प्रमाण मिल गए आपके गुनाह के सरकार

Posted By Geetashree On 1:24 AM 8 comments


राष्ट्रीय महिला आयोग को इस बात के पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि मध्य प्रदेश के शहडोल में कन्यादान योजना का लाभ देने से पहले जिला प्रशासन ने आदिवासी एवं अनुसूचित जनजाति की युवतियों का कौमार्य परीक्षण करवाया था। आयोग के समक्ष परीक्षण की प्रक्रिया से गुजरने वाली लड़कियों के बयान से पूरा मामला साफ हो गय़ा है और दोषियों का चेहरा बेनकाब हो गया है। अब क्या जवाब देंगे और कहां जाकर मुंह छिपाएंगे वे लोग, जिन्होंने सरेआम लड़कियों को बेइज्जत किया।
सारा कांड जिलाधिकारी के निर्देश और नेतृत्व में हुआ। प्रशासन की देखरेख में जो घिनौवना खेल खेला गया, उसकी क्या सफाई. उसका क्या पक्ष। संसद में हंगामा हुआ तो कहा गया कि आयोजको का पक्ष तो सुनिए। कितनी हास्यास्पद बात है। पहले इज्जत लूटो फिर कहो हमारा भी पक्ष सुनो, क्योंकि ये जरुरी था...। क्यों सुने आपका पक्ष। चोरो, बेईमानों का भी अपना पक्ष होता है। उनकी सुनें तो अराजकता ना फैल जाएगी। प्रशासन किस मुंह से रखेगा अपना पक्ष, क्या कहेगा कि कैसे चालाकी को औजार बना कर, लालच देकर सौ से ज्यादा लड़कियों को बेईज्जत कर दिया। किसने आपको ये अधिकार दिया कि आप लड़कियों को कौमार्य परीक्षण करें। आपके बेहुदा तर्को का कोई अर्थ नहीं इस लोकतांत्रिक समाज में। आपने पहले लालच दिया, उन गरीब घर की लड़कियों को, कि मेडिकल परीक्षण करवा लो तभी सरकार की तरफ से 6500 रुपये की कीमत का घरेलु सामान दिया जाएगा। ये सरकार की तरफ खुलेआम दिया जाने वाला (गैरकानूनी) दहेज है। जबकि उन्हें दहेज शब्द से ही घिन आनी चाहिए।
इस योजना के लिए जारी सरकारी घोषणा के अनुसार इसमें विधवा, तलाकशुदा या परित्यक्त औरतें भी शामिल हो सकती हैं। बशर्ते वे खुद से अपने विवाह का खर्च उठाने की स्थिति में ना हों। गरीबों के लिए सरकारी खजाने से दी जाने वाली यह बड़ी सहायता है। लोग आसानी से झांसे में आ जाते हैं।

लड़कियां आसानी से मान गईं। वे गरीब थीं, लाचार थीं, जिन्हें मां बाप गाय की तरह किसी खूंटे से बांधने के लिए ले आए थे। उनके सामने रास्ता क्या था। एसी सामूहिक शादियों मे अपनी पसंद की कोई जगह नहीं होती। उन्हें तो यह भी नही पता होता कि उनकी जीवन किस खूंटी में बंधने जा रहा है..क्या लिखा है उनके भाग्य में। कौन होगा जीवन साथी। बस शादी करनी है और उनके होने का मतलब यही है। लड़की हो तो शादी एक अनिवार्य शर्त्त है। ये भारतीय समाज की सच्चाई है। लड़की के पैदा होते ही उसकी शादी के दिन रात सपने देखने वाले मां बाप से और क्या उम्मीद की जा सकती है कि जितनी जल्दी हो एक खूंटा तलाश लें और गंगा नहाए। गांव में दो कहावतो का एक ही मतलब है...आज मैं घोड़ा बेचकर सोया या एसे सोया जैसे बेटी की विदाई कर दी हो।
दोनों में घरवाले एक जैसी नींद लेते हैं।
प्रशासन चला एसे घरवालों का बोझ हल्का करने। जिस वक्त परीक्षण के दौर से लड़कियां गुजर रही थीं तब क्या उनके घरवाले बहरे-गूंगे हो गए थे। उन्हें दिखाई नहीं दिया कि मेडिकल परीक्षण के नाम पर उनकी लड़कियों को नंगा किया जा रहा है।
वैसे भी इस योजना में लाभान्वित होने वाली लड़कियों में ज्यादातर आदिवासी थीं और आदिवासी संस्कृति में यौन वर्जनाएं दूसरे समाजो की तरह नहीं है। आपको यह सच स्वीकारना चाहिए।
उन लड़को का क्यों नहीं परीक्षण करवाया जो शादी के लिए लपलपाए चले आए थे यो सोचकर कि एकदम वर्जिन लड़की मिलेगी। लड़के चाहे किसी समाज के हों, वे क्या दूध के धुले होते हैं। खुलापन तो उनका मौलिक अधिकार है, जिसका वे भरपूर फायदा उठाते हैं और शादी के लिए वर्जिन लड़की तलाशते हैं। एक हिंदी फिल्म का संवाद है जो मुझे कभी नहीं भूलता...ईश्वर ने तुम औरतो को कोख देकर हम मर्दो का काम आसान कर दिया है। क्या लड़कियों को गर्भवती हवा ने कर दिया था। एसी ही मानसिकता वाले लड़को की वजह से हालात एसे बनते हैं। इनको जांचो और पूछो कि क्या ये वर्जिन हैं, किसी लड़की को कभी छुआ नहीं। इनके पास कोख नहीं इसलिए पूछने या शक करने का आधार नहीं।
कुछ लड़कियां गर्भवती पाई गईं इसलिए सारी लड़कियों की जांच हुई।
ये लड़कियों की निजता पर सीधा हमला है। इससे प्रशासन का स्त्री विरोधी रवैया जाहिर होता है। वैसे भी कूपमंडको को औरतो की आजादी पर हमला बोलने का बहाना चाहिए। कभी ड्रेस कोड लागू करो, कभी वैलेंटाइन डे मत मनाने दो...पुरुष मित्रों के साथ हाथ में हाथ डाल कर मत घूमने दे...कुछ भी एसा ना करने दो जिससे इनकी तथाकथित संस्कृति खतरे में पड़ जाए।

हम नहीं, आंकड़े बोलते हैं

Posted By Geetashree On 12:36 AM 13 comments

एक दिन पहले मैंने पोस्ट लिखा, अगले दिन एक अखबार में एक सर्वे छपा जो मेरी राय को सपोर्ट कर रहा है। मैं यहां उस खबर को ज्यों का त्यों डाल रही हूं, ताकि शादी की उम्र को को लेकर जो भयावह सच है वो सामने आ जाए। सहयोग संस्था के सर्वे के मुताबिक य़ू पी में 62 प्रतिशत युवाओं की शादी 18 साल से कम उम्र में हो रही है।
यह सर्वे आजमगढ, चंदौली, मिर्जापुर, झांसी, लखनऊ और मुजफ्फरपुर के 1003(एक हजार तीन) लोगो के बीच किया गया। इनमें पुरुष एवं महिला अभिभावको के अलावा शिक्षक, एएनएम, डाक्टर और युवा शामिल थे। सहयोग की ओर से यशोधरा ने जो रिपोर्ट तैयार की है उसमें कहा गया है कि अभी भी यूपी में 62 फीसदी युवाओं का विवाह 18 वर्ष से कम उम्र में हो रहा है। 13 से 18 वर्ष की सिर्फ 3.23 लड़कियां ही एसी हैं जिन्हें अपनी मर्जी से घर बाहर जाने की इजाजत है।

