मेरी भूटान-यात्रा

Posted By Geetashree On 2:32 AM 4 comments


गीताश्री
.तस्वीर से ज्यादा सुंदर


एक पुरानी भूटानी कहावत के अनुसार भूटान एक ऐसी पुण्यभूमि है जहां साम्राज्य का कोई भी ऐसा चप्पा नहीं है जिसे गुरु रिम्पोचे का आर्शीवाद प्राप्त ना हो। जैसे हिमालय की गोद में धरा हुआ, तांत्रिक रहस्यमयता से लिपटा एक सुंदर और शांत शहर। लोग इसलिए धीमे बोलते हैं मानो बुद्ध अभी किसी पहाड़ी पर ध्यानरत हैं। जोर से बोलेंगे तो खलल पड़ जाएगा। पड़ोसी देश के एक महान दार्शनिक कन्फ्यूसिएश ने कहा था कि आओ खामोश रहें ताकि देवताओं की कानाफूसी सुन सकें। भूटानी यानी स्थानीय भाषा में द्रूपका लोगो ने सुन लिया पड़ोस से आए इस दर्शन को। तब से लोग यहां चिल्लाते कम हैं। कहीं कोई पुकार तक नहीं सुनाई देती। हवा का शोर ना हो तो अपनी धडक़न भी सुन सकते हैं। ट्रेफिक लाइट के बिना ट्रेफिक चलती है। पुलिस कहीं दिखती नहीं। मैंने मुनीरा से पूछा। उसने मुस्कुरा कर कहा-पुलिस है, उसकी आंखें आपको देख रही है। गल्ती करेंगे तो सामने जाएगी। ना पुलिस की सीटियां ना व्यर्थ के हॉर्न बजते हैं। दिल्ली के कोलाहल से भाग कर वहां जाएंगे तो तेज और कानफोड़ू आवाज के लिए तरस जाएंगे। धुली धुली पहाडियां, कुंवारी और शादीशुदा नदियो का कल कल दूर से सुनाई देता है। यहां एक शादीशुदा नदी भी है। पुनाखा घाटी में अलग अलग रंगो की एक पुरुष नदी और एक स्त्री नदी आपस में मिलते हैं और एक होकर सफर करते हैं। गाइड फुंगशू मजाक करता है..देखा है कहीं मैरिड नदी.. रास्ते में झरने ही झरने। खेतो में धान ललहाते हुए। बादल जैसे ठिठके से घरो की छतो पर। हवा भी जैसे पत्तो पर ठहरी सी। बच्चो के चेहरे फूल से या फूल बच्चो से, आप र्फक ही नहीं कर पाएंगे, इतने गुलाबी और खिलखिलाते। ये सब कुछ किसी तस्वीर सा सुंदर है जो आपकी बेचैनी को आराम दे देता है।


.थोड़ा है थोड़े की जरुरत है


उनके लिए खुशहाली सर्वोपरि है, विकास का वही पैमाना भी। भूटान को अपनी सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक विरासत से बहुत लगाव है। आर्थिक प्रगति की दौड़ में इनसानी मूल्य, संस्कृति, अतीत की धरोहर नष्ट ना हो जाए, लोग अपनी जड़ो से ना कट जाएं, इसके प्रति बेहद सजग है। नेपाल के हश्र और चीन के व्यापार से डरे हुए इस देश ने विकास की राह पर चलने की अपनी अलग नीति बनाई गई है। उनकी नीति दुनिया की आंखें खोलने का माद्दा रखती है। सकल राष्ट्रीय खुशी (ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस) शब्द एक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है। भूटान के चौथे राजा जिगमे सिगवे वांगचुंग ने इस अवधारणा की नींव रखी। ये शब्द भी उन्हीं का अविष्कार है। इसमें आर्थिक निर्भरता, पर्यावरण, भूटानी संस्कृति और सभ्यता के संरक्षण जैसी चिंताएं शामिल थीं। इसके लिए एक आयोग का भी गठन किया गया है। इसीलिए आज भी वहां मकान के डिजाइन पारंपरिक रखे जाते हैं। सरकारी-प्राइवेट सभी ऑफिस में पारंंपरिक पोशाक (स्त्री-टेगो और कीरा, पुरुष-घो) पहन कर जाना अनिर्वाय है। सूचना और संचार मंत्रालय के सचिव दाशो किनले दोरजी एक विशेष मुलाकात में बताते हैं, इस बड़ी सी दुनिया में भूटान एक छोटा सा देश है। हमारे पास अर्थव्यवस्था की ताकत नहीं है। सांस्कृतिक पहचान ही हमारी असली ताकत है। सरकार की जिम्मेदारी है इसे संरक्षित करने की। भूटान के प्रधानमंत्री बताते हैं, हमारी कोशिश है कि हम भौतिक रुप से नहीं, दिल से खुश रहें। वित्तीय समस्या होने के बावजूद संतुलित रहें। जीवन में हमने क्या पाया, हमें कितनी संतुष्टि मिली, ज्यादा महत्वपूर्ण है। हम इच्छाएं ज्यादा नहीं रखतें। इसीलिए हमने भौतिक स्वरुप के बजाए संतुष्टि का मानक रखा है। दस साल बाद किसी भूटानी नागरिक को रोटी के लिए मशक्कत ना करनी पड़े, ये हमारा लक्ष्य है। भूटान सरकार यह भी दावा कर रही है कि उनका पैमान दुनियाभर में लोकप्रिय हो रहा है। उन्हें अंतराष्ट्रीय समुदाय में खूब वाहवाही मिल रही है।


.सच्चे किस्से


हिमालय पर्वत की सुंदर वादियों में बसे छोटे से देश के एक गांव में एक परिवार बरसों से सामाजिक बहिष्कार झेल रहा था। पूरे गांव तो क्या पूरे इलाके में कोई उनके घर का अन्न जल नहीं खाता था। इस परिवार पर जादू टोने करने का कलंक लगा था। पूरे इलाके में अपवाह थी कि इस परिवार के घर को अन्न जल जो भी ग्रहण करेगा, वो मर जाएगा। ये परिवार एक शापित जिंदगी जी रहा था कि एक दिन इस देश का राजा अचानक उनके द्वार पर पहुंचा। घर के मालिक को कहा कि अपनी पत्नी से मेरे लिए खाना बनवाओ, आज मैं तुम्हारे घर खाना खाऊंगा और यहीं रात बिताऊंगा। पूरे इलाके में राजा के आने की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई लोग इक्कठे हो गए और राजा को समझाया कि इस घर का पानी भी नहीं छूना चाहिए। राजा नहीं माने। राजा ने उस घर में खाना खाया और वहीं रात बितायी। वो राजा आज भी जिंदा हैं, भला चंगा है और अपने देश का युवा राजा है। शापित परिवार के माथे से जादू-टोने का कलंक धुल गया अब पूरा गांव उनके साथ अच्छे संबंध रखता है। ये किस्से कहानियों की बात नहीं ,ना ही नानी दादी की कहानियां हैं। ये सच्ची घटना है। ये वर्तमान राजा हैं, जो नहीं चाहते कि उनकी प्रजा अंधविश्वास और रुढियो में जकड़ी रहे।
एक घटना और..वहां राजा प्रजा के बीच संवादहीनता नहीं है, इसका एक उदाहरण है। चौथे राजा ने चार शादी की। चारो सगी बहने हैं। वर्तमान राजा दूसरी बहन के बेटे हैं। एक बार चौथे राजा किसी पब्लिक मीटिंग में भाषण देने के बाद लोगो के सवालो के जवाब दे रहे थे। एक व्यक्ति ने उठकर पूछा-आप राजा हैं, आपने चार शादियां क्यो की? राजा ने शांत उत्तर दिया--आप चिंता ना करें, आपका अगला राजा एक ही शादी करेगा।




कुछ कुछ होता है..


