चीन की चकाचौंध में तिब्बत के गिरवी सपने

Posted By Geetashree On 7:41 AM 9 comments



दो साल पहले मैं चीन और तिब्बत की यात्रा करके लौटी तब से तिब्बत मेरे दिल दिमाग में घूम रहा है। मैंने चीन पर कई लेख लिखे मगर तिब्बत पर लिखने की इजाजत नहीं मिली. सारे अनुभव, सारी भावनाएं धरी रह गईं। अब जब तिब्बत अपनी गुलामी के 50 साल पूरे कर चुका है तब मुझे उनकी पीड़ा याद आई. गुलाम देश के लोग कैसे जीते हैं, उनका जीवन कैसा होता है, वे कैसे जीते हैं वो देखा ल्हासा जाकर. तभी गुलामी भारत की याद आई... अपने पूर्वजो के चेहरे मिलते जुलते से लगे।मैं सिलसिलेवार वहां का अनुभव लिखना चाहती हूं..यही मेरी दुआ है उनकी आजादी के लिए।

तिब्बत और चीन के बीच जब पहले दिन रेल गाड़ी चली तो तिब्बत के युवा गायक उस पर सवार हुए और गाना गाते रहे... रेलगाड़ी से पेइचिंग जा रहे हैं हम, बर्फीली पठार की शुभकामनाएं साथ लेकर... -छिंगहाई तिब्बत का सूर्य लेकर जा रहे हैं हम...। श्वांग उत्साह में भूल गए थे कि वह ट्रेन उनके देश को चीन के शिकंजे में और कसने का औजार बनने वाली है। श्वांग अपने देश की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसने चीन की जकड़न वाले तिब्बत में आंखें खोली हैं और जिसकी आंखें चीन की चमक में चौंधिया रही हैं।
तिब्बत में चौदहवें दलाई लामा का सिर्फ नाम भर सुनने वाली पीढ़ी की पीड़ा तब गहरा जाती है जब वह अपनी गुलामी की पचासवीं वर्षगांठ का मातम मनाने वालों में शामिल होती है। भारत से आए लोगों के युवा तिब्बती करीब आते हैं। दिल पर हाथ रखते हैं और फुसफुसाते हैं, क्या आपने कभी दलाई लामा को देखा है. ल्हासा स्थित दलाई लामा के पोटाला महल में तेरहवें दलाई लामा तक की चर्चा होती है। मौजूदा दलाई लामा की चर्चा नहीं होती। चर्चा पर प्रतिबंध है।
ल्हासा के बाखोर बाजार की दुकानों में एक दुकानदार दबी जुबान में आरोप लगाता है कि आबादी में चीन के हान मूल के लोगों की संख्या बढ़ रही है। जबकि सरकारी आंकड़े कहते हैं कि यहां तिब्बती अब भी 92 प्रतिशत हैं। यहां हान की आबादी 40 प्रतिशत है और ऊंचे पदों पर चीनी लोग काबिज हैं। सरकारी नौकरी के लिए चीनी भाषा का ज्ञान आवश्यक कर दिया गया है। इसकी वजह से तिब्बती पिछड़ रहे हैं।
तिब्बत भाषा के एकमात्र अखबार तिब्बत डेली में भी महत्वपूर्ण पदों पर चीनी लोग बैठे हैं। तिब्बतियों की नजर में हर चीनी अपनी सरकार का जासूस है और कुछ तिब्बतियों को भी जासूसी के लिए इस्तेमाल कर रही है।

पहले चीन और तिब्बत के बीच आवागमन महंगा और कठिन था। रेल ने रास्ते आसान कर दिये हैं. ल्हासा में चीन ने बड़ी बड़ी इमारतें खड़ी कर दी हैं। उन पर चीनी भाषा में विशालकाय होर्डिंग्स लगी हैं। यह चकाचौंध नई पीढी को लुभा रही है।
लेकिन यह 'लुभाना' सबके लिए एक समान नहीं है. युवाओं में ऐसे लोगों की संख्या काफी बड़ी है, जो चीन से अलग अपने सपने देखते हैं, सपने कि जिनमें उनका देश आज़ाद हो...... युवा तिब्बतियों को लगने लगा है कि अपनी पहचान और संस्कृति को बचाए रखें तथा विकास को स्वीकारते हुए आजादी की अपनी मांग पर कायम रहें। इसके उलट चीनी सरकार सोचती है कि विकास में जब तिब्बतियों की भागीदारी बढेगी तो स्वतंत्रता की मांग खुद ब खुद ठंडी पड़ जाएगी।

गोलन एक शहर का नाम था

Posted By Geetashree On 9:09 PM 5 comments

गीताश्री

अब तक आपने पढा सीरिया की खुशहाली की गाथा। इस बार वो व्यथा जिसकी याद सीरियाई लोगों को उदास कर देती है। सीरिया की राजधानी दमिश्क से दो घंटे की दूरी पर बसा गोलान एक पठार है, जो सीरिया को जॉडर्न, लेबनान और इजरायल से जोड़ता है। 

यह इलाका कुदरती उर्वरता से भरपूर है। अंगूर, ऑलिव, सेव जैसी कैश क्राप यहां की खूबी है। कुनेत्रा गोलन की राजधानी था। कहते हैं, गोलन का मुख्य बाजार यही था। कभी यहां जिंदगी की चहल-पहल थी। चारोतरफ ऊंची पहाड़ियां, हरी-भरी, कलकल करती नदियां, झरने और चारों मौसम के फल एक साथ फलते थे यहां। 

