पहले मुक्ति, अब गुलामी की गोली

Posted By Geetashree On 9:57 AM 3 comments
गीताश्री


पिल का खेल सबको समझ में आ गया है। इनका बहुत बड़ा बाजार है। इसने औरतों को टारगेट किया। पुरुषो ने अपने स्पर्श के आनंद के लिए औरतो को गोली ठुंसाई। वे कंडोम को अपनी राह का रोड़ा मानते हैं। इसीलिए औरतो को मानसिक रूप से तैयार करते हैं कि वे पिल को अपना लें। औरतें ही गोली क्यो खाएं? इससे बेहतर है कि हम पचास साल की गुलामी से बाहर आएं।
-एक स्त्रीवादी लेखिका
बहुत योजनाबद्घ तरीके से पुरुष नियंत्रित कंपनियों और समाज ने पिल को प्रोत्साहित किया। जबकि हमारे पास उसका विकल्प कंडोम के रूप में मौजूद था। अब महिलाएं कंडोम के पक्ष में हैं। -- एक स्त्रीवादी उपभोक्ता
एक शांत-सा विज्ञापन- टेलीविजन पर आता है इन दिनों। कोई शोर शराबा नहीं, पति पत्नी के बीच आंखों-आंखों में बातें होती है और उसके बाद ‘आई-पिल’ का जिक्र।ऐसा नहीं कि इससे पहले कोई गर्भ निरोधक दवाई बाजार में नहीं आई। सिप्ला कंपनी की यह गोली शायद कुछ ज्यादा ही खास है। इसे गर्भधारण के 72 घंटे बाद लेने से भी काम चल जाता है। यही इसकी सबसे खास बात है। कंपनी ने इस के प्रचार में गुलाबी रंगों से लिखा है, ‘इसका उपयोग बिना डॉक्टरी सहायता के भी किया जा सकता है। साथ ही यह भी लिखा है कि यह गोली गर्भपात की गोली नहीं है।’पचास साल पहले जब गर्भनिरोध· गोली अस्तित्व में आई तब औरतों की दुनिया बदलने का अंदाजा शायद किसी को न रहा होगा। अनचाहे गर्भ का बोझ ढोती और साल दर साल बच्चे पैदा करती औरतें असमय बूढ़ा जाती थीं। आधी जिंदगी रसोई और आधी कोख यानी बच्चे पैदा करने में गुजर जाती थी। अपने साथ दैहिक आजादी का अहसास लेकर आई ‘जादुई पिल’ ने जब पश्चिम की औरतों को पहली बार उनकी आजादी का अहसास कराया होगा, तब औरतों ने ईश्वर के बदले वैज्ञानिको को धन्यवाद दिया होगा। औरतों की इस बेचारगी के बारे में मार्क्सवादी विचारक शुलामिथ फायर स्टोन ने भी स्पष्ट किया था कि जब तक स्त्री को गर्भाशय से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक उसकी वास्तविक मुक्ति संभव नहीं। इन गोलियों ने पश्चिम में 50 वर्ष पहले महिलाओं के लिए मुक्ति की दिशा में कदम बढ़ा दिए। आई पिल के पैकेट पर ऐसी औरतों का ही सूरते हाल छपा हुआ है। एक उदास औरत शून्य में देख रही है। उसके नीचे लिखा है, ‘असहजता, दुश्चिंता, क्रोध, खुद से खफा, भय, ग्लानि, क्षोभ, शर्म, अकेलापन... ऐसे अनेक तरह के संशय बोध से घिरी एक औरत अनचाही गर्भ का बोझ ढोने को खुद को तैयार नहीं पाती तो इससे उबार लेने के लिए ‘आई-पिल’ मदद करने आया।’ मदद के नाम पर स्त्रियां इनके जाल में फंसती चली गईं। जो चीज 50 साल पहले शुरुआती वर्षो में आजादी का प्रतीक थी, वह धीरे धीरे जबरन गुलामी का प्रतीक बन गई। अब पता चल रहा है कि जादुई पिल सेक्सुअल आजादी की सारी कीमत सिर्फ महिलाओं से वसूलता है, पुरुषों से नहीं। कोख से मुक्ति देने के नाम पर कंडोम की उपलब्धता के बावजूद स्त्रियां पिल की जादुई गिरफ्त में फंसती चली गईं। जबकि सच ये हैं कि पिल कंडोम की तरह यौन सुरक्षा नहीं दे सकता। बल्कि सिर्फ इस पर निर्भर रहे तो यौन संबंधी कई बीमारियां हो सकती है। कंपनियां भी इसे स्त्रियों की आजादी से जोड़कर प्रचारित करती हैं। इस दौर में पिल को स्त्री की आजादी से जोड़कर देखने को मैं मर्दवादी सत्ता की साजिश मानती हूं। ये ठीक है पिल ने मुक्ति दी थी। लेकिन 50 साल से स्त्रियां ही बचाव क्यो करें। आजादी के नाम पर उन्हें लुभाना बंद कर देना चाहिए। क्यों खाती रहें गोली। आप क्यो ना यह जिम्मेवारी उठाओ। अब मुक्ति दो गोली की गुलामी से। अपने लिए उपाय तलाशो और उन्हें आजमाओ। पिल के महत्व से हमें इनकार नहीं। दुनिया बदलने में उसका बहुत बड़ा हाथ रहा है। एक पुरानी फिल्म का संवाद यहां सटीक बैठता है, जिसमें लंपट नायक कुंवारी, गर्भवती-नायिका से कहता है, ‘ईश्वर ने तुम स्त्रियों को कोख देकर हम मर्दों का काम आसान कर दिया।’ लेकिन पिल ने आकर ईश्वर के काम में दखल दे दिया। ये गोलियां धार्मिक वर्जना के विरुद्ध एक औजार की तरह आईं जिसे स्त्रियों ने अपने बचाव के लिए इस्तेमाल किया। पचास साल पहले जब इन गोलियों का अस्तित्व सामने आया तब पश्चिमी विचार· मारग्रेट सेंगर ने टिप्पणी की थी, ‘गर्भ पर नियंत्रण वह पहला महत्वपूर्ण कदम है जो स्त्री को आजादी के लक्ष्य की ओर उठाना ही चाहिए। पुरुषों की बराबरी के लिए उसे यह पहला कदम लेना चाहिए। ये दोनों कदम दासता से मुक्ति की ओर हैं।’ मुक्ति का दौर आज भी जारी है। इस एक छोटी सी गोली ने औरतों की बड़ी दुनिया का नक्शा बदल दिया। औरतें खुदमुख्तार हुईं और देह पर उनका पहला नियंत्रण यही से आरंभ हुआ। उन्होंने तय किया कि उन्हें ‘महाआनंद’ की कीमत अनचाहे गर्भ से नहीं चुकाना है। बेखौफ औरतें पुरुषों के अराजक साम्राज्य से बाहर निकलीं। बस अब नई राह पर चलना है...आप समझ रही हैं ना..।
अब पुरुषों के लिए भी गोली
दौर में महिलाओं के लिए राहत की कई खबरें हैं। अब जो खबर है वह उन महिलाओं को खुश कर देगी जो इन गर्भनिरोध· गोलियों के इस्तेमाल से स्तन कैंसर और इसकी बीमारियों के खतरे को लेकर आशंकित रहती हैं।
ब्रिटेनमें एक ऐसी गर्भनिरोधक गोली का परीक्षण किया जा रहा है जो खासतौर से पुरुषों के लिए तैयार की गई है। ब्रिटिश प्रोफेसर रिचर्ड एंडरसन के अनुसार, ‘मौजूदा दौर में ज्यादातर महिलाओं का मानना है कि पुरुषों के लिए कोई गर्भ निरोधक गोली होनी चाहिए। महिलाओं की इसी चाहत को अमल में लाने की कोशिश की जा रही है।’ बतौर परीक्षण दो साल तक पुरुषों पर इन गोलियों के प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा।

बुर्का से मुक्ति का समय

Posted By Geetashree On 7:57 AM 10 comments
एक कविता की पंक्तियां याद आ रही है...तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है, तू इस आंचल का एक परचम बना लेती तो अच्छा था....।