हिंदी सिनेमा के नाम पर भूटान में युवाओ को कुछ कुछ होता है.. . जिसे देखो, उसके ऊपर शाहरुख खान और काजोल का नशा छाया हुआ है और गाने के बोल फूटते हैं..क्या करुं हाय, कुछ कुछ होता है..।इस गिरफ्त में युवा राजा भी हैं। वैसे बॉलीवुड के और भी सितारे यहां पसंद किए जाते हैं, लेकिन काजोल के प्रति दीवानगी के क्या कहने। हिंदी सिनेमा और सास बहू वाले धारावाहिको ने यहां के नागरिको को हिंदी बोलना सीखा दिया है। दाशो किन्ले हंस कर कहते हैं, बॉलीवुड ने हमारे युवाओं को अपने प्रभाव में ले लिया है। उनकी तर्ज पर उनके हाव भाव, चाल ढाल बदल रहे हैं। नई फिल्मों के शौकीन लोग राजधानी थिंपु से तीन चार घंटे की यात्रा करके भारत-भूटान बार्डर पर स्थित शहर फुंसलिंग शहर जाकर फिल्म देख आते हैं। दबंग का नया नया नशा वहां की हवाओं में बदनाम हो रहा है।टीवी की तरह भूटानी फिल्मों का इतिहास भी महज एक दशक पुराना है। वहां हर साल 17-18 फिल्में बनती हैं। भूटानी फिल्मों की प्रेरणा बॉलीवुड है। इसके अनेको उदाहरण है। जैसे हिंदी फिल्म कहो ना प्यार है का भूटानी वर्जन बनता है सेरेगिल नाम से। मुन्नाभाई का भूटानी भूटानी वर्जन कुजू(भूटानी में अर्थ हैलो) नाम से रिलीज होता है। हिंदी फिल्मों की पाइरेटेड डीवीडी के लिए भूटान अच्छा बाजार है। वहां के युवा नई फिल्में जल्दी देखना चाहते हैं। उनतक पाइरेटेड डीवीडी आसानी से पहुंच जाती है।
पर्यटको के प्रति रवैयाभूटान के व्यस्त बाजार में आप घूमे तो एक सामान्य नजारा दिखेगा। कहीं स्टार प्लस के सीरियल रहे हैं तो कहीं सोनी टीवी के सीरियल तो कहीं सिनेमा चैनल पर फिल्में चल रही हैं। दूकानो पर ज्यादातर लड़कियां बैठी होती हैं। उनमें सामान बेचने की वो आतुरता नहीं जो चीनी बाजार में दिखाई देती है। वे आपको बुलाती भी नहीं हैं। हैंडीक्राफ्टस के दूकानो की भरमार है। बेहद महंगे सामान कि खरीदने से पहले कुछ देर सोचना पड़े। ऐसे ही एक दूकान पर बैठी प्रतिमा से बातचीत होती है. उससे पूछती हूं कि चीजें यहां इतनी महंगी क्यों हैं, तुम लोग बेचने के प्रति इतने उदासीन क्यो हो? प्रतिमा की मां बंगाली है पिता भूटानी। इसीलिए वह हिंदी, बांगला और भूटानी भाषा जोंगखा अच्छे से बोल लेती है। वह बताती है, हमें पता है जिन्हें खरीदना है, वे खरीदेंगे। महंगी होने के कारण ज्यादा लोग विंडो शॉपिंग करके चले जाते हैं। हम किसी पर दवाब नहीं बनाते। यहां टैक्स बहुत देना पड़ता है इसलिए चीजें महंगी हो जाती है। भारतीय लोगो के लिए हम चीजें सस्ती कर देते हैं, अगर वे लोग मोलभाव करें तो। यहां बता दें कि भूटानी मुद्रा नोंगत्रुम और भारतीय रुपया एक समान है और आप वहां भारतीय रुपयो से खरीदारी कर सकते हैं। प्रतिमा पर्यटको के कम आमद से थोड़ा हताश दिखी मगर अपनी सरकार की नीतियों का सर्मथन भी किया। उसे एहसास है कि उसका देश सुंदर है, टूरिस्ट यहां आना चाहते हैं मगर सरकार उन्हें परमिट या वीजा नहीं देती। विदेशियो का आगमन यहां नियंत्रित है। ये भूटान के भले के लिए है। प्रतिमा के साथ खड़ी डोलमा कहती है, हमें टूरिस्ट की क्वांटीटी नहीं, क्वालिटी चाहिए। संकेत हमें साफ समझ में रहा था। सरकार की नीतियां जनता के दिमाग में बैठ गई है। कारोबार से ज्यादा संस्कृति बचाने की चिंता है। मुझे वहां के प्रधानमंत्री का एक स्लोगन याद आया-हाई क्वालिटी, हाई कॉस्ट। बाजार में एक बंगाल की गाड़ी दिखी। उसका ड्राइवर उपेन दत्ता बेहद मुखर है। अक्सर थिंफू आता जाता रहता है। बातचीत के क्रम में वह टिप्पणी करता है--भारतीय को भी ये लोग 6 या सात दिन से ज्यादा का परमिट नहीं देते। खासकर मजदूर या किसान जैसे दिखने वाले भारतीय पर्यटक से बहुत डरते हैं। उन्हें लगता है कि ये लोग यहां आकर बस जाएंगे, काम करने लगेंगे जिससे संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। भूटान की खुशकिस्मती है कि वह कभी किसी देश का उपनिवेश नहीं बना। इसीलिए बाहरी प्रभाव से बचा रहा। बना होता तो आज कहानी दूसरी होती। भूटान 1974 में आम पर्यटको के लिए खुला है।


लोकतंत्र के खतरे या अनजाना भय


भूटान के सामने नेपाल का ताजा उदाहरण है। राजशाही के अंत के बाद वह देश किस तरह बरबाद हो रहा है। भूटान का लोकतंत्र नया नया है। दाशो केनली दोरजी कहते हैं, लोकतंत्र कई देशो में आंतरिक-बाहरी समस्याओं से जूझ रहा है। हम अपनी तरह के अलग हैं, यूनिक हैं, हमारे लोकतंत्र का फारमेट अलग है। हम किसी और की तरह नहीं होना चाहते। राजशाही हमारे यहां जनता की ख्वाहिश है। ये लोकतंत्र हमारे राजा की ओर से प्रजा को उपहार में मिला है। किसी संघर्ष की देन नहीं है। भूटान के प्रधानमंत्री ल्योनचेन जिगमी वाई. थिनले भी एक विशेष मुलाकात में ऐसी ही बात करते हैं। वह कहते हैं, आसपास के देशो का हाल देखते हुए तो लगता है कि हमारे यहां भी डेमोक्रेसी उसी रास्ते पर चलने लगे या लोग उसका दुरुपयोग ना करने लगे। वे अपने इस भय को हमारे सामने छिपाते नहीं, जाहिर करते हैं। भूटान शायद इसीलिए चीन से कोई ट्रेड का रिश्ता नहीं रखता। भारत या थाईलैंड दो मुख्य व्यापार के लिए मफीद हैं। यहां बाजार में चीनी समाना कम मिलते हैं जो मिलते भी हैं वे तस्करी होकर आते हैं। ये बात वहां के अधिकारी भी स्वीकारते हैं। प्रधानमंत्री चीन के साथ संबंधो के मामले में दो टूक कहते हैं, हम नहीं चाहते कि दो देशो के बीच कोई गलतफहमी हो। आपसी समझदारी से हम एक दूसरे के प्रति सम्मान भाव रखते हैं और संप्रभुता को स्वीकार करते हैं।

यह धरती के आराम करने का समय है

Posted By Geetashree On 3:08 AM 6 comments
इस ऋंखला में कवि अनिल करमेले की कविता. 12 सितंबर के दैनिक भास्कर अखबार(फीचर पेज) में छपी थी. वहां से साभार ले रही हूं दोस्तो के लिए. वो भी एक कवि की कविता. यहां स्त्री होने की विडम्बना देखिए..कितनी करुणा और कितना क्षोभ। आनर किलिंग वाले समाज की मानसिकता पर चोट करती हुई ये कविता स्त्री के चोटीले मन को हौले से एक आश्वस्ति के साथ सहलाती है...गीताश्री

कहीं कोई आवाज नहीं है
जैसे मै शून्य में प्रवेश कर रहा हूं
जैसे एक नवजात शिशु के रुदन स्वर से
दुनिया के तमाम संगीत आश्चर्य के साथ
थम गए हों

मेरी देह का संतुलन बिगड़ गया है
और वह लगातार कांपती हुई
पहली बारिश में अठखेलियां करती
चिड़ियों की तरह लग रही है

मैं चाहता हूं इस वक्त दुनिया के
सारे काम रोक दिए जाएं
यह धरती के आराम करने का समय है
न जाने कितने जन्मों की प्रतीक्षा के बाद
अनंत कालों को लांघता हुआ
मुझ तक आ पहुंचा है यह
मैं इसके शब्दों को
छू कर महसूस करना चाहता हूं...

*************

तीनो लोको में फैल गया है घोर आश्चर्य
सारे देवता हैरान परेशान
दांतो में उंगली दबाए भाव से व्याकुल
मजबूती से थामे अपनी अपनी प्रिया का हाथ
निहार रहे हैं पृथ्वी की ओर..

कि जब संग संग मारे जा रहे हैं प्रेमी
लगाया जा रहा है सम्मान पर पैबंद
प्रेम करती हुई स्त्री की खाल से
पुरुष कर रहे हैं पलायन
उनकी कोख में छोड़कर बीज

और एक क्रूर हत्यारा अट्टाहास
फैला है प्रेम के चहुंओर
कैसे संभव हुआ एक स्त्री के लिए
इस पृथ्वी पर प्रेम...

निर्मला पुतुल की कविताएं

Posted By Geetashree On 8:06 AM 6 comments
गीताश्री
पर्वत राग का नया अंक पढ रही थी,,,इस अंक में कई सामग्री पठनीय है। मगर मेरा ध्यान खींचा निर्मला पुतुल की कविता ने. मैं अब नयी चीज शुरु करने जा रही हूं...अपने इस ब्लाग पर अपना लिखा बहुत हुआ. अब स्त्री द्वारा स्त्री पर लिखी जाने वाली कविता, कहानी, लेख, साक्षात्कार भी इसमें शामिल करुंगी. खासकर जो चीजें सिर्फ अखबारो या पत्रिकाओं में छप कर रह जाती है..उन्हें यहां अपने दोस्तो को पढवाना मेरा दायित्व है...जो मुझे अच्छा लगता है शायद आपको भी रुचे. ना रुचे तो बताएं..रुचे तो एक कमेंट डाल दें..
मैं जानती हूं...यहां भी मुझ पर घोर स्त्रीवादी होने का आरोप लगाया जाएगा. क्या करें..हम हैं ही एसे. कोई पुरुष साथी की रचना जंची तो शामिल कर लेंगे..फिलहाल दूर दूर तक स्त्री के हक में लिखने वाले ही दिख रहे हैं...शुरुआत कविता से कर रहे हैं..उनकी तस्वीर गूगल में नहीं मिली, ना ही मैं उनसे परिचित हूं,,एक स्त्री का दूसरी स्त्री से अपरिचय भी कैसा..वो जिस स्त्री की बात अपनी कविता मे करती है..शायद मैं हूं..आप हैं..
निर्मला जी जानी मानी कवयित्री हैं, हिंदी-संथाली की. पर्वत राग में साक्षात्कार समूह(निरंजन देव शर्मा, अजेय, प्रतिमा) ने इनके बारे में लिखा है---सचमुच निर्मला पुतुल की कविताएं पाठक से संवाद स्थापित करने के मामले में कविता के क्षेत्र में पसरे सन्नाटे को बखूबी तोड़ती हैं..निर्मला खुद कहती हैं कि वह प्रायोजित कविताएं नहीं लिखतीं...आप पढिए देखिए..निर्मला एक स्त्री जीवन के अंधेरे से कैसे जूझती हैं..
कविता
क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न
एक स्त्री का एकांत

घर-प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी जमीन
के बारे में बता सकते हो तुम.

बता सकते हो
सदियो से अपना घर तलाशती
एक बेचैन स्त्री को
उसके घर का पता.

क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में
किस तरह एक ही समय में
स्वंय को स्थापित और निर्वासित
करती है एक स्त्री.