अब वहां सिर्फ सन्नाटा है। यह सन्नाटा टूटता है, प्रत्येक सप्ताह शुक्रवार को जब सीरिया में साप्ताहिक छुट्टी होती है। कुनेत्रा और गोलन के पुराने निवासी यहां अपने परिवार के साथ छुट्टी बिताने आते हैं। इस इलाके में ना अब झरने बचे हैं ना नदियां ना ही वह मकान जो कभी इनका था। अपने अस्तित्व की तलाश में नई पीढ़ी के साथ पूरा परिवार पिकनिक इस उजाड़ में आखिर कैसे मनाता है। आस-पास के कई गांव मलबों में बदल चुके हैं। टूटे मकानों के साए में सीरियाई परिवार पिकनिक के बहाने खुद को इस अहसास से मुक्त नहीं होने देते कि यह जमीन कभी उसकी थी। तबाह हो चुकी जमीन पर बैठकर पुराने लोग नई पीढ़ी के बच्चों को बताते हैं कि उनके साथ क्या हादसा हुआ था और इस्राइल ने उन्हें कैसे तबाह कर दिया। उन्हें इस बात की भी उम्मीद है कि एक न एक दिन उनकी जमीन उन्हें वापस मिल जाएगी। गांव फिर से गुलजार हो जाएंगे।  

इन दिनों वहां पूरे इलाके में यूएन के तकरीबन 12 हजार सैनिक तैनात हैं, जिनमें भारत, ऑस्ट्रिया, रुस, जापान और चेक सैनिक प्रमुख है। गौरतलब है कि 1967 में इजरायल ने सीरिया के बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया था, लेकिन 1973 के युद्व में सीरिया ने इसका कुछ हिस्सा वापस ले लिया था। वापस लिए हिस्से में गोलान की कुनेत्रा भी शामिल थी। इजरायलियों ने कुनेत्रा को खाली तो कर दिया, लेकिन जाते-जाते वह इस पूरे शहर को तहस नहस कर गए।

तबाही के निशान वहां अब भी मौजूद हैं। देखकर आप सिहर उठेंगे। उस पीढी की कल्पना कर सकेंगे जिसने इस मंजर को देखा और भोगा होगा। उस वीराने में घूमते हुए कुछ लोग मिले..कुछ स्थानीय महिलाएं भी।

टूटे और ध्वस्त घरों के बीच रहना और जीना दर्दनाक तो है मगर यहां अपनी जमीन का आनंद भी है। 53 वर्षीय सईदा की अधेड़ आंखें अपनी जमीन के बारे में बात करते हुए चमकने लगती है। सईदा उन औरतों में से है जो इस्राइल के कब्जे वाले सीरियाई इलाके से बच-बचाकर अपने वतन लौट आई है। कुछ परिवारों के साथ अब भी वह गोलन हाईट्स के पास ही एक गांव में रहती है। चंद परिवार ही वहां किसी तरह रहने की हिम्मत जुटा पाए हैं। बाकी वहां से उजड़ गए हैं।
 
1973 में इस्राइली हमले ने पूरा इलाका तबाह कर दिया। कुछ गांव तो मिट्टी में मिल गए और कुछ गांव के लोग हमले और कब्जे के डर से घर बार छोड़ दिया। वे फिर कभी नहीं लौटे। वे कभी आते भी हैं तो मेहमान की तरह, बस आंख भर अपनी जमीन को देखने और आह भरने के लिए। 

ध्वस्त मकानों से अभी तक बारूद की गंध गई नहीं है। गोलन क्षेत्र के पब्लिक रिलेशन डायरेक्टर मोहम्मद अली इसी इलाके के रहने वाले हैं। उन्हें अपने समय की बस इतनी याद है कि उनके गांव के आकाश में दिनभर लड़ाकू हवाई जहाज मंडराते रहते थे और रह-रहकर गोलियो और बमों के धमाके सुनाई देते थे। अपनी तरफ से पूरा इलाका तबाह कर जब लड़ाकू विमान चले गए तब जो सौभाग्यशाली लोग बचे, उन्होंने अपने बच्चों के साथ घर छोड़ दिया और दमिश्क या दूसरे ठिकानों पर चले गए।

कुनेत्रा के सरकारी अस्पताल की ध्वस्त इमारत आज भी बर्बरता की कहानी बताती है। दीवारों पर गोलियों और बमों के हमले के निशान अब भी मौजूद हैं। सीरिया सरकार ने ध्वस्त मलबों को इतने वर्षों में हाथ तक नहीं लगाया। एक सरकारी अधिकारी के अनुसार तबाह हुए गांवों में से 11 गांव को दुबारा बसाया जा चुका है। पांच गांव अब तक बचे हैं। इनके पुर्नवास के लिए सीरियाई सरकार ने प्लान तैयार कर लिया है। सूत्र बताते हैं कि ये प्लान ही रहेगा। जल्दी बसाने का कोई इरादा नहीं। क्योंकि सीरिया सरकार दुनिया को तबाही का ये भयावह मंजर दिखाना चाहती है। जब तक अपनी जमीन को इजरायल के कब्जे से वापस नहीं ले लेते तब तक कुछ गांव वैसे ही मलबा बने रहेंगे जो उनके जख्मों की याद दिलाते रहेंगे। 

एक उदास इतिहास
जैसे ही आप नेट पर सीरिया के गोलन पेज को खोलेंगे...स्लाइड शो ऊपर ही चलता दिखाई देगा...जादुई प्रकृति, मॉडरेटर वेदर, संर्घषरत लोग, एक उदास इतिहास...हमारा घर गोलन। 

गोलन का उदास इतिहास की कहानी बहुत दर्दनाक है। नुकीले तारों के बाड़ों की एक लंबी श्रृंखला के बीच लोहे के मजबूत दरवाजों के खुलने पर शुरुआत होती है, एक नई दुनिया की, नई जिंदगी की। इस जिंदगी में आंसू और मुस्कान के साथ-साथ अपनों से बिछुड़ने का गम है तो नई जिंदगी और रिश्तों को शुरू करने का रोमांच भी। सेना व पुलिसवालों के सपाट चेहरों और चौकन्नी निगाहों के साए में आंसू और हंसी के ऐसे फूल तब खिलते हैं, जब कोई दुल्हन शादी के बाद इस दरवाजे से गुजरती है, जब कोई बच्चा पढने या युवा रोजी-रोटी की तलाश में घर से निकलता है। धरती के एक खूबसूरत टुकड़े अल छाआल, जिसे आज पूरी दुनिया गोलान के नाम से जानती है। 1866 वर्ग किमी में फैले इस सीरियाई इलाके के एक बड़े हिस्से पर इजरायल का कब्जा है, जो आज इजरायल अधिकृत गोलान के नाम से जाना जाता है। 