यह पृथ्वी पर बुर्का से मुक्ति का समय है। हमने अपने घूंघट उतार फेंके हैं। हमारे सिरों से आंचल खिसकर हमारी मुक्ति का परचम बन गया है। वक्त आ गया है। दुनिया की बुर्कानशीनों...समझो..सुनो..देखो...कि अब तक किस साजिश के तहत हम काले कपड़ो में लपेट कर छुपा दिए गए थे। हमारे सिऱ तपती गरमी में भी काले कपड़ो में जकड़े रहते थे। ये लबादा नहीं, हमारी पहचान छुपाने की साजिश थी। एक सुंदर लड़की सड़क पर चलती फिरती काली आत्माओं में बदल जाती थी। कहीं हिजाब, कहीं नकाब तो कही बुर्का...। परदानशीं हुए हम और आप बेपरदा होकर घूमते रहे। पोशाक से लेकर आत्मा तक गुलाम बना दी गई। हमें पाठ पढाया गया कि पोशाक भी हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। हमें उन्हें बचाना है तभी हमारी पहचान, हमारी संस्कृति बचेगी। हम इससे बाहर गए तो हमारा धरम खतरे में।
मैंने दुनिया के कई मुसलिम देश देखे हैं...वहां की लड़कियों को करीब से देखा है। हिजाब और बुर्के से मुक्ति की उनकी छटपटाहट देखी और महसूस किया है। सीरिया जैसे आधुनिक देश में भी आधुनिक लड़कियां हिजाब में लिपटी हुई मिलीं। उनकी पीड़ा ये थी कि उनके प्रेमियो ने लंबे समय तक उनके खुले गेसू नहीं देखें। जब तक निकाह नहीं हुआ तब तक क्या मजाल कि एकांत में भी वे गेसुओं को देखने की हिमाकत कर जाएं। ईरानी फिल्मों का तो अब तक ये हाल है कि परदे पर स्त्रियां खुले बालों में दिखाई ही नहीं जा सकती। चाहे घर के अंदर का दृश्य हो या खेल के मैदान का। इसके खिलाफ मुसलिम महिलाओं को ही क्रांति करनी होगी। प्रतिबंध की नौबत ही क्यो आए। काफी हद तक शहरी महिलाओं ने क्रांति की है,कठमुल्लों को कोप झेला है, झेल रही है, विरोध के आगे वे डट कर खड़ी हैं। देखादेखी हिम्मत आ रही है। मगर बहुसंख्यक अभी भी काली पोशाक की गिरफ्त में है।
जहां महिलाएं पहल नहीं कर रही वहां सरकार को दखल देना पड़ रहा है। हाल ही में फ्रंस सरकार ने क्रंतिकारी कदम उठाया और बुर्के पर रोक के विधेयक को मंजूरी दे दी। जिसमें सार्वजिनक जगहो पर मुसलिम महिलाओं के बुर्का पहनने पर पाबंदी का प्रावधान है। इसस जुलाई में इसे संसद में रखने का रास्ता साफ हो गया है। वहां की सरकार का तर्क है कि सावर्जनिक जगहो पर वैसे कपड़े पहनने की इजाजत नहीं होगी जिनका उद्देश्य चेहरा छिपाना हो। कानून के मसौदे केअनुसार यदि कोई महिला बुर्का या नकाब पहनती है तो उसे 150 यूरो का जुर्माना देना होगा। यही नहीं तालिबान की नजर में शाबाशी लायक काम करने वाले शख्स को फ्रांस जेल भेजने के लायक समझता है। कानून में साफ किया गया है कि किसी महिला को जबरन बुर्का पहनाने वाले व्यक्ति को एक साल की कैद और 20 हजार डालर के जुर्माने का प्रवधान किया गया है।
बुर्कानशीन महिलाओं को आर्थिक दंड इसलिए कम दिया जाएगा कि लोग यह मानतो हैं कि महिलाओं को बुर्का पहनाने के लिए मजबूर किया जाता है। जैसे ही लड़की बड़ी होती है उस पर परदा थोप दिया जाता है। बंद समाज की औरते क्या करें..उन्हें समाज की पाबंदी के साथ जीने की आदत डाल लेना पड़ता है।

वहां से आई एक अन्य खबर के अनुसार पकड़े जाने पर महिलाओं को जुमार्ना भरने के स्थान पर नागरिकता का पाठंयक्रम पूरा करना होगा। फ्रांस सरकार मुसलिम समुदाय से कह रही है कि वे इस कानून को दिल पर ना लें और इस प्रतिबंध को सकारात्मक दृष्टि से देखें।
लेकिन इस पर दुनिया भर में प्रतिक्रियाएं होंगी। कठमुल्ले बौखलाएंगे। स्त्रियों को राहत मिलेगी। अपनी देह पर संस्कृति के नाम पर अतिरिक्त पहरा लेकर चलने से आजादी मिल जाएगी। सवाल ये है कि क्या इस तरह के प्रतिबंध की जरुरत भारत में नहीं है। समाज अगर खुद को बदल ले तो सरकार को एसे कानून बनाने की जरुरत ही क्यो पड़े। सदियो से चली आ रही रुढियो को अब तक ढोए जाने का कोई अर्थ नहीं बचता। वो भी इस दौर में...जब लड़कियां जीवन के सभी वर्जित क्षेत्रो में सेंध लगा रही हैं, आगे बढ रही हैं। सारे बैरियरस तोड़ रही है। एसे में उन्हें लपेट कर रखना कहां तक जायज है। भारत में एसा प्रतिबंध तभी नहीं लगाया जा सकेगा। यहां संभव ही नहीं। हमारी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं. धर्मभीरुता और रुढियों के प्रति हमारा अतिरिक्त मोह कभी संभव नहीं होने देंगा। इस पर सोचना तक दुश्वार है। यह यूरोप में ही संभव है, जहां संसद के 100 प्रतिशत सदस्यो ने पक्ष में मतदान किया। भारत में रायशुमारी करके देख लीजिए...। बहस शुरु हो जाएगी और जातीय अस्मिता का सवाल खड़ा हो जाएगा। तालिबान कही ना कहीं भारतीय मानसिकता में भी जड़े जमा चुका है।

एसा नहीं होता तो गांव की औरते पंचायत की बैठको में सिर पर पल्लू रख कर ना भाषण देतीं। राजनीतिक महिलाएं सल्लज नारी बन कर वोट मांगने ना जातीं। कुछ गांवो में मैंने देखा है कि औरते स्कूटर चला रही है, मगर सिर पर पल्लू कस कर बांधा हुआ है। उसे उतारने की हिम्मत नहीं उनमें। गांव की सीमा में घुसते ही उन्हें अपने खोल में वापस आ जाना है। समाजसेवी भी उन्हें सारी प्रेरणा देते हैं, उन्हें घर की चहारदीवारी से बाहर निकलने को उकसाते हैं, मगर उनके सिर पर पड़े पल्लू से मुक्ति का रास्ता नहीं दिखा पाते। इतनी हिम्मत नहीं कि सामाजिक ताने बाने से टकरा जाएं। भारतीय परिवेश में उनकी एसी मदद कोई और नहीं कर सकता, खुद ही करना होगा। मुसलिम महिलाएं भी चाहे तो शबाना, सईदा हमीद, शबनम हाशमी जैसी अनेक महिलाओं के प्रेरणा लेकर खुद को आजाद घोषित कर दें। बस एक यही बाधा पार करने की जरुरत है...। एक धक्का और...।