सपनो में भागती
एक स्त्री का पीछा करते
कभी देखा है तुमने उसे
रिश्तो के कुरुक्षेत्र में
अपने...आपसे लड़ते.

तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के
मन की गांठे खोलकर
कभी पढा है तुमने
उसके भीतर का खौलता इतिहास

पढा है कभी
उसकी चुप्पी की दहलीज पर बैठ
शब्दो की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को.

उसके अंदर वंशबीज बोते
क्या तुमने कभी महसूसा है
उसकी फैलती जड़ो को अपने भीतर.

क्या तुम जानते हो
एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण
बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री -दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा

अगर नहीं
तो फिर जानते क्या हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में......।

स्त्री लेखन में देह घाव की तरह टभकती है...

Posted By Geetashree On 4:34 AM 8 comments
गीताश्री
विमर्शात्मक लेखन में देह बोलती है क्योंकि स्त्री संबंधी सारे अपराधो कीआधार भूमि उसका प्राइम साइट स्त्री देह ही है। स्त्री लेखन में देह टमकतीहै बस घाव की तरह।
--अनामिका
आज जो आत्मकथाएं लिखी जा रही हैं उसमें स्त्री के दैहिक रुप का जश्नमनाया जा रहा है। वहां विमर्श नहीं है।
--मृदुला गर्ग
समाज में जब स्त्रीदेह और उसकी नैसर्गिक जरुरतो के साथ दोयम बरताव जारीहै। वहां अतृप्ति है, शोषण है, बलात्कार है, ब्लैकमेल है, तो क्यो ना लिखेंहिंदी की लेखिकाएं अपनी यौनिकता पर, यौन प्राथमिकताओ पर या फंतासियो पर।
--मनीषा कुलश्रेष्ठ
यौनिकता को खासतौर पर रखना लेखिकाओं का मकसद नहीं था। लिखते हुए पता भी नहीं चला होगा। ये स्वभाविक प्रक्रिया में लिखे गए आख्यान हैं। यौनिकताभरे दिमाग मर्दो के हैं। वे स्त्री की योग्यता नहीं देखते, देह को देखतेहैं।
--मैत्रेयी पुष्पा

मौजूदा दौर के स्त्री-विमर्श को ‘बेवफाई का विराट उत्सव’ बताने वाले मर्द मानसिकता के ऊपर इस वक्त पूरा स्त्री समुदाय बौखलाया हुआ है। इसके साथ ही साहित्य जगत में नई बहस छिड़ गई है। स्त्री लेखन में स्त्री देह की मौजूदगी को लेकर मर्द समाज चाहे जो सोचे लेकिन स्त्रियां उसे यौनिकता के प्रकटीकरण के रूप में देखती है।


हाल के दिनों में स्त्री विमर्श और लेखिकाओं की आत्मकथा को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। ज्यादातर पुरुष लेखकों का आरोप है कि हमारे यहां स्त्री विमर्श मुख्य रूप से शरीर केंद्रित है। वे मानते है कि आत्मकथाओं में सेक्स प्रसंग जबर्दस्ती ठूंसे और गढ़े गए हैं ताकि किताबों को चर्चा और पाठक दोनों मिल सके। यह लोग अपने तर्कों के समर्थन में जार्ज बर्नाड शॉ के एक प्रसिद्ध लेख का सहारा लेते है जिसमें उन्होंने आत्मकथाओं को झूठ का पुलिंदा बताया है।‘ऑटोबॉयोग्राफिज आर लाइज’ में उन्होंने कई तर्कों और प्रस्थापनाओं से ये साबित करने की कोशिश की है कि आत्मकथा झूठ से भरे होते हैं।यहां लड़ाई फिलहाल सच और झूठ की नहीं है।
लड़ाई स्त्री-विमर्श और आत्मकथाओं में यौनिकता के प्रकटीकरण का है। वरिष्ठï कवियत्री अनामिका इस मुद्दे पर लगभग ललकारती है, ‘कौन माई का लाल कहता है कि स्त्री आत्मकथाओं के यहां दैहिक दोहन का चित्रण पोर्नोग्राफिक है। घाव दिखाना क्या देह दिखाना है?’


जर्मनी की एक फिल्म है पैशन ऑफ लाइफ। पूरी फिल्म एक औरत के आवेग की कहानी है जो अपनी सेक्सुआलिटी की खोज में लगी है, पूरे आवेग के साथ। वह प्रेम और सेक्स को अलग रखती है। नायिका को प्रेम की तलाश नहीं है, वह अपनी कामनाओं की खोज में है। इस खोज में वह यूरोटिक पार्लर में जाकर हर तरह के प्रयोग कर डालती है। अंतत: उसका मोहभंग होता है। लेकिन वह मोहभंग की प्रक्रिया तक अपने प्रयोग और खोज जारी रखती है और जिसका उसे कोई अफसोस नहीं होता। यह फिल्म अपने अनूठे आख्यान की वजह से पोर्नग्राफी होते-होते बची और एक महान फिल्म में बदल गई।फिल्म देखते हुए दर्शक सेक्सुआलिटी की खोज पर सवाल नहीं खड़ा करते बल्कि एक स्त्री की यौनिक आजादी के रूप में देखते हैं। निर्देशक ने दर्शकों से फिल्म शुरू होने से पहले कहा, ‘यह फिल्म थोड़ी जटिल है। समझने में थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। एक गांठ खुल गई तो आप समझ जाएंगे...।’


यह बात हिंदी समाज के मर्दवादियों को कब समझ में आएगी। या तो उनकी समझ में कोई समस्या है जो यौनिकता के चित्रण में ‘महापाप’ देख रहा है या एक स्त्री को यौनिकता की आजादी भोगते-लिखते बर्दाश्त नहीं कर सकता। यह डरे हुए पुरुषों की जमात है जिसे यह डर है कि यौनिकता के इस विस्फोट में कभी भी उनकी धज्जियां उड़ सकती हैं। इससे पहले कि घाव फूटे, उसे टमकते हुए में ही दबा दो। वरिष्ठ साहित्यकार-पत्रकार निर्मला भुराडिय़ा ऐसी मानसिकता को फटकारते हुए एक दिलचस्प किस्सा सुनाती है-निर्देशिका अरुणा राजे से एक बार बात हो रही थी। यह तब की बात है जब उन्होंने फिल्म रिहाई बनाई थी।
अरुणा बोलीं, ‘लोग मेरी आलोचना कर रहे हैं, कहते हैं, क्या आप स्त्रियों के ‘सोने’ के अधिकार मांग रही है?
मैंने उन्हें कहा, सोने के अधिकार भी मांग रही हैं तो भी स्त्रियों को हक है अपनी बात कहने का। स्त्री मात्र भोग्या नहीं है, उसकी भी अपनी दैहिक आकांक्षाएं हैं। सारी वर्जनाएं स्त्रियों के लिए ही क्यों? जो पुरुष लेखन के लिए सही है, वही स्त्री लेखन के लिए भी है। दोनों के लिए अलग नियम थोड़े ही होंगे!’


कुछ ऐसी ही कहानी मृदुला गर्ग सुनाती हैं, ‘जब चितकोबरा में स्त्री पति से सहवास करते समय अनेक विषयों पर जैसे शरीर और मस्तिष्क के द्वैत पर सोच रही होती है, प्रेमी के बारे में नहीं। अगर उस वक्त प्रेमी के बारे सोचती तो लोगों को एतराज नहीं होता। वह मर्द मानसिकता के अनुरूप होता। हमारे बुद्धिजीवियों को एतराज इस बात पर था कि एक स्त्री-पुरुष पति को देह की तरह कैसे देख सकती है। अब तक वे स्त्रियों को देह की तरह देखने के आदि थे। एक स्त्री में इतनी हिम्मत कैसे हुई कि वो अपना मस्तिष्क और देह को पृथक रखे और पुरुष को देह की तरह देखे।’
मनीषा कुलश्रेष्ठ भी मृदुला गर्ग के चितकोबरा को एक मिसाल मानती है। वह कहती हैं, सेक्सुआलिटी की ईमानदार अभिव्यक्ति की मिसाल है चितकोबरा। जिसके लिए उन्हें पुलिस द्वारा मानसिक प्रताडऩा भी झेलनी पड़ी। मनीषा मर्दवादी बौखलाहट पर हमला बोलते हुए सवाल दागती है, ‘जब पेट की भूख के प्रकटीकरण से कोई फर्क नहीं तो उसी प्रकृति प्रदत्त यौनिकता को ही क्यों हौआ बना देते हैं लोग?’
वे जवाब भी तलाश लाती हैं, ‘आज का हमारा जो त्रिशंकु किस्म का पुरुष समुदाय है जो न लोक से जुड़ा है और न ही उदार और उन्मुक्त विचारधारा से, जो न इधर का है न उधर का। बस वही उखड़ा हुआ है। ऐसे कुंठित लोगों का एक बड़ा समुदाय है जो शोर मचाता है।’


अनामिका भी कुछ इसी सुर में कहती हैं, नई स्त्री का प्यार पा सकने लायक शिष्ट-सभ्य-शालीन ‘नया’ पुरुष दूर-दूर तक नजर नहीं आता।


‘नए पुरुष’ की गैरमौजूदगी के बावजूद हिंदी में ‘बोल्ड लेखन’ हो रहा है। इस पर भी विवाद और संदेह है। कुछ लोग यौनिकता पर और अधिक गंभीर लेखन की मांग करते है। कुछ लोग मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा को बचते बचाते लेखन का आरोप मढ़ा है। आलोचक मानते हैं कि इनकी आत्मकथा में खुलापन नहीं है, अपने आप से मुंह चुराने की कोशिश दिखाई पड़ती है।मैत्रेयी इनका जवाब देती है, ‘मैं मानती हूं कि मेरी दोनों आत्मकथा में ऐसा कुछ भी नहीं है लेकिन देखने वालों को इसमें भी यौनिकता दिखी।’