इजरायल अधिकृत गोलान में यूं तो 244 गांव आते हैं, लेकिन पांच गांव ऐसे हैं, जिनमें सीरियाई नागरिक रहते हैं। इन पांच गांवों में रहने वाले 30 हजार द्रूज मुस्लिमों के लिए जिंदगी मुश्किलों का एक पहाड़ बन चुकी है। तार के बाड़ों से घिरे ये गांव वाले लगातार मौत, मुश्किलों, यातनाओं और शोषण का शिकार हो रहे हैं। इन गांव में रहने वाले बच्चों और युवाओं के लिए न तो शिक्षा और ना ही स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं हैं। इन्हें पड़ने और रोजी रोटी कमाने के लिए अपने वतन सीरिया का मुंह देखना पड़ता है। यूएन शांति सेना और इजरायली सुरक्षा के बीच इनका सीरिया आना-जाना अपने आप में एक दुरुह प्रक्रिया होती है। पढ-लिख कर लौटे इन युवकों के पास जहां खेती के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं हैं, वहीं इन गांवों में आज तमाम विवाह योग्य कन्याएं बेहतर जीवन साथी की तलाश में कुंवारा जीवन जीने को विवश हैं। 

 मोहम्मद अली के अनुसार, इजराइल इन सीरियाई लोगों को दोयम दर्जे के नागरिकों की तरह देखता है। उनकी कोशिश है कि सीरिर्याइ लोग या तो यहां से वापस चले जाएं या फिर इजरायली नागरिकता स्वीकार कर लें; लेकिन गांव वालों ने इनकार कर दिया। मोहम्मद अली बताते हैं कि इजरायल ने सीरियाई लोगो को एक तरह से नजरबंद कर रखा है। वे उन पर भारी भरकम टैक्स थोपते हैं। कब्जे में एक गांव है जिसका नाम है, अलगजब, वहां हर घर के बाहर एक इजरायली सैनिक पहरा देता है। इसका कारण सीरियाई सरकार को समझ में नहीं आता। अली बताते हैं कि सीरिया में पांच तरह की नागरिकता है, जापानी, पोलिश, इंडियन, स्लोवाक, आस्ट्रेलिया। फिर इजरायल अपनी नागरिकता थोपने की कोशिश क्यों कर रहा है?  

शाउटिंग वैली
इस इलाके का सबसे बड़ा गांव है मजदल षम्स, जहां आर-पार जाने वाला गेट बना है। दोनों ओर एक उंचा जगह बनी है, जहां पर खड़े होकर दोनों तरफ के लोग लाउडस्पीकर के जरिए खास मौके पर आपस में बातचीत करते है। चिल्ला-चिल्ला कर बात करने के कारण ही इस पॉइंट का नाम शाउटिंग वैली पड़ गया है। यह वैली सीरिया और इजराइल को बांटने वाली 74 किमी लंबी एक सड़क के दोनों स्थित है, जो दोनो ओर नोमेंस लैंड का भी काम करती है। इसी नोमेंस लैंड के पास रहने वाले एक सीरियाई गांव वाले के अनुसार जमीन के इस बंटवारे ने मां और बच्चों और भई बहनों तक को जुदा कर दिया। इसी शाउटिंग वैली पर बेटों के लिए तड़पती और चिल्लाती कई मांएं अपनी जिंदगी से हार बैठीं। 
 

प्रतिभा की दुनिया से चंद सांसे

Posted By Geetashree On 5:26 AM 6 comments
सीरिया की गाथा के बीच प्रतिभा की यह कविता मेरे हाथ लगी। उन्होंने लिखा था-जरा देख कर बताइए..पढने के बाद मैं खुद को रोक नही पाई। ये कविता वो आईना है जिसमें दुनिया, समाज का प्रेम से डरा हुआ लेकिन खौफनाक चेहरा दिखाई पड़ता है।--गीताश्री
किस कदर उलझे रहते हैं वे
एक-दूसरे में,
किस कदर तेज चलती हैं उनकी सांसें
किस कदर बेफिक्र हैं वे दुनिया के हर खौफ से
कि दुनिया को उनसे ही लगने लगा है डर,
कि उन पर ही लगी हैं सबकी निगाहें
वे कोई आतंकवादी नहीं,
न ही सभ्यताओं के हैं दुश्मन
न ही उनके दिमाग में है कोई षडयंत्र
फिर भी दुनिया को लग रहा उनसे डर.
पंचायतों की हिल गई हैं चूलें
पसीने आ रहे हैं समाज के मसीहाओं के
कैसे रोकें वे उन दोनों को
कैसे उलझायें उन्हें दूसरे कामों में
कि उनकी दिशायें ही बदल जायें
कौन से जारी किये जाएं फरमान
कि खत्म हो सके उनका प्रेम
कितने खतरनाक हैं
वे इस दुनिया के लिए, सचमुच?

प्रतिभा कटियार

या हबीबी की तलाश में

Posted By Geetashree On 5:25 AM 11 comments

सच कहते हैं बड़े बजुर्ग कि अगर किसी देश की संस्कृति और सभ्यता को समझना हो तो वहां की औरतो की स्थिति को जानो. सीरियाई औरतों के देखने के बाद यह यकीन हो गया. परंपरा और आधुनिकता का ऐसा मेल कहीं और नहीं देखा. आधी-आधी रात तक बेखौफ घूमती लड़कियां हुक्के के नशे में झूमती हुई सर्र से गुजर जाती हैं.