शब्दों का सिरा

Posted By Geetashree On 12:54 AM 7 comments
विपिन चौधरी
दिन-रात शब्दों की श्रृंखालाओं से साक्षात्कार के बावजूद कुछ शब्द ऐसे भी हैं जो जब भी सामने आते हैं, हर बार नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर देते हैं। ऐसे ही दोशब्द आते हैं- नारीवादी और शील-अश्लिल के बीच का भेद। तीन चार दिनों
के अंतराल में एक बार फिर इन दोनों शब्दों से मेरा सामना हुआ था।
हाल ही में एक वरिष्ठ आलोचक ने शील या अश्लिल के मसले पर अपनी टिप्पणी देते हुए कहा है कि साहित्य में इसे इतना सतही तौर पर नहीं लिया जा सकता। मंटों ने कभी अपने साहित्य पर लगे आरोपों के बारे में कहा था कि समाज में ही इतनी गंदगी है और दरअसल मैं समाज के सच को ही लिखता हूँ। क्या साहित्य और कला में आकर श्लीलता और अश्लीलता के मायने दूसरे हो जाते हैं या कला -सत्यता की आड में कुछ भी उकेरे जाने की छूट है। यहाँ आकर मेरा 'जड' और 'संस्कारी' मन मुझसे अकसर बहस करने लगता है।इसी तरह फेमिनिज्म या नारीवादी शब्द से भी कुछ समय पहले मेरी मुठभेड हुई। उस दिन दिल्ली से ही प्रकाशित होने वाले एक अखबार में काम कर रही एक महिला छायाकार से मिलने गई। उनसे यह मेरी पहली मुलाकात थी और काफी समय तक याद रखने वाली साबित हुई। जीवन की तमाम परेशानियों को झेलते हुए अपनी अदम्य जिजीविषा के बल पर उन्होनें अपनी राह खुद बनाई जो निश्चय तौर पर काबिले- तारीफ है।कुछ साल पहले जब कादम्बिनी पत्रिका में उनका लेख पढा था, तभी से ही उनसे मिलने का मन था और कुछ रोज़ पहले टेलिविज़न पर उन्हें देख कर एक बार उनसे मिलने की इच्छा बलवती हो उठी। बडी आसानी से उनका फोन नम्बर भी मिल गया। अगले ही दिन मुलाकात तय हुई। हँसते-हँसाते चलती हुई हमारी बातों के बीच में अचानक उनका चेहरा उस वक्त बेहद सख्त हो गया था। एक आम पुरूष के प्रति मेरा नरम रूख उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं आया। समाज में महिलाओं की समस्याओं के बारे में बातें करते-करते आदत के मुताबिक कुछ आधुनिक महिलाओं के आचरण पर मैनें सवाल उठा दिया। इसके बाद उन्होनें अपनी कामान के सारे तीर मुझ पर चला डाले। उनकी बात का समापन इस बात से हुआ किऔर मैंने उन्हें लाख समझाया पर सब व्यर्थ और उस किस्से का समापन इस वाक्य से हुआ कि "तुममें बचपना बहुत है और तुमने अभी दुनिया देखी ही कहां है" ?घर वापिस लौटते समय बार-बार मन में यही ख्याल आ रहे थे कि एक महिला जब समाज में अपनेआप को सार्थक करने की राह पकड़ती है तो इस दौर से गुजरते हुए वह पुरूषों से इतनी नफरत क्यों करने लगती है। क्या खुद की कोशिशों से आगे बढने के इस सारे घटनाक्रम में सामने आये सभी पुरूष उसे छलते हैं।
हमारे यहां यों भी नारीवाद के बारे में अलग-अलग विचारधाराएं बन गई हैं। सवाल है कि नारीवाद अपने असली अर्थों में है क्या?यह सही है कि हमारी इस सामाजिक दुनिया में नारीवादी विचारधारा, लैंगिक भेदभाव के सामने एक चुनौती पेश कर रही है। महिलाओं के सार्वभौमिक दमन को लेकर नारीवाद सामाजिक परिवर्तन के लिए एक प्रतिबद्धता है और समतावादी समाज में ही वह एकमात्र हल दिखाई देता है जो पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना को बदलने में सक्षम है।मेरा मानना है कि नारीवादी होने का मतलब पुरूषजाति के प्रति द्वेष तो बिलकुल नहीं है। स्त्री के हितों की बात करते-करते पुरुषों को दोष देते हुए हम नारी के उत्थान की दिशा से भटकते हुए कहीं ओर निकल जाते हैं। पुरूष क्या केवल इस लिए दोषी है, कि उसे पितृसत्तात्मकता विरासत में मिली है । महिला सशक्तिकरण में नारीवाद की भूमिका तभी सार्थक होगी जब नारी चेतना संपन्न होगी और शिक्षा इस दिशा में सबसे भूमिका निभायेगी। ध्यान देने की बात यह भी है जहाँ पश्चिम में नारीवाद की शुरूआत महिलाओं ने की वहीं भारत में नारीवादी सुधारों की शुरूआत पुरूषों ने की जिसे बाद में महिलाओं ने आगे बढ़ाया और वे इस दिशा में बहुत आगे तक बढती गई।. नारीवादी सिद्धांत पर पश्चिमी बहस भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश पर आज तक हावी रही है। हमारे यहाँ नारीवाद हमेशा विविध रूप धारण कर लेता है। समूचे संसार का भूगोल और इतिहास अलग-अलग है और नारीवाद चूंकि काफि पुराना सैद्धांतिक मॉडल हो चुका है, इसलिए उसमें टूट होना भी स्वभाविक है। यही कारण है कि भारतीय नारीवाद की अनेकों शाखायें हैं और उनके सैद्धांतिक रास्ते भी अलग- अलग हैं। भारत में इस सोच और उसके विकास की दिशा में अब तक कोई ठोस काम नहीं हुआ है।
नारीवाद में शामिल दूसरे विषय जैसे संपत्ति के अधिकार, भत्ते, विरासत, और बच्चे के रखरखाव सब कहीं पीछे छूटते दिखाई देते हैं। आज लगभग हर चीज़ को बाज़ार निर्धारित करता है। जाहिर है, बाजार उस स्त्री के साथ है जो विश्व में उसका उत्पाद बेचेगी। ऐसे में महिलाओं को अपनी गरिमा का ध्यान खुद रखना होगा, अपनी युवा और स्रजनात्मक सोच के साथ क्योंकि युवा होने का मतलब अपने ही द्वारा संशोधित और मानीखेज विचारधारा को साथ लेकर चलना भी है।

त्वरित प्रतिक्रिया, कल्बे जव्वाद के बयान पर

Posted By Geetashree On 10:58 PM 11 comments
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राजनीति नही, घर संभालें महिलाएं

लगता है शिया धर्मगुरु कल्बे साहब का दिमाग खराब हो गया है। तभी वे भयानक किस्म के बयान दे रहे हैं। इनको अपने दिमाग का इलाज कराना चाहिए। उनके मुताबिक औरतें घर संभालें और राजनीति मर्दो की बपौती बनी रहे। सवालिया दिमाग वाले एसी ही बाते करते हैं। आज सभी पेपर में उनका यह खौफनाक बयान छपा है। उस बयान के बाद उन्हें भारत में नहीं स्वातघाटी की राजनीति करना चाहिए या वहां जाकर तालिबानी आंदोलन को मजबूत करना चाहिए। भारत को उनकी जरुरत नहीं...वे गलत मुल्क में हैं। वे हमारी लोकतांत्रिक आधिकारों पर हमला कर रहे हैं। बमुश्किल हासिल की गई आजादी और हको पर हमला बोल रहे हैं। पता नहीं, कोई समाज कैसे बर्दाश्त करता है एसे लोगो को।


पहले तो वह महिला आरक्षण बिल में मुस्लिम महिलाओं के कोटे का विरोध करते हैं फिर बयान देते हैं...महिलाओं को घर गृहस्थी संभालना चाहिए। उन्हें खूबसूरत बच्चे पैदा करना चाहिए। उनका पालन पोषण करना चाहिए। अगर घर में बच्चा रो रहा हो तो वह संसद के गंभीर मुद्दों पर बहस कैसे कर पाएंगी। इसीलिए महिलाओं को चुनाव लड़ने और संसद तक पहुंचने के बारे में सोचना ही नहीं चाहिए।

अकेले यही नही इनसे पहले दारुल ऊलूम देवबंद ने भी राजनीति में जाने की इच्छुक महिलाओं के गैर इस्लामिक व्यवहार पर सजा देने की बात की थी। पांच साल पहले देवबंद ने चुनाव लड़ने वाली महिलाओं के खिलाफ फतवा जारी किया था। कुछ उलेमा एसे हैं जो उदारवादी रवैया रखते हैं। मगर वे भी जमात के विरोध के चलते चुप लगा जाते हैं। उनके अनुसार मुसलिम महिलाएं शरीयत के दायरे में रहकर चुनाव लड़ सकती हैं। क्योकि इस्लाम में महिलाओं के राजनीति में हिस्सा लेने के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं है।

कल्बे के इस बयान के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं। एक बार फिर से मुसलिम महिलाओं की आजादी पर बहस शुरु हो गई है। इस समाज में जब भी औरतो की आजादी की बात होती है तो सारे धर्म गुरु एक सुर में बोलने लगते हैं। सुना है कि उत्तर प्रदेश के कुछ और धर्म गुरु बड़ाबड़ा रहे हैं...महिलाए अपनी हदो से बाहर ना जाएं तो अच्छा होगा...अगर उन्हें राजनीति में आना है तो पहले परदा उतार दें, क्योंकि इस्लाम कही भी परदा उतार कर भाषण देने की इजाजत नहीं देता। इस्लाम मे उन्हें सिर्फ घर में रहकर परिवार और बच्चो की देखभाल करने को कहा गया है... उन्हें पढने लिखने और देशसेवा का अधिकार जरुर दिया गया है लेकिन उन्हें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि पब्लिक प्लेस पर भाषण देने का इस्लाम इजाजत नहीं देता...जो महिलाए चुनाव लड़ती है वे मुसलमान नहीं है...और भी ना जानें क्या क्या...अधिक तापमान में इनसान बड़बड़ता ही है। धर्मगुरुओं का तापमान इन दिनों फिर बढ गया है।
शाइस्ता अंबर के पीछे हाथ धो कर पड़ गए हैं। कहते हैं वे माफी मांगे। माफी तो आप मांगे जनाब...आपने औरत को औरत बनाए रखने की हिमायत और हिमाकत दोनो की है। कब तक धर्म के नाम पर औरतो को बच्चा पैदा करने की मशीन समझते रहेगें। कब तक चहारदीवारी में नकी आत्माएं चित्कारती रहेंगी। आप दस दस बच्चे पैदा करें..चहे जिनती बीबियां अपने हरम में रख लें...औरत को आजादी के सपने भी देखना गुनाह हो जाता है। यह अलग बात है कि कोटे के अंदर कोटा मिले या ना मिले..यह बिल्कुल अलग मुद्दा है। यहां तो आप असली मुद्दे से ही ध्यान हटाया जा रहा है।

मुसलिम महिलाएं अगर राजनीति में आ गईं तो यकीनन इस्लाम खतरे में पड़ जाएगा। जरा जरा सी बात पर क्या कोई धर्म खतरे में पड़ सकता है। समय के हिसाब से जीने की आदत ही नहीं है इन्हें। ढोए चले जा रहे हैं ढोंग को। वक्त कितना बदल गया,,दुनिया बदल गई। हालात और जरुरते बदल गईं। लगभग सारे समाजो की स्त्रियां मुक्त हो रही है...और आप इस्लाम के नाम पर लगाम कसे जा रहे हैं.

ये संयोग है कि आज ही कल्बे का बयान आया और जनसत्ता अखबार में साहित्यकार मित्र मुशर्ऱफ आलम जौकी का एक लेख छपा है जो इस मसले पर बेहद मौजूं है। यहां उसको रख रही हूं...

इस्लाम में औरत को जो भी मुकाम दिया गया हो, मौलवियो ने हर बार धर्म की आड़ लेकर औरत को अपने पैर की जूती बनाने की कोशिश की है। लगातार अत्याचार कई कई पत्नियों का रिवाज, आजादी के पहले तक बीबी की मौजूदगी में दाश्ता रखने और कोठो पर जाने का रिवाज, इस बारे में अपने मर्दाना होने ढेरो तर्क, शहजादों नवाबो और बड़े लोगो के हजारों लाखों किस्मों में औरत सचमुच खेती बन गई थी। मर्द औरत की धरती पर हल चला सकता था, रोलर चला सकता था, धरती को चाहे तो जरखेज या बंजर बना सकता था। क्योंकि वह मर्द की खेती थी। उसे बोलने की बात तो दूर उफ करने का भी कोई हक नहीं था। मर्द उसका कोई भी भी इस्तेमाल कर सकता था। लेकिन बदलते समय के साथ शिक्षित मुसलिम महिलाओं ने स्वंय को पहचानना शुरु कर दिया है, और इसे शुभ संकेत माना जाना चाहिए।

जौकी साहब का लेख बहुत बड़ा है और वे अपने ही समुदाय के धर्मगुरुओं के पाखंड की धज्जी उड़ाते हैं। जिस बदलाव को जौकी साहब शुभ संकेत मान रहे हैं कल्बे उस पर दहाड़ रहे हैं। उन्हें मंच से ललकारती हुई स्त्री डरा रही है। अगर स्त्री के हाथ सत्ता आई तो इनकी दूकाने बंद हो जाएंगी। इनके फरमान कौन सुनेगा। वे अपने आंगन से उठती हुई लहरें देख रहे हैं...डर रहे हैं। एक स्वतंत्र स्त्री सबको मर्दवादी मानसिकता को किसी चुनौती की तरह डराती है। ये सारे पाखंडी जहां तहां मस्जिदो, मदरसो पर कब्जा जमा कर बैठे हैं उनका क्या होगा। सारे रौब तो स्त्री समाज के लिए है। अपनी अय्याशी के लिए सामान की तरह औरते कहां से जुटाएंगे। उनके फरेब में जागरुक औरते नहीं आएगी। ये भयभीत..भीरु मर्दो का विलाप है....इन्हें अनसुना करने की जरुरत है...तभी तो जावेद अख्तर कहते हैं...यह मुसलिम महिलाओं को तय करना है कि वे एसे गुरुओं की बातें माने या फिर खुद फैसला करें।


पारो ही पारो है जहां

Posted By Geetashree On 12:20 AM 4 comments

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हाल ही में सहारा में एक खबर पढी, जो देश के बाकी अखबारो के लिए शायद उतनी बिकाउ खबर ना रही होगी। खबर थी, हरियाणा में मिली बालिका वधू नौ दिनों से गायब थी। यह मामला सबसे पहले सहारा समय पर उजागर हुआ तब जाकर मुकदमा दर्ज हो पाया। उसके परिजन कहते फिर रहे हैं कि लड़की मानसिक रुप से विक्षिप्त है। जबकि मामला कुछ और होगा। पुलिस ने मामला दर्ज किया होगा और घरवालो की बात पर यकीन कर लिया होगा। अगर 12 साल की लड़की की शादी 70 साल के बूढे से कर दी जाए, उसके घर वाले उसका सौदा कर दें या कोई दलाल उसे उठा ले आए और बूढे के हाथो बेच दे तो क्या वो नाबालिग लड़की विक्षिप्त नहीं होगी। क्या वह वयस्क दुल्हनो की तरह विहंसेगी। क्या उम्मीद करते हैं आप उससे। कि वह यह सब चुपचाप स्वीकार ले। खेलने कूदने के दिनों में बीबी बन कर घर संभाल ले या एक लालची बूढे के हवस की भेंट चढ जाए।
बिहार से छपरा जिले के मसरक प्रखंड के घोघिया गांव की 12 साल की आरती की शादी हरियाणा के सोनीपत के नूरनखेड़ा गांव के 70 साल के बलराम से होने के मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है। कई दिनों से वह अपने घर से लापता थी। गायब होने की खबर जब सहारा समय चैनल पर चलाई गई तो परिवार वालो ने मामला मसरक थाने में दर्ज कराया। लड़की गायब हो गई और लड़की के नाना को पुलिस का भय सताने लगा। डर से उसने गायब होने की सूचना पुलिस को नहीं दी, एसा उसका कहना है। सच क्या है ये नाना जानता होगा। कौन ले गया होगा उसे। अपने गांव से हरियाणा तक कैसे पहुंची। किसी ने नहीं देखा कि आरती कैसे गई. किसके साथ कई।
लोग तरह तरह की बात करते हैं। आरती की कहानी कम दर्दनाक नहीं है। बताते हैं कि उसकी सगी मां भी उसे गायब करा सकती है। क्योंकि कई साल पहले आरती की मां अपनी बेटी को नाना के पास छोड़कर कहीं चली गई और आज तक वापस नहीं आई है। आरती के पिता से उसकी मां की नहीं बनी। लगभग अनाथ आरती को उसकी किस्मत ने हरियाणा पहुंचा दिया। उसका भी अपनी मां की तरह पता नहीं चलता अगर मामला मीडिया में नहीं उछलता। घरवाले अपने बचाव में कह रहे हैं कि आरती सिर्फ अपना नाम बता सकती है, बस। वह मानसिक रुप से विक्षिप्त है। ना वो बेचने का आरोप लगा रहे हैं ना किसी के द्वारा चुरा कर ले जाने का। नाबालिग लड़कियो गायब होने पर उसके परिजन अक्सर एसे ही स्टैंड लेते हैं। ये कोई नया बहाना तो नहीं।
हरियाणा का कुछ हिस्सा लड़कियों की तस्करी का प्रमुख अड्डा बन गया है। आए दिन वहां बिहार, झारखंड, असम, उड़ीसा के पिछड़े इलाको ले लाई गई बच्चियां, लड़कियां यहां बेच दी जाती हैं। कभी दलाल तो कभी घरवाले तो यहां सौदा करने आते हैं, वे बिकती हैं, बनती है पारो और भूल जाती है हमेशा हमेशा के लिए अपनी मुक्ति का स्वप्न। ना वे यहां से भागकर कहीं जा सकती हैं ना विद्रोह कर सकती हैं। यहां एक बूढे की अय्याशी का सामान बनने के बदले दो जून की रोटी तो मयस्सर हो जाती है। चाहे इसके बदले में इन्हें बच्चा पैदा करने की मशीन बनना पड़े।
इस इलाके में पारो का पता करना लगभग असंभव है। पारो यानी राज्य की सरहद से पार की लाई हुई वह लड़की, बहू, पत्नी जिसे पैसे देकर खरीदा गया हो। मेवात इलाके के खातेपीते परिवारो में भी एसी पारो मौजूद हैं जिन पर परदा डालकर रखा जाता है। उन्हे बाहरी व्यक्ति के सामने आने की इजाजत नहीं है। उनकी व्यथा चहारदीवारी में घुमड़ती है। साधारण परिवारो की पारो भी सामने नहीं पाती। पारो की तलाश में मैं जब वहां भटक रही थी तब मेरे साथ इलाके के कुछ प्रभावशाली सामाजिक कार्यकर्त्ता थे। उन्होंने बताया कि यह इलाका खतरनाक है। अगर उनहें भनक भी लग गई कि आप अखबार में लिखने के लिए उनसे मिलना चाहती है तो आप पर हमला भी कर सकते हैं। मेव समुदाय मरने मारने वाली कौम है। इस भय की वजह से एक स्वांग रचा गया। उन लोगो ने पारो के घरवालो को बताया कि केंद्र सरकार पारो को 500 रुपये का मासिक राशि भुगतान करने की योजना बना रही है। मैंडम पारो का सर्वे करने आई हैं। बिना मिले, बात किए पहचान कैसे होगी। बस...यह स्वांग असर दिखा गया। एक के बाद एक पारो से सामने आने लगी लेकिन तब भी अकेली नहीं। अपने घरवालो से घिरी हुई। जो अकेली मिली उनकी कथा ने झकझोर दिया। मेवात के घासेड़ा कस्बे के बस स्टाप पर हमारी मुलाकात नैंसी से हुई. झारखंड की नैंसी बताती है- “मुझे एक ट्रक ड्राइवर लेकर यहां आया था. उसने 500 रुपये मेरे सौतेले बाप को सौंपा और फिरोजपुर गांव में लाकर किसी के घर छोड़ कर चला गया. वो आदमी मुझसे धंधा करवाना चाहता था. उसने कहा-जा कमा कर ला. मैं यह काम नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसके चंगुल से भाग निकली. मैं पारो नहीं बनना चाहती.”मेवात के इस इलाके में ऐसी सैकड़ों पारो हैं. पारो यानी राज्य की सीमा पार से खरीद कर लाई गई वह लड़की, जिसका मनचाहा इस्तेमाल किया जा सकता है. बीवी बनाने से लेकर बच्चा पैदा करने की मशीन या फिर देह व्यापार कराने तक.दिल्ली से सटे आईटी सिटी गुड़गांव के पास है मेवात का इलाका. आधा हरियाणा और आधा राजस्थान में. 6,662 बूचड़खाने वाले इस इलाके को गोकशी के लिए जाना जाता है, टकलू क्राइम यानी सोने की ईंट बेचने के धंधे के लिए जाना जाता है और पारो की खरीद फरोख्त के लिए.यहां गांव गांव में है पारो। मेव, जाट और अहीर बहुल इस इलाके में ‘पारो’ का खूब चलन है. बेचारगी के साथ दलील दी जाती है कि गरीबों को यहां का कोई धनाढ़य व्यक्ति अपनी लड़की नहीं देता. ऐसे में हमारे पास ‘पारो’ के अलावा कोई विकल्प नहीं है.यहां हर कदम पर पारो मिलेगी. कई गांवों में आधी संख्या पारो की है. ये अलग बात है कि लोग अपने घरों में कैद पारो के मुद्दे पर बात करने से बचना चाहते हैं. थोड़ी चालाकी के साथ बात करें या फिर घरवालों को लगे कि बात करने का कोई लाभ मिल सकता है तो लोग थोड़ा-थोड़ा खुलने लगते हैं. तरह-तरह के किस्से आपके सामने आने लगेंगे. झारखंड, आंध्र प्रदेश, असम, बंगाल और देश के अलग-अलग हिस्सों से खरीद कर, बहला फुसला कर या जबरन उठा कर लाई गई हर पारो के पास अपनी-अपनी कहानी है लेकिन सबके हिस्से का दुख एक जैसा है, पहाड़ सा.सलमबा गांव में एक पारो मिली- रुक्सिना। वह असम की हैं. पिछले सात साल से यही हैं. अपने गांव घर का रास्ता भूल चुकी हैं। किस्मत ने उन्हें एक अधेड़ मर्द अकबर की दूसरी बीबी बना दिया है। जब वह हमें मिलीं तो उनकी गोद में एक बच्चा था। बच्चे को गोद में चिपटाए, बेहद डरी सहमी-सी, घरवालो से घिरी हुई। पूछने पर टुकुर-टुकुर मुंह ताकने लगती हैं. साथ में खड़ी एक मेवाती महिला बताती हैं- “इसका मायका गरीब है. रोटी के लाले पड़ते हैं. वहां जाकर क्या करेगी? यहां दो वक्त की रोटी तो नसीब हो रही है ना.”दो वक्त की रोटी के नाम पर रुक्सिना की जिंदगी कैद में बदल गई. भूख का भूगोल जीवन के सारे पाठों पर भारी पड़ गया.पश्चिम की स्त्रवादी लेखिका एलीन मारगन अपनी किताब डिसेंट आफ वीमेन मे एक पुरानी कहावत का हवाला देती हैं, ईश्वर ने कभी कहा था कि जो तुम्हे चाहिए, वह ले लो, लेकिन इसका मूल्य तुम्हे चुकाना पड़ेगा। स्त्री के संदर्भ में यह बात सौ फीसदी सही लगती है। उसने स्त्री रुप में पैदा होने का मूल्य चुकाया और वस्तु में तब्दील हो गई।
यकीन ना हो तो पारो से मिल लें। स्त्री को मादा में बदलते देख सकते हैं।

नूंह कस्बे में कुछ महीने पहले एक और पारो झारखंड से आई है. नाम है सानिया, उम्र कोई 15 वर्ष. ना वह सामने आई, ना उसके घरवालों ने बात की. पड़ोसियों ने बताया कि गरीबी की वजह से 50 वर्षीय मजलिस के साथ मेवात में किसी ने अपनी बेटी नहीं ब्याही. अंततः वह किसी स्थानीय एजेंट के साथ झारखंड गया और अपने लिए कम पैसे में एक पारो का इंतजाम कर लाया. मजलिस ने अपने अरमान पूरे किए और सानिया के अरमानों पर उम्र के इस फासले ने हमेशा के लिए पानी फेर दिया. अनवरी की उम्र है 20 साल. वह मूल रूप से झारखंड के हजारीबाग की रहनेवाली हैं. पिछले साल उन्हें मेवात जिले के घासेड़ा गांव में लाकर एक अधेड़ व्यक्ति के घर में बिठा दिया गया. उन्हें झारखंड से यह झांसा देकर लाया गया कि दूर के रिश्तेदार के यहां मिलने जा रहे है. यहां आते ही अधेड़ व्यक्ति की ब्याहता बना दी गई. जबरन. डरते-डरते अनवरी बताती हैं, “ एक आदमी ने मेरे पति से मेरे बदले दस हजार रुपये लिए।” ये सिर्फ अनवरी की नहीं उनके जैसी अनेक लड़कियों की कहानी है. अरावली पहाड़ियों से घिरे पूरे मेवात क्षेत्र में ऐसी अनेक लड़कियां हैं, जो तस्करी करके यहां लाई गई हैं. यहां उन्हें या तो किसी खूंटे में बांध दिया जाता है या फिर नीलाम किया जाता है. कहीं-कहीं घर वाले धंधा करवाते हैं या दर-दर भीख मांगने पर मजबूर कर देते हैं. ऊपर से देखने पर मामला सिर्फ शादी और लड़का पैदा करने जैसा दिखाई देता है लेकिन अंदर-अंदर मौज मस्ती और कई तरह धंधे के साथ-साथ तस्करी का बहुत मजबूत तंत्र है जिसमें यहां का एक बहुत बड़ा वर्ग लिप्त है. हरियाणा में जब तक लैंगिक असमानता रहेगी तब तक गरीब लड़कियों की अस्मत का सौदा यहां होता रहेगा। कोमा में सोए और स्त्री को मादा समझने वाले समाज पर इसका कोई असर नहीं होगा।

औरतों की ऐसी-तैसी करने वाले कबीर

Posted By Geetashree On 10:56 PM 8 comments

0 गीताश्री 0 कबीरदास को अब तक हम सब एक संत कवि के रुप में जानते रहे हैं, लेकिन कबीर का एक नया रुप भी है. स्त्रियों को गरियाते, उनकी लानत मलामत करते कबीर... धमकाते हुए कबीर कि अगर तुमने अपनी आजादी या चुनाव या स्वेच्छा की बात सोची भी तो पीट-पीट कर नीली कर दी जाओगी...