रमणिका गुप्ता की आत्मकथाओं के अंश जरूर बेहद विवादास्पद रहे जिनमें उन्होंने अपने जमाने के कई प्रसिद्ध हस्तियों के साथ अपने दैहिक संबंधों का खुलकर बखान किया है। इस बारे में रमणिका का तर्क है कि जब एक पुरुष कहता है कि उसने स्त्रियो को भोगने की सेंचुरी बनाई तो कुछ नही। स्त्री एक से भी जुड़े तो उसको कुलटा कहना शुरु। इसीलिए लेखन में यौनिकता दिखाना जरुरी है ताकि शोषण बंद हो जाए। कवियत्री किरण अग्रवाल भी इसी मानसिकता पर चोट करती हैं, जिस समाज में स्त्री को महज एक सेक्स आब्जेक्ट के रूप में देखा जाता तो उस समाज में किसी भी महिला लेखक की आत्मकथा उसकी यौनिकता की चर्चा के बिना कैसे लिखी जा सकती है। खुलकर लिखना चाहिए। इसका मकसद सनसनी फैलाना नहीं है बल्कि समाज के सामने उसका वो चेहरा दिखाना है जिससे जूझते हुए एक स्त्री आगे बढ़ती हैं।इन तमाम तर्को प्रतिवादो के मद्दे नजर जो बात सामने आती है वो है एक स्त्री की यौनिकता पर गंभीर विर्मश की आवश्यकता। रमणिका के अनुसार जिसे पुरुष समाज हल्की टिप्पणी करके हल्का बना रहा है।

वक्त का ज्वालामुखी और बर्फ जैसी औरतें

Posted By Geetashree On 5:06 AM 2 comments


गीताश्री

“ सेक्स वर्कर दूसरी औरतो से अलग होती है। इसके चार कारण हैं...हम अपनी मर्जी की मालिक होती हैं। हमें खाना बनाकर पति का इंतजार नहीं करना पड़ता। हमें उसके मैले कपड़े नहीं धोने पड़ते। हमें अपने बच्चों को अपने हिसाब से पालने के लिए आदमी की इजाजत नहीं लेनी पड़ती। हमें बच्चे पालने के लिए आदमी की जायदाद पर दावा नहीं करना पड़ता। ”
......नलिनी जमीला (एक सेक्सवर्कर की आत्मकथा में )
साथ रहने वाला एक आदमी पति बन जाता था और दूसरा भाई।
ये वो रिश्ते थे, जो बाजार बनाता था और बाजार ही देता था रिश्तों को नाम।
रिश्तों को नाम देने के बावजूद ऐसे रिश्तों को समझना मुश्किल है क्योंकि अबूझ रिश्तों की ये एक ऐसी कहानी है, जो किसी औरत के जिस्म से शुरु होकर औरत के अरमानों पर आकर खत्म हो जाती है।
लेकिन किसी के अरमान मिटे या सपने लुटे, इसकी परवाह बाजार कब करता है? केरल में भी हमने अरमानों की ऐसी अनगिनत चिताएं देखीं, जिसे किसी की बेचारगी और लाचारी हवा दे रही थी ।
केरल में सेक्स वर्करो की दुनिया के अनचीन्हे दर्द से साझा करते हुए मैंने देखा कि जो आदमी खुद को पति बता रहा है वो पति नहीं दलाल है और जो खुद को भाई बता रहा है वो ग्राहक ढूंढलानेवाला बिचौलिया. । और दोनों जिस्म के सौदे के बाद मिले पैसों से करते थे ऐश। लेकिन ये सब एक बंद दुनिया का चेहरा था, जिससे खुली दुनिया के लोग कोई मतलब नहीं रखना चाहते । तभी तो हमने पाया कि सेक्सवर्कर समाज से वैसे ही नफरत करती है जैसे समाज सेक्स वर्कर से।
कोई पति बनकर दलाली करेगा और कोई भाई बनकर ग्राहक लाएगा, शायद सामजिक ताने-बाने पर रिसर्च करनेवाले रिश्तों की इस नई परिभाषा को कुबुल न कर पाए, लेकिन सच था।
केरल के कोझीकोड में इन्हें रोपर्स के नाम से जाना जाता है। रोपर्स, रोप(रस्सी) शब्द से बना है। यानी दो किनारों को जोड़ने वाला, रस्सी की तरह जोड़ने वाला रोपड़,ये खुलासा केरल की मशहूर सेक्स वर्कर नलिनी जमाली ने भी अपनी आत्मकथा में किया है। उनकी आत्मकथा खूब बिकी है और हिंदी में भी अनुवाद होकर आई है। इसे पढ़ने के बाद केरल की सेक्सवर्कर के बारे में और करीब से जानने-समझने का मन हुआ।
मैं केरल की यात्रा पर गई थी तंबाकू पर शोध करने, लेकिन वहां मेरे एक एकिटविस्ट मित्र साजू से मैंने अपनी इच्छा जताई।
शाम तक उनके आफिस में दो महिलाएं हाजिर थीं। रमणी और सरोजनी। कोट्टायम के उनके दफ्तर में बैठी, थोड़ी सकुचाई, झिझकती हुई दो सांवली-काली रंगत वाली यौन कर्मियों और मेरे बीच भाषा का संकट था। वे ना तो अंग्रेजी बोल सकती थीं, ना हिंदी समझती थी। ना मैं उनकी भाषा। मगर वे इस बातके लिए तैयार होकर आई थी कि एक पत्रकार को इंटरव्यू देना है। साजू खुद इंटरप्रेटर बन गया।
स्त्री का दर्द पहली बार पुरुष के मुख से अनुवाद होकर स्त्री तक आ रहा था। पता नहीं पुरुष ने उसमें क्या जोड़ा, क्या घटाया...मगर उन दोनों की दैहिक भाषा ने मुझे समझा दिया, सब कुछ। रमणी थोड़ी कम उम्र की थी। वह खुल रही थी, साहसपूर्वक, वैसे ही जैसे उसने यौनकर्म की दहलीज पर पैर रखा था।
बोलते हुए वह उसके भीतर की खड़खड़ साजू ने नहीं, मैंने सुनी। कुछ था जो खुलता और बंद होता था। खौफ के साथ अपने बाहर फैलने की ललक को वह रोक नहीं पा रही थी। रमणी को दिल्ली देखना है। उसने देखा नहीं, सुना भर है। बातचीत के दौरान वह लगभग गिड़गिड़ाती है-“ क्या आप मेरे लिए टिकट भेजोगे। अपने पास रखोगे। लालकिला, कुतुब मीनार देखना है। सुना है...बहुत सुंदर और बड़ा शहर है...।” मैं भी वादा कर देती हूं पर अभी तक पूरा नहीं कर पाई हूं। शायद कभी कर पाऊं...उनसे संपर्क का जरिया भी तो नहीं कोई. हम कौन सी भाषा में बात करेंगे, फोन पर? वो बोल रही थीं और मुझे मुझे निदा फाजली की पंक्तियां याद आ रही थीं-
“ इनके अन्दर पक रहा है वक़्त का ज्वालामुखीकिन पहाड़ों को ढके हैं बर्फ़ जैसी औरतें । ”
रमणी, बोलती कम है,हंसती ज्यादा है। हंसी हंसी में कहती है, मैं पहले एक दिन में पांच छह ग्राहक निपटा देती थी। अब थकान होने लगी है। अब संख्या कोई मायने नहीं रखती...दो तीन निपटा ले,यही बहुत है। वह थोड़ी गंभीर होती है---ग्राहको की संख्या मायने नहीं रखती, उनकी संतुष्टि मायने रखती है। धंधे में उतरने का कोई अफसोस? रमणी ईमानदारी से स्वीकारती है, अफसोस तो है, मगर जिंदगी चुनौती की तरह है, उसका सामना कर रहे हैं। अब भाग नहीं सकते। देर हो चुकी। इसके आगे का रास्ता बंद है। क्या करें?रमणी का यह वक्तव्य किसी अनुपस्थित को संबोधित था। साजू मुझे बता रहे थे और वह शून्य में देख रही थी।
बात-चीत से पता चला कि रमणी कोट्टायम शहर के एक संभ्रांत मुहल्ले में रहती है। वहां धंधा करने मे समस्या ही समस्या। उसने एक रास्ता निकाल लिया। जंगल ही उसका रेडलाइट एरिया बन गया है। वह ग्राहकों को पास के जंगल में ले जाती है। घास के बिछौने होते हैं। मोबाइल हैं, ग्राहक फोन करते हैं फिर जंगल में जगह तय होती है। कुछ ग्राहक जंगल नहीं जाना चाहते, तब सरोजनी की बन आती है। वह अपने ग्राहक उसकी तरफ भेज देती है। सरोजनी का घर भी तंग गलियो में हैं मगर वह घर से धंधा करती है। थोड़ी उम्र ज्यादा है इसलिए लोग शक कम करते हैं। साथ में एक पतिनुमा जीव रहता है।
पति का जिक्र आया तो नलिनी याद आ गई। नलिनी ने एसे पतियो के बारे में साफ लिखा है कि मकान वगैरह किराए पर लेना हो तो ये लोग बड़े काम आते हैं। लेकिन कुल मिलाकर ये किसी सिरदर्द से कम नहीं हैं। सरोजनी का पति भी एसा ही है। सरोजनी ही उसका खर्च चलाती है। बदले में वह उसे सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का नाटक करता है। घर पर अक्सर ग्रहको का आना जाना देख कर कई बार पड़ोसी पूछ लेते हैं, सरोजनी का जवाब होता है-“ये लोग प्रोपर्टी डीलर हैं, मेरा प्लाट खरीदना चाहते हैं। देखने आते रहते हैं।“
सरोजनी बताती है-“ कई बार उसके पास युवा लड़को का ग्रुप आता है। वह पांच मिनट में उन्हें मुक्ति देकर भेज देती है। भीतर से उसे ग्लानी होती है कभी कभी, उनकी और अपनी उम्र देखकर। लेकिन ग्राहक तो ग्राहक है, चाहे किसी भी वक्त या किसी भी उम्र का हो..। “ लेकिन पैसे की जरूरत ऐसी सोच पर लगाम लगा देती है ।
रमणी भी कहती है, पैसा बड़ी चीज है। उन्हें कैसे लौटा दें। मैंने कहा, छोड़ क्यो नहीं देती ये धंधा...दोनों एक साथ बोल पड़ी, इतना पैसा किस काम में मिलेगा। अब हमें कौन काम देगा। हम किसी काम के लायक बचे ही नहीं...अब तो आदत सी पड़ गई है...। अब छोड़ भी दे तो लोग हमें चैन से नहीं जीने देंगे।
रमणी अब बातचीत में सहज हो चुकी है और उसे ये स्वीकारने में झिझक नहीं होती कि इस पेशे में भी वो कभी-कभार आनंद ढूंढ लेती है।
कैसे,मैं चकित होती हूं... ।
वह स्वीकार करती है कि एक स्थाई ग्राहक से वह भी आनंद लेती है। यहां पैसा गौण है। उससे मोल-भाव नहीं करती। रमणी के पास किस्से बहुत है...। एक बार पैसे वाला अधेड़ ग्राहक आया, कहा—“मैं अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता हूं, मगर मैं जिस उत्तेजना की तलाश में हूं, वहां नहीं है। चलो, सेक्स में ‘फन’ करते हैं...।“ लेकिन रमणी अच्छी तरह जानती है कि दूसरों को भले ही उसके जिस्म में ‘फन’ की तलाश हो, लेकिन वो खुद अपने पति के मर जाने और कंगाल हो जाने के बाद यातना के जिस रास्ते पर चल रही है,वो रास्ता
कहां खत्म होगा। न घर बचा न कोई जमीन का टुकड़ा, जिसे वह अपना कह सके। रिश्तेदारो ने शरण देने से मना कर दिया। कम पढी लिखी थी, सो नौकरी ना मिली। एक शाम उसने खुद को पीकअप प्वाइंट पर पाया। जिस्म की कमाई से पहले बेटियो को पाला, अब खुद को पाल रही है। इसी नरक में अपने लिए सुख का एकाध कतरा भी तलाश लेती है। यह सब बताते हुए उसकी आंखों में कहीं भी संकोच या शरम नहीं..है तो बस थोड़ी शिकायत, थोड़ा धिक्कार।
दोनों से बातचीत करते हुए ही हमने जाना कि केरल में कहीं भी कोई रेडलाइट एरिया नहीं है। इसीलिए वहां सेक्सवर्कर पूरे समाज में घुली मिली है। उन्हें अलग से चिनिहत नहीं किया जा सकता। इसकी दिक्कते भी हैं। बताते हैं कि केरल में 10,000 स्ट्रीट बेस्ड सेक्सवर्कर हैं। इनमें हिजड़े भी शामिल हैं। इसके बावजूद सोनागाछी की एकता उनके लिए रोल माडल की तरह है। वहां एक अनौपचारिक रुप से संगठन बना है, सेक्सवर्कर फोरम केरला(एस डब्लू एफ के) जो इनके हितो का ध्यान रखने लगा है। गाहे-बगाहे आंदोलनों में शिरकत भी करने लगा है।मगर एसडब्लूएफके सोनागाछी के दुर्वार महिला समन्य समिति की तरह ताकतवर नहीं है। रमणी,सरोजनी उसकी सदस्य बन चुकी हैं।
सरोजनी की दो बेटियां हैं, चेन्नई में रहती हैं। वे हिंदी नहीं जानती, किताब नहीं पढ सकती, तो क्या हुआ, फोटो तो पहचान सकती है। रमणी और सरोजनी ने फोटो तो खिचवाए लेकिन न छपवाने का आग्रह किया। बेटियां हालांकि अब जान गई हैं कि मां क्या काम करती हैं। पहले तो बहुत विरोध हुआ अब नियति को कुबुल कर चुकी है । साथ कुछ वक्त बिताने के बाद जब वो जाने की अनुमति मांग रहीं थीं
तो वहां मौजूद आंखें उन्हें संशय से घूर रही थीं. तभी मुझे निशांत की कविता(वर्त्तमान संदर्भ में छपी हुई) की पंक्तियां याद आने लगी....
इन औरतो को,
गुजरना पड़ता है एक लंबी सामाजिक प्रक्रिया से
तय करना पड़ती है एक लंबी दूरी
झेलनी पड़ती हैं गर्म सलाखों की पैनी निगाहें
फाड़ने पड़ते हैं सपनो को
रद्दी कागजो की तरह
चलाना पड़ता है अपने को खोटे सिक्कों की तरह
एक दूकान से दूसरे दूकान तक.