सीरियाई लड़कियों से मिलने के बाद देर तक उनकी कजरारी आंखें आपके जेहन में धंसी रहती हैं. काजल प्रेमी सीरियाई लड़कियों के बारे में वहां खूब मजाक चलते हैं. गोरे गोरे चेहरे पर काजल की गहरी रेखाएं बाकी सारे ऐब को ढंक देती हैं. शायद इसी लिए वे बिना काजल लगाएं बाथरुम तक नहीं जाती. हमारी सीरियल की नायिकाओं जिस तरह मेकअप और गहने से लदी रहती हैं, वैसे ही सीरियन लड़कियां अपनी आंखों के सौंदर्य और उनकी मारक क्षमता के प्रति बहुत सजग रहती हैं. 

कजरारी आंखों के कहर के बारे में दमिश्क के सबसे बड़े धार्मिक नेता जिन्हें मुफ्ती कहा जाता है का एक कथन बहुत दिलचस्प है. भारतीय महिला पत्रकारों से मुलाकात में वे बहुत मस्ती से भरे दिखाई दिए. उनका कथन सुनिए और आनंद उठाइए-हमारी मदर ईव ने भी आदम को अपनी आंखों से मारा था. इसीलिए हम अपनी महिलाओं से गुजारिश करते हैं, आप लोग काजल और मस्करे का इस्तेमाल कम करिए और पुरुषों को मारना बंद करिए. 

यहां एक गाना याद आ रहा है...नैन लड़ जइहें त मनवा मा कसक होइबे करी..., हर मौके पर एक गाना याद आ जाने पर हमारी मित्र सुहासिनी हैदर बहुत दिलचस्प तरीके से रिएक्ट करती थीं. चीन यात्रा के दौरान जब भी कोई बात हो मैं एक गाना पेश कर दूं वह ठठा कर हंस पड़े. कभी कोई दिलचस्प बात कहके कई बार सुहासिनी मेरी तरफ देखती और कहती इस पर एक गाना हो जाए. बाद में यह मजाक के तौर पर चल पड़ा है. मेरी याद उसे कोई ना कोई गाना याद दिला देती है. क्या करें. दुनिया गुनगुना रही है हमारे गाने. खैर... 

फिलहाल सीरियन लड़कियों के बारे में कई कई गाने याद आ रहे हैं. किनका किनका जिक्र करुं. गोरी चिट्टी छरहरी, सजी संवरी, फैशनपरस्त लड़कियां इत्र की खूशबू और मुस्कान बिखेरती जब पास से गुजरती हैं तो अंदाजा हो जाता है कि कहीं किसी की शामत आई है या 'या हबीबी' की तलाश जारी है. 

इतनी उन्मुक्तता कि खुले कैफे में बैठी लड़कियों का झुंड ठाठ से हुक्का पी रहा होता है और मस्ती के तराने गा रहा होता है. किसी की फिक्र नहीं, कौन देख रहा है या सुन रहा है. नैतिक पुलिस जैसी कोई शय नहीं यहां. हुक्का उनकी संस्कृति का अंग है इसीलिए ऐसा नजारा आम है. हुई शाम उनका ख्याल आ गया..की तर्ज पर शाम होते ही कैफे में लड़को की तर्ज पर लड़कियों की भीड़ जुटने लगती है, चाय की प्याली से उठती गर्म भाप के साथ हुक्के का धुंआ बतकहियों के बीच खो जाता है. यहां परदानशीं लड़कियां भी बेखौफ-खुलेआम हुक्का पीती रहती हैं, अपने पार्टनर के हाथों में हाथ डाल कर देर रात तक घूमती रहती हैं. काले स्कार्फ में कसा माथा और गोरा चेहरा जब धुंआ उगलता है तो सोचिए क्या नजारा बनता होगा. चांद जैसे धुंए से घिरा हो. हंसी तो जैसे होठो पर बिजली की तरह खेलती रहती है. 

एलेप्पो शहर में किले की सीढियां चढते उतरते मस्त लड़कियों का एक ग्रुप मिला. साथ में मेरी मित्र मंजरी थीं. उसने बिंदी लगा रखी थी. लड़कियां अचानक पलटी और अरबी-इंगलिश मिक्स भाषा में पूछने लगीं, ये क्या है? मैंने बताया--ये साइन है कि आप गॉड से ब्लेसड हैं. मैं जानबूझ कर बिंदी को सुहाग से नहीं जोड़ा. वैसे भी बिंदी अब फैशन स्टेटमेंट हो गई है. मंजरी ने साफ बता दिया, ये सुहाग की निशानी है और शादीशुदा औरतें लगाती हैं. पता नहीं उनकी समझ में अंग्रेजी कितनी आई, लड़कियों में बिंदी लगाने की होड़ मच गई. समूह में सिर्फ एक लड़की काली स्कार्फ (सीरियन लड़कियों को काले रंग से बहुत मोहब्बत है) पहने थी. उसने मना कर दिया. फिर कहा गया-लगा लो, उसने बहुत गंभीर होकर कहा-नो, थैंक्स, हमारे यहां अलाउड नहीं है. 

ये लड़की उस वर्ग से आती है जो अभी भी अपनी पंरपरा को ढो रहा है. सीरिया का एक पारंपरिक वर्ग ऐसा है जहां परदा प्रथा अभी तक है. कुछ तबके की महिलाएं बुर्का भी पहनती हैं, कुछ सिर्फ स्कार्फ लगाती हैं. एक स्कार्फ वाली महिला ने हमें बताया कैसे उसके प्रेमी से दो साल बाद जब उसकी शादी हुई तब पहली बार प्रेमी-शौहर ने प्रेमिका-पत्नी की खुली जुल्फे देखीं. जब पहली बार देखा होगा काली जुल्फों को तब उसके शौहर को कैसा लगा होगा? वह बताती है, पहले तो वह इतने घने और रेशमी बालों को देख कर सन्न रह गया, फिर आहें भरीं...और करता भी क्या. कभी कहने का साहस ही जुटा पाया कि स्कार्फ उतारो. वह उसकी काली काली आंखों में ही तमाम सौंर्दय तलाशता रहा होगा. दो साल के प्रेम-संबंध में कभी वह अपना स्कार्फ उतारने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. यह बताते हुए उसकी आंखें थोड़े अफसोस से भरी थीं. यह इनके समाज की तरफ से थोपी गई पाबंदी थी ना कि सरकार की तरफ से. यहां ईरान जैसा सलूक नहीं होता. आपकी मर्जी है, परदा मानो या ना मानो.  