सर्वे के दौरान इसके अलावे कई और चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। यूपी की ही एक सामाजिक कार्यकर्त्ता तीखी प्रतिक्रिया देती है--लोग कच्ची उम्र में बच्चियों की शादी करने से परहेज नहीं करते पर यौन शिक्षा देने के नाम पर उनकी झूठी नैतिकता जाग उठती है। वह हैरान थी कि इन इलाको में लड़कियां अपने शरीर में होने वाले परिवर्तनों के बारे में एकदम अनभिज्ञ थी। लड़को की भी कमोवेश यही हालत थी। 92 फीसदी युवाओ ने बताया कि उन्हें अपने बदलावों के बारे में जानकारी अपने दोस्तों, सहेलियों से मिलती है, जो काफी हद तक गलत होती है। ग्रामीण इलाको के डाक्टर भी नीम हकीम भी होते हैं। कभी कभी वे भी गलत जानकारी दे देते हैं। नतीजा..शादी तो हो जाती है मगर ज्ञान शून्य।
एसे में धड़ाधड़ बच्चे ना पैदा होंगे तो क्या होगा।
क्या एसे पिछड़े इलाको में युवा परामर्श केंद्र नहीं खोले जाने चाहिए जहां जाकर बेहिचक ग्रामीण युवा लड़के, लड़कियां अपनी जिज्ञासा शांत करसकें, अपने सवाल पूछ सकें। क्या घरवालो को नहीं चाहिए कि अपने बच्चे को प्राथमिक स्तर की यौन शिक्षा दे सकें या दिला सकें। साधारण जानकारी तो घर में भी दी जा सकती हैं। नहीं तो बच्चों की शादी की उम्र बढा दो, समय के साथ कुछ बातें अपने आप समझ में आने लगती हैं। उनकी समझ पकने से पहले ही ब्याह देंगे तो क्या होगा। लड़कियों के मामले में मां बाप ही फैसला लेते हैं। यहां उनकी जवाबदेही ज्यादा बनती है। इनकी मानसिकता तो एसी होती है कि लड़की पैदा हुई नहीं कि उनका एक एक दिन इसी इंतजार में कटने लगता है कि कब जल्दी बड़ी हो और ब्याह दें। लड़के के बारे में सोचते हैं कि कब कमाने लगे कि घर में आर्थिक सहयोग करने लगे।
लड़की को जाना है अपने घर..इसलिए उससे एसी उम्मीद करना पाप है। लड़की की कमाई..ना बाबा ना..सोचना भी पाप है। जिस घर में जाएगी वहां तय होगा कि क्या करना है इसे आगे..हम तो पालक हैं, भाग्य विधाता कोई और..। अभी तक इस मानसिकता से पूरा समाज ग्रस्त है, खासकर ग्रामीण इलाको में तो घोर स्त्री विरोधी माहौल है।
एसे माहौल में उनसे ये उम्मीद करना कि वे लड़कियों को यौन शिक्षा देंगे, मूर्खता है। अज्ञानता का यह आलम है कि सर्वे में सिर्फ 32 फीसदी युवाओ को पता था कि गर्भपात क्या होता है। गर्भ निरोधको की जानकारी की तो बात ही मत पूछो।
यह चेहरा एक राज्य का नहीं है, एसे हालात देश के कई राज्य के ग्रामीण इलाके में है। बिहार में सर्वे करा लीजिए, इससे भी भयावह नतीजे मिलेंगे। जल्दी ही वहां के आंकड़े भी बोलेंगे..। हालात तो मेरा आंखों देखा है। बताएंगे विस्तार से..।



देर से शादी का फैसला कौन करे

Posted By Geetashree On 9:21 PM 9 comments



जनसंख्या कम करने के लिए क्या शानदार फार्मूला दिया दै हमारे आजाद ख्याल के स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने। उनका सुझाव है कि लोग शादी देर से करें तो देर तो तेजी से बढती हुई जनसंख्या पर जल्दी से काबू पाया जा सकेगा। तब लोग देर होने की वजह से कम बच्चे पैदा करेंगे। कितना सीधा सुझाव है। इसमें नई बात क्या है। मंत्री जी का एक और मजेदार सुझाव सुनें..गांवों में बिजली होने से भी जनसंख्या की समस्या पर काबू पाया जा सकता है। लोग रात के 12 बजे तक टीवी देखेंगे और बच्चे कम पैदा करेंगे। बहुत हल्के फुल्के मूड में मंत्री जी ने दो अलग अलग दुनिया की सच्चाईयों की तरफ ध्यान खींच दिया है। शहरो में लोग पहले से ही शादी देर से कर रहे हैं और जीवन की आपाधापी, काम के तनाव और व्यस्तता की वजह से रिश्तों में दूरियां वैसे ही आ गई है। कई रिश्ते टूट गए, कुछ टूट के कगार पर हैं तो कुछ ढोए जा रहे हैं। जहां समझदारी है वहां घुटन भी है जो सिर्फ एक को खाए जा रही है, वह है सिर्फ स्त्री। तमाम सेक्स सर्वे उठा कर देख लीजिए। इसकी भयावहता का अंदाजा लग जाएगा।
कामकाजी महिलाएं तो किसी तरह वक्त काट ले रही हैं, उनसे पूछिए जो घरेलु मोर्चे परतैनात हैं। यहां हम उनकी तरफ से विलाप नहीं करेंगे लेकिन कुछ सवाल उठाए जाने लाजिमी हैं। निपट देहात और झुग्गियों में वैसे भी स्त्रियां मनोरंजन का पर्याय हैं। एक अमेरिकी फिल्मकार का कोटस याद आ रहा है---जिन लोगों को अपने हिस्से का प्यार नहीं मिला सेक्स उनके लिए सांत्वना भर है। बिजली पंहुचा दे तो टीवी आसानी से उनकी जगह ले सकता है, मंत्री जी का इशारा शायद इसी तरफ था।
जहां तक देर से शादी की बात है तो बड़े शहरों में ज्यादतर लड़के लड़कियां शादी देर से कर रहे हैं..छोटे शहरो में नहीं। महनगरो की बात तो ना ही करें। यहां लोग बच्चे भी अपनी हैसियत देख पैदा कर कर रहे हैं। लेकिन इसकी असली जड़ तो छोटे शहर, कस्बा और गांव में है। वहां कौन समझाएं। मैं पिछड़े राज्यों की बात कर रही हूं, जहां आज भी लड़कियों को सिर्फ इसलिए पढाया लिखाया जाता है कि किसी अच्छे, कमाऊ लड़के से शादी हो जाए, कोई संपन्न परिवार मिल जाए और उनका पीछा छूटे। कुछ मां बाप को जमाने की हवा लगी तो सोचने लगे, थोड़ा पढ लिख जाएगी तो कभी ऊंच नीच(मतलब, परित्यक्ता, तलाकशुदा या विधवा) हुआ तो कमा खा लेगी। रोटी के लिए जमाने का मुंह नहीं जोहना पड़ेगा।
छोटे कस्बे में आज भी यही मानसिकता है। मां बाप अभी तक इसी सोच के हैं कि पढा लिखाकर मालिको (पति-ससुराल) के हाथों सौंप दो, भाग्यविधाता तय करेंगे कि आगे और पढाई जारी रखनी है या उन्हें बच्चा पैदा करने की मशीन में बदल देना है। गांव और छोटे कस्बे में देर से शादी के बारे में लड़की फैसले नहीं ले सकती। मां बाप चाहे तो भी नहीं ले सकते। वहां समाज बहुत प्रभावी होता है। उन्हें हर दिन सवालों के जबाव देने पड़ते हैं। लड़की को कब तक बिठा कर रखोगे, शादी क्यों नहीं हो रही, लड़की में कहीं खोट तो नहीं..ज्यादा उम्र हो गई तो कुंवारे लड़के मिलने मुश्किल है...जल्दी जो मिल रहा है कर दो। गांव-कस्बे के मध्यवर्ग में लड़की मैट्रिक पास करने के बाद से ही शादी के लायक हो जाती है। तभी से लडको पर नजर रखने लगते हैं लोग। आज भी ज्यादातर बीए पास करने से पहले लड़कियों की शादी हो जा रही है। एमए पास करने का मतलब लड़की का उम्रदराज हो जाना है। वहां तक पहुंचने का रिस्क मां बाप नहीं ले सकते। लड़के भले जिस उम्र में शादी करे। उनपर कोई हुकुम नहीं चलता। वे चाहे कितनी देर से शादी करें, उन्हें लड़की तो कमसिन-सी मिल ही जाएगी।
अब जिस समाज में लड़कियां अपनी शादी का फैसला नहीं कर सकती वहां बच्चा देर से पैदा करने के बारे में सोच भी कैसे सकती हैं। रहना उन्हें उसी समाज में है। महानगरों में लड़कियों का जीवन ज्यादा खुला और आजाद है। वे अपने लिए लड़-भिड़ लेती हैं। जब रहना हो कस्बे में तो कैसे लड़े-भिड़े। यहां कवि मित्र आलोक श्रीवास्तव की कविता की कुछ पंक्तियां सुनाती हूं..
इस समाज में / शोषण की बुनियाद पर टिके संबंध भी / प्रेम शब्द से अभिहित किए जाते हैं / एक स्त्री तैयार है मन-प्राण से / घर संभालने, खाना बनाने, कपड़ा धोने, और झाड़ू-बुहारु के लिए / मुस्तैद है पुरुष उसके भरण पोषण में.(कविता संग्रह-वेरा उन सपनो की कथा कहो)

यहीं पर स्त्रीमुक्ति की देवी सीमोन अपने एक इंटरव्यू में कहती हैं, जब पुरुष हमसे कहते हैं, एक अच्छी और सभ्य स्त्री बनने के रास्ते पर चलो। सारी भारी और कठिन चीजें जैसे ताकत, प्रतिष्ठा और कैरियर हमारे लिए छोड़ दो...तुम जैसी हो उसी में खुश रहो, पृथ्वी की लय में निमग्न, अपने मानवीय सरोकारों में तल्लीन....। दरअसल यह बहुत खतरनाक है।

हालांकि यह बहुत ही लंबे लेख और बहस का विषय है। इस पर फिर कभी। फिलहाल देर से शादी का मामला सामने है और इस पर पूरे समाज को गंभीरता से सोचने की जरुरत है। यह चेंज तभी संभव है जब अभिभावक लड़िकयों के बारे में वही रवैया रखें जैसे लड़को के बारे में रखते हैं। पहले लड़की के मन को टटोले और फिर उसकी नौकरी हो जाने तक का सपना देखें। फिर देखिए...

आपका क्या होगा जनाबेआली

Posted By Geetashree On 10:33 PM 9 comments



ये दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है, इसका अंदाजा इन दिनों कुछ ज्यादा ही हो रहा है। अभी समलैंगकिता पर उठा तूफान थमा नहीं था कि वैज्ञानिको ने एक और नई बहस छेड़ दी। समलैंगिकता को अवैज्ञानिक करार देने वाले इस नई वैज्ञानिक खोज के बारे में क्या कहेंगे.
ताजा ताजा खोज है-नजर डालें। पूरी दुनिया में हलचल मची है। लंदन के वैज्ञानिको ने पहली बार लैब में कृत्रिम मानव स्पर्म बनाने का दावा किया है। कहा तो ये भी जा रहा है कि इसके पूरी तरह से सफल होने पर बच्चा पैदा करने के लिए पुरुषों की जरुरत नहीं रह जाएगी। लगता है मर्दो ने इस बात को दिल पर ले लिया है। खोज जारी रही तो जल्दी ही औरतो की भी जरुरत नहीं पड़ेगी। उन्हें लग रहा है कि आगे चलकर अगर यह तकनीक प्रचलन में आई तो महिलाएं शायद बच्चे पैदा करने के काम से भी उन्हें अलग ना कर दें। तब तो उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। उनके घबराने की और भी वजहें हैं..तनाव, व्यस्तता, प्रदूषण की मार से पुरुषों में पिता बनने की क्षमता कम हो रही है। वंश चलाने के लिए पिता तो बनना ही पड़ेगा ना। विज्ञान उनका काम आसान कर रहा है तो सहजता से स्वीकारने में हर्ज क्या है।

विज्ञान की रफ्तार बहुत तेज है। वह सारी नैतिक बहसो से आगे निकल चुका है। नैतिकतावादी कृत्रिम बच्चे का विरोध कर सकते हैं। उन्हें भय सताने लगेगा कि आगे चलकर पूरी तरह से कृत्रिम रुप से बच्चे पैदा किए जाने लगेंगे।
वैज्ञानिको का कहना है कि अगर आगे भी टेस्ट में लैब में बनाए गए इन स्पर्म को नेचुरल स्पर्म की तरह साबित कर दिया गया तो इससे मेल इनफर्टिलिटी के मामले में बहुत सहायता मिल सकेगी। उनका कहना है कि अभी महिलाओं की कोशिकाओं से स्पर्म बनाने की संभावनाओं की भी स्टडी की जा रही है, ताकि लेस्बियन महिलाओं के लिए बच्चे को जन्म देना मुमकिन हो सके। यह सिर्फ समलैंगिको को लिए ही खुशी की बात नहीं है, पति में कमी की वजह से बच्चा पाने से वंचित जोड़ों के लिए भी नयी उम्मीद जागी है। आंकड़े बताते हैं कि हर छठे दंपत्ति को किसी ना किसी वजह से औलाद का सुख नहीं है। अब कमसेकम उनकी त्वचा की मदद से ही उन्हें संतान सुख मिल सकता है।
हालांकि अभी इस संबंध में कई सबूतो की मांग हो रही हैं। अभी इसे आसानी से नहीं माना जा सकता। फिर भी आप इस खोज को हल्के से नहीं ले सकते। ये बहुत ही क्रांतिकारी खोज होगी जो दुनिया का चेहरा बदल देगी। औरतों की दुनिया एकदम से बदल जाएगी। रिश्तों के मायने बदल जाएंगे। अभी समलैंगिकता ने जो तूफान उठाया उससे पुरुषों की दुनिया उबर नहीं पाई है। उनके अस्तित्व को जो खतरा समलैंगिकता से दिख रहा था, उससे ज्यादा खतरा यहां है। उन्हें खतरे की घंटी सुनाई दे रही है। जहां पुरुष इसे चौकन्ना करने वाली बात मान रहे हैं वहीं स्त्रियां अभी मौन हैं। इस मामले में अभी कोई राय कायम करना जल्दीबाजी ही होगी। लेकिन कुछ लोगों में त्वरित प्रतिक्रियाएं हो रही हैं जो बेहद दिलचस्प है।
कोई कह रहा है, कृत्रिम चीजें ज्यादा दिन नहीं चलने वाली।
पुरुष कभी अप्रासंगिक नहीं होगा।
-प्रकृति के करीब रहना ज्यादा जरुरी है। ये चीजें आएंगी और चली जाएंगी।
-स्त्री-पुरुष में एक दूसरे के प्रति जो आदिम ललक है, वह कायम रहेगी।
-हमें कुछ चीजों की आदत होती है, जो आसानी से नहीं छूटती...कितना भी साजिश रचे जाएं, रोमांटिसिज्म की परिकल्पना कभी खत्म नहीं होगी।
-स्त्री-पुरुष संबंधों में भावनाओं के साथ साथ देह की उपस्थिति अनिवार्य है।
-मैं भ्रम में हूं..इस खोज का समर्थन करें या खिलाफत। दोनों ही उलझा देने वाला है। हम विज्ञान के खिलाफ जाएं या ईश्वर के विऱुद्ध किसी मानवीय आयोजन में शामिल हों या सामाजिक बहसो को आमंत्रित करें। खोज करने वाले वैज्ञानिक तर्क दे रहे हैं कि विज्ञान हमेशा से सामाजिक बहस और मुद्दों से आगे रहता है। वह नैतिक बहसो के चक्कर में नहीं पड़ता। विज्ञान इनसे आगे चलता है। लेकिन यहां इतना तो सोचा ही जा सकता है कि प्रजनन सिर्फ बायोलोजिकल प्रक्रिया भर नहीं है। थ्योरिटिकल रुप से तो सही हो सकता है मगर इजाजत देने से पहले मनोवैज्ञानिक, सामाजिक पहलुओ पर क्या विचार नहीं करना चाहिए। आप क्या सोचते हैं....

इतिहास रचती भली स्त्रियां

Posted By Geetashree On 7:54 AM 13 comments

ब्लात्कार के आरोप में न्यायिक हिरासत झेल रहे अभिनेता शाइनी आहूजा की पत्नी बनी हुई हैं। वह लगातार अपने पति के पीछे खड़ी हैं, सारा सच जानते हुए भी..सारे सबूत शाइनी के खिलाफ जा रहे हैं...फिर भी वे तनी हुई हैं। ये अनुपमा अकेली नहीं हैं अपने समाज में..एसी कई अनुपमाएं हैं..खासकर एक सफल पति के पीछे...। अब अनुपमा एक प्रतीक बन चुकी हैं...एक एसी स्त्री जो अपने सफल पति के हर गुनाह को जायज बना देती हैं। उसे कुछ दिखाई नहीं देता...ना डीएनए टेस्ट की रिर्पोट ना पति गुनाह कबूलना...ना वे तमाम साक्ष्य जो चीख चीख कर उसके गुनाह का प्रमाण दे रहे हैं। एसी पत्नी की कामना कोई भी पुरुष कर सकता है..। पति पर चाहे जितने आरोप लगे..चाहे कितना गुनाह करें....ये छायाएं कभी साथ नहीं छोड़तीं। एसी स्त्रियों की आदर्श हि्लेरी क्लिंटन हैं...भारत में अनुपमा हो जाएंगी। ये तो किस्से सेलिब्रिटी लोगो के हैं। अपेक्षाकृत कम मशहूर किंतु सफल पतियों की पत्नियां भी इनसे कम नहीं हैं। अपने आसपास नजर दौड़ाइए...याद करिए...ढेरो उदाहरण मिल जाएंगे। पति पर बलात्कार के आरोप लग रहे हैं...जांच हो रही है...आरोप सच सिध्द हो रहे हैं...पति सजा पा रहे हैं..कुछ केस लड़ रहे हैं..कुछ हार रहे हैं..कुछ जीत रहे हैं..इन सबके बीच कहीं कुछ है जो दरक रहा है..टूट रहा है..
पति पर आरोप लगा नहीं कि वकील से पहले पत्नी मैदान में तैनात कर दी जाती है, कुछ अपनी मर्जी से तो कुछ अपनी मजबूरी में...ज्यादा मामले मजबूरी के। वो मजबूरी कई किस्म की हो सकती है। आखिर क्या वजह है कि पत्नी उनका साथ देती है। कौन सी मजबूरी...ये कैसी औरतें हैं जो खुद को मार रही हैं। दूसरी औरत के खिलाफ खड़ी होकर झूठ का साथ दे रही हैं। क्या इसमें उनका लाभ है।

कोई तो बात है...कि ये आधुनिकाएं बलात्कार जैसे जघन्य पाप करने वाले मर्द के पीछे खड़ी है..इतनी नासमझ भी नहीं वे..उन्हें पता है कि सच किस खिड़की से झांक रहा है..झूठ किस दरवाजे पर खड़ा दहाड़ रहा है। दोनों दिख रहा है...मगर ने कहां देख रही हैं...उन्हें दिख रहा है अपना भविष्य...अपनी छवि..एक भली स्त्री की छवि...जिससे गुनाहगार पति जीवन भर नहीं उबर पाएगा...और समाज, परिवार देवी बनाकर पूजेगा। इतनी प्रशंसा... कि वे जीवन भर इस नशे से ऊबर नहीं पाएंगी। ये पेज 3 की स्त्रियां हैं..जिनकी महफिल में रेप-वेप कोई बड़ी बात नहीं। कौन कहता है कि भली स्त्रियां इतिहास नहीं रचती..इन्हें देखिए..रच रही हैं ना। पुरुष जब इतिहास लिखेंगे तब स्त्रियां दर्ज होंगी, सम्मान के साथ...। वे नकार दी जाएंगी जिन्होंने गुनाहगार का साथ नहीं दिया और उन्हें सजा दिलाई। सुना है कभी उनका नाम...नहीं ना। अनुपमा के समर्थन में कई पेज3 महिलाएं बयान दे रही हैं...रीतू बेरी हों या अदिति गोवित्रीकर या अर्चना पूरन सिंह या सुचित्रा कृष्णमूर्ति...सबकी एक ही बानी...पता नहीं शाइनी गुनाहगार है या नहीं..मगर अनुपमा जो कर रही है उसकी सराहना करनी चाहिए। वह अपने पति के साथ पूरी ताकत के साथ खड़ी है..उसे संकट की इस घड़ी में खड़ा भी होना चाहिए...वह जानती है कि उसका पति दोषी नहीं है..एक पत्नी को अपने पति के पीछे खड़ा होना भी चाहिए..सार्वजनिक जगहो पर पत्नी को रिएक्ट भी नहीं करना चाहिए..बंद दरवाजे के पीछे चाहे पति को लताड़ लगाए...
इन औरतो से क्या पूछा नहीं जाना चाहिए...कि अगर कभी उनके साथ एसा होगा तो उनके पति क्या करेंगे. क्या इतनी ही उदारता बरतेंगे। शादी के बाद पत्नी का एक पुरुष मित्र तक तो बर्दाश्त नहीं होता...प्रेमी का पता चले तो या तो मार डालेंगे या मामला तलाक तक पक्का पहुंचेगा। पूरे समाज में घूम घूम कर गालियां बकेंगे सो अलग. वाइफ स्वैपिंग करने वालो को छोड़ दें,वहां तो सब काम आपसी सहमति के आधार पर चलता है। सामान्य किस्म के पति कभी प्रेस कांफ्रेंस करके अपनी पत्नी की बेगुनाही का ढोल नहीं पीटेंगे। कभी नजर उठाकर समाज में चल नहीं पांएगे। इज्जत मिट्टी मे मिल जाएगी। औरतों की कोई इज्जत ही नहीं होती। इसका ठेका सिर्फ पुरुषो ने ले रखा है।

आज से लगभग 20 साल पहले महेश भट्ट की फिल्म अर्थ आई थी.. फिल्म प्रेमी जानते हैं कि विवाहेत्तर संबंधों पर यह फिल्म कैसे रिश्तों की परतें खोली थीं। फिल्म के अंत में...जब शादीशुदा नायक अपनी प्रेमिका से हताश होकर पत्नी के पास लौटता है, तब पत्नी एक सवाल पूछती है...अगर मैंने एसा किया होता और लौट कर आती तो क्या तुम मुझे स्वीकार लेते। जवाब के मामले में इमानदार पति थोड़ी देर सोचता है, फिर कहता है...नहीं। पत्नी को शायद इसी जवाब का इंतजार था...वह पुर्नमिलन की उम्मीद लगाए पति को थैंक्यू कह कर चली जाती है।
अपने किशोरावस्था में देखी गई इस फिल्म ने मेरे मन पर एसी छाप छोड़ी कि भली पत्नी बनने की जगह एक अच्छी नागरिक बनना ज्यादा जरुरी लगता है..ये अच्छी पत्नियों को कौन समझाए, जो सफल पति से मिले एशोआराम, नाम, प्रतिष्टा किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहती...वे इस मानसिकता से ग्रस्त हैं कि मेरा पति कोठा जाए...आपको क्या...

वैध बनेंगे अवैध रिश्ते

Posted By Geetashree On 1:40 AM 10 comments

आज 2 जुलाई है। सुबह से एक समूह की धड़कने बढी हुईं थीं..पता नहीं कोर्ट में क्या होगा..क्या फैसला आएगा..वो घड़ी आ ही गई। दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिक रिश्तों पर आज फैसला सुना दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार 18 साल की उम्र से ऊपर रजामंदी से किया गया समलैंगिक रिश्ता अपराघ नहीं है। समलैंगिकता को कानूनी तौर पर मान्यता देते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को गैरआपराधिक करार दिया है। हाईकोर्ट के अनुसार स्त्री का स्त्री से या पुरूष का पुरूष से सहमति से संबंध बनाना अपराघ नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट के अनुसार धारा 377 वैघ नहीं है और यह मौलिक अधिकार का हनन है। गे संबंघ को कानूनन अपराध नही माना जाता है। 1861 में अंग्रेजों ने यह कानून बनाया था।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद गे समूह ने राहत की सांस ली होगी। इनकी राह में जहां सबसे बड़ा रोड़ा भारतीय समाज का पारंपरिक रवैया था, वहीं धारा 377। फैसले के बाद अवैध रिश्ते वैध बन जाएंगे और कोई मुंह छिपा कर अपनी जिंदगी नहीं जिएगा। समान सेक्स के बीच संबंधों को स्वीकृति देने वाले इस फैसले को अभी एक बड़ी लड़ाई और जीतनी है..उन्हें, अभी उनके सामने कठमुल्लों के कोप से जूझने की चुनौती है। वे लोग हार नहीं मानेंगे..अभी उच्च अदालत का रास्ता बचता है..फिलहाल जिन्न बोतल से बाहर आ गय़ा है।
इसे एक लीक से हटकर, एतिहासिक फैसला करार दे सकते हैं। यह भारत के लिए बड़ा फैसला है। भारतीय समाज की बनावट को देखते हुए बहुत आसान नहीं रही होगी फैसले की डगर। इस फैसले के बाद भारत उन 16 देशों में शामिल हो जाएगा जहां समलैंगिकता को कानूनी मान्यता प्राप्त है। नीदरलैंड, नार्वे, बेलज्यिम, स्पेन, कनाडा, द.अफ्रीका, समेत कई अन्य देशो में समलैंगिकता को कानूनी मान्यता प्राप्त है।
यहां बता दें कि ये अधिकार पाने की लड़ाई कहां से शुरु हुई। दिल्ली स्थित नाज फाउंडेशन ने सन 2001 में हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर इस धारा में संशोधन की मांग की थी। अर्जी में कहा गया था कि दो व्यस्को(होमो या हेट्रो) के बीच अगर आपसी सहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाए जाते हैं, यानी दो लोग अगर होमो सेक्सुआलिटी में संलिप्त हैं तो उनके खिलाफ धारा 377 का केस नहीं बनना चाहिए। मामले की सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय और हेल्थ मिनिस्ट्री की दलीलें भी अलग अलग थीं...गृह मंत्रालय जहां धारा 377 में संसोधन के पक्ष में था वहीं हेल्थ ने भी पक्ष लिया...इस तरह माहौल बनता चला गया..। हालांकि सरकारी वकील ने नाज की अर्जी के खिलाफ खूब दलीलें दीं..लेकिन पक्ष की दलील भारी पड़ी..जिसमें कहा गया कि धारा 377 मूलभूत अधिकारों में दखल दे रहा है। मैंने भी तो पिछले पोस्ट में कुछ एसी ही दलील दी थी..
मुझे यहा जिक्र करना लाजिमी लग रहा है। मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई ने महिला समलैंगिकता पर जब लिहाफ कहानी लिखी तब जोरदार हंगामा हुआ था और उन पर ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा चलाया था। वैसी कहानी जब जब लिखी गई..हंगामा हुआ..दीपा मेहता ने फिल्म फायर बनाई...हंगामा हुआ..धरने प्रदर्शन हुए..पुतले जलाए गए..नैतिकता और भारतीय संस्कृति खतरे में जो पड़ गई थी..।
अब तो बात कहानियों से ऊपर उठ गई है...अब परदे के पीछे का सच सामने आने लगा है...आपके आसपास दिखाई देगा..। साहित्य में झेलने के बाद अब जीवन में देखने की आदत समाज को डालनी पड़ेगी। तभी ये सियापा रुकेगा। मेरे एक मित्र ठीक ही कहते हैं, आधुनिकता और रिश्तों की निजता उन्हें सिर्फ कहानी-कविता में चाहिए, जीवन में नहीं। हमारे समाज में जो तथाकथित आधुनिक मनबोध के लोग हैं, वे बहस में अपनी शताब्दी से आगे नजर आते हैं, लेकिन उनका जीवन पिछली शताब्दी से भी पीछे रहता है।
समय की मांग को सुनने की ताकत पैदा करना जरुरी है, नहीं तो समय ही आपको खारिज कर देगा। यह मसला समय की मांग है। कब तक इनकार करते रहते। आपको दिखाई नहीं दे रहा था जब ये चीजें आपके घर में ही घट रही थीं..। वैसे भी चंद लोगो के वाहियात विरोध की कोई अहमियत नहीं होती। युवा आबादी वाले देश में आप युवाओं में सर्वे करा लो..। सारा भ्रम टूट जाएगा। नौजवान पीढी मानती है कि यह मामला निहायत ही व्यक्तिगत है। एक अखबार में युवाओं की बेखौफ राय छपी है जिसमें उन्होंने अपनी राय साफ जाहिर कर दी है... किसी को भी हक है अपनी पसंद चुनने का। अगर आप इसके खिलाफ हैं... तो रहिए, ये आपकी राय हो सकती है लेकिन आप कृपया इसे अपराध नहीं मानें।

एक समानांतर दुनिया के लोग

Posted By Geetashree On 4:14 AM 10 comments

नैतिकता के ठेकेदारों की दुनिया में फिर से खलबली मची है. अचानक उन्हें नैतिकता खतरे में दिखाई दे रही है. उनके हिसाब से परदे के पीछे जो नरक करना हो करो..सामने आए तो मारे जाओगे. क्योंकि इससे समाज का ढांचा गड़बड़ा जाएगा..परिवार नामक संस्था कमजोर पड़ जाएगी..भारतीय समाज यूरोपीय समाज में बदल जाएगा.
समलौंगिको को सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए सरकार ने कानून बदलने की अभी सोच ही रही है कि ठेकेदार सामने आ गए है और छाती पीट रहे हैं. उस वक्त ये ठेकेदार सो जाते हैं जब किसी लड़की का सामूहिक बलात्कार होता है या किसी दलित लड़की को सरेआम नंगा करके घुमाया जाता है. सरकार को भी इन्हीं से भय है..पता नहीं क्या हंगामा कर बैठे। समलैंगिकता को इतना बड़ा मुद्दा ना बना दे कि संसद का अगला सत्र हंगामेदार हो जाए.
सोच जब गहरी हो जाती है तब इरादे कमजोर पड़ जाते हैं। सरकार इस पर सोच विचार करने की बात करके फिलहाल हंगामे को टालने मूड में दिखाई दे रही है। समलैंगिक संबंधों को गैरकानूनी ठहराने वाले आईपीसी के सेक्शन 377 को बदलने के लिए जैसे ही सरकार ने इसकी पुर्नविवेचना की आवश्यकता पर जोर दिया वैसे ही किसी का दुनिया आबाद हो उठी तो समाज के ठेकेदारों के पेशानी पर बल पड़ गए..सरकार ने कहा ही है कि वह समाज के सभी तबको से बात करने वाली है और इनमें धार्मिक संस्थाएं भी शामिल होंगी. कानून मंत्री वीरप्पा मोइली बयान सुने-कैबिनेट को इस मुद्दे पर विचार करने कहा गया है लेकिन जल्दीबाजी में कोई फैसला नहीं लिया जाएगा. पता नहीं सरकार किस मूड में है..अगर धार्मिक संगठनो को शामिल करेगी तो भारत में समलैंगिक समाज को मान्यता मिलना असंभव है. विरोधी दल अपना विरोध जता रहे हैं कि भारत को यूरोप नहीं बनने देंगे. भारत में अप्राकृतिक(कानून की नजर में 10 साल की सजा का प्रवधान) यौन संबंधों के लिए कोई जगह नहीं है. लेकिन यूरोपीय देशों में इसे व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा संवैधानिक अधिकार मानते हैं। क्या भारत में नहीं होना चाहिए एसा..क्या यहां के लोगो को व्यक्तिगत पसंद चुनने का हक नहीं होना चाहिए. माना कि यहां वहां के समाजो में काफी अंतर है..मगर यहां मसला व्यक्तिगत आजादी का है जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज की पहली पहचान, पहली शर्त्त होती है. सरकार के कुछ मंत्री भी डर रहे है कि इस तरह के संबंध को छूट देने से देश की कानून व्यवस्था बिगड़ेगी। कोई तर्क दे रहा है कि इस कानून को मान्यता देने से ,माज में अराजकता फैल जाएगी, कोई इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ मान रहा है तो कोई इसे भयानक बीमारियों से जोड़ कर देख रहा है...। हमें समझ में नहीं आता कि आखिर दो व्यक्तियो के बीच प्रेम अपराध कैसे हो सकता है। अपनी लैंगिकता का उत्सव मनाने में जुटे लोगो की बातें तो इक बार सुनो..हमें तो डर है कि यह मसला भी राजनीति का शिकार होकर ना रह जाए. दिल्ली समेत कई शहरो में समानांतर दुनिया के लोगो ने खुशियां तो मना ली..सरेआम खुल कर..बयान भी दिए...टीवी चैनलों पर चीख चीख कर कहा कि हमने नहीं चुना ये रास्ता..इसको समझो. हमें ईश्वर ने बनाया एसा तो हम क्या करें...। हालाकिं ये पूरा सच नहीं है। कई बार कुछ लोग खुद चुनते हैं इस रास्ते को..खासकर औरतें..जब वे शासक पुरुषों के चंगुल से मुक्ति चाहती है तब। मर्द क्यों होते हैं समलैगिक, ये तो वही जानें..शायद प्रकृति उन्हें बना कर भेजती है..लेकिन औरते इस मामले में कई बार अपना रास्ता खुद चुन लेती है। कुछ प्राकृतिक रुप से समलैगिंक होती भी हैं। दोनो ही मामले में एक स्त्री या इनसान को अपनी देह पर इतना अधिकार तो है ना कि वो अपनी मर्जी से सेक्स जीवन का चुनाव करे। ना जाने कितनी लड़कियों और पुरुषों को जबरन शादी के बंधन में बांध कर उनका जीवन बरबाद कर दिया गया है। मेरे जानने वाले एक मेकअप मैंन की व्यथा सुने जिनकी शादी हाल ही में कर दी गई। घरवाले उसकी बात सुनने तक को तैयार नहीं थे। अंत क्या हुआ...बीबी दो दिन में यह कहते हुए छोड़ गई कि तुम्हें पुरुष की जरुरत है मेरी नहीं..। आज वो अपने भविष्य के इस अंधेरे से अकेले जूझ रहा है..
क्या उसे हक नहीं कि जिसके साथ वह कंफर्टेबल है उसके साथ जीवन शुरु कर सके..समाज में रह सके..लोग उसे हीन नजर से ना देखें..क्या घरवालों को उसकी समस्या को समझना नहीं चाहिए..इसी साल एक चर्चित फिल्म दोस्ताना आई थी..बहुत चली और सराही गई। इसमें एक बात गौर कने लायक है कि एक दकियानूसी मां आखिर अपने बेटे के समलैंगिक होने को स्वीकार लेती है. ये अलग बात है कि बेटा समलैगिंक नहीं है..मगर फिल्म इसी उद्ददेश्य से बनाई गई है कि समाज अपना रवैया बदले। एसे रिश्तों से लोगो को परिवार का ढांचा बखरता क्यों दिखाई दे रहा है..जबकि एसे कई सफल जोड़ो ने बच्चे तक गोद लिए हैं, परिवार बनाया है. कहां हैं समस्या..एसा भी नहीं कि कानून बनते ही सारे लोग इसी रास्ते पर चल पड़ेंगे..जो जैसा है वै वैसा ही जीवन चुनेगा..बस एक समानांतर दुनिया जरुर बन जाएगी जो आपसे ज्यादा खुली और आजाद होगी..कुंठा रहित..

शादी से तौब्बा

Posted By Geetashree On 7:14 AM 3 comments


आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हो रहे हमलो के बीच एक दिलचस्प खबर आई. जो औरतो की दुनिया की से ताल्लुक रखती है. सबकी नजरो से खबर आई गई हो गई. छात्रों पर हो रहे हमले से मन खिन्न था लेकिन एक खबर थी मुझे चौंका नहीं रही थी, बस खलबली थी, भीतर कहीं..


आज से तीन साल पहले मैं तीन देशों की यात्रा पर गई थी, महिला पत्रकारों के एक समूह के साथ. हमें
वहां की औरतों की समाज में स्थिति पर अध्ययन करना था। वो देश थे, बेलजियम, जर्मनी और लंदन. शुरुआत हुई ब्रसेल्स से यानी बेल्जियम से. वहां अध्ययन के दौरान पता चला तो हमारी हैरान होने की बारी थी। लंदन तक पंहुचते पंहुचते हम कंवींश हो चुके थे...सब समझ में आ गया था.

पहले आस्ट्रेलिया की वो खबर बता दें जिसने मुझे यो पोस्ट लिखने को उकसाया. खबर एक लाइन..आस्ट्रेलियाई महिलाओं की शादी से ना. वहां की ज्यादातर महिलाएं तमाम उम्र शादी ना करने का फैसला ले रही हैं. यह बात पेसिफिक माइक्रो मार्केटिंग नामक अनुसंधान संस्था द्रारा पता लगाई गई है। समाचार एजेंसी डीपीए ने जनसंख्या विशेषज्ञों द्वारा उपलब्ध करवाए गए आंकड़ों के हवाले से बताया है कि आस्ट्रेलिया की 51 फीसदी महिलाएं अविवाहित हैं, और एक चौथाई से ज्यादा महिलाएं चाहती हैं कि वह एसे पुरुष के साथ रहें जो रिश्ता निभाने के लिए समझौते करने को भी तैयार हो. यह मनोवृति महिलाओं को एकल जीवन जीने के लिए प्रेरित करती है जो पुरुषों के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही है.

वैसे आमतौर पर आर्थिक रुप से स्वतंत्र महिलाएं देर से शादी करने की इच्छा रखती हैं, लेकिन आस्ट्रेलियाई समाज में हो रहे बदलाव दिखाते हैं कि महिलाओं ने घर और रिश्तों की परिभाषाएं ही बदल दी है.
यहां पर बता दें कि इन दिनों समूचे पश्चिम समाज में यह चलन तेजी से फैल चुका है. तीन साल पहले की ही तो बात है जब हम तीन विकसित देशों का यात्रा करके जान समझ करके लौटे हैं. अब उनमें आस्ट्रेलिया भी शामिल हो गया है...हमारे अध्ययन के मुताबिक बेल्जियम की औरतो ने शादी तो कर ली लेकिन बच्चे पैदा करने से मना कर दिया. ना तो वहां क्रेच है, ना ही भारत की तरह 24 घंटे वाली मेड मिलती है. पार्टटाइम मेड जितना पैसा मांगती है उतने में उनकी आधी कमाई निकल जाती है. बच्चे के लालन पालन का बोझ किस पर पड़ता है-औरतों पर. कामकाजी औरतें दोतरफा मार झेलने के लिए अब तैयार नहीं हैं और परिणामस्वरुप उन्होंने मां बनने से ही विद्रोह कर दिया. भारत की तरह नहीं कि कामकाजी औरत दोनो मोर्चो पर मुस्तैदी से डटी रहे, बदले में अपने बच्चे की एक मीठी मुस्कान से अपनी थकान उतार ले. .घर और समाज तारीफ के पुल बांधे...देखो तो ...फलां महिला कितनी कुशल है. घर और नौकरी दोनों कैसे संभाल रही है...समाज खुश..घरवाले खुश...और खुद भी धीरे धीरे खुश होने की प्रक्रिया में शामिल (और चारा भी क्या है) । एक सुघड़ औरत और कर भी क्या सकती है.

अब भारतीय महिलाएं भी बदल रही है, बदल रही है उनकी सोच. मैं कई एसी शादी शुदा ल़ड़कियों को जानती हूं जो बेखौफ फैसले ले चुकी हैं और अपने साथी को भी धीरे धीरे मानसिक रुप से इसके लिए तैयार कर चुकी हैं. हां तो मैं विदेशों का बात कर रही थी...चाहे किसी देश की महिला हो, समस्याएं कमोबेश एक सी हैं. खासकर कोख और किचेन के मामले में. इसीलिए अधिकांश देशों की महिलाओ का कोख से मोहभंग हो चुका है.वहां की सरकारें चिंतित हैं..जनसंख्या घट रही है..पिछले साल जर्मनी से एक खबर आई थी कि वहां की सरकार वो तमाम सुविधाएं देने पर विचार कर रही है ताकि महिलाएं अपने फैसले बदल लें.

मुक्तिराग की आहटें

Posted By Geetashree On 5:09 AM 4 comments

गीताश्री

आधी दुनिया के लिए यह खुश होने का वक्त है.भारत में महिला आरक्षण बिल पर मचे बवाल ने आधी आबादी की दुनिया में जहां मायूसी का आलम पैदा किया है, वहीं बाहर से आई एक ताजा खबर सूकून देने वाली है. अब सऊदी अरब में महिलाओं पर पाबंदी में कुछ रियायत मिलने वाली है. हल वक्त एक संरक्षक होने को अनिवार्य़ करने वाले नियमों को खत्म करने संबंधी कदम उठाने का संकल्प वहां की सरकार ने लिया है।

यह बात हम सबको पता थी कि सऊदी अरब में महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर अकेली जाने, विदेश यात्रा, शादी करने और सार्वजनिक सेनाएं हासिल करने के लिए पुरुषों का संरक्षण लेना जरुरी होता है. यह एकमात्र एसा मुल्क है जहां औरतें बिना बुर्के के बाहर नहीं निकल सकती, ना ही गाड़ी ड्राइव कर सकती हैं. घोषित तौर पर कई अन्य इस्लामिक देशों में औरतों पर इतनी पाबंदी नहीं है.
अब ईरान को ही लें. अपनी आंखों से देख सुन, जी कर आई हूं..वहां हमने भी सिर पर स्कार्फ बांधा, पूरी बांह के कपड़े पहने..सड़को पर चुपचाप फिरे..ना गाना..ना बजाना..मगर बुर्के से आजादी तो थी. लड़कियां गाड़ी चला रही थीं, सरेआम सिगरेट फूंक रही थीं., हुक्के गुड़गुड़ा रही थीं..अकेली फिर रही थीं. तेहरान की सड़को पर लड़िकयां लड़को के हाथ में हाथ डाले घूमती दिख जाती हैं. वे लड़के संरक्षक नहीं, साथी होते हैं. वहां कुछ पाबंदियों को छोड़ दें तो सऊदी अरब से बेहतर स्थितियों में ईरानी महिलाएं सांसें ले रही हैं. ऐसा नहीं है कि सऊदी की औरतें गूंगी गुड़ियाएं है. समय-समय पर उन्होंने आवाज उठाई है, कई नियमों के बदलाव के खिलाफ, मगर उन्हें हर बार वहां के प्रभावशाली कट्टरपंथी धर्मगुरुओं के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा और उनकी आवाजें दब गईं. सऊदी अरब हो या अन्य कोई इस्लामिक देश, उनका कानून काफी हद तक शरीयत पर निर्भर करता है. बाकी इस्लामिक देशों ने आधुनिक रंगढ़ग अपना लिया है, सऊदी अरब अभी तक उसी पुराने रंग ढंग की काली खोल में लिपटा रहा है. पिछले सप्ताह जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद के साथ एक समीक्षा हुई बैठक के दौरान सऊदी अरब के अधिकारियों ने पहली बार अपना उदारवादी चेहरा दिखाया. उन्होंने बयान दिया कि इस्लाम महिलाओं को अपने काम करने और कानून द्वारा दिए गए अधिकारों के इस्तेमाल के हक की इजाजत देता है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शरीयत में वर्णित पुरुष संरक्षकत्व का सिध्दांत सऊदी कानून में शामिल नहीं है. ऐसा बयान देने वालों से कौन पूछे कि जब पुरुष संरक्षकत्व का सिध्दांत आपके कानून में नहीं था, तब आपने औरतों पर अपनी मर्जी क्यों और कैसे थोपी? इतनी देर से आपको समझ में कैसे आया? औरतों को पता नहीं कितनी पीढ़ियां अपनी मुक्ति का स्वप्न देखती हुई गुजर गई.

फिलहाल मेरी पड़ोसन और सऊदी अरब में रहने वाली भारतीय महिला पिंकी भटनागर आज मुस्कुरा रही होगी. शीघ्र ही उसे सऊदी अरब अच्छा लगने लगेगा. उसे बुर्के से आजादी तो नहीं मिलेने वाली. हां वह जहां चाहे वहां अकेली तो जा ही सकती है. पति की व्यस्तता ने उसे एकदम से वहां घर में कैद कर लिया है. वह बिना कथित पुरुष संरक्षक के बाजार तक नहीं जा सकती, गाड़ी चलाना तो दूर. अपने डॉ. पति के साथ रियाद के पास 'आभा' शहर में रहने वाली पिंकी को वहां के नियम कानून के हिसाब से रहना पड़ता है. जब भी वह भारत आती है या यूं कहें, वहां के दमघोंटू (औरत विरोधी) माहौल से भाग-भाग कर यहां आती है तो उसके जीने-रहने-पहनने-ओढ़ने के मायने बदल जाते है. फर्राटे से कार चलाती हुई, किसी से भी गुर्राकर बात करने वाली, पश्चिमी ड्रेस में लिपटी, गोल्फ खेलने जाती हुई पिंकी रियाद से दिल्ली की फ्लाइट में बैठते ही बुर्के को ऐसे उतार फेंकती है जैसे कोई कैदी अपनी जेल की कैदी नंबर वाली पोशाक से पीछा छुड़ाता है. पति के साथ सऊदी अरब में रहना मजबूरी ना होती तो वह अपनी इस बेखौफ, बेलौस आजादी को कभी ना गंवाती.

पिंकी भारत के उपनगरीय अपार्टमेंट में रहती हैं जहां मध्यवर्गीय लोगों की जमात है. आमतौर पर वहां महिलाएं उतनी आधुनिक नहीं दिखाई देतीं संयमित उदासीन माहौल में पिंकी अपनी आजादी को यहां जी भर कर जीती है- यूं कहं खुलकर. शुरू शुरू में मुझे हैरानी होती थी. औरों को भी अटपटा लगता था.

सऊदी अरब के संकीर्ण मिजाज को समझते थे, उन्हें शीघ्र पता चल गया कि आखिर पिंकी ऐसी क्यों है? एक कैदी अब जेल से बाहर आता है तो आप उसकी मनोदशा सोच सकते हैं. बुर्काविहीन देह, हाथ में स्टेयरिंग, खुला मुहल्ला, अकेली मटरगश्ती, शाम को स्विमिंग....गोल्फ क्लब में पुरुष साथियों के साथ शॉट मारती हुई... एक ऐसी आजाद स्त्री की छवि है जो मैं पिंकी में देखती हूं. जब सऊदी जाने का दिन करीब आता है, उसकी उदासी घनी होती जाती है. बुर्के को इस्त्री करवाकर मंगाती है और बैग के ऊपरी हिस्से में रखती है. अपनी आजादी को उसे इसी काले चोगे के भीतर कैद करना है. और उस देश में पति की उंगली थाम कर उसकी छाया में घूमना है. अपनी आजादी को इतने आक्रामक तरीके से भोगते हुए मैंने किसी मध्यवर्गीय स्त्री को नहीं देखा. पिंकी अब थोड़ी आजादी के साथ वहां जी सकेंगी. शायद ऐसी ही खुशी सऊदी की उन तमाम औरतों के चेहरे पर होगी जो पुरुषों की छाया से मुक्त होकर अपने शहर कस्बे की गलियों में फिरना चाहती है, विदेश जाना चाहती हैं. उनकी मुक्ति-राग मुझे सुनाई दे रहा है.

चीन की चकाचौंध में तिब्बत के गिरवी सपने

Posted By Geetashree On 7:41 AM 9 comments



दो साल पहले मैं चीन और तिब्बत की यात्रा करके लौटी तब से तिब्बत मेरे दिल दिमाग में घूम रहा है। मैंने चीन पर कई लेख लिखे मगर तिब्बत पर लिखने की इजाजत नहीं मिली. सारे अनुभव, सारी भावनाएं धरी रह गईं। अब जब तिब्बत अपनी गुलामी के 50 साल पूरे कर चुका है तब मुझे उनकी पीड़ा याद आई. गुलाम देश के लोग कैसे जीते हैं, उनका जीवन कैसा होता है, वे कैसे जीते हैं वो देखा ल्हासा जाकर. तभी गुलामी भारत की याद आई... अपने पूर्वजो के चेहरे मिलते जुलते से लगे।मैं सिलसिलेवार वहां का अनुभव लिखना चाहती हूं..यही मेरी दुआ है उनकी आजादी के लिए।

तिब्बत और चीन के बीच जब पहले दिन रेल गाड़ी चली तो तिब्बत के युवा गायक उस पर सवार हुए और गाना गाते रहे... रेलगाड़ी से पेइचिंग जा रहे हैं हम, बर्फीली पठार की शुभकामनाएं साथ लेकर... -छिंगहाई तिब्बत का सूर्य लेकर जा रहे हैं हम... श्वांग उत्साह में भूल गए थे कि वह ट्रेन उनके देश को चीन के शिकंजे में और कसने का औजार बनने वाली है। श्वांग अपने देश की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसने चीन की जकड़न वाले तिब्बत में आंखें खोली हैं और जिसकी आंखें चीन की चमक में चौंधिया रही हैं।
तिब्बत में चौदहवें दलाई लामा का सिर्फ नाम भर सुनने वाली पीढ़ी की पीड़ा तब गहरा जाती है जब वह अपनी गुलामी की पचासवीं वर्षगांठ का मातम मनाने वालों में शामिल होती है। भारत से आए लोगों के युवा तिब्बती करीब आते हैं। दिल पर हाथ रखते हैं और फुसफुसाते हैं, क्या आपने कभी दलाई लामा को देखा है. ल्हासा स्थित दलाई लामा के पोटाला महल में तेरहवें दलाई लामा तक की चर्चा होती है। मौजूदा दलाई लामा की चर्चा नहीं होती। चर्चा पर प्रतिबंध है।
ल्हासा के बाखोर बाजार की दुकानों में एक दुकानदार दबी जुबान में आरोप लगाता है कि आबादी में चीन के हान मूल के लोगों की संख्या बढ़ रही है। जबकि सरकारी आंकड़े कहते हैं कि यहां तिब्बती अब भी 92 प्रतिशत हैं। यहां हान की आबादी 40 प्रतिशत है और ऊंचे पदों पर चीनी लोग काबिज हैं। सरकारी नौकरी के लिए चीनी भाषा का ज्ञान आवश्यक कर दिया गया है। इसकी वजह से तिब्बती पिछड़ रहे हैं।
तिब्बत भाषा के एकमात्र अखबार तिब्बत डेली में भी महत्वपूर्ण पदों पर चीनी लोग बैठे हैं। तिब्बतियों की नजर में हर चीनी अपनी सरकार का जासूस है और कुछ तिब्बतियों को भी जासूसी के लिए इस्तेमाल कर रही है।

पहले चीन और तिब्बत के बीच आवागमन महंगा और कठिन था। रेल ने रास्ते आसान कर दिये हैं. ल्हासा में चीन ने बड़ी बड़ी इमारतें खड़ी कर दी हैं। उन पर चीनी भाषा में विशालकाय होर्डिंग्स लगी हैं। यह चकाचौंध नई पीढी को लुभा रही है।
लेकिन यह 'लुभाना' सबके लिए एक समान नहीं है. युवाओं में ऐसे लोगों की संख्या काफी बड़ी है, जो चीन से अलग अपने सपने देखते हैं, सपने कि जिनमें उनका देश आज़ाद हो...... युवा तिब्बतियों को लगने लगा है कि अपनी पहचान और संस्कृति को बचाए रखें तथा विकास को स्वीकारते हुए आजादी की अपनी मांग पर कायम रहें। इसके उलट चीनी सरकार सोचती है कि विकास में जब तिब्बतियों की भागीदारी बढेगी तो स्वतंत्रता की मांग खुद ब खुद ठंडी पड़ जाएगी।