वक्त का ज्वालामुखी और बर्फ जैसी औरतें

Posted By Geetashree On 5:06 AM 2 comments


गीताश्री

“ सेक्स वर्कर दूसरी औरतो से अलग होती है। इसके चार कारण हैं...हम अपनी मर्जी की मालिक होती हैं। हमें खाना बनाकर पति का इंतजार नहीं करना पड़ता। हमें उसके मैले कपड़े नहीं धोने पड़ते। हमें अपने बच्चों को अपने हिसाब से पालने के लिए आदमी की इजाजत नहीं लेनी पड़ती। हमें बच्चे पालने के लिए आदमी की जायदाद पर दावा नहीं करना पड़ता। ”
......नलिनी जमीला (एक सेक्सवर्कर की आत्मकथा में )
साथ रहने वाला एक आदमी पति बन जाता था और दूसरा भाई।
ये वो रिश्ते थे, जो बाजार बनाता था और बाजार ही देता था रिश्तों को नाम।
रिश्तों को नाम देने के बावजूद ऐसे रिश्तों को समझना मुश्किल है क्योंकि अबूझ रिश्तों की ये एक ऐसी कहानी है, जो किसी औरत के जिस्म से शुरु होकर औरत के अरमानों पर आकर खत्म हो जाती है।
लेकिन किसी के अरमान मिटे या सपने लुटे, इसकी परवाह बाजार कब करता है? केरल में भी हमने अरमानों की ऐसी अनगिनत चिताएं देखीं, जिसे किसी की बेचारगी और लाचारी हवा दे रही थी ।
केरल में सेक्स वर्करो की दुनिया के अनचीन्हे दर्द से साझा करते हुए मैंने देखा कि जो आदमी खुद को पति बता रहा है वो पति नहीं दलाल है और जो खुद को भाई बता रहा है वो ग्राहक ढूंढलानेवाला बिचौलिया. । और दोनों जिस्म के सौदे के बाद मिले पैसों से करते थे ऐश। लेकिन ये सब एक बंद दुनिया का चेहरा था, जिससे खुली दुनिया के लोग कोई मतलब नहीं रखना चाहते । तभी तो हमने पाया कि सेक्सवर्कर समाज से वैसे ही नफरत करती है जैसे समाज सेक्स वर्कर से।
कोई पति बनकर दलाली करेगा और कोई भाई बनकर ग्राहक लाएगा, शायद सामजिक ताने-बाने पर रिसर्च करनेवाले रिश्तों की इस नई परिभाषा को कुबुल न कर पाए, लेकिन सच था।
केरल के कोझीकोड में इन्हें रोपर्स के नाम से जाना जाता है। रोपर्स, रोप(रस्सी) शब्द से बना है। यानी दो किनारों को जोड़ने वाला, रस्सी की तरह जोड़ने वाला रोपड़,ये खुलासा केरल की मशहूर सेक्स वर्कर नलिनी जमाली ने भी अपनी आत्मकथा में किया है। उनकी आत्मकथा खूब बिकी है और हिंदी में भी अनुवाद होकर आई है। इसे पढ़ने के बाद केरल की सेक्सवर्कर के बारे में और करीब से जानने-समझने का मन हुआ।
मैं केरल की यात्रा पर गई थी तंबाकू पर शोध करने, लेकिन वहां मेरे एक एकिटविस्ट मित्र साजू से मैंने अपनी इच्छा जताई।
शाम तक उनके आफिस में दो महिलाएं हाजिर थीं। रमणी और सरोजनी। कोट्टायम के उनके दफ्तर में बैठी, थोड़ी सकुचाई, झिझकती हुई दो सांवली-काली रंगत वाली यौन कर्मियों और मेरे बीच भाषा का संकट था। वे ना तो अंग्रेजी बोल सकती थीं, ना हिंदी समझती थी। ना मैं उनकी भाषा। मगर वे इस बातके लिए तैयार होकर आई थी कि एक पत्रकार को इंटरव्यू देना है। साजू खुद इंटरप्रेटर बन गया।
स्त्री का दर्द पहली बार पुरुष के मुख से अनुवाद होकर स्त्री तक आ रहा था। पता नहीं पुरुष ने उसमें क्या जोड़ा, क्या घटाया...मगर उन दोनों की दैहिक भाषा ने मुझे समझा दिया, सब कुछ। रमणी थोड़ी कम उम्र की थी। वह खुल रही थी, साहसपूर्वक, वैसे ही जैसे उसने यौनकर्म की दहलीज पर पैर रखा था।
बोलते हुए वह उसके भीतर की खड़खड़ साजू ने नहीं, मैंने सुनी। कुछ था जो खुलता और बंद होता था। खौफ के साथ अपने बाहर फैलने की ललक को वह रोक नहीं पा रही थी। रमणी को दिल्ली देखना है। उसने देखा नहीं, सुना भर है। बातचीत के दौरान वह लगभग गिड़गिड़ाती है-“ क्या आप मेरे लिए टिकट भेजोगे। अपने पास रखोगे। लालकिला, कुतुब मीनार देखना है। सुना है...बहुत सुंदर और बड़ा शहर है...।” मैं भी वादा कर देती हूं पर अभी तक पूरा नहीं कर पाई हूं। शायद कभी कर पाऊं...उनसे संपर्क का जरिया भी तो नहीं कोई. हम कौन सी भाषा में बात करेंगे, फोन पर? वो बोल रही थीं और मुझे मुझे निदा फाजली की पंक्तियां याद आ रही थीं-
“ इनके अन्दर पक रहा है वक़्त का ज्वालामुखीकिन पहाड़ों को ढके हैं बर्फ़ जैसी औरतें । ”
रमणी, बोलती कम है,हंसती ज्यादा है। हंसी हंसी में कहती है, मैं पहले एक दिन में पांच छह ग्राहक निपटा देती थी। अब थकान होने लगी है। अब संख्या कोई मायने नहीं रखती...दो तीन निपटा ले,यही बहुत है। वह थोड़ी गंभीर होती है---ग्राहको की संख्या मायने नहीं रखती, उनकी संतुष्टि मायने रखती है। धंधे में उतरने का कोई अफसोस? रमणी ईमानदारी से स्वीकारती है, अफसोस तो है, मगर जिंदगी चुनौती की तरह है, उसका सामना कर रहे हैं। अब भाग नहीं सकते। देर हो चुकी। इसके आगे का रास्ता बंद है। क्या करें?रमणी का यह वक्तव्य किसी अनुपस्थित को संबोधित था। साजू मुझे बता रहे थे और वह शून्य में देख रही थी।