या हबीबीः ओ मेरे प्रेम

सीरिया में सूकू सूकू...

Posted By Geetashree On 12:03 PM 13 comments

गीताश्री

सीरिया से कुवैत आते हुए फ्लाइट में सहयात्री अमेरिकी जेरी एल डौडरमैन ने एक सीरियाई यात्री से पूछा कि क्या तुम मेरे आईपॉड से गाना सुनना पसंद करोगे? संगीत प्रेमी सीरियाई ने मना कर दिया. बिजनेसमैन जेरी हंसा और बोला-क्यों, मैं एक अमेरिकी हूं इसलिए. भरोसा नहीं मुझ पर? सीरियाई झेंप गया. जेरी ने कहा, भई बुश का युग गया. अब ओबामा युग है. संबंध बदल रहे हैं. हम इतने बुरे नहीं. जेरी को इस सच्चाई का पता है कि सीरियाई अमेरिका से कितनी नफरत करते हैं और बिना उसकी सहायता के अपनी अर्थव्यवस्था को निरंतर मजबूत बनाए जा रहे हैं. वे उम्मीद करते हैं कि आने वाले दिनों में ये इंप्रेशन बदलेगा.

 
मैं पास में बैठी यह सब देख सुन रही थी. जेरी मेरी तरफ घूमा. सीरिया के बारे में वो मेरा अनुभव जानना चाहता था. बिजनेस के सिलसिले में वह दुनिया भर में घूमता रहता है. वह सीरियाई लोगों के उदार स्वभाव और दोस्ताना रवैये की देर तक मुझसे चर्चा करता रहा. मैं उसके इंप्रेशन से सौ फीसदी सहमत थी. सीरियाई लोग बेहद खुले दिल वाले और हमारी तरह मेहमान नवाज होते हैं. हम शायद अजनबियों को देख कर ना मुस्कुराए या हेलो ना कहें मगर आप सीरिया के किसी भी शहर की गलियों से गुजरेंगे तो इतनी मुस्कुराहटें राहों में मिलेंगी कि आपके होठ बंद होना भूल जाएंगे. वे आपसे पूछेंगे...पाकिस्तान...आप कहेंगे नहीं इंडिया. वे कहेंगे--हिंदिया...मरहबा..मरहबा.... किसी कोने से ये आवाज आएगी, शाम्मी कापूर(शम्मी कपूर).... गाने के बोल आपके कानों से टकराएंगे....अई अईया करुं मैं क्या..सूकू सूकू.... 

सीरिया में शम्मी कपूर की इतनी लोकप्रियता देख कर हम दंग रह गए. अब तक जहां गए वहां राजकपूर, सलमान खान, शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय, अमिताभ बच्चन सरीखे सितारों के प्रति दीवानगी देखी. शम्मी कपूर को चाहने वाला ये देश उन्हीं की तरह मस्त और सूकू सूकू(जापानी शब्द, हिंदी में बहुत बहुत प्यार)वाला निकला. हमनें दमिश्क की गलियों में एक दिन बिताया.
 
वह शुक्रवार की शाम थी. छुट्टी का दिन और मस्ती की शाम. एक कैफे है 'अल-नौखारा.' वहां की पारंपरिक किस्सागोई 'हाकावती' करने वाले किस्सागो राशिद अल-हलक अबू सादी जिस मजे से अरबी संस्कृति और वीरता की कहानियां सुनाते हैं उतने मजे से भारतीय पर्यटको को हिंदी गाना सुनाते और सुनते हैं. एक हाथ में अरबी इतिहास का छोर थामे हैं दूसरे में भारतीय गीत-संगीत. भारतीय पर्यटकों को देखकर उनके हाथ से किस्सों की किताब छूट जाती है और वह अपनी मुद्राएं शम्मी कपूर की तरह बना लेते हैं. कैफे में भरे चिलम के धुंए के बीच शम्मी कपूर अगर उन्हें अई-अईया... सूकू सूकू गाते हुए सुन लें तो उन्हें नशा आ जाए. इस किस्सागो के लिए हरेक भारतीय पर्यटक शम्मी कपूर है और सूकू सूकू... गाना उसका परम कर्तव्य. सीरिया के इस इकलौते किस्सागो की कहानियां सुनने के लिए सीरियाई लोग शाम को यहां इकट्ठे होते हैं वही अरबी तलवार बीच में छोड़कर रोमांटिक मुद्रा अख्तियार कर लेता है. भारतीय पर्यटकों से गाना सुनाने का अनुरोध करता है, उनकी तस्वीरे उतारता है, गाने रिकार्ड करता है, अपनी अकेली और अंधेरी रातों के लिए.  

यही हाल और नजारा पूरे सीरिया का है. हर दुकान, हर चौक चौराहे पर सीरियाई लोगों की नजर आप पर पड़ी नहीं कि मुस्कुराएंगे-कहेंगे..मरहबा मरहबा(स्वागत है स्वागत है) और तत्काल हिंदी गाना गाकर आपको खुश कर देते हैं. मिथुन चक्रवर्ती भले ही भारतीय समाज के एक खास सिने प्रेमी वर्ग में ना सराहे गए हों, सीरिया में वे आज भी अपने डांस पर बूढे- नौजवान को थिरका रहे हैं. 'आया मैं डिस्को डांसर...पुरानी और नई पीढ़ी दोनों को जवां बनाए हुए है.
एलेप्पो सीरिया का ऐतिहासिक शहर है. वहां का ओल्ड सूक बहुत फेमस है. 