स्त्री की सारी आजादी छीन ली क्योंकि उसका कंत बहुत गुणों वाला पहले ही घोषित कर दिया गया है. और बेगुणी, बेलच्छनी, बेशऊर स्त्री को अब उसे ही सर्वस्व मान लेना है......

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सलाखो के पीछे कैद स्वाधीनता

Posted By Geetashree On 9:25 AM 6 comments
0 नीलाभ 0

तो आज था कि अभय ने अपने ब्लौग-- निर्मल आनन्द-- में जो सवाल उठाया है : हिन्दी में सितारा कौन है ? -- उस पर कुछ विचार किया जाये, लेकिन आज एक ऐसी बात हुई कि आप से किसी और विषय की चर्चा करने को मन हो आया है.
आज हमारी युवा मित्र सीमा आज़ाद और उनके पति विश्वविजय की १४ दिन की रिमाण्ड की अवधि पूरी हो रही थी और उन्हें पुलिस फिर से रिमाण्ड में लेने के लिये अदालत में पेश करने नैनी जैल से लाने वाली थी. बात को आगे बढ़ाने से पहले मैं आपको यह बता दूं कि सीमा आज़ाद मानवाधिकार संस्था पी.यू.सी.एल. से सम्बद्ध हैं, साथ ही द्वैमासिक पत्रिका "दस्तक" की सम्पादक हैं और उनके पति विश्वविजय वामपन्थी रुझान वाले सामाजिक कार्यकर्ता हैं. अपनी पत्रिका "दस्तक" में सीमा लगातार मौजूदा जनविरोधी सरकार की मुखर आलोचना करती रही है. सीमा ने पत्रिका का सम्पादन करने के साथ-साथ सरकार के बहुत-से क़दमों का कच्चा-चिट्ठा खोलने वाली पुस्तिकाएं भी प्रकाशित की हैं. इनमें गंगा एक्सप्रेस-वे, कानपुर के कपड़ा उद्योग और नौगढ़ में पुलिसिया दमन से सम्बन्धित पुस्तिकाएं बहुत चर्चित रही हैं. हाल ही में, १९ जनवरी को सीमा ने गृह मन्त्री पी चिदम्बरम के कुख्यात "औपरेशन ग्रीनहण्ट" के खिलाफ़ लेखों का एक संग्रह प्रकाशित किया. ज़ाहिर है, इन सारी वजहों से सरकार की नज़र सीमा पर थी और ६ तारीख़ को पुलिस ने सीमा और विश्वविजय को गिरफ़्तार कर लिया और जैसा कि दसियों मामलों में देखा गया है उनसे झूठी बरामदगियां दिखा कर उन पर राजद्रोह का अभियोग लगा दिया.
वैसे यह कोई नयी बात नहीं है. जनविरोधी सरकारें सदा से यही करती आयी हैं. हाल के दिनों में मौजूदा सत्ताधारी कौंग्रेस ने जिस तरह देश को बड़े पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथों गिरवी रखने के लिये क़रार किये हैं और कलिंगनगर, सिंगुर, नन्दीग्राम, लालगढ़, और बस्तर और झारखण्ड के आदिवासियों को बेदखल करना शुरू किया है, वह किसी भी तरह की आलोचना को सहन करने के मूड में नहीं है. और इसीलिये हमारी तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था लोकतंत्र को लम्बा अवकाश दे कर अपनी नीतियों के विरोधियों को कभी "आतंकवादी" और कभी "नक्सलवादी" या "माओवादी" घोषित करके जेल की सलाखों के पीछे ठूंसने का वही फ़र्रुख़ाबादी खेल खेलने लगी है. इस खेल में सब कुछ जायज़ है -- हर तरह का झूठ, हर तरह का फ़रेब और हर तरह का दमन. और इस फ़रेब में सरकार का सबसे बड़ा सहयोगी है हमारा बिका हुआ मीडिया. इसीलिए हैरत नहीं हुई कि सीमा की गिरफ़्तारी के बाद अख़बारों ने हर तरह की अतिरंजित सनसनीख़ेज़ ख़बरें छापीं कि ट्रक भर कर नक्सलवादी साहित्य बरामद हुआ है, कि सीमा माओवादियों की "डेनकीपर" (आश्रयदाता) थी और विश्वविजय माओवादियों के कमाण्डर हैं. यही नहीं, पुलिस और अख़बारों ने मिल कर ऐसा ख़ौफ़ का वातावरण पैदा करने की कोशिश भी की जिस से सीमा के परिवार और मित्रों का मनोबल टूट जाये.
अभय ने अपने ब्लौग मॆं पुस्तक मेले का ज़िक्र किया है. मज़े की बात है कि पांच फ़रवरी को उसी पुस्तक मेले में अभय, मैं और सीमा साथ थे और जिस साहित्य को पुलिस और अख़बार नक्सलवादी बता रहे हैं वे पुस्तक मेले से ख़रीदी गयी किताबें थीं.
बहरहाल, आज की तरफ़ लौटें तो सीमा और विश्वविजय की रिमाण्ड के चौदह दिन आज पूरे हो रहे थे और आज दोनों को अदालत में पेश होना था. हम ग्यारह बजे ही अदालत पहुंच गये. लगभग दो घण्टे के इन्तज़ार के बाद सीमा और विश्वविजय को अदालत में लाया गया. मुझे यह देख कर बहुत खुशी हुई कि दोनों इन चौदह दिनों में थोड़े दुबले भले ही हो गये थे लेकिन दोनों का मनोबल ऊंचा था. सीमा के चेहरे पर एक दृढ़्ता थी और विश्वविजय के चेहरे पर मुस्कान. सीमा हमेशा की तरह मुस्कराती हुई आयी और उसने गर्मजोशी से हाथ मिलाया. लगा जैसे सलाख़ों के पीछे क़ैद स्वाधीनता चली आ रही हो.
हम लोग काफ़ी देर तक सीमा से बातें करते रहे, बिना फ़िकर किये कि सरकार के तमाम गुप्तचर किसी-न-किसी बहाने से आस-पास मंडरा रहे थे और . जब हम आने लगे तो सीमा ने ख़ास तौर पर ज़ोर दे कर कहा कि उसे तो बयान देने की इजाज़त नहीं है, इसलिए वह पुलिस और मीडिया के झूठ का पर्दाफ़ाश नहीं कर पा रही, लेकिन मैं सब को बता दूं कि पुलिस की सारी कहानी फ़र्ज़ी है जैसा कि हम बार-बार देख चुके हैं
सो दोस्तो, यह रिसाला जैसा भी उखड़ा-उखड़ा है सीमा की बात आप सब तक पहुंचाने के लिए भेज रहा हूं. सीमा की रिमाण्ड की अर्ज़ी खारिज हो गयी है. २२ तारीख़ को उसे ज़मानत के लिए पेश किया जायेगा और आशंका यही है कि उसे ज़मानत नहीं दी जायेगी. आशंका इस बात की भी है कि स्पेशल टास्क फ़ोर्स सीमा और विश्वविजय को अपनी रिमाण्ड में ले कर पूछ-ताछ करें और जबरन उनसे बयान दिलवायें कि वे ऐसी कार्रवाइयों में लिप्त हैं जिन्हें राजद्रोह के अन्तर्गत रखा जा सकता है. हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां सब कुछ सम्भव है-- भरपूर दमन और उत्पीड़न भी और जन-जन की मुक्ति का अभियान भी. यह हम पर मुनस्सर है कि हम किस तरफ़ हैं. ज़ाहिर है कि जो मुक्ति के पक्षधर हैं उन्हें अपनी आवाज़ बुलन्द करनी होगी. अर्सा पहले लिखी अपनी कविता की पंक्तियां याद आ रही हैं :


चुप्पी सबसे बड़ा ख़तरा है ज़िन्दा आदमी के लिए
तुम नहीं जानते वह कब तुम्हारे ख़िलाफ़ खड़ी हो जायेगी और सर्वधिक सुनायी देगी
तुम देखते हो एक ग़लत बात और ख़ामोश रहते हो
वे यही चाहते हैं और इसीलिए चुप्पी की तारीफ़ करते हैं
वे चुप्पी की तारीफ़ करते हैं लेकिन यह सच है
वे आवाज़ से बेतरह डरते हैं
इसीलिए बोलो,
बोलो अपने हृदय की आवाज़ से आकाश की असमर्थ ख़ामोशी को चीरते हुए
बोलो, नसों में बारूद, बारूद में धमाका,
धमाके मॆं राग और राग में रंग भरते हुए अपने सुर्ख़ ख़ून का
भले ही कानों पर पहरे हों, ज़बानों पर ताले हों, भाषाएं बदल दी गयी हों रातों-रात
आवाज़ अगर सचमुच आवाज़ है तो दब नहीं सकती
वह सतत आज़ाद है.