वो चली गईं, लेकिन दोनों मेरे सामने एसे खुली जैसे अंधड़ में जंग लगे दरवाजे-खिड़कियो की सांकलें भरभरा कर खुल जाती है। उन्होंने अपने दर्द को कही से भी अतिरंजित नही किया...बल्कि भोगे हुए को ज्यों का त्यों रख दिया। शायद उन्हें लग रहा था कि इस जलालत से भरी दुनिया में कोई है, जो उसकी व्यथा सहानूभूति पूर्वक सुन रहा है। उसके भीतर मुझे लेकर प्रश्नाकुलता थी। भाषाई संकट के कारण पूछ नहीं पा रही थी,शायद साजू की उपस्थिति भी संकोच पैदा कर रही थी। फिर भी साजू के बावजूद उन्हें जो कुछ कहना था साफ-साफ कह गई। सुना गई अपनी कहानी। उस कहानी में गुड गर्ल बनने का सिंड्रोम नहीं था । ये रास्ता उन्होंने खुद चुना था। शिकायतें कम थीं और लहजे में.मुक्ति की चाह भी खत्म थी। उनके जाने के बाद भी रमणी की खिलखिलाहट मेरे सामने गूंज रही थी और दर्द की दरिया में भींगने के बाद पनपे अवसाद को कम कर रही थी । सरोजनी ने भी अपनी चालबाजियो को चटखारे लेकर सुनाया था, और उसे सुनाने में मजा भी आ रहा था, लेकिन क्या वो सचमुच चालबाज है ।

उनके जाने के बाद मैं सोच रही थी और बगल में बैठा साजू शरमा रहा था ।

जा बिट्टो..जा..भईया को भेज...

Posted By Geetashree On 3:07 AM 2 comments

लाडो पे लाड़ ना आए जहां
गीताश्री
...एक ठाकुर परिवार में अनेक नवजात कन्याओं की मौत हुई। अब उसकी केवल एक बेटी है। एक बेटी को मां ने ही बेरहमी से मार डाला। नवजात को मुंह में तंबाकू भरकर नाले में फेंक दिया गया। किसी ग्रामीण ने उसे बचा लिया। और उसे ठाकुर के घर ले आया। ठाकुर ने उसे स्वीकार नहीं किया और चार पांच घंटे बाद वह चल बसी। (मुरैना, देहात)

...मोती बुआ नामक एक दाई नवजात कन्याओं की हत्या के काम में माहिर थी। वह पीढ़ी (एक तरह का छोटा स्टूल) की एक टांग नवजात की गर्दन पर रखकर यह कहते हुए बैठ जाती है, ‘जा बिट्टो जा, अपने भैया को भेज।’

...युवा लडक़ी एक बेल या लता की तरह होती है। देखते देखते वह बड़ी होकर उपर चढ जाती है। सोचने का भी वक्त नहीं देती। बालपन से ही उसपर लोगो की नजर पडऩे लगती है। बेटी पैदा करने की जिम्मेदारी भी बड़ी विकट है। अगर बेटा हो तो कोई फिक्र नहीं।
देश के प्रमुख पांच राज्यो, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में एक्शन एड और इंटरनेशनल डेवलपमेंट रिसर्च सेंटर (कनाडा) द्वारा कराए गए एक अध्ययन से अनेक चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
यह अध्ययन बालिकाओं और औरतो के विरुध पक्षपात की बारीकियों को समझने और व्यापक पड़ताल करने के उद्देश्य से पांच जिलों में कराया गया। एक्शनएड के निदेशक (इंडिया) बॉब मैथ्यु ने जानकारी दी कि यह अध्ययन गरीबी और पितृसत्ता के खिलाफ अभियान में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यूं तो हरेक राज्य में बेटियों का जीना मुहाल है लेकिन कुछ राज्यो के अंदरुनी हालात से वहां के सरकारी दावो की कलई खुल जाती है।

हरियाणा कन्या भ्रण हत्या के लिए बदनाम भले हो लेकिन सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में और राजस्थान के धौलपुर जिले में बाल मृत्यु दरें बहुत ऊंची हैं और मरने वालो में बालिकाएं ज्यादा हैं। भाजपा शासित मध्य प्रदेश में कन्याओं के लिए लाडली जैसी अनेक कल्याणकारी योजनाएं प्रभावी हैं। ऐसे में वहां के आंकड़े भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं। अध्ययन के मुताबिक मुरैना में 25 से 26 वर्ष की आयु वर्ग की मांओं में बाल जन्म औसत 2.85 है और सरवाइवल दर 2.56 हैं। यानी 200 परिवारों में लगभग 90 बच्चे मौत के मुंह में समा जाते हैं।

धौलपुर की स्थिति और भी बुरी है। वहां 200 परिवारो में 95 बच्चो की मुत्यु हा जाती है। गौर करने वाली बात ये हैं कि किस हद तक बालिकाएं बाल मरणशीलता का शिकार होती हैं। मुरैना में जन्म से पहले ही बालिका विरोधी रवैया उजागर हो जाता है। धीरे धीरे मामला संगीन होता चला जाता है। बालिका-शिशु हत्या की पुरानी प्रथा वाले इन जिलों में देहात के लोग भी टेकनोलॉजी का इस्तेमाल करने लगे हैं। वहां के कस्बाई इलाके में अनेक ऐसे केंद्र हैं जहां लिंग पहचान और लिंग आधारित गर्भपात का प्रबंध है। वहां सिर्फ बेटियो वाले परिवार कम ही मिलते हैं।

मुरैना में एसे परिवार मात्र 3 प्रतिशत ही हैं। ये अनचाही बेटियां भी मजबूरन बेटे के इंतजार में पैदा हो जाती हैं। जबकि ज्यादा बेटे वाले परिवार ज्यादा नजर आते हैं।