मैं जब वहां शापिंग कर रही थी तब शम्मी कपूर के दीवाने दूकानदारों ने आवाजें लगानी शुरु कर दी. पूरा बाजार जैसे हमारी तरफ घूम गया. मैं सूकू सूकू गा गा कर बोर हो गई मगर वे ना माने. मैं गाती और वे तालियां बजा बजा कर झूमते. ना जाने कितने लोगों ने मेरा गाना रिर्काड किया. एक दीवाना ऐसा मिला जो जीनत अमान का फैन था. उमर अक्कद नाम है. उसने अपना इमेल दिया और आग्रह किया कि मैं उसे शम्मी कपूर, जीनत अमान और दारो मंदारा (मैं तलाश नहीं पाई)की तस्वीरें भेजूं. पता नहीं दारो...कौन है? किसी को पता चले तो बताए. मैं उमर की सहायता करना चाहती हूं. फिलहाल मैं उसको शेष फोटो मेल करने वाली हूं. उसी बाजार में एक और दिलचस्प दृश्य ने हम सबको हंसा हंसा कर लोट पोट कर दिया. एक शॉल और स्टोल की दूकान थी. जब हम वहां से गुजरे, देखा दूकानदार महोदय हाथ में एक पोस्टर और चाकू लिए खड़े हैं. पोस्टर पर हिंदी में लिखा था-सास के लिए. 

सीरिया से जुड़ी अभी दिलचस्प यादें अभी कईं हैं. अगले पोस्ट में वहां की लड़कियों के बारे में. तबतक गाइए...सूकू सूकू...

आज फिर जीने की तमन्ना है

Posted By Geetashree On 8:48 AM 10 comments

हिंदी सिनेमा के किन किन गानो में स्त्री मुक्ति की ध्वनि आती है..ये इन दिनों मेरे शोध का विषय बन गया है.ये दिलचस्पी जगाने वाले कथाकार मित्र तेजिंदर शर्मा हैं. उन्होने ये नहीं सोचा होगा कि बहस इस दिशा में भी मुड़ सकती है. अब आप किसी मुक्तिकामी स्त्री से बहस करेंगे तो संभव है कि बहस वहां तक जाएगी. वे हमें बता रहे थे कि जिन गानों की धुने अच्छी होती हैं उनके बोल पर कोई ध्यान नहीं देता, वो अननोटिसड रह जाते हैं.

जैसे 1965 में आई 'गाइड' फिल्म का गाना सुनें...कांटो से खींच के ये आंचल...तोड़ के बंधन बांधी पायल...कोई ना रोको दिल की उड़ान को...दिल वो चला..। मैंने मित्रवर को वहीं रोका...अरे हां..मैंने भी कभी गौर नहीं किया था...ये तो स्त्री मुक्ति का गान है...संभवत पहला गाना. शैलेंद्र आज से 40 साल पहले जो कुछ रच रहे थे, वह महज गीत भर कहां था ! "सजन रे झुठ मत बोलो" लिखने वाले शैलेंद्र यहां दर्शन का एक ऐसा संसार रच रहे थे, जो अब तक अपने यहां अलक्षित किया गया था. विवाहेत्तर संबंध तो हमने देखा था और एक धनाढय, विवाहित नायिका का एक कुंवारे गाइड के साथ रोमांस भी...अपने नपुंसक पति को वो अंधेरे से बाहर आने जैसा मानती है और गाने में आगे गाती है..कल के अंधेरों से निकल के, देखा है आंखें मलते मलते, फूल ही फूल, जिंदगी बहार है...तय कर लिया....।
पहले तो नायिका कांटों से अपने आंचल को खींच निकालती है और बंधन वहीं झनझना कर टूट जाते हैं. बंधन तोड़ती है, सायास और अपने पांव में फिर से पायल बांध लेती है...इसके बाद उसकी जिंदगी में उड़ान ही उड़ान है...एक स्त्री की उड़ान है..सामाजिक, पारिवारिक बंधनों से मुक्ति की उड़ान...इसके बाद उसकी इच्छाओं का नीला आकाश है, सीमाहीन..एक ऐसे पुरुष का साथ है, जिसे वह अपनी मर्जी से चुनती है. 
सच कहूं, आज पहली बार मुझे पायल थोड़ी ठीक लगी. मैं अब तक उसे गुलामी, बेड़ी के प्रतीक के तौर पर देखती थी, उसकी खनक से भी मुझे गुलामी की धुन सुनाई देती थी. पायल के खिलाफ मेरी आवाज दोस्तों को अक्सर सुनाई देती रही है. स्त्री के पांव में बेड़ी कितनी लयात्मक हो सकती है, मैं सोचती. मेरी राय बदल गई. आज से उसे उड़ान का प्रस्थान बिंदू और आजादी की लय मानूंगी.
नायिका की मनस्थिति की कल्पना कर रही हूं. जिसे हर गूंज में फिर से जीने मरने की तमन्ना सुनाई देती है..। तय कर लिया है...मुक्ति के रस्ते में जिंदगी बहार है, इसके लिए कांटो से दामन छुड़ाना जरुरी है. इन कांटों के बारे में और स्त्री मक्ति के और गानों के बारे में कुछ और बातें अगले पोस्ट में..तब तक मेरी खोज जारी है.

ओ मेरे वसंत के वर्ष

Posted By Geetashree On 3:12 AM 5 comments
तुझसे मुझे शिकायत नहीं,
मेरे वसंत के वर्ष,
जो बीत गए प्रेम के व्यर्थ सपनों में-
तुझसे मुझे नहीं है शिकायत,
मादक बांसुरी-से-संगीतमय
ओ रातों के रहस्य।
मुझे तुमसे नहीं है शिकायत
प्याले लिए पंखों का मुकुट पहने जंगल की
घुमावदार पगडंडियों पर मिलने वाले
ओ धोखेबाज साथियों,
युवा देशद्रोहियो-
नहीं है शिकायत मुझे तुमसे
और मैं इस खेल से, चिंता भरा।
किंतु कहां गए वे, भावुक पल,
जवान उम्मीदों और
हृदय की शांति के पल
कहां है प्रेरणा के आंसू
पहले की सी उष्मा कहां गई,
मेरे वसंत के वर्ष
फिर आना.....
रुसी के महान कवि अलेक्जेंडर पूश्किन की एक प्रेम कविता(अनु-कुमार कौस्तुभ)
जैसे पुश्किन की कविताओं में प्रेम और क्रांति दोनों साथ साथ, अगल बगल रहते है, उसी तरह हम अतीतजीवियो की चेतना में अतीत और वर्त्तमान दोनों साथ साथ चलते रहते हैं। हम वर्त्तमान में रहते हुए अपने अतीत की गीली जमीन नहीं छोड़ पा रहे हैं। बहुत आसान नहीं होता स्मृतियों को टटोलना, डूबना और बाहर आना. बहुत मुश्किल होता है बाहर आ पाना. ये आवाजाही होली जैसे मौको पर बेहद मारक होती है. ...हमें याद है, वसंत-होली के आने का पता छोटे शहरों और कस्बों में कैसे चलता था. वो पता स्मृतियों में दर्ज है...खुली-धुली--गंधाती हवा..किसी की देह से होकर गुजरती...रसिक प्रिया बजाता, फगुआ गाता कोई पीछे की गली से गुजर जाता तो कई जोड़ी घूंघटवाली आंखें खिड़कियों पर जम जाती. अब तो आप ऊंची उंची अट्टालिकाओं पर कबूतर से टंगे हैं, बालकोनी से दुनिया को निहारिए..शहर के कचरे से उठती गंधीली हवा को सूंघ सूंघ कर कोफ्त होइए. लाउडस्पीकर पर और हाइवे से गुजरती गाड़ियों से निकलती कानफोड़ू शोर से आजीज आकर टीवी चैनल आन कर लीजिए..कर भी क्या सकते हैं. जाने कहां गए वे दिन..बचपन की यादें करिश्मा हैं, आपको पुर्ननवा करती हैं. रंगों की पूरी बारात घुमड़ रही है.आज भी फगुआ अपने पारंपरिक रुप में मेरी स्मृतियों में जिंदा है....भर फागुन ससुर जी देवर लागे....। मैं चाह कर भी पुश्किन की तरह नहीं कह पा रही हूं...दूर भागो, ओ मेरी स्मृतियों...सो जाओ ओ मेरे अभागे प्रेम।
गीताश्री

होली की शुभकामनाएं

Posted By Geetashree On 1:38 AM 11 comments
वही आदर्श मौसम
और मन में कुछ टूटता सा
अनुभव से जानता हूं कि यह वसंत है
- रघुवीर सहाय

वेलेंटाइन डे समझ में आने से बहुत पहले की बात है। होली पर प्रेम का इजहार होता था हमारे मोहल्ले में। कोई चौदह फरवरी का इंतजार नहीं करता था। सभी को होली का इंतजार रहता था कि कब होलिका दहन की रात आए और पूरी रात उसका दीदार हो पाए, जिसे देख पाना सपने की तरह होता है। पूरी रात लकड़ियां चुराना, क्योंकि उन दिनों खरीदने के पैसे नहीं हुआ करते थे, रंगीन ताव की झंडियां बना कर लई से सुतली पर चिपकाना और एक किनारा पकड़ कर दूसरा किनारा पकड़ने के बहाने हौले से उसका हाथ छू लेना और सुबह गुलाल लगाने के बहाने उसकी मांग लाल कर देने का शौक पूरा कर लेते थे। वही एक रात होती थी जब लड़कियों को घर से बाहर रहने की इजाजत होती थी। भाई बेशक साथ होते थे, लेकिन बहनों को छूट देने में उस दिन कोई कंजूसी नहीं। आखिर उन्हें भी तो किसी का इंतजार रहता था। सुबह चार बजे होलिका दहन की आंच में चमकते चेहरों को देख कर किसी भी मुड़े-तुड़े कागज पर लिखी गई शायरी शायद आज भी कहीं किसी डायरी में महफूज होगी। अब याद करती हूं तो लगता है, पता नहीं कौन सी वह दुनिया थी और कौन सी होली। बस याद है तो कुछ बातें. किसी की कोई हो...ली और कोई उन दिनों को याद कर बस रो...ली।
आकांक्षा पारे

इरा का पत्र अन्नू के नाम

Posted By Geetashree On 2:25 AM 2 comments
हमारे पेशे की ये चंद कड़वी सच्चाईयां हैं. पर इनमें भटकते हुए मैंने अपना जज्बा नहीं खोया. बल्कि हर घटना ने लड़ने और जूझने का मेरा हौसला बढाया. मेरी तो पूरी उम्र खांटी पत्रकारिता की इन्हीं गलियों में गुजर गई, वह भी पूरी ठसक के साथ. पर कब तक सुशीला बन कर घर के पोतड़े छिपाती रहूं. ये सच्चाईयां रअसल उन मानवियों लिए है जो दुनियाभर की औरतों का दर्द बयान करने का जज्बा लेकर पत्रकारिता की दहलीज में कदम रखने को बेकरार है. मेरी हैसियत इस परिवार के बुजुर्ग जैसी हो गई है. इस नाते उन्हें इस पेशे के लिए मानसिक तौर पर तैयार करना मेरा फर्ज है. कमसेकम मैं एसा मानती हूं. हिंदी न्यूज रुम की पेचिदगियों से और साथिनें शायद मेरे जितनी वाकिफ ना हों. मैंने तो इस जिंदगी को जिया है. पत्रकारिता के इस सागर में मैं डूबते उतराते आज भी तैर रही हूं. इस पेशे की तहों का अंदाज है. जहां तक दीगर पेशे में महिलाओं के संघर्ष की बात है, हम तुम गीता, नीलम, पारुल, सभी ने सच्चाईयों को अपनी कलम से आवाज दे रही हैं. अफसोस इस बात का है कि विचार और अभिव्यक्ति की आजादी के पेशे में हम सभी को यही झेलना पड़ रहा है. अब और नहीं. मत बनी रहो रानी बेटी. सुनाओ देश भर को इस पेशे की दास्तान...। इससे नयी मानवियों के लिए राह बनेगी. वैसे यह लेख मैंने फकत गीताश्री की किताब के लिए लिखा था. संदर्भ कुछ और था. पत्रकारिता की पेचिदगियों पर तो महाग्रंथ लिख सकती हूं. इतना बड़ा अनुभव संसार है.. इस राह पर और ना जाने कितने लोग बेनकाब हो जाएंगे. बस उन्ही की खातिर कलम ठहरी हुई है. पर उसका भी समय आएगा....जल्दी.

तंग गलियों के विरूद्द

Posted By Geetashree On 2:51 AM 5 comments
हाल ही में एक मीडिया पोर्टल में हमारी एक पत्रकार साथी(इरा झा) ने पत्रकारिता के अनुभवों का वर्णन करते हुए लिखा कि पुरूष वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में लड़कियों के लिए पत्रकार होना एक गुनाह है। उनके निजी अनुभवों का सम्मान करने के बावजूद लेख के अंत में यह पढ़कर दुख और आश्चर्य हुआ कि उन्हें लगता है यह पेशा महिलाओं के लिए उचित नहीं। आज जब महिलाओं ने दुर्गम माने जाने वाले पेशों में भी अपना वर्चस्व स्थापित कर दिया है हम पत्रकारिता की गलियों को तंग केवल इसलिए मान ले क्योंकि यहां पुरूषों की मानसिकता जंग खाई है।

ऐसा नहीं साथी, गलियां तंग ही सही पर अभी भी उसमें ठंडे हवाओं के झोकें बहते हैं। इन तंग गलियों में कुछ साहसी मानवियों ने ऐसे झरोखे बनाए हैं कि गलियों के संकरे होने का अहसास ही नहीं होता। ऐसा केवल पत्रकारिता में नहीं कि महिलाओं को पुरूषों की तंग सोच का सामना करना पड़े। घर से बाहर कदम रखने वाली हर महिला हर कदम पर ऐसी संकुचित सोच को झेलती है। किसी भी व्यवसाय में ऐसे अनुभवों से महिलाओं को रूबरू होना पड़ता है। लेकिन महिलाओं ने पत्रकारिता सहित हर पेशे में इन तंग या बंद गलियों के विरूद्द मोर्चे खोल दिए हैं।

यह सब पढ़ कर तो मुझे दिल्ली के एक पत्रकारिता संस्थान में पढने वाली उस लड़की का चेहरा याद आता है जिसके गांव में अभी भी बिजली की रोशनी नहीं पहुंची है और उसके गांव में लड़कियों को स्कूल भेजना अपराध से कम नहीं है। ऐसे में उसका दिल्ली जैसे महानगर में आकर पत्रकारिता की पढ़ाई करना और घर से शुरू हुई अपने अस्तित्व की लड़ाई किसी अजूबे से कम नहीं।

ऐसी बहुत सी लड़कियां पत्रकारिता में प्रवेश कर चुकी हैं जो प्रतिकूल वातावरण में पलने के बावजूद आज पत्रकारिता के गलियारों में अपने पुरूष साथियों से कहीं आगे निकल चुकी हैं। ''पत्रकारिता की दुनिया में लड़की होना ऐसा गुनाह है जिसकी कोई सजा नहीं सिर्फ घुट घुट कर बर्दाश्त करने के'' जैसा कि लेख में बताया गया है, सही नहीं। ऐसा कहना उन बहुत सी युवा पत्रकारों के सपनों को धूमिल कर सकता है जो पत्रकारिता में नए आयाम बनाने की आकाक्षाएं रखती हैं।

मेरा मानना तो यह है कि हम शहरों में पढ़ी लिखी महिलाओं के लिए कार्यालयों और आस -पडोस के माहौल की छोटी सोच कोई चुनौती नहीं बल्कि ऐसी पगडंडी है जिस पर चलने और संभल कर चल अपनी मंजिल पाने की कला हम महिलाएं अपनी परवरिश के दौरान ही सीख लेती हैं। वास्तविक चुनौती तो हमारे लिए भी एक पत्रकार के रूप में बेहतर रिपोर्टर, कापी एडिटर या संपादक बनने के साथ घर परिवार की जिम्मेदारियां को उचित ढंग से निभाने की होती है और लेखिका स्वयं इसे साबित कर चुकी है। फिर तंग गलियों की शिकायत क्यों? गलिया तंग ही नहीं बंद भी थीं और होंगी लेकिन इन बंद गलियों से रास्ते निकल चुके हैं। पत्रकारिता संस्थानों और अखबारों से लेकर चैनलों तक में छोटे छोटे शहरों और गांवो से आने वाली लड़कियों की बढ़ती संख्या इसकी गवाह है।

पेशा कोई भी हो पुरूषों द्वारा लड़कियों को काम में नाबराबर या कमतर आंकना, उनकी उनमुक्तता पर टिप्पणी करना या फिर उसके चरित्र पर आक्षेप लगाकर उसे आगे बढ़ने से रोकना अधिकतर कार्यालयों की प्रवृति बन चुका है। कईं बार तो महिलाएं भी पुरूष साथियों की ऐसी साजिशों का साथ देने लगतीं हैं। ऐसी मिसालों की कमी नहीं। लेकिन इस निराशाजनक चर्चाओं में मुझे उन महिलाओं के अनुभव बेहद बल देते है जो उस माहौल में पैदा होतीं है जहां लड़कियों के जन्म पर ढोल बजाकर या बंदूके चलाकर खुशी नहीं मनाई जाती। पैदाइश से लेकर वह बडे होने तक केवल लड़की होने की खिलाफत झेलती हैं। लेकिन आज वहीं महिलाएं कहीं पुरूषों की चैपाल में बैठकर, पंचायतों की सरपंच बनकर या फिर किसी संगठन का नेतृत्व कर पुरूषों की चैधराहट को खत्म कर रही हैं। इन्होंने साबित कर दिया है कि लड़की होना कोई गुनाह नहीं है। हर प्रकार की विपरीत परिस्थिति का सामना कर अपनी सबलता को मिसाल बनाने वाली ये महिलाएं हमें यही सबक देती है कि गली तंग नहीं।

अन्नू आनंद