औरत कैसी औरत है

Posted By Geetashree On 3:52 AM 7 comments
0 प्रतीभा कटियार 0
इश्किया देखने के बाद आकांक्षा पारे ने जो सवाल उठाए हैं उस पर कई कमेंटस आए...प्रतिभा जी ने भी कुछ लिखा है। बहस पर नई रोशनी डालता हुआ उनका लेख .यहां पेश हैं। इश्किया में इस्तेमाल गालियों पर बहुत बहस हुई..अखबारों में लेख लिखे गए, चैनलों पर बहसें हुईं...मगर एक संवाद अनदेखा रह गया जिसमें एक स्त्री के जरिए समूची स्त्री जाति को कठघरे में खड़ा कर दिया। तिलमिला देने वाले इस संवाद को जस्टिफाई नहीं किया जा सकता..लोगबाग अब सफाई दे रहे हैं...तरह तरह के तर्क गढे जा रहे हैं...इस संवाद से हामारा वजूद खतरे में भले ना पड़ा हो..हमारी विश्वसनीयता पर हमले किए गए हैं...उसका प्रतिकार जरुरी...यह लेख उसी सिलसिले की कड़ी है... गीताश्री
औरत होने का क्या अर्थ है। विन्रम, सुशील, सच्ची...नैतिक, पारंपरिक उच्च चरित्रवाली ईमानदार, मृदुभाषी...ये फेहरिस्त काफी लंबी है।

अक्सर आसपास ऐसे जुमले सुनने में आते रहते हैं, एक औरत होकर उसने ये किया...देखो औरत होकर भी कैसा काम किया. उसकी भाषा देखो, औरतों की नाक कटा दी. एक औरत होकर क्राइम में...

पिछले दिनों रवीश कुमार जी के ब्लॉग पर एक तस्वीर चस्पां की गई कि औरतें भी जेबकतरी हो सकती हैं...सावधान. कमेंट्स भी आये कि लो जी औरतों से तो ये उम्मीद नहीं थी या यहां भी आ गईं महिलाएं. संभ्रांत तबकों से आवाजें और घनी होती हैं. कोई औरत अगर आगे बढ़ जाती है तो उसका चरित्र निशाने पर, पर अगर नहीं बढ़ पाती तो उसकी कार्यक्षमता निशाने पर. घर के मोर्चे पर असफल तो नौकरी को दोष, नौकरी के मोर्चे पर ढीली पड़ी कभी तो घर को दोष. अगर सब साध ही लिया ठीक से उसकी स्मार्टनेस उसकी चालाकी कहलाती है. ये है आज का आधुनिक युग और आधुनिक सोच. औरत होने का अर्थ क्या होता है बार-बार सोचना पड़ता है. स्त्री विषयों पर मुखर होने के कारण अक्सर ऐसे मौकों पर जब कोई महिला कहीं भी किसी भी मामले में दोषी पाई जाती है तो मुझे घेरा जाता है कि देखा औरतों को आजादी देने का नतीजा. हम सब जानते हैं कि ऐसे जुमले कसने वाले बेहद एलीट, पढ़े-लिखे लोग होते हैं. ऐसे जुमलों से ज्यादा खतरनाक होती है उसकेपीछे की नीयत.
एक अजीब किस्म का सैडिस्ट अप्रोच. जो आगे बढऩे वाली महिलाओं में खामियां देखते या ढूंढते ही खिल उठता है. समझ में नहीं आता कि ये लोग कब समझेंगे औरत होने का अर्थ. औरत होते ही सारे गुणों की चादर में क्यों लपेट दिया जाता है किसी को. औरत होना भी इंसान होना ही तो है. सारे गुण-दोषों से युक्त. उसकी गलतियों की सफाई देना मेरा मकसद नहीं न ही उसका पक्ष लेने का. सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि जो इंसान है वो इंसानी गुणों से भी तो भरपूर होगा, दोषों से भी. गलत फिर गलत ही है एक जैसा चाहे स्त्री करे या पुरुष. इसमें लिंग भेद की गुंजाइश कब, कहां, कैसे आ जाती है. स्त्री भी एक इंसान है. उसमें भी गुण दोष सब हैं. आगे बढऩे के लिए वो भी वो सब कर सकती है जो अब तक सिर्फ पुरुष करते आये हैं. दांव-पेंच, झूठ-सच, अच्छा-बुरा सब कुछ. क्यों उसे अलग खांचे में फिट किया जाता है और एक की गलती के बहाने पूरी औरतों की बिरादरी और उनके संघर्ष पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाता है. इतने बरसों से तो पुरुषों ने एक-दूसरे का गला काटा है. भाई ने भाई का, बाप ने बेटे का, दोस्त ने दोस्त का. एक की टांग घसीट कर पीछे करना, खुद को आगे निकालना यही सब तो होता रहा है, हो रहा है. लेकिन गलती से कोई एक औरत अपनी किसी सहयोगी की आलोचना करे तो हो जाती है औरत ही औरत की दुश्मन. पुरुष ऐसे मौकों को हथियाने को तैयार बैठे रहते हैं. क्या स्त्रियों को इन खांचों से मुक्त होकर एक स्वतंत्र इंसान के तौर पर कभी देखा जायेगा. जहां उनसे किसी देवी होने की उम्मीद नहीं की जायेगी. उनकी गलतियां भी वैसी ही हैं जैसी किसी पुरुष की. न कम न ज्यादा. गलत को गलत कहना बुरा नहीं. बुरा है उसे जेंडर के खांचे में डालकर आनंद लेना.
प्रतिभा कटियार

पहले औरत होकर तो देखें

Posted By Geetashree On 1:08 AM 6 comments
0 आकांक्षा पारे 0
फिल्म इश्किया देखने के बाद.....

'मैं औरत होता तो पता भी नहीं चलता की परी हूं या तवायफ। यह गाली किसे है? औरत को या औरत के रूप में तवायफ को? या फिर दोनों को ही। क्योंकि कुछ लोगों को तो फर्क शायद नजर ही आता हो। दफ्तर में किसी से हंस कर बात कर लो, शाम टहलते हुए किसी के साथ चाय पी आओ, किसी के साथ फिल्म चलने का कार्यक्रम रख लो। सस्ती या सबके साथ चली जाती है यार (एक आंख दबाए बिना इस वाक्य को न बोलें) सुनने में कितना वक्त लगेगा। अब तो यह नई सदी है। इसलिए नदी सौगातें भी हैं। किसी एक लड़की के साथ हमेशा घूमते फिरो तो खुद के कानों में जल्द ही यह शब्द पड़ेंगे, 'दोनों धारा 377 हैं बे। लड़कों के साथ घूमो तो परी या तवायफ के फर्क के बीच का महीन अंतर लेकर। जब उनकी जो मर्जी होगी, जब जैसी परिस्थिति होगी वे अपनी सुविधा से नामकरण कर देंगे। दो दशक पहले एक फिल्म आई थी, एक ठाकुर बिना हाथ वाला। दो चिरकुट चोर। ठाकुर ने उनमें शोले दहकाए। पैसे जो चिरकुटों ने चाहे, काम जो ठाकुर ने चाहा। बरसों लोगों के दिलो-दिमाग पर तीनों राज करते रहे। 21 वीं शताब्दी तक आते-आते ठाकुर का स्वरूप बदल गया। वह खूबसूरत औरत हो गई। मासूम लेकिन शातिर। चिरकुट चोर वही रहे। मासूम ठकुराइन ने चिरकुटों को फिर इस्तेमाल किया। काम और पैसा जो उसने चाहा। ठाकुर इंतकाम की आग में जल रहा था, ठकुराइन विरह की। विरह की आग भभकती नहीं, धीमी सुलगती है सुस्त। उसकी आंखें दर पर लगी रहीं, अपने प्रियतम की खातिर। ऐसा निर्दयी बलम जो मर कर भी नहीं मर सका। जिंदा रहा उस घर में, उन गैस सिलेंडरों में, उस रसोई में जहां फिर ठकुराइन हमेशा चूल्हे पर खाना पकाती दिखी। एक चिरकुट से लहसुन छील देने की गुजारिश करती हुई। जबकि पूरे घर में सिलेंडर ही सिलेंडर रखे थे। बुजुर्ग संगीत का रसिक, विरहन गुनगुनाने की शौकीन। बुर्जग संजीदा है, अकेली जिंदगी में न संजीदगी रही थी न शरारत। इसलिए पहले संजीदगी ने दस्तक दी। लेकिन सिर्फ दस्तक दी। इकरार कहीं नहीं। बस एक सपने की इमानदार स्वीकारोक्ति। 'आपसे मिलने के बाद फिर जीने की इच्छा होने लगी है। या शायद अपनी योजना के लिए डाला जाने वाला दाना। लेकिन इश्क तो इश्क है। इश्क को पाने की खातिर इश्क के जरिए इश्क का बदला लेना। इश्क जब परवान चढ़ता है तो खत्म करने या खत्म होने के सिवाय दूसरा रास्ता कहां छोड़ता है। रग-रग में दौड़ता अकेलापन, उन सालों का हिसाब संजीदगी से नहीं लिया जा सकता। इसलिए शरारत जीत जाती है। फिर यह जीना तवायफ हो जाना क्यों है?
तेजाब डाल कर किसी की आत्मा जला देना। चेहरे से वह नूर छीन लेना और खुश होना कि साली हमारी नहीं तो किसी की नहीं। यह हरामीपन क्यों नहीं है? एक ब्याहता रखना और दफ्तर जा कर मानसिक भूख शांत करने के नाम पर वैचारिक बहस के दरवाजे से मन पर कब्जा कर लेना, कमीनगी क्यों नहीं है? कोई ठौर दे, मुसीबत में काम आए, अगल मन में मुगालता पाल ले और बाद में कहे, 'अगर मैं औरत होता... अगर औरत होता तो समझता कि जिसका पति इतना चाहने के बाद भी अपने हाथों सिंदूर पोंछ कर चला जाए तो क्या होता है। अगर औरत होता तो समझ पाता कि भलाई के रास्ते पर किसी पुरुष को ठेलने की एक तवायफ ने क्या कीमत चुकाई थी। यदि औरत होता तो ही समझता न कि सोने की जंजीर में बना ताजमहल कैसे उसके सपने के घर को मकबरा बना गया है। लेकिन वह औरत होता तब न...। यह बोलने के पहले औरत तो होता। भले ही तवायफ होता।

सितमगर पर नकेल....

Posted By Geetashree On 8:06 PM 9 comments

एनआऱआई दुल्हे का सपना ज्यादातर भारतीय लड़कियां देखती है...पंजाब इस मामले में सबसे आगे है..जहां मां बाप की ही नजर रहती है विदेशो में रहने वाले लड़को पर। प्रवासी लोगो की नजर रहती है भारतीय लड़की पर. अपने बेटे का ब्याह भारत में करना चाहते हैं ताकि भारतीय संस्कृति में पगी एक लड़की मिल जाए..वही सेवा भाव...कृतज्ञता का भाव लिए हुए हो..उनके वैभव के सामने दबी रहे..अय्याशी करने के लिए गोरी छोरी और शादी करके घर बसाने के लिए भारतीय सती सावित्री चाहिए. क्या पाखंड है...इस झांसे में ना जाने कितनी लड़कियां, परिवार आते जा रहे हैं..लड़कियां कुरबान हो रही है...मारी जा रही है...गायब कर दी जा रही है..फिर भी मां बाप नहीं चेत रहे हैं..नजर है कि लंदन अमेरिका से आने वाले प्रवासी पक्षियो पर ही टिकी है।

जैसे खाड़ी देशो में भारतीय मजदूरो के पासपोर्ट मालिको द्वारा जब्त कर लिए जाते हैं..वैसे ही भारतीय दुल्हन का पासपोर्ट ससुराल वाले अपने कब्जे में कर लेते हैं। उसके बाद शुरु होता है प्रताड़ना का दौर...वह भाग नहीं सकती..आसपास कोई अपना नहीं...जहां फरियाद करे...वह शहर का नक्शा तक नहीं समझ पाती कि यातनाओं का दौर शुरु...। खुशकिस्मत लड़कियां लौट आती हैं जिनकी किस्मत खराब वे या तोयातना सहने की आदत डाल लेती है या खुदकुशी कर लेती है...आए दिन एसी खबरे आती रहती है...ये मामले जगजाहिर है...इस मसले पर केंद्र सरकार भी गंभीरता से विचार कर रही थी...आखिर एक विचार सामने आया कि प्रवासी दूल्हे से शादी करने वाली लड़कियो को दो पासपोर्ट दिया जाए। एक पासपोर्ट लड़की साथ ले कर जाए और दूसरा अपने मां बाप के पास छोड़ दे। मुसीबत पड़ने पर मां बाप विदेश जाकर अपनी बेटी का ला सकेंगे। महिला व बाल विकास मंत्रालय ने इस विचार को अमल में लाने का जिम्मा नेशनल वीमेन कमीशन को सौंपा है। जल्दी ही कमीशन इस पर कोई ठोस काम करने वाली है..जाहिर है सभी पहलूओं पर विचार करना होगा। ये इतनी आसान राह नहीं है...एसी शादियो का अलग से पंजीकरण किए जाने का प्रस्ताव भी आया है। इसके लिए सरकार को राज्यवार निगरानी रखना होगी...सबसे ज्यादा पंजाब प्रभावित है इनसे। जहां पूरा का पूरा गांव प्रवासी है या जहां की तमाम लड़कियां विदेशी दूल्हों को ब्याह दी जाती है.

इन सब पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है तभी सरकार की आंख खुली। सरकार तो बाद में आती है..क्या पहले घरवालो को नहीं चेतना चाहिए। क्या खतरनाक सपनो को आंखों से बेदखल नहीं करना चाहिए...सिवाए विदेशी जमीन के वहां क्या रखा है। भारतीय दुल्हे किस मायने में कम हैं..हालात बदल चुके हैं..भारत अब इंडिया बन गया है..एक से एक हैंडसम सैलरी वाले लड़के हैं..उनके परिचित परिवार है। दूरिया कम हैं..अपने लोगो का संसार है...काम करने के अवसर है...विद्रोह के लिए मंच है..भाषाई संकट नहीं...थोड़ी सूझ-बूझ के साथ अपनी जमीन पर किसी संकट का सामना किया जा सकता है...बिना किसी मारे मरे भी यहां स्वर्ग पाया जा सकता है....

इन सब मसलो पर लड़की समेत घरवालो को भी सोचने की जरुरत है...फिर से कोई किरण ना हो जो अपने पति के अत्याचारो से ऊब कर उसे जला दे। आपको जगमोहन मुंदरा की फिल्म प्रोवोक्ड याद है ना..

ये फिल्म एक सत्यकथा पर आधारित है...क्या करती वह लड़की...उसके सामने रास्ता क्या बचा था...या क्या रास्ता छोड़ा गया था...उसे दो मौत मे से एक चुननी थी..उसने उसकी चुनी जो उसे यातना देता था...जिसने नरक में झोंक रखा था...यातना की इंतेहा होती है..तब जाकर एक औरत किलर बनती है। हम एसी नौबत क्यो आने देते हैं कि सपनीली आंखें खूनी हो जाती हैं...सोचो...सोचो...

पता नहीं दो दो पासपोर्ट इस समस्या को कैसे सुलझा पाएगी...जिस रिश्ते में इतनी आशंकाए हो वहां क्यो जाना..उधर का रुख क्यो करना...पासपोर्ट लेकर छटपटाते मां बाप को मौका नहीं भी तो मिल सकता है..। कहानी कभी भी बदल जाती है...सरकार से ज्यादा मां बाप को चेतने की जरुरत है। प्रवासी परिवार से रिश्ता जोड़ने को अपनी खुशकिस्मती मानने वाले परिवारो को अपनी मानसिकता बदलने की जरुरत है...