुणा राजे से एक बार बात हो रही थी। यह तब की बात है जब उन्होंने फिल्म रिहाई बनाई थी।
अरुणा बोलीं, ‘लोग मेरी आलोचना कर रहे हैं, कहते हैं, क्या आप स्त्रियों के ‘सोने’ के अधिकार मांग रही है?
मैंने उन्हें कहा, सोने के अधिकार भी मांग रही हैं तो भी स्त्रियों को हक है अपनी बात कहने का। स्त्री मात्र भोग्या नहीं है, उसकी भी अपनी दैहिक आकांक्षाएं हैं। सारी वर्जनाएं स्त्रियों के लिए ही क्यों? जो पुरुष लेखन के लिए सही है, वही स्त्री लेखन के लिए भी है। दोनों के लिए अलग नियम थोड़े ही होंगे!’


कुछ ऐसी ही कहानी मृदुला गर्ग सुनाती हैं, ‘जब चितकोबरा में स्त्री पति से सहवास करते समय अनेक विषयों पर जैसे शरीर और मस्तिष्क के द्वैत पर सोच रही होती है, प्रेमी के बारे में नहीं। अगर उस वक्त प्रेमी के बारे सोचती तो लोगों को एतराज नहीं होता। वह मर्द मानसिकता के अनुरूप होता। हमारे बुद्धिजीवियों को एतराज इस बात पर था कि एक स्त्री-पुरुष पति को देह की तरह कैसे देख सकती है। अब तक वे स्त्रियों को देह की तरह देखने के आदि थे। एक स्त्री में इतनी हिम्मत कैसे हुई कि वो अपना मस्तिष्क और देह को पृथक रखे और पुरुष को देह की तरह देखे।’
मनीषा कुलश्रेष्ठ भी मृदुला गर्ग के चितकोबरा को एक मिसाल मानती है। वह कहती हैं, सेक्सुआलिटी की ईमानदार अभिव्यक्ति की मिसाल है चितकोबरा। जिसके लिए उन्हें पुलिस द्वारा मानसिक प्रताडऩा भी झेलनी पड़ी। मनीषा मर्दवादी बौखलाहट पर हमला बोलते हुए सवाल दागती है, ‘जब पेट की भूख के प्रकटीकरण से कोई फर्क नहीं तो उसी प्रकृति प्रदत्त यौनिकता को ही क्यों हौआ बना देते हैं लोग?’
वे जवाब भी तलाश लाती हैं, ‘आज का हमारा जो त्रिशंकु किस्म का पुरुष समुदाय है जो न लोक से जुड़ा है और न ही उदार और उन्मुक्त विचारधारा से, जो न इधर का है न उधर का। बस वही उखड़ा हुआ है। ऐसे कुंठित लोगों का एक बड़ा समुदाय है जो शोर मचाता है।’


अनामिका भी कुछ इसी सुर में कहती हैं, नई स्त्री का प्यार पा सकने लायक शिष्ट-सभ्य-शालीन ‘नया’ पुरुष दूर-दूर तक नजर नहीं आता।


‘नए पुरुष’ की गैरमौजूदगी के बावजूद हिंदी में ‘बोल्ड लेखन’ हो रहा है। इस पर भी विवाद और संदेह है। कुछ लोग यौनिकता पर और अधिक गंभीर लेखन की मांग करते है। कुछ लोग मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा को बचते बचाते लेखन का आरोप मढ़ा है। आलोचक मानते हैं कि इनकी आत्मकथा में खुलापन नहीं है, अपने आप से मुंह चुराने की कोशिश दिखाई पड़ती है।मैत्रेयी इनका जवाब देती है, ‘मैं मानती हूं कि मेरी दोनों आत्मकथा में ऐसा कुछ भी नहीं है लेकिन देखने वालों को इसमें भी यौनिकता दिखी।’


रमणिका गुप्ता की आत्मकथाओं के अंश जरूर बेहद विवादास्पद रहे जिनमें उन्होंने अपने जमाने के कई प्रसिद्ध हस्तियों के साथ अपने दैहिक संबंधों का खुलकर बखान किया है। इस बारे में रमणिका का तर्क है कि जब एक पुरुष कहता है कि उसने स्त्रियो को भोगने की सेंचुरी बनाई तो कुछ नही। स्त्री एक से भी जुड़े तो उसको कुलटा कहना शुरु। इसीलिए लेखन में यौनिकता दिखाना जरुरी है ताकि शोषण बंद हो जाए। कवियत्री किरण अग्रवाल भी इसी मानसिकता पर चोट करती हैं, जिस समाज में स्त्री को महज एक सेक्स आब्जेक्ट के रूप में देखा जाता तो उस समाज में किसी भी महिला लेखक की आत्मकथा उसकी यौनिकता की चर्चा के बिना कैसे लिखी जा सकती है। खुलकर लिखना चाहिए। इसका मकसद सनसनी फैलाना नहीं है बल्कि समाज के सामने उसका वो चेहरा दिखाना है जिससे जूझते हुए एक स्त्री आगे बढ़ती हैं।इन तमाम तर्को प्रतिवादो के मद्दे नजर जो बात सामने आती है वो है एक स्त्री की यौनिकता पर गंभीर विर्मश की आवश्यकता। रमणिका के अनुसार जिसे पुरुष समाज हल्की टिप्पणी करके हल्का बना रहा है।

वक्त का ज्वालामुखी और बर्फ जैसी औरतें

Posted By Geetashree On 5:06 AM 2 comments


गीताश्री

“ सेक्स वर्कर दूसरी औरतो से अलग होती है। इसके चार कारण हैं...हम अपनी मर्जी की मालिक होती हैं। हमें खाना बनाकर पति का इंतजार नहीं करना पड़ता। हमें उसके मैले कपड़े नहीं धोने पड़ते। हमें अपने बच्चों को अपने हिसाब से पालने के लिए आदमी की इजाजत नहीं लेनी पड़ती। हमें बच्चे पालने के लिए आदमी की जायदाद पर दावा नहीं करना पड़ता। ”
......नलिनी जमीला (एक सेक्सवर्कर की आत्मकथा में )
साथ रहने वाला एक आदमी पति बन जाता था और दूसरा भाई।
ये वो रिश्ते थे, जो बाजार बनाता था और बाजार ही देता था रिश्तों को नाम।
रिश्तों को नाम देने के बावजूद ऐसे रिश्तों को समझना मुश्किल है क्योंकि अबूझ रिश्तों की ये एक ऐसी कहानी है, जो किसी औरत के जिस्म से शुरु होकर औरत के अरमानों पर आकर खत्म हो जाती है।
लेकिन किसी के अरमान मिटे या सपने लुटे, इसकी परवाह बाजार कब करता है? केरल में भी हमने अरमानों की ऐसी अनगिनत चिताएं देखीं, जिसे किसी की बेचारगी और लाचारी हवा दे रही थी ।
केरल में सेक्स वर्करो की दुनिया के अनचीन्हे दर्द से साझा करते हुए मैंने देखा कि जो आदमी खुद को पति बता रहा है वो पति नहीं दलाल है और जो खुद को भाई बता रहा है वो ग्राहक ढूंढलानेवाला बिचौलिया. । और दोनों जिस्म के सौदे के बाद मिले पैसों से करते थे ऐश। लेकिन ये सब एक बंद दुनिया का चेहरा था, जिससे खुली दुनिया के लोग कोई मतलब नहीं रखना चाहते । तभी तो हमने पाया कि सेक्सवर्कर समाज से वैसे ही नफरत करती है जैसे समाज सेक्स वर्कर से।
कोई पति बनकर दलाली करेगा और कोई भाई बनकर ग्राहक लाएगा, शायद सामजिक ताने-बाने पर रिसर्च करनेवाले रिश्तों की इस नई परिभाषा को कुबुल न कर पाए, लेकिन सच था।
केरल के कोझीकोड में इन्हें रोपर्स के नाम से जाना जाता है। रोपर्स, रोप(रस्सी) शब्द से बना है। यानी दो किनारों को जोड़ने वाला, रस्सी की तरह जोड़ने वाला रोपड़,ये खुलासा केरल की मशहूर सेक्स वर्कर नलिनी जमाली ने भी अपनी आत्मकथा में किया है। उनकी आत्मकथा खूब बिकी है और हिंदी में भी अनुवाद होकर आई है। इसे पढ़ने के बाद केरल की सेक्सवर्कर के बारे में और करीब से जानने-समझने का मन हुआ।
मैं केरल की यात्रा पर गई थी तंबाकू पर शोध करने, लेकिन वहां मेरे एक एकिटविस्ट मित्र साजू से मैंने अपनी इच्छा जताई।
शाम तक उनके आफिस में दो महिलाएं हाजिर थीं। रमणी और सरोजनी। कोट्टायम के उनके दफ्तर में बैठी, थोड़ी सकुचाई, झिझकती हुई दो सांवली-काली रंगत वाली यौन कर्मियों और मेरे बीच भाषा का संकट था। वे ना तो अंग्रेजी बोल सकती थीं, ना हिंदी समझती थी। ना मैं उनकी भाषा। मगर वे इस बातके लिए तैयार होकर आई थी कि एक पत्रकार को इंटरव्यू देना है। साजू खुद इंटरप्रेटर बन गया।
स्त्री का दर्द पहली बार पुरुष के मुख से अनुवाद होकर स्त्री तक आ रहा था। पता नहीं पुरुष ने उसमें क्या जोड़ा, क्या घटाया...मगर उन दोनों की दैहिक भाषा ने मुझे समझा दिया, सब कुछ। रमणी थोड़ी कम उम्र की थी। वह खुल रही थी, साहसपूर्वक, वैसे ही जैसे उसने यौनकर्म की दहलीज पर पैर रखा था।
बोलते हुए वह उसके भीतर की खड़खड़ साजू ने नहीं, मैंने सुनी। कुछ था जो खुलता और बंद होता था। खौफ के साथ अपने बाहर फैलने की ललक को वह रोक नहीं पा रही थी। रमणी को दिल्ली देखना है। उसने देखा नहीं, सुना भर है। बातचीत के दौरान वह लगभग गिड़गिड़ाती है-“ क्या आप मेरे लिए टिकट भेजोगे। अपने पास रखोगे। लालकिला, कुतुब मीनार देखना है। सुना है...बहुत सुंदर और बड़ा शहर है...।” मैं भी वादा कर देती हूं पर अभी तक पूरा नहीं कर पाई हूं। शायद कभी कर पाऊं...उनसे संपर्क का जरिया भी तो नहीं कोई. हम कौन सी भाषा में बात करेंगे, फोन पर? वो बोल रही थीं और मुझे मुझे निदा फाजली की पंक्तियां याद आ रही थीं-
“ इनके अन्दर पक रहा है वक़्त का ज्वालामुखीकिन पहाड़ों को ढके हैं बर्फ़ जैसी औरतें । ”
रमणी, बोलती कम है,हंसती ज्यादा है। हंसी हंसी में कहती है, मैं पहले एक दिन में पांच छह ग्राहक निपटा देती थी। अब थकान होने लगी है। अब संख्या कोई मायने नहीं रखती...दो तीन निपटा ले,यही बहुत है। वह थोड़ी गंभीर होती है---ग्राहको की संख्या मायने नहीं रखती, उनकी संतुष्टि मायने रखती है। धंधे में उतरने का कोई अफसोस? रमणी ईमानदारी से स्वीकारती है, अफसोस तो है, मगर जिंदगी चुनौती की तरह है, उसका सामना कर रहे हैं। अब भाग नहीं सकते। देर हो चुकी। इसके आगे का रास्ता बंद है। क्या करें?रमणी का यह वक्तव्य किसी अनुपस्थित को संबोधित था। साजू मुझे बता रहे थे और वह शून्य में देख रही थी।
बात-चीत से पता चला कि रमणी कोट्टायम शहर के एक संभ्रांत मुहल्ले में रहती है। वहां धंधा करने मे समस्या ही समस्या। उसने एक रास्ता निकाल लिया। जंगल ही उसका रेडलाइट एरिया बन गया है। वह ग्राहकों को पास के जंगल में ले जाती है। घास के बिछौने होते हैं। मोबाइल हैं, ग्राहक फोन करते हैं फिर जंगल में जगह तय होती है। कुछ ग्राहक जंगल नहीं जाना चाहते, तब सरोजनी की बन आती है। वह अपने ग्राहक उसकी तरफ भेज देती है। सरोजनी का घर भी तंग गलियो में हैं मगर वह घर से धंधा करती है। थोड़ी उम्र ज्यादा है इसलिए लोग शक कम करते हैं। साथ में एक पतिनुमा जीव रहता है।
पति का जिक्र आया तो नलिनी याद आ गई। नलिनी ने एसे पतियो के बारे में साफ लिखा है कि मकान वगैरह किराए पर लेना हो तो ये लोग बड़े काम आते हैं। लेकिन कुल मिलाकर ये किसी सिरदर्द से कम नहीं हैं। सरोजनी का पति भी एसा ही है। सरोजनी ही उसका खर्च चलाती है। बदले में वह उसे सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का नाटक करता है। घर पर अक्सर ग्रहको का आना जाना देख कर कई बार पड़ोसी पूछ लेते हैं, सरोजनी का जवाब होता है-“ये लोग प्रोपर्टी डीलर हैं, मेरा प्लाट खरीदना चाहते हैं। देखने आते रहते हैं।“
सरोजनी बताती है-“ कई बार उसके पास युवा लड़को का ग्रुप आता है। वह पांच मिनट में उन्हें मुक्ति देकर भेज देती है। भीतर से उसे ग्लानी होती है कभी कभी, उनकी और अपनी उम्र देखकर। लेकिन ग्राहक तो ग्राहक है, चाहे किसी भी वक्त या किसी भी उम्र का हो..। “ लेकिन पैसे की जरूरत ऐसी सोच पर लगाम लगा देती है ।
रमणी भी कहती है, पैसा बड़ी चीज है। उन्हें कैसे लौटा दें। मैंने कहा, छोड़ क्यो नहीं देती ये धंधा...दोनों एक साथ बोल पड़ी, इतना पैसा किस काम में मिलेगा। अब हमें कौन काम देगा। हम किसी काम के लायक बचे ही नहीं...अब तो आदत सी पड़ गई है...। अब छोड़ भी दे तो लोग हमें चैन से नहीं जीने देंगे।
रमणी अब बातचीत में सहज हो चुकी है और उसे ये स्वीकारने में झिझक नहीं होती कि इस पेशे में भी वो कभी-कभार आनंद ढूंढ लेती है।
कैसे,मैं चकित होती हूं... ।
वह स्वीकार करती है कि एक स्थाई ग्राहक से वह भी आनंद लेती है। यहां पैसा गौण है। उससे मोल-भाव नहीं करती। रमणी के पास किस्से बहुत है...। एक बार पैसे वाला अधेड़ ग्राहक आया, कहा—“मैं अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता हूं, मगर मैं जिस उत्तेजना की तलाश में हूं, वहां नहीं है। चलो, सेक्स में ‘फन’ करते हैं...।“ लेकिन रमणी अच्छी तरह जानती है कि दूसरों को भले ही उसके जिस्म में ‘फन’ की तलाश हो, लेकिन वो खुद अपने पति के मर जाने और कंगाल हो जाने के बाद यातना के जिस रास्ते पर चल रही है,वो रास्ता
कहां खत्म होगा। न घर बचा न कोई जमीन का टुकड़ा, जिसे वह अपना कह सके। रिश्तेदारो ने शरण देने से मना कर दिया। कम पढी लिखी थी, सो नौकरी ना मिली। एक शाम उसने खुद को पीकअप प्वाइंट पर पाया। जिस्म की कमाई से पहले बेटियो को पाला, अब खुद को पाल रही है। इसी नरक में अपने लिए सुख का एकाध कतरा भी तलाश लेती है। यह सब बताते हुए उसकी आंखों में कहीं भी संकोच या शरम नहीं..है तो बस थोड़ी शिकायत, थोड़ा धिक्कार।
दोनों से बातचीत करते हुए ही हमने जाना कि केरल में कहीं भी कोई रेडलाइट एरिया नहीं है। इसीलिए वहां सेक्सवर्कर पूरे समाज में घुली मिली है। उन्हें अलग से चिनिहत नहीं किया जा सकता। इसकी दिक्कते भी हैं। बताते हैं कि केरल में 10,000 स्ट्रीट बेस्ड सेक्सवर्कर हैं। इनमें हिजड़े भी शामिल हैं। इसके बावजूद सोनागाछी की एकता उनके लिए रोल माडल की तरह है। वहां एक अनौपचारिक रुप से संगठन बना है, सेक्सवर्कर फोरम केरला(एस डब्लू एफ के) जो इनके हितो का ध्यान रखने लगा है। गाहे-बगाहे आंदोलनों में शिरकत भी करने लगा है।मगर एसडब्लूएफके सोनागाछी के दुर्वार महिला समन्य समिति की तरह ताकतवर नहीं है। रमणी,सरोजनी उसकी सदस्य बन चुकी हैं।
सरोजनी की दो बेटियां हैं, चेन्नई में रहती हैं। वे हिंदी नहीं जानती, किताब नहीं पढ सकती, तो क्या हुआ, फोटो तो पहचान सकती है। रमणी और सरोजनी ने फोटो तो खिचवाए लेकिन न छपवाने का आग्रह किया। बेटियां हालांकि अब जान गई हैं कि मां क्या काम करती हैं। पहले तो बहुत विरोध हुआ अब नियति को कुबुल कर चुकी है । साथ कुछ वक्त बिताने के बाद जब वो जाने की अनुमति मांग रहीं थीं
तो वहां मौजूद आंखें उन्हें संशय से घूर रही थीं. तभी मुझे निशांत की कविता(वर्त्तमान संदर्भ में छपी हुई) की पंक्तियां याद आने लगी....
इन औरतो को,
गुजरना पड़ता है एक लंबी सामाजिक प्रक्रिया से
तय करना पड़ती है एक लंबी दूरी
झेलनी पड़ती हैं गर्म सलाखों की पैनी निगाहें
फाड़ने पड़ते हैं सपनो को
रद्दी कागजो की तरह
चलाना पड़ता है अपने को खोटे सिक्कों की तरह
एक दूकान से दूसरे दूकान तक.

वो चली गईं, लेकिन दोनों मेरे सामने एसे खुली जैसे अंधड़ में जंग लगे दरवाजे-खिड़कियो की सांकलें भरभरा कर खुल जाती है। उन्होंने अपने दर्द को कही से भी अतिरंजित नही किया...बल्कि भोगे हुए को ज्यों का त्यों रख दिया। शायद उन्हें लग रहा था कि इस जलालत से भरी दुनिया में कोई है, जो उसकी व्यथा सहानूभूति पूर्वक सुन रहा है। उसके भीतर मुझे लेकर प्रश्नाकुलता थी। भाषाई संकट के कारण पूछ नहीं पा रही थी,शायद साजू की उपस्थिति भी संकोच पैदा कर रही थी। फिर भी साजू के बावजूद उन्हें जो कुछ कहना था साफ-साफ कह गई। सुना गई अपनी कहानी। उस कहानी में गुड गर्ल बनने का सिंड्रोम नहीं था । ये रास्ता उन्होंने खुद चुना था। शिकायतें कम थीं और लहजे में.मुक्ति की चाह भी खत्म थी। उनके जाने के बाद भी रमणी की खिलखिलाहट मेरे सामने गूंज रही थी और दर्द की दरिया में भींगने के बाद पनपे अवसाद को कम कर रही थी । सरोजनी ने भी अपनी चालबाजियो को चटखारे लेकर सुनाया था, और उसे सुनाने में मजा भी आ रहा था, लेकिन क्या वो सचमुच चालबाज है ।

उनके जाने के बाद मैं सोच रही थी और बगल में बैठा साजू शरमा रहा था ।