सेंटर फॉर वीमेनस डेवलपमेंट स्टडीज की निदेशक मैरी ई. जॉन बताती हैं कि अध्ययन में और कई चौंकाने वाली सच्चाईयां उजागर हुई हैं। मसलन लिंग जांच कराने में महिलाएं बढ चढ कर हिस्सा लेती हैं। ज्यादातर वे अपनी मर्जी से कन्या भ्रूण जांच कराती हैं और बेटे की चाह में अपनी कोख से अपनी लाडो का सफाया करवा देती हैं।

उदाहरण के तौर पर धौलपुर में नाई जाति की शिक्षित अंजलि को एक बेटा व बेटी है। इसकी इच्छा है कि उसका बेटा सुशिक्षित हो और अच्छा आदमी बनें। एक और बेटे की चाहत में उसने नसबंदी नहीं कराई। बेटी के जन्म के बाद उसने दो कन्या भ्रूणों का गर्भपात कराया। ये उस औरत का फैसला था कि उसे बेटा चाहिए या बेटी। हद तो यह है कि मुरैना और धौलपुर में बच्चे पैदा करने की जरुरत के निर्देश देने में सास ससुर और मां बाप भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। ठाकुरो, गूजरो और जाटवो में यह पाया गया कि बच्चों के जन्म संबंधी मामले में पुरुषों की आवाज ज्यादा ताकतवर होती है। महिलाओं को बार बार गर्भधारण करना पड़ता है। ऐसा न करने की उन्हें इजाजत नहीं होती। जन्म देने को वहां पुरुषत्व के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। उन्हें कईबार यह निर्देश दिया जाता है कि उसे किस लिंग का बच्चा पैदा करना है। जो महिलाएं गर्भ गिराना चाहती हैं, उनके चरित्र पर लांछन लगाया जाता है कि बच्चे का बाप कोई और है।

धौलपुर का एक गूजर पति स्पष्ट रुप से बताता है कि अगर मेरी पत्नी कहती है कि वह एक बेटे और बेटी से संतुष्ट है, चाहे उसका शरीर और बच्चे जनने लायक मजबूत नहीं है, तो भी उसे जितने मैं चाहूं उतनी संख्या में बच्चे पैदा करने होंगे। भले ही इस बात को लेकर झगड़े हो जाएं । इन परिस्थितियो में औरत की पिटाई भी करनी पड़ सकती है।

मैरी सरकार की योजनाओं के बारे में दो टूक कहती है कि कहीं भी कोई योजना ना लागू की गई है ना ही लोगो की इसकी भनक है। खराब लिंग अनुपातो वाले इलाके से ये योजनाएं कोसो दूर दिखीं। वे चाहती हैं कि सरकार अपनी घोषणा के मुताबिक कम लिंग अनुपात वाले इलाके में गर्भवती महिलाओं की मॉनीटरिंग शीघ्र शुरु करवा दे ताकि चाहे भी तो कोई गर्भपात न करा सके। समुचित संख्या में बेटियां तभी पैदा हो सकेंगी।

संतानविहीनता नहीं, संतानमुक्तता

Posted By Geetashree On 7:54 PM 5 comments

ब्रसेल्स(बेल्जियम) से लौटकर गीताश्री
चॉकलेट के स्वाद, रहस्यमय सन्नाटे और ऐंद्रिक ठंडेपन में डूबे इस देश में संतान न होना उनके लिए अभाव नहीं, एक किस्म की आजादी और जिम्मेदारियों से मुक्ति है। वे खुद को संतानविहीन नहीं संतानमुक्ति समझती हैं। ऐसी ही हैं बेल्जियम की स्त्रियां। सरकार चिंतित हों तो होती रहे। घरवाले उत्तराधिकारी मांगें तो मांगते रहे। जनसंख्या घटती है तो घटे, उन्हें परवाह नहीं क्योंकि बच्चा न पैदा करना उनकी निजी स्वतंत्रता से जुड़ा है।उन्हें अपने कॅरिअर पर ध्यान देना है इसलिए अक्सर मातृत्व और करियर में से किसी एक को चुनना है। इनमें करियर का पलड़ा ज्यादा भारी है।

इस परिस्थिति को बदला नहीं जा सकता। दुनिया के बाकी हिस्सों की तरह बच्चों का लालन पालन सिर्फ महिला की समस्या है। कोई समाज इस बोझ को साझा नहीं करता। क्रेच का अभाव है इसलिए बच्चे को जन्म देते ही इनके करियर पर विराम चिन्ह लग जाता है।राजकोषीय अध्ययन संस्थान के शोध के अनुसार बच्चे पैदा करने से पहले महिला कर्मियों के लिए प्रति घंटा औसत वेतन पुरुष के औसत का 91 प्रतिशत होता है। यह नौकरियों और बच्चों की देखभाल के बीच बाजीगरी कर रही कामकाजी माओं के लिए 67 प्रतिशत तक गिर जाता है। और यह कभी वापस पहले के स्तर पर नहीं आ पाता-तब भी जब बच्चे बड़े होकर स्कूल जाने लगते हैं।

इसे मीडिया में खासतौर से मम्मी मार्ग की उपाधि दी जाती है-एक ऐसा रास्ता जो कम वेतन और कम संभावनाओं की तरफ ले जाता है। कुछ साल पहले तक उन महिलाओं को बच्चा न होना खलता था। अब 30 वर्ष की उम्र के दौर वाली बहुत सी महिलाएं संतान पैदा करने और उनकी परवरिश करने को इस रूप में देखने लगी हैं कि इससे उनकी आजादी छिनती है, कॅरिअर की संभावनाएं कम होती हैं और वित्तीय जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। यह हालात यूरोप के बहुत से देशों में हैं जहां लगभग 10 प्रतिशत महिलाएं ऐसी होती हैं जो 45 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते बेऔलाद हो जाती हैं।

कुछ तो देर से शादी भी करती हैं।इस तथ्य की पुष्टि ब्रसेल्स में रहने वाली पामेला मोरनेयर करती हैं, ‘इनमें वे महिलाएं भी शामिल होती हैं जो अपनी मर्जी से बेऔलाद रहना पसंद करती हैं- और जो बच्चे पैदा करना टालती हैं या बच्चे पैदा करने में समस्याओं का सामना करती हैं या कुछ ऐसी भी हैं जो मां नहीं बन सकतीं।’पामेला के अनुसार ऐसी महिलाएं या उनका परिवार जरुरत पडऩे पर बच्चे गोद लेना पसंद करते हैं। इसके लिए सबसे बेहतर जमीन है भारत की। भारत में बढती हुई जनसंख्या सबसे बड़ी समस्या है। इन पर रोकथाम के लिए सरकार क्या क्या उपाय नहीं कर रही है।

एक जानकारी के मुताबिक बेल्जियम में प्रति वर्ष 6-7 हजार बच्चे भारत से गोद लिए जा रहे हैं। जब वे बच्चे बड़े होते हैं तो अपनी जड़ें खोजने भारत आते हैं। पहचान के संक्रमण से गुजरने वाले इन बच्चों की पीड़ा कुछ महीने पहले भारत में देखी गई जब बेल्जियम से आई दो लड़कियां हरियाणा में अपने मां-बाप की तलाश करती पाई गईं।

ऐसे पता नहीं कितने युवा भारत आते हैं असली मां-बाप को ढूंढऩे। भारत से गोद लेने की यह प्रक्रिया लंबे समय से चली आ रही है। इधर भारत सरकार ने थोड़ी सख्ती कर दी है तो बेल्जियम वालों ने रूस, बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया जैसे आर्थिक रूप से कमजोर देशों की तरफ देखना शुरू कर दिया है।यहां की जनसंख्या घटने की एक वजह समलैंगिकता भी है। लगातार इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। जब से ऐसे संबंधों को कानूनी मान्यता मिली है, ऐसे लोग खुलकर अपने संबंधों को जाहिर करने लगे हैं। आदमी आदमी साथ रहते हैं और बच्चा पाल लेते हैं।

इस वजह से कई घर टूट रहे हैं, तलाक की दर बढ़ रही है। ऊपर ऊपर शांति पसरी हुई दिखाई देती है पर अंदर अंदर गहरा तनाव है। वहां रहने वाले एक भारतीय ने बताया कि यहां मां-बाप छुटपन में ही बच्चों को सिखा देते हैं कि पहले लडक़ी के साथ 6 महीने रहो फिर शादी करो। 18 साल का होते-होते लडक़ा घर से बाहर हो जाता है। परिवार का महत्व वे समझे तो कैसे?

यहां कुछेक प्रमुख चौराहो पर विचित्र वेशभूषा में विद्रोही युवक-युवतियों की फौज घूमती रहती है। इसे वे अपने समाज के खिलाफ अपना विरोध प्रदर्शन मानते हैं। एक स्थानीय व्यक्ति ने इसे एक किस्म का युवा आंदोलन करार देते हुए बताया कि इनकी अपने अभिभावको से नहीं पटती। इसीलिए जीने का ऐसा तरीका अपना लिया है।

फ्रांस रेडियो में कार्यरत अन्नाबेले मोपास कहती हैं, ‘अमेरिकन संस्कृति और यूरोपियन संस्कृति एक जैसे ही हैं। इसीलिए यहां पारिवार का महत्व अपेक्षाकृत कम हैं।’एक शोध के मुताबिक यहां पांच में से एक स्त्री घरेलू हिंसा का शिकार है। यह बात भले हम भारतीयों के गले उतारना मुश्किल नजर आता है कि महिलाएं इन्हीं सारी वजहों से अब यह विकल्प चुनने लगी हैं कि वे बच्चे पैदा नहीं करना चाहतीं। फ्रांसीसी महिलाएं भी भारतीय महिलाओं की तरह बिना बच्चे के जिंदगी की कल्पना नहीं कर सकतीं। हालांकि भारत में भी बड़े शहरों में संतानमुक्त स्त्रियों की संख्या बढ़ रही है।

ब्रसेल्स की 33 वर्षीय शादीशुदा महिला ग्रेसी कहती हैं, ‘मैंने बच्चे नहीं पैदा करने का फैसला कॅरिअर की वजह से नहीं किया बल्कि यह एक जीवनशैली का मुद्दा है। मैं अपने जीवन का आनंद अपनी तरह से उठाना चाहती हूं।’ लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस में समाज विज्ञानी डॉ. कैथरीन हकीम ने इस बारे में एक दिलचस्प अध्ययन किया है। वह कहती हैं-इसमें जरा भी शक नहीं कि ऐसे लोगों की संख्या बढ रही है जो संतान नहीं चाहते। बहुत से देशों में ऐसे लोगों की संख्या बढ कर 20 प्रतिशत हो जाएगी जो बेऔलाद रहना पसंद करते हैं और। जर्मनी में ऐसे लोगों की संख्या पहले ही 30 प्रतिशत हो चुकी है। क्योंकि इसे एक ऐसा देश माना जाता है जहां की ज्यादतर नीतियां पारिवारिक जीवन के लिए सहयोगी नहीं हैं।

प्राइवेट फर्म में काम करने वाली मरिया कहती हैं, ‘मैंने 25 साल की उम्र में नसबंदी करा ली थी और बच्चे पैदा नहीं करने का फैसला करके मुझे अफसोस नहीं है।’ कैथरीन ऐसी ही महिलाओं की तरफ संकेत करती हुई कहती हैं-अब लोगों ने यह सोचना शुरु कर दिया है कि संतानविहीनता कोई अभाव नहीं, बल्कि परिवर्तित जीवन शैली का एक नमूना है।यूरोप में भी अब अमेरिका की तरह ऐसे गुट बनने लगे हैं जो संतानविहीन होने के समर्थन में अपनी बात रखते हैं।

ब्रिटेन में बाकायदा एक संतानमुक्त संगठन है-किडिंग एसाइड। इस तरह के संगठनों को इस बात की बेहद चिंता होती है कि प्रवासी लोग इतने बच्चे पैदा क्यों कर रहे हैं। बेल्जियम सरकार प्रवासी तुर्की और प्रवासी भारतीयों के बच्चों की बढ़ती संख्या पर चिंतित दिखाई देती हैं। तुर्की के लोग बच्चे पैदा करने में अव्वल हैं। ब्रसेल्स से सटे उपनगर एन्टवर्प में लगभग 400 गुजराती परिवार रहते हैं जिनका मूल व्यवसाय हीरे का व्यापार है। इनके परिवारों को संतान के मामले में यूरोप की हवा नहीं लगी है।इधर जनसंख्या की घटती दर से बेल्जियम समेत अन्य कई देश जैसे जापान और आस्ट्रेलिया भी चिंतित है। जनसंख्या को संतुलित करने के लिए समृद्ध देशों की सरकारों को काफी मशक्ïकत करनी पड़ रही है। जापान सरकार ने अपनी जनसंख्या नीति में आमूलचूल परिवर्तन कर लोक लुभावन घोषणाएं कर दीं ताकि लोग अधिक से अधिक बच्चे पैदा कर सकें। आस्ट्रेलिया में शिशु जन्म दर बढ़ाने पर सरकार द्वारा बोनस दिए जाने की योजना के सकारात्मक परिणाम नजर आए हैं।

वहां जब से ‘एक बच्चा मम्मी का, एक बच्चा डैड का और एक बच्चा देश का’ जैसा नारा शुरू किया है, तब से लोगों में बच्चा पैदा करने के प्रति उत्साह बना है।

बेल्जियम में भी सरकार संतान वाले परिवारों को बहुत सारी सुविधाएं देती हैं। संतानमुक्त लोग इस तरह सरकारी सुविधाओं का बंटवारा सही नहीं मानते हैं।

लेकिन क्रेच(डे केयर सेंटर) की मांग को लेकर महिलाओं की जंग जारी है।

बेवफाई विशेषांक-एक घिनौवनी मानसिकता का परिचायक

Posted By Geetashree On 3:34 AM 1 comments

गीतांजलिश्री
सबसे पहले मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि कालिया और राय की बर्खास्तगी के कागज पर हस्ताक्षर नहीं दे रही हूं। मगर इस मुद्दे पर सारी औरत विरोधी नजर और मानसिकता पर अपना प्रोटेस्ट दर्ज कर रही हूं।
जिस तरह के उल-जलूल शीर्षक के सहारे नए ज्ञानोदय को लोकप्रियता दिलाए जाने का प्रयास किया जाता रहा है। और जिस छद्म भाषा में ये निंदनीय साक्षात्कार दिया गया है, दोनों उसी गहरे पैठी पुरुष मानसिकता के प्रतिमान हैं जो सदियों से चली आ रही है। न जाने दंभ में या की बेवकूफी में, ये बाते कही गई, मगर इससे फर्क नहीं पड़ता। बल्कि इरादा क्या था या है उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि जब तक आपकी मनसिकता नहीं बदलेगी और औरत के प्रति ‘नजर’ वही पुरानी चलेगी, तब तक आप उसके पक्ष में हों या विपक्ष में, आपकी भाषा यही रहेगी। क्योंकि आपके पास कोई और भाषा है ही नहीं। मजाक, गंभीर विवाद, गाली, तारीफ, सबके लिए शब्द-संपदा एक होगी। भद्दे शब्द, बेहूदा शैली, फूहड़ अंदाज।
इसमें नया कुछ नहीं है। और बोल्ड तो सिरे से ही नहीं। यह वही भाषा है। वही रस-प्रसंग जो कबसे पुरुष इस्तेमाल कर रहे हैं।
(हिंदी अकादमी अश्लील क्या होता है का सबक यहां पढ़ें।यह है अश्लील, न की हमारे कृष्ण बलदेव वैद्य) मुद्दा यही है - कि जेंडर सेंसटिविटी और जेंडर इक्विलिटी का अहसास पुरजोर नारीबाजी और रेडिकल फैमिनिस्ट वक्तव्यों के बावजूद आप की चेतना को अछूता छोड़ सकता है।
नजर वही है, पुरुष-प्रधान, और पैमाना वही है औरत को आंकने का, तो आप पक्ष में हों, विपक्ष में, दोनों सूरत में, यही साक्षात्कार देगा, यही शीर्षक चुनेगा, यही बयानबाजी होगी, यही बवाल उठेंगे।
अफसोस यह की ये नजर और मानसिकता इस कदर फैली हुई है कि जब सफाई अभियान चलाने की बात है, तो कतार-दर-कतार उसी किस्म के लोग नजर आते हैं जिन्हें बर्खास्त करा देना चाहिए। किस-किस को बर्खास्त करना चाहिए? बर्खास्तगी का कायदा क्या होना चाहिए? मैं कम से कम, इसको लेकर आश्वस्त नहीं हूं।
दोनों शख्स अपनी गलती मान के, जिस ओहदे पर आसिन हैं वहां से हट जाएं तो कुछ इज्जत पाएंगे? या फिर माफी मांग कर विनम्रता से कुछ सही और संवेदनशील करें? शायद यह मौका तो उन्हें मिलना चाहिए? (यह भी न भूलें की विभूति ने किसी और क्षेत्र में, संप्रदायों और जातियों के बीच, सराहनीय और हिम्मती काम किया है।)
यह भी हमारी जिम्मेदारी है कि इस मुद्दे से इतर कोई राजनीति यहां शामिल न हो। मैं गलत हो सकती हूं पर यह सारे सवाल मुझे जरूरी लग रहे हैं।
बर्खास्तगी की मांग करने वालों में यह समझ पाने का विवेक होना चाहिए, कि इस मांग से न जुडऩा उस गंदगी की तरफ होना कतई नहीं है, जिसका सिर्फ विरोध ही हो सकता है, और मैं कर रही हूं।
न केवल एक साक्षात्कार, बल्कि बेवफाई का पूरा तस्व्वुर - बेवफाई को एलानिया प्रेम से अलग कर प्रेम विशेषांक के बाद बेवफाई विशेषांक निकालने का सारा आयोजन-- एक घिनौनी मानसिकता दर्शाता है।

सड़ांध मार रहे विभूति के विचारो पर थू थू..

Posted By Geetashree On 3:25 AM 1 comments

मनीषा
‘लेखिकाओं को छिनाल’ बताकर विभूतिनारायण ने अपने सारे किये-कराये पर खुद ही तेजाब डाल दिया। क्या पता ये बैंक ऑफ-द-माइंड पड़े सड़ांध मार रहे उनके घिनौने विचार हों या अपनी गुस्ताखियों का पुलिंदा खुलने से भयभीत बचाव में की गई बयानबाजी। मैं राय से यह जरूर जानना चाहूंगी कि अगर यही ‘टर्म’ पुरुष के लिए में इस्तेमाल करना चाहूं तो कैसे और क्या होगा?यह घटिया शब्द किसी सभ्य व्यक्ति की जुबान पर तब भी नहीं आ सकता, जब वह क्रोधित हो या बदले की भावना से किसी ‘खास’ को गरिया रहा हो। इस तरह की तमाम स्त्रियोचित गालियां पुरुषों की कुंठाओं का प्रतिफल हैं, जिनका इस्तेमाल वे शेखी बघारने के लिए कितना ही करते फिरें पर सच्चाई यही है कि ढलान पर जाती मर्दानगी और शिथिलता उनके दिमाग को इस कदर कब्जिया लेती है कि सोचने-समझने की क्षमता ही वे खो बैठते हैं।
औरतों के जननांगों पर अपना निशाना साधने वालों की कूवत पर अब तक स्त्रियों ने प्रश्नचिन्ह नहीं लगाए, इसीलिए मूंछों पर ताव देकर ये अनर्गल प्रलाप सार्वजनिक रूप से कर पा रहे हैं। चरित्र-प्रमाण-पत्र बांटने को लालायित रहने वाले मर्दों का दिमाग ही नहीं खराब है, इनमें अपनी कारस्थानियों का ठीकरा औरतों के सिर फोडऩे की आदत भी जबर्दस्त है। काफी समय बेमजा काटने के बाद आखिर हिंदी वालों ने विभूति की जबान से फिसले विशेषण को स्यापा है। यह कहते हुए मुझको जरा भी संकोच नहीं हो रहा कि स्त्री हर हर एंगेल से शोषण करने वाले उनके विरोधी भी अब एक हो चले हैं।
राय के यह कहने पर कि हमारे यहां जो स्त्री विमर्श हुआ है, वह मुख्य रूप से शरीर केंद्रित है... मैं तो हमेशा से पूछती आई हूं कि स्त्री विमर्श को देह से कैसे मुक्त करेंगे, इसका कोई नुस्खा है तो बताएं। यह संकीर्ण और बीमार मानसिकता है, जो औरत की देह का तो बढ़-चढ़ कर इस्तेमाल करने में कोई संकोच नहीं करती। लेकिन जब वही स्त्री मुक्ति की आवाज उठाती है तो उसको जलील करने, नीचे ढकेलने और कमजोर बनाने में कोई कोताही नहीं बरती जाती। औरत यदि शरीर ही छोड़ दे तो उसके पास बचता ही क्या है, वंशबेल पर पुरुषों का कब्जा, कुलनाम पर पुरुषों का कब्जा, घर/ परिवार की मुखियागिरी पर पुरुषों का कब्जा, कोख और चरित्र पर पुरुषों की बपौती। फिर बचा क्या है?
यह देह ही है, जिस पर अतिक्रमण करने को आमादा पुरुष तरह-तरह के स्वांग रचाता है। यह औरत की देह ही है, जो उस पुरुष को कोख में पोषती है, जो उसकी ‘शुचिता’ के प्रमाण-पत्र देता फिरता है। स्त्री सिर्फ देह है, मान्यवर। जिसके बिना ना तो आपका काम चल सकता है, ना ही हम औरतों का। नख से शिख समूची औरत को उसकी संपूर्णता के साथ जीने का अधिकार चाहिए। यह देह ही है, जिसके पीछे फिरता पुरुष दिमागी दीवालियेपन की स्थिति में पहुंच जाता है। ज्यादा दर्शन बघारने की जरूरत इसलिए भी नहीं है कि इस वाहियात जवाब में कही गई सारी बातें/ सारे तर्क स्त्री की देह को लेकर की हैं। जब आपका विचार ही देह मुक्त नहीं हो पा रहा तो हम अपनी देह (का विचार) त्यागने की बात सोच भी कैसे सकते हैं। आगे वे कहते हैं - यह भी कह सकते है कि यह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सवकी तरह है। ‘बेवफाई’ पर भी क्या मर्दों का आधिकारिक जोर है। ‘वफा’ बात पुरुषों की जुबान पर वैसे भी शोभती नहीं। स्त्री विमर्श तो अभी अपने यहां शैशव में ही है। खुलकर लिखने की बात तो दूर, अभी तमाम पुरुषों के साये में पलने को मजबूर लेखिकाओं को ‘स्त्रीवाद’ शब्द ही डरावना लगता है।
स्त्रीविमर्श के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे शिकारी स्त्रियों की देह को लेकर लार टपकाऊ बने फिर रहे हैं। इक्का-दुक्का पत्रकारों की हिम्मत और लेखिकाओं द्वारा किये जा रहे स्त्री विमर्श को उनके जैसे किसी पुरुष की छत्रछाया नहीं चाहिए, यह उनके लिए ही काफी है, जो अपनी नायिकाओं के भरोसे एकाध सीन रचने की कोशिश करके खुश हैं। रही बातें बिस्तरों की, तो क्या बिस्तरी उन्माद पर केवल पुरुषों का ही एकाधिकार है, क्या उनकी लतरानियों को रचने का साहस करने वाली स्त्री स्यापा करती ही उनको भाती है। यह याद रखना होगा कि आपसी सहमति से बने किसी के रिश्तों पर राय का प्रलाप, ‘अंगूर खट्टïे हैं’ जैसी लोमड़ी का रोदना नहीं लगता क्या। जिन लेखिकाओं की होड़ लगी है उनमें से जो प्रतिष् िठत पुरुषों की गोद में बैठकर वैचारिक वमन करती हैं, वे इनके चंगुल में नहीं आई होंगी, यह भी स्वीकारते चलना था इनको। अपनी सफलताओं का सेहरा जब तक पौरुषेय दंभ के हाथों बंधवाते रहेंगे हम, तभी तक इनके बीमार मगज हमें ‘साबित’ करने की चेतावनियां देने का साहस कर पायेंगे
...दरअसल स्त्री मुक्ति के बड़े मुद्दे पीछे चले गये हैं... माफ करें, पर पुरुष तो कम से कम ऐसी बातें बोलने का मंूह की नहीं रखते, जल्लाद की जुबान से बकरे की खैरीयत जमती जो नहीं। आप इस तरह के वाहियात विशेषणों से शोभना बंद कर दीजिए, हमको मुक्ति खुद-ब-खुद मिल जाएगी। मुक्ति कोइ अमर फल नहीं है, जिसको खोज कर हमें खाना है। मुक्ति इसी खौफनाक दरिंदी मर्दवादी मानसिकता से चाहिए। यह भी वही मॉरल पुलिसिंग है, जो बजरंगे करते फिरते हैं। इस तरह के मर्दाना विचारों को मैं किसी खाप से कू नहीं मानती, जो लैंकिग विषमता का वमन करते हैं, वह भी वैचारिकता काचोंगा पहन कर। जिस दरिद्र विचार को उखाड़ फेंकने के लिए हम स्त्रीवादी वैचारिक आंदोलन चला रही है, उसका गला रेतने वाले किसी भी मर्दाना सोच को कुचलना खालिस मानवतावादी कदम कहलाएगा, क्योंकि ये सनकी खुराफातें भी इतिहास का हिस्सा होंगी, थू-थू के लिए ही सही।
... औरतें भी वही गलतियां कर रही है, जो पुरुषों ने की थी... पुरुषों की गुंडागर्दी और लिजलिजेपन को छिपाने का कितना मासूम तर्क लाए हैं, हमको रास्ते मत सुझाइए। जाइए अपनी सोच का इलाज कराइए। अपनी आनेवाली पीढिय़ों को मानवता का पाठ पढ़ाइए, ताकि वे आपकी मांओं/ बहनों को उनके गोपन अंगों के नाम से पुकारने से पहले थोड़ा झिझकें।... बेवफाई को समझने के लिए व्यक्तिगत संपत्ति, धर्म या पितृसत्ता जैसी संस्था को ध्यान रखने की बात करने से पहले ठीक से समझ तो लीजिए, दरअसल आपको चाहिए क्या। स्त्री मुक्ति के नाम पर स्त्री भक्ति करने वाले पुरुषों से भरे आपके साहित्य समाज में बैठे दरिंदों को आईना दिखाना शुरू भीतो नहीं हो पाया है अभी। हिंदी जगत में तो हिम्मत वाली औरतों की खोज इसलिए नहीं हो रही कि उनके कंधे पर रखकर बंदूक चलाई जा सके, बल्कि इसी डर से हो रही है कि उनकी धार को सामूहिक रूप से कुंद किया जा सके और उनको भोथरा करके अपनी जमात में शामिल करने में सफलता मिल सके।

वरिष्ठ साहित्यकार गिरिराज किशोर का पत्र

Posted By Geetashree On 6:12 AM 2 comments

दो दिन पहले शाम को अचानक कानपुर से गिरिराज किशोर जी का फोन आया। वे विभूतिनारायण के साक्षात्कार पर बेहद कुपित थे. जैसे पूरा महिला समाज है. उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री को पत्र लिखने जा रहे है. वे चाहते कि महिला लेखिकाओं को छीनाल का दर्जा देने वाले विभूति के खिलाफ सभी एकजुट होकर विऱोध करें। वो हो भी रहा है.,,,लोग अपने अपने स्तरो पर कर रहे हैं. दो दिन से अखबारो में ये मामला खूब उछल रहा है। उन्होंने पत्र की वो कापी हमें मेल कर दी है। हम ज्यो त्यो यहां लगा रहे हैं। साथ में वरिष्ठ कहानीकार प्रियंवद का भी हस्ताक्षर है...पढिए...

मामला काफी तूल पकड़ चुका है. मैंने कुलपति महोदय से भी बात की। कल तक वे अपने बयान के बचाव में टिक कर खड़े थे...आज उन्होंने अलग एंगल दे दिया. आज वे कतरा गए। वह कहते हैं कि मैंने इंटरव्यू में छीनाल शब्द बोला ही नहीं है. मैंने सिर्फ बेवफाई शब्द बार बार बोला है। ये शब्द वहां कहां से आया, मुझे नहीं मालूम। कुलपति महोदय को नया ज्ञानपीठ के संपादक रवींद्र कालिया का इंतजार है. उनके दिल्ली लौटने पर वे बात करेंगे कि कैसे और कहां से ये शब्द इंटरव्यू में घुसा। विभूति आशंका जताते हैं कि मैगजीन के डेस्क पर ये शरारत हुई है। मजे की बात ये कि इस विवादास्पद इंटरव्यू का कोई रिकार्ड किसी के पास मौजूद नहीं है। ना लेने वाले के पास ना देने वाले के पास.अब ये दोनो ही जानते होंगे कि सच कौन बोल रहा है. रवींद्र कालिया खलनायक हैं या विभूति...दोनो जल्दी फैसला करले और जनता के बता दें, तो अच्छा होगा. दोष तो तय करना ही होगा। बात अब तक इतनी बिगड़ चुकी है कि विभूति की पत्नी और ममता कालिया तक पर छीनाल के छींटे पड़ रहे हैं। ये ठीक नहीं..हम प्रतिशोध में वही गल्तियां दुहरा रहे हैं..जो मर्दवादी मानसिकता वाले लोग कर रहे हैं. ये लड़ाई अब सीधे सीधे कहीं स्त्री-पुरुष के बीच की लड़ाई ना बन जाए. लेकिन जिस तरह से इस लड़ाई को स्त्रियां कम और पुरुष ज्यादा लड़ रहे हैं वो काबिले तारीफ है. मगर कुछ कुंठित लोग भी हैं जिनकी तड़पती आत्मा को चैन मिला होगा इस बयान से. विभूति उन्हें मौका दिया कि वे अपनी कुंठा शांत कर सके।