बात-चीत से पता चला कि रमणी कोट्टायम शहर के एक संभ्रांत मुहल्ले में रहती है। वहां धंधा करने मे समस्या ही समस्या। उसने एक रास्ता निकाल लिया। जंगल ही उसका रेडलाइट एरिया बन गया है। वह ग्राहकों को पास के जंगल में ले जाती है। घास के बिछौने होते हैं। मोबाइल हैं, ग्राहक फोन करते हैं फिर जंगल में जगह तय होती है। कुछ ग्राहक जंगल नहीं जाना चाहते, तब सरोजनी की बन आती है। वह अपने ग्राहक उसकी तरफ भेज देती है। सरोजनी का घर भी तंग गलियो में हैं मगर वह घर से धंधा करती है। थोड़ी उम्र ज्यादा है इसलिए लोग शक कम करते हैं। साथ में एक पतिनुमा जीव रहता है।
पति का जिक्र आया तो नलिनी याद आ गई। नलिनी ने एसे पतियो के बारे में साफ लिखा है कि मकान वगैरह किराए पर लेना हो तो ये लोग बड़े काम आते हैं। लेकिन कुल मिलाकर ये किसी सिरदर्द से कम नहीं हैं। सरोजनी का पति भी एसा ही है। सरोजनी ही उसका खर्च चलाती है। बदले में वह उसे सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का नाटक करता है। घर पर अक्सर ग्रहको का आना जाना देख कर कई बार पड़ोसी पूछ लेते हैं, सरोजनी का जवाब होता है-“ये लोग प्रोपर्टी डीलर हैं, मेरा प्लाट खरीदना चाहते हैं। देखने आते रहते हैं।“
सरोजनी बताती है-“ कई बार उसके पास युवा लड़को का ग्रुप आता है। वह पांच मिनट में उन्हें मुक्ति देकर भेज देती है। भीतर से उसे ग्लानी होती है कभी कभी, उनकी और अपनी उम्र देखकर। लेकिन ग्राहक तो ग्राहक है, चाहे किसी भी वक्त या किसी भी उम्र का हो..। “ लेकिन पैसे की जरूरत ऐसी सोच पर लगाम लगा देती है ।
रमणी भी कहती है, पैसा बड़ी चीज है। उन्हें कैसे लौटा दें। मैंने कहा, छोड़ क्यो नहीं देती ये धंधा...दोनों एक साथ बोल पड़ी, इतना पैसा किस काम में मिलेगा। अब हमें कौन काम देगा। हम किसी काम के लायक बचे ही नहीं...अब तो आदत सी पड़ गई है...। अब छोड़ भी दे तो लोग हमें चैन से नहीं जीने देंगे।
रमणी अब बातचीत में सहज हो चुकी है और उसे ये स्वीकारने में झिझक नहीं होती कि इस पेशे में भी वो कभी-कभार आनंद ढूंढ लेती है।
कैसे,मैं चकित होती हूं... ।
वह स्वीकार करती है कि एक स्थाई ग्राहक से वह भी आनंद लेती है। यहां पैसा गौण है। उससे मोल-भाव नहीं करती। रमणी के पास किस्से बहुत है...। एक बार पैसे वाला अधेड़ ग्राहक आया, कहा—“मैं अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता हूं, मगर मैं जिस उत्तेजना की तलाश में हूं, वहां नहीं है। चलो, सेक्स में ‘फन’ करते हैं...।“ लेकिन रमणी अच्छी तरह जानती है कि दूसरों को भले ही उसके जिस्म में ‘फन’ की तलाश हो, लेकिन वो खुद अपने पति के मर जाने और कंगाल हो जाने के बाद यातना के जिस रास्ते पर चल रही है,वो रास्ता
कहां खत्म होगा। न घर बचा न कोई जमीन का टुकड़ा, जिसे वह अपना कह सके। रिश्तेदारो ने शरण देने से मना कर दिया। कम पढी लिखी थी, सो नौकरी ना मिली। एक शाम उसने खुद को पीकअप प्वाइंट पर पाया। जिस्म की कमाई से पहले बेटियो को पाला, अब खुद को पाल रही है। इसी नरक में अपने लिए सुख का एकाध कतरा भी तलाश लेती है। यह सब बताते हुए उसकी आंखों में कहीं भी संकोच या शरम नहीं..है तो बस थोड़ी शिकायत, थोड़ा धिक्कार।
दोनों से बातचीत करते हुए ही हमने जाना कि केरल में कहीं भी कोई रेडलाइट एरिया नहीं है। इसीलिए वहां सेक्सवर्कर पूरे समाज में घुली मिली है। उन्हें अलग से चिनिहत नहीं किया जा सकता। इसकी दिक्कते भी हैं। बताते हैं कि केरल में 10,000 स्ट्रीट बेस्ड सेक्सवर्कर हैं। इनमें हिजड़े भी शामिल हैं। इसके बावजूद सोनागाछी की एकता उनके लिए रोल माडल की तरह है। वहां एक अनौपचारिक रुप से संगठन बना है, सेक्सवर्कर फोरम केरला(एस डब्लू एफ के) जो इनके हितो का ध्यान रखने लगा है। गाहे-बगाहे आंदोलनों में शिरकत भी करने लगा है।मगर एसडब्लूएफके सोनागाछी के दुर्वार महिला समन्य समिति की तरह ताकतवर नहीं है। रमणी,सरोजनी उसकी सदस्य बन चुकी हैं।
सरोजनी की दो बेटियां हैं, चेन्नई में रहती हैं। वे हिंदी नहीं जानती, किताब नहीं पढ सकती, तो क्या हुआ, फोटो तो पहचान सकती है। रमणी और सरोजनी ने फोटो तो खिचवाए लेकिन न छपवाने का आग्रह किया। बेटियां हालांकि अब जान गई हैं कि मां क्या काम करती हैं। पहले तो बहुत विरोध हुआ अब नियति को कुबुल कर चुकी है । साथ कुछ वक्त बिताने के बाद जब वो जाने की अनुमति मांग रहीं थीं
तो वहां मौजूद आंखें उन्हें संशय से घूर रही थीं. तभी मुझे निशांत की कविता(वर्त्तमान संदर्भ में छपी हुई) की पंक्तियां याद आने लगी....
इन औरतो को,
गुजरना पड़ता है एक लंबी सामाजिक प्रक्रिया से
तय करना पड़ती है एक लंबी दूरी
झेलनी पड़ती हैं गर्म सलाखों की पैनी निगाहें
फाड़ने पड़ते हैं सपनो को
रद्दी कागजो की तरह
चलाना पड़ता है अपने को खोटे सिक्कों की तरह
एक दूकान से दूसरे दूकान तक.

वो चली गईं, लेकिन दोनों मेरे सामने एसे खुली जैसे अंधड़ में जंग लगे दरवाजे-खिड़कियो की सांकलें भरभरा कर खुल जाती है। उन्होंने अपने दर्द को कही से भी अतिरंजित नही किया...बल्कि भोगे हुए को ज्यों का त्यों रख दिया। शायद उन्हें लग रहा था कि इस जलालत से भरी दुनिया में कोई है, जो उसकी व्यथा सहानूभूति पूर्वक सुन रहा है। उसके भीतर मुझे लेकर प्रश्नाकुलता थी। भाषाई संकट के कारण पूछ नहीं पा रही थी,शायद साजू की उपस्थिति भी संकोच पैदा कर रही थी। फिर भी साजू के बावजूद उन्हें जो कुछ कहना था साफ-साफ कह गई। सुना गई अपनी कहानी। उस कहानी में गुड गर्ल बनने का सिंड्रोम नहीं था । ये रास्ता उन्होंने खुद चुना था। शिकायतें कम थीं और लहजे में.मुक्ति की चाह भी खत्म थी। उनके जाने के बाद भी रमणी की खिलखिलाहट मेरे सामने गूंज रही थी और दर्द की दरिया में भींगने के बाद पनपे अवसाद को कम कर रही थी । सरोजनी ने भी अपनी चालबाजियो को चटखारे लेकर सुनाया था, और उसे सुनाने में मजा भी आ रहा था, लेकिन क्या वो सचमुच चालबाज है ।

उनके जाने के बाद मैं सोच रही थी और बगल में बैठा साजू शरमा रहा था ।

जा बिट्टो..जा..भईया को भेज...

Posted By Geetashree On 3:07 AM 2 comments

लाडो पे लाड़ ना आए जहां
गीताश्री
...एक ठाकुर परिवार में अनेक नवजात कन्याओं की मौत हुई। अब उसकी केवल एक बेटी है। एक बेटी को मां ने ही बेरहमी से मार डाला। नवजात को मुंह में तंबाकू भरकर नाले में फेंक दिया गया। किसी ग्रामीण ने उसे बचा लिया। और उसे ठाकुर के घर ले आया। ठाकुर ने उसे स्वीकार नहीं किया और चार पांच घंटे बाद वह चल बसी। (मुरैना, देहात)

...मोती बुआ नामक एक दाई नवजात कन्याओं की हत्या के काम में माहिर थी। वह पीढ़ी (एक तरह का छोटा स्टूल) की एक टांग नवजात की गर्दन पर रखकर यह कहते हुए बैठ जाती है, ‘जा बिट्टो जा, अपने भैया को भेज।’

...युवा लडक़ी एक बेल या लता की तरह होती है। देखते देखते वह बड़ी होकर उपर चढ जाती है। सोचने का भी वक्त नहीं देती। बालपन से ही उसपर लोगो की नजर पडऩे लगती है। बेटी पैदा करने की जिम्मेदारी भी बड़ी विकट है। अगर बेटा हो तो कोई फिक्र नहीं।
देश के प्रमुख पांच राज्यो, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में एक्शन एड और इंटरनेशनल डेवलपमेंट रिसर्च सेंटर (कनाडा) द्वारा कराए गए एक अध्ययन से अनेक चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
यह अध्ययन बालिकाओं और औरतो के विरुध पक्षपात की बारीकियों को समझने और व्यापक पड़ताल करने के उद्देश्य से पांच जिलों में कराया गया। एक्शनएड के निदेशक (इंडिया) बॉब मैथ्यु ने जानकारी दी कि यह अध्ययन गरीबी और पितृसत्ता के खिलाफ अभियान में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यूं तो हरेक राज्य में बेटियों का जीना मुहाल है लेकिन कुछ राज्यो के अंदरुनी हालात से वहां के सरकारी दावो की कलई खुल जाती है।

हरियाणा कन्या भ्रण हत्या के लिए बदनाम भले हो लेकिन सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में और राजस्थान के धौलपुर जिले में बाल मृत्यु दरें बहुत ऊंची हैं और मरने वालो में बालिकाएं ज्यादा हैं। भाजपा शासित मध्य प्रदेश में कन्याओं के लिए लाडली जैसी अनेक कल्याणकारी योजनाएं प्रभावी हैं। ऐसे में वहां के आंकड़े भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं। अध्ययन के मुताबिक मुरैना में 25 से 26 वर्ष की आयु वर्ग की मांओं में बाल जन्म औसत 2.85 है और सरवाइवल दर 2.56 हैं। यानी 200 परिवारों में लगभग 90 बच्चे मौत के मुंह में समा जाते हैं।

धौलपुर की स्थिति और भी बुरी है। वहां 200 परिवारो में 95 बच्चो की मुत्यु हा जाती है। गौर करने वाली बात ये हैं कि किस हद तक बालिकाएं बाल मरणशीलता का शिकार होती हैं। मुरैना में जन्म से पहले ही बालिका विरोधी रवैया उजागर हो जाता है। धीरे धीरे मामला संगीन होता चला जाता है। बालिका-शिशु हत्या की पुरानी प्रथा वाले इन जिलों में देहात के लोग भी टेकनोलॉजी का इस्तेमाल करने लगे हैं। वहां के कस्बाई इलाके में अनेक ऐसे केंद्र हैं जहां लिंग पहचान और लिंग आधारित गर्भपात का प्रबंध है। वहां सिर्फ बेटियो वाले परिवार कम ही मिलते हैं।

मुरैना में एसे परिवार मात्र 3 प्रतिशत ही हैं। ये अनचाही बेटियां भी मजबूरन बेटे के इंतजार में पैदा हो जाती हैं। जबकि ज्यादा बेटे वाले परिवार ज्यादा नजर आते हैं।

सेंटर फॉर वीमेनस डेवलपमेंट स्टडीज की निदेशक मैरी ई. जॉन बताती हैं कि अध्ययन में और कई चौंकाने वाली सच्चाईयां उजागर हुई हैं। मसलन लिंग जांच कराने में महिलाएं बढ चढ कर हिस्सा लेती हैं। ज्यादातर वे अपनी मर्जी से कन्या भ्रूण जांच कराती हैं और बेटे की चाह में अपनी कोख से अपनी लाडो का सफाया करवा देती हैं।

उदाहरण के तौर पर धौलपुर में नाई जाति की शिक्षित अंजलि को एक बेटा व बेटी है। इसकी इच्छा है कि उसका बेटा सुशिक्षित हो और अच्छा आदमी बनें। एक और बेटे की चाहत में उसने नसबंदी नहीं कराई। बेटी के जन्म के बाद उसने दो कन्या भ्रूणों का गर्भपात कराया। ये उस औरत का फैसला था कि उसे बेटा चाहिए या बेटी। हद तो यह है कि मुरैना और धौलपुर में बच्चे पैदा करने की जरुरत के निर्देश देने में सास ससुर और मां बाप भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। ठाकुरो, गूजरो और जाटवो में यह पाया गया कि बच्चों के जन्म संबंधी मामले में पुरुषों की आवाज ज्यादा ताकतवर होती है। महिलाओं को बार बार गर्भधारण करना पड़ता है। ऐसा न करने की उन्हें इजाजत नहीं होती। जन्म देने को वहां पुरुषत्व के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। उन्हें कईबार यह निर्देश दिया जाता है कि उसे किस लिंग का बच्चा पैदा करना है। जो महिलाएं गर्भ गिराना चाहती हैं, उनके चरित्र पर लांछन लगाया जाता है कि बच्चे का बाप कोई और है।

धौलपुर का एक गूजर पति स्पष्ट रुप से बताता है कि अगर मेरी पत्नी कहती है कि वह एक बेटे और बेटी से संतुष्ट है, चाहे उसका शरीर और बच्चे जनने लायक मजबूत नहीं है, तो भी उसे जितने मैं चाहूं उतनी संख्या में बच्चे पैदा करने होंगे। भले ही इस बात को लेकर झगड़े हो जाएं । इन परिस्थितियो में औरत की पिटाई भी करनी पड़ सकती है।

मैरी सरकार की योजनाओं के बारे में दो टूक कहती है कि कहीं भी कोई योजना ना लागू की गई है ना ही लोगो की इसकी भनक है। खराब लिंग अनुपातो वाले इलाके से ये योजनाएं कोसो दूर दिखीं। वे चाहती हैं कि सरकार अपनी घोषणा के मुताबिक कम लिंग अनुपात वाले इलाके में गर्भवती महिलाओं की मॉनीटरिंग शीघ्र शुरु करवा दे ताकि चाहे भी तो कोई गर्भपात न करा सके। समुचित संख्या में बेटियां तभी पैदा हो सकेंगी।

संतानविहीनता नहीं, संतानमुक्तता

Posted By Geetashree On 7:54 PM 5 comments

ब्रसेल्स(बेल्जियम) से लौटकर गीताश्री
चॉकलेट के स्वाद, रहस्यमय सन्नाटे और ऐंद्रिक ठंडेपन में डूबे इस देश में संतान न होना उनके लिए अभाव नहीं, एक किस्म की आजादी और जिम्मेदारियों से मुक्ति है। वे खुद को संतानविहीन नहीं संतानमुक्ति समझती हैं। ऐसी ही हैं बेल्जियम की स्त्रियां। सरकार चिंतित हों तो होती रहे। घरवाले उत्तराधिकारी मांगें तो मांगते रहे। जनसंख्या घटती है तो घटे, उन्हें परवाह नहीं क्योंकि बच्चा न पैदा करना उनकी निजी स्वतंत्रता से जुड़ा है।उन्हें अपने कॅरिअर पर ध्यान देना है इसलिए अक्सर मातृत्व और करियर में से किसी एक को चुनना है। इनमें करियर का पलड़ा ज्यादा भारी है।

इस परिस्थिति को बदला नहीं जा सकता। दुनिया के बाकी हिस्सों की तरह बच्चों का लालन पालन सिर्फ महिला की समस्या है। कोई समाज इस बोझ को साझा नहीं करता। क्रेच का अभाव है इसलिए बच्चे को जन्म देते ही इनके करियर पर विराम चिन्ह लग जाता है।राजकोषीय अध्ययन संस्थान के शोध के अनुसार बच्चे पैदा करने से पहले महिला कर्मियों के लिए प्रति घंटा औसत वेतन पुरुष के औसत का 91 प्रतिशत होता है। यह नौकरियों और बच्चों की देखभाल के बीच बाजीगरी कर रही कामकाजी माओं के लिए 67 प्रतिशत तक गिर जाता है। और यह कभी वापस पहले के स्तर पर नहीं आ पाता-तब भी जब बच्चे बड़े होकर स्कूल जाने लगते हैं।

इसे मीडिया में खासतौर से मम्मी मार्ग की उपाधि दी जाती है-एक ऐसा रास्ता जो कम वेतन और कम संभावनाओं की तरफ ले जाता है। कुछ साल पहले तक उन महिलाओं को बच्चा न होना खलता था। अब 30 वर्ष की उम्र के दौर वाली बहुत सी महिलाएं संतान पैदा करने और उनकी परवरिश करने को इस रूप में देखने लगी हैं कि इससे उनकी आजादी छिनती है, कॅरिअर की संभावनाएं कम होती हैं और वित्तीय जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। यह हालात यूरोप के बहुत से देशों में हैं जहां लगभग 10 प्रतिशत महिलाएं ऐसी होती हैं जो 45 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते बेऔलाद हो जाती हैं।

कुछ तो देर से शादी भी करती हैं।इस तथ्य की पुष्टि ब्रसेल्स में रहने वाली पामेला मोरनेयर करती हैं, ‘इनमें वे महिलाएं भी शामिल होती हैं जो अपनी मर्जी से बेऔलाद रहना पसंद करती हैं- और जो बच्चे पैदा करना टालती हैं या बच्चे पैदा करने में समस्याओं का सामना करती हैं या कुछ ऐसी भी हैं जो मां नहीं बन सकतीं।’पामेला के अनुसार ऐसी महिलाएं या उनका परिवार जरुरत पडऩे पर बच्चे गोद लेना पसंद करते हैं। इसके लिए सबसे बेहतर जमीन है भारत की। भारत में बढती हुई जनसंख्या सबसे बड़ी समस्या है। इन पर रोकथाम के लिए सरकार क्या क्या उपाय नहीं कर रही है।

एक जानकारी के मुताबिक बेल्जियम में प्रति वर्ष 6-7 हजार बच्चे भारत से गोद लिए जा रहे हैं। जब वे बच्चे बड़े होते हैं तो अपनी जड़ें खोजने भारत आते हैं। पहचान के संक्रमण से गुजरने वाले इन बच्चों की पीड़ा कुछ महीने पहले भारत में देखी गई जब बेल्जियम से आई दो लड़कियां हरियाणा में अपने मां-बाप की तलाश करती पाई गईं।

ऐसे पता नहीं कितने युवा भारत आते हैं असली मां-बाप को ढूंढऩे। भारत से गोद लेने की यह प्रक्रिया लंबे समय से चली आ रही है। इधर भारत सरकार ने थोड़ी सख्ती कर दी है तो बेल्जियम वालों ने रूस, बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया जैसे आर्थिक रूप से कमजोर देशों की तरफ देखना शुरू कर दिया है।यहां की जनसंख्या घटने की एक वजह समलैंगिकता भी है। लगातार इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। जब से ऐसे संबंधों को कानूनी मान्यता मिली है, ऐसे लोग खुलकर अपने संबंधों को जाहिर करने लगे हैं। आदमी आदमी साथ रहते हैं और बच्चा पाल लेते हैं।

इस वजह से कई घर टूट रहे हैं, तलाक की दर बढ़ रही है। ऊपर ऊपर शांति पसरी हुई दिखाई देती है पर अंदर अंदर गहरा तनाव है। वहां रहने वाले एक भारतीय ने बताया कि यहां मां-बाप छुटपन में ही बच्चों को सिखा देते हैं कि पहले लडक़ी के साथ 6 महीने रहो फिर शादी करो। 18 साल का होते-होते लडक़ा घर से बाहर हो जाता है। परिवार का महत्व वे समझे तो कैसे?

यहां कुछेक प्रमुख चौराहो पर विचित्र वेशभूषा में विद्रोही युवक-युवतियों की फौज घूमती रहती है। इसे वे अपने समाज के खिलाफ अपना विरोध प्रदर्शन मानते हैं। एक स्थानीय व्यक्ति ने इसे एक किस्म का युवा आंदोलन करार देते हुए बताया कि इनकी अपने अभिभावको से नहीं पटती। इसीलिए जीने का ऐसा तरीका अपना लिया है।

फ्रांस रेडियो में कार्यरत अन्नाबेले मोपास कहती हैं, ‘अमेरिकन संस्कृति और यूरोपियन संस्कृति एक जैसे ही हैं। इसीलिए यहां पारिवार का महत्व अपेक्षाकृत कम हैं।’एक शोध के मुताबिक यहां पांच में से एक स्त्री घरेलू हिंसा का शिकार है। यह बात भले हम भारतीयों के गले उतारना मुश्किल नजर आता है कि महिलाएं इन्हीं सारी वजहों से अब यह विकल्प चुनने लगी हैं कि वे बच्चे पैदा नहीं करना चाहतीं। फ्रांसीसी महिलाएं भी भारतीय महिलाओं की तरह बिना बच्चे के जिंदगी की कल्पना नहीं कर सकतीं। हालांकि भारत में भी बड़े शहरों में संतानमुक्त स्त्रियों की संख्या बढ़ रही है।

ब्रसेल्स की 33 वर्षीय शादीशुदा महिला ग्रेसी कहती हैं, ‘मैंने बच्चे नहीं पैदा करने का फैसला कॅरिअर की वजह से नहीं किया बल्कि यह एक जीवनशैली का मुद्दा है। मैं अपने जीवन का आनंद अपनी तरह से उठाना चाहती हूं।’ लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस में समाज विज्ञानी डॉ. कैथरीन हकीम ने इस बारे में एक दिलचस्प अध्ययन किया है। वह कहती हैं-इसमें जरा भी शक नहीं कि ऐसे लोगों की संख्या बढ रही है जो संतान नहीं चाहते। बहुत से देशों में ऐसे लोगों की संख्या बढ कर 20 प्रतिशत हो जाएगी जो बेऔलाद रहना पसंद करते हैं और। जर्मनी में ऐसे लोगों की संख्या पहले ही 30 प्रतिशत हो चुकी है। क्योंकि इसे एक ऐसा देश माना जाता है जहां की ज्यादतर नीतियां पारिवारिक जीवन के लिए सहयोगी नहीं हैं।

प्राइवेट फर्म में काम करने वाली मरिया कहती हैं, ‘मैंने 25 साल की उम्र में नसबंदी करा ली थी और बच्चे पैदा नहीं करने का फैसला करके मुझे अफसोस नहीं है।’ कैथरीन ऐसी ही महिलाओं की तरफ संकेत करती हुई कहती हैं-अब लोगों ने यह सोचना शुरु कर दिया है कि संतानविहीनता कोई अभाव नहीं, बल्कि परिवर्तित जीवन शैली का एक नमूना है।यूरोप में भी अब अमेरिका की तरह ऐसे गुट बनने लगे हैं जो संतानविहीन होने के समर्थन में अपनी बात रखते हैं।

ब्रिटेन में बाकायदा एक संतानमुक्त संगठन है-किडिंग एसाइड। इस तरह के संगठनों को इस बात की बेहद चिंता होती है कि प्रवासी लोग इतने बच्चे पैदा क्यों कर रहे हैं। बेल्जियम सरकार प्रवासी तुर्की और प्रवासी भारतीयों के बच्चों की बढ़ती संख्या पर चिंतित दिखाई देती हैं। तुर्की के लोग बच्चे पैदा करने में अव्वल हैं। ब्रसेल्स से सटे उपनगर एन्टवर्प में लगभग 400 गुजराती परिवार रहते हैं जिनका मूल व्यवसाय हीरे का व्यापार है। इनके परिवारों को संतान के मामले में यूरोप की हवा नहीं लगी है।इधर जनसंख्या की घटती दर से बेल्जियम समेत अन्य कई देश जैसे जापान और आस्ट्रेलिया भी चिंतित है। जनसंख्या को संतुलित करने के लिए समृद्ध देशों की सरकारों को काफी मशक्ïकत करनी पड़ रही है। जापान सरकार ने अपनी जनसंख्या नीति में आमूलचूल परिवर्तन कर लोक लुभावन घोषणाएं कर दीं ताकि लोग अधिक से अधिक बच्चे पैदा कर सकें। आस्ट्रेलिया में शिशु जन्म दर बढ़ाने पर सरकार द्वारा बोनस दिए जाने की योजना के सकारात्मक परिणाम नजर आए हैं।

वहां जब से ‘एक बच्चा मम्मी का, एक बच्चा डैड का और एक बच्चा देश का’ जैसा नारा शुरू किया है, तब से लोगों में बच्चा पैदा करने के प्रति उत्साह बना है।

बेल्जियम में भी सरकार संतान वाले परिवारों को बहुत सारी सुविधाएं देती हैं। संतानमुक्त लोग इस तरह सरकारी सुविधाओं का बंटवारा सही नहीं मानते हैं।

लेकिन क्रेच(डे केयर सेंटर) की मांग को लेकर महिलाओं की जंग जारी है।

बेवफाई विशेषांक-एक घिनौवनी मानसिकता का परिचायक

Posted By Geetashree On 3:34 AM 1 comments

गीतांजलिश्री
सबसे पहले मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि कालिया और राय की बर्खास्तगी के कागज पर हस्ताक्षर नहीं दे रही हूं। मगर इस मुद्दे पर सारी औरत विरोधी नजर और मानसिकता पर अपना प्रोटेस्ट दर्ज कर रही हूं।
जिस तरह के उल-जलूल शीर्षक के सहारे नए ज्ञानोदय को लोकप्रियता दिलाए जाने का प्रयास किया जाता रहा है। और जिस छद्म भाषा में ये निंदनीय साक्षात्कार दिया गया है, दोनों उसी गहरे पैठी पुरुष मानसिकता के प्रतिमान हैं जो सदियों से चली आ रही है। न जाने दंभ में या की बेवकूफी में, ये बाते कही गई, मगर इससे फर्क नहीं पड़ता। बल्कि इरादा क्या था या है उससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि जब तक आपकी मनसिकता नहीं बदलेगी और औरत के प्रति ‘नजर’ वही पुरानी चलेगी, तब तक आप उसके पक्ष में हों या विपक्ष में, आपकी भाषा यही रहेगी। क्योंकि आपके पास कोई और भाषा है ही नहीं। मजाक, गंभीर विवाद, गाली, तारीफ, सबके लिए शब्द-संपदा एक होगी। भद्दे शब्द, बेहूदा शैली, फूहड़ अंदाज।
इसमें नया कुछ नहीं है। और बोल्ड तो सिरे से ही नहीं। यह वही भाषा है। वही रस-प्रसंग जो कबसे पुरुष इस्तेमाल कर रहे हैं।
(हिंदी अकादमी अश्लील क्या होता है का सबक यहां पढ़ें।यह है अश्लील, न की हमारे कृष्ण बलदेव वैद्य) मुद्दा यही है - कि जेंडर सेंसटिविटी और जेंडर इक्विलिटी का अहसास पुरजोर नारीबाजी और रेडिकल फैमिनिस्ट वक्तव्यों के बावजूद आप की चेतना को अछूता छोड़ सकता है।
नजर वही है, पुरुष-प्रधान, और पैमाना वही है औरत को आंकने का, तो आप पक्ष में हों, विपक्ष में, दोनों सूरत में, यही साक्षात्कार देगा, यही शीर्षक चुनेगा, यही बयानबाजी होगी, यही बवाल उठेंगे।
अफसोस यह की ये नजर और मानसिकता इस कदर फैली हुई है कि जब सफाई अभियान चलाने की बात है, तो कतार-दर-कतार उसी किस्म के लोग नजर आते हैं जिन्हें बर्खास्त करा देना चाहिए। किस-किस को बर्खास्त करना चाहिए? बर्खास्तगी का कायदा क्या होना चाहिए? मैं कम से कम, इसको लेकर आश्वस्त नहीं हूं।
दोनों शख्स अपनी गलती मान के, जिस ओहदे पर आसिन हैं वहां से हट जाएं तो कुछ इज्जत पाएंगे? या फिर माफी मांग कर विनम्रता से कुछ सही और संवेदनशील करें? शायद यह मौका तो उन्हें मिलना चाहिए? (यह भी न भूलें की विभूति ने किसी और क्षेत्र में, संप्रदायों और जातियों के बीच, सराहनीय और हिम्मती काम किया है।)
यह भी हमारी जिम्मेदारी है कि इस मुद्दे से इतर कोई राजनीति यहां शामिल न हो। मैं गलत हो सकती हूं पर यह सारे सवाल मुझे जरूरी लग रहे हैं।
बर्खास्तगी की मांग करने वालों में यह समझ पाने का विवेक होना चाहिए, कि इस मांग से न जुडऩा उस गंदगी की तरफ होना कतई नहीं है, जिसका सिर्फ विरोध ही हो सकता है, और मैं कर रही हूं।
न केवल एक साक्षात्कार, बल्कि बेवफाई का पूरा तस्व्वुर - बेवफाई को एलानिया प्रेम से अलग कर प्रेम विशेषांक के बाद बेवफाई विशेषांक निकालने का सारा आयोजन-- एक घिनौनी मानसिकता दर्शाता है।

सड़ांध मार रहे विभूति के विचारो पर थू थू..

Posted By Geetashree On 3:25 AM 1 comments

मनीषा
‘लेखिकाओं को छिनाल’ बताकर विभूतिनारायण ने अपने सारे किये-कराये पर खुद ही तेजाब डाल दिया। क्या पता ये बैंक ऑफ-द-माइंड पड़े सड़ांध मार रहे उनके घिनौने विचार हों या अपनी गुस्ताखियों का पुलिंदा खुलने से भयभीत बचाव में की गई बयानबाजी। मैं राय से यह जरूर जानना चाहूंगी कि अगर यही ‘टर्म’ पुरुष के लिए में इस्तेमाल करना चाहूं तो कैसे और क्या होगा?यह घटिया शब्द किसी सभ्य व्यक्ति की जुबान पर तब भी नहीं आ सकता, जब वह क्रोधित हो या बदले की भावना से किसी ‘खास’ को गरिया रहा हो। इस तरह की तमाम स्त्रियोचित गालियां पुरुषों की कुंठाओं का प्रतिफल हैं, जिनका इस्तेमाल वे शेखी बघारने के लिए कितना ही करते फिरें पर सच्चाई यही है कि ढलान पर जाती मर्दानगी और शिथिलता उनके दिमाग को इस कदर कब्जिया लेती है कि सोचने-समझने की क्षमता ही वे खो बैठते हैं।
औरतों के जननांगों पर अपना निशाना साधने वालों की कूवत पर अब तक स्त्रियों ने प्रश्नचिन्ह नहीं लगाए, इसीलिए मूंछों पर ताव देकर ये अनर्गल प्रलाप सार्वजनिक रूप से कर पा रहे हैं। चरित्र-प्रमाण-पत्र बांटने को लालायित रहने वाले मर्दों का दिमाग ही नहीं खराब है, इनमें अपनी कारस्थानियों का ठीकरा औरतों के सिर फोडऩे की आदत भी जबर्दस्त है। काफी समय बेमजा काटने के बाद आखिर हिंदी वालों ने विभूति की जबान से फिसले विशेषण को स्यापा है। यह कहते हुए मुझको जरा भी संकोच नहीं हो रहा कि स्त्री हर हर एंगेल से शोषण करने वाले उनके विरोधी भी अब एक हो चले हैं।
राय के यह कहने पर कि हमारे यहां जो स्त्री विमर्श हुआ है, वह मुख्य रूप से शरीर केंद्रित है... मैं तो हमेशा से पूछती आई हूं कि स्त्री विमर्श को देह से कैसे मुक्त करेंगे, इसका कोई नुस्खा है तो बताएं। यह संकीर्ण और बीमार मानसिकता है, जो औरत की देह का तो बढ़-चढ़ कर इस्तेमाल करने में कोई संकोच नहीं करती। लेकिन जब वही स्त्री मुक्ति की आवाज उठाती है तो उसको जलील करने, नीचे ढकेलने और कमजोर बनाने में कोई कोताही नहीं बरती जाती। औरत यदि शरीर ही छोड़ दे तो उसके पास बचता ही क्या है, वंशबेल पर पुरुषों का कब्जा, कुलनाम पर पुरुषों का कब्जा, घर/ परिवार की मुखियागिरी पर पुरुषों का कब्जा, कोख और चरित्र पर पुरुषों की बपौती। फिर बचा क्या है?
यह देह ही है, जिस पर अतिक्रमण करने को आमादा पुरुष तरह-तरह के स्वांग रचाता है। यह औरत की देह ही है, जो उस पुरुष को कोख में पोषती है, जो उसकी ‘शुचिता’ के प्रमाण-पत्र देता फिरता है। स्त्री सिर्फ देह है, मान्यवर। जिसके बिना ना तो आपका काम चल सकता है, ना ही हम औरतों का। नख से शिख समूची औरत को उसकी संपूर्णता के साथ जीने का अधिकार चाहिए। यह देह ही है, जिसके पीछे फिरता पुरुष दिमागी दीवालियेपन की स्थिति में पहुंच जाता है। ज्यादा दर्शन बघारने की जरूरत इसलिए भी नहीं है कि इस वाहियात जवाब में कही गई सारी बातें/ सारे तर्क स्त्री की देह को लेकर की हैं। जब आपका विचार ही देह मुक्त नहीं हो पा रहा तो हम अपनी देह (का विचार) त्यागने की बात सोच भी कैसे सकते हैं। आगे वे कहते हैं - यह भी कह सकते है कि यह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सवकी तरह है। ‘बेवफाई’ पर भी क्या मर्दों का आधिकारिक जोर है। ‘वफा’ बात पुरुषों की जुबान पर वैसे भी शोभती नहीं। स्त्री विमर्श तो अभी अपने यहां शैशव में ही है। खुलकर लिखने की बात तो दूर, अभी तमाम पुरुषों के साये में पलने को मजबूर लेखिकाओं को ‘स्त्रीवाद’ शब्द ही डरावना लगता है।
स्त्रीविमर्श के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे शिकारी स्त्रियों की देह को लेकर लार टपकाऊ बने फिर रहे हैं। इक्का-दुक्का पत्रकारों की हिम्मत और लेखिकाओं द्वारा किये जा रहे स्त्री विमर्श को उनके जैसे किसी पुरुष की छत्रछाया नहीं चाहिए, यह उनके लिए ही काफी है, जो अपनी नायिकाओं के भरोसे एकाध सीन रचने की कोशिश करके खुश हैं। रही बातें बिस्तरों की, तो क्या बिस्तरी उन्माद पर केवल पुरुषों का ही एकाधिकार है, क्या उनकी लतरानियों को रचने का साहस करने वाली स्त्री स्यापा करती ही उनको भाती है। यह याद रखना होगा कि आपसी सहमति से बने किसी के रिश्तों पर राय का प्रलाप, ‘अंगूर खट्टïे हैं’ जैसी लोमड़ी का रोदना नहीं लगता क्या। जिन लेखिकाओं की होड़ लगी है उनमें से जो प्रतिष् िठत पुरुषों की गोद में बैठकर वैचारिक वमन करती हैं, वे इनके चंगुल में नहीं आई होंगी, यह भी स्वीकारते चलना था इनको। अपनी सफलताओं का सेहरा जब तक पौरुषेय दंभ के हाथों बंधवाते रहेंगे हम, तभी तक इनके बीमार मगज हमें ‘साबित’ करने की चेतावनियां देने का साहस कर पायेंगे
...दरअसल स्त्री मुक्ति के बड़े मुद्दे पीछे चले गये हैं... माफ करें, पर पुरुष तो कम से कम ऐसी बातें बोलने का मंूह की नहीं रखते, जल्लाद की जुबान से बकरे की खैरीयत जमती जो नहीं। आप इस तरह के वाहियात विशेषणों से शोभना बंद कर दीजिए, हमको मुक्ति खुद-ब-खुद मिल जाएगी। मुक्ति कोइ अमर फल नहीं है, जिसको खोज कर हमें खाना है। मुक्ति इसी खौफनाक दरिंदी मर्दवादी मानसिकता से चाहिए। यह भी वही मॉरल पुलिसिंग है, जो बजरंगे करते फिरते हैं। इस तरह के मर्दाना विचारों को मैं किसी खाप से कू नहीं मानती, जो लैंकिग विषमता का वमन करते हैं, वह भी वैचारिकता काचोंगा पहन कर। जिस दरिद्र विचार को उखाड़ फेंकने के लिए हम स्त्रीवादी वैचारिक आंदोलन चला रही है, उसका गला रेतने वाले किसी भी मर्दाना सोच को कुचलना खालिस मानवतावादी कदम कहलाएगा, क्योंकि ये सनकी खुराफातें भी इतिहास का हिस्सा होंगी, थू-थू के लिए ही सही।
... औरतें भी वही गलतियां कर रही है, जो पुरुषों ने की थी... पुरुषों की गुंडागर्दी और लिजलिजेपन को छिपाने का कितना मासूम तर्क लाए हैं, हमको रास्ते मत सुझाइए। जाइए अपनी सोच का इलाज कराइए। अपनी आनेवाली पीढिय़ों को मानवता का पाठ पढ़ाइए, ताकि वे आपकी मांओं/ बहनों को उनके गोपन अंगों के नाम से पुकारने से पहले थोड़ा झिझकें।... बेवफाई को समझने के लिए व्यक्तिगत संपत्ति, धर्म या पितृसत्ता जैसी संस्था को ध्यान रखने की बात करने से पहले ठीक से समझ तो लीजिए, दरअसल आपको चाहिए क्या। स्त्री मुक्ति के नाम पर स्त्री भक्ति करने वाले पुरुषों से भरे आपके साहित्य समाज में बैठे दरिंदों को आईना दिखाना शुरू भीतो नहीं हो पाया है अभी। हिंदी जगत में तो हिम्मत वाली औरतों की खोज इसलिए नहीं हो रही कि उनके कंधे पर रखकर बंदूक चलाई जा सके, बल्कि इसी डर से हो रही है कि उनकी धार को सामूहिक रूप से कुंद किया जा सके और उनको भोथरा करके अपनी जमात में शामिल करने में सफलता मिल सके।

वरिष्ठ साहित्यकार गिरिराज किशोर का पत्र

Posted By Geetashree On 6:12 AM 2 comments

दो दिन पहले शाम को अचानक कानपुर से गिरिराज किशोर जी का फोन आया। वे विभूतिनारायण के साक्षात्कार पर बेहद कुपित थे. जैसे पूरा महिला समाज है. उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री को पत्र लिखने जा रहे है. वे चाहते कि महिला लेखिकाओं को छीनाल का दर्जा देने वाले विभूति के खिलाफ सभी एकजुट होकर विऱोध करें। वो हो भी रहा है.,,,लोग अपने अपने स्तरो पर कर रहे हैं. दो दिन से अखबारो में ये मामला खूब उछल रहा है। उन्होंने पत्र की वो कापी हमें मेल कर दी है। हम ज्यो त्यो यहां लगा रहे हैं। साथ में वरिष्ठ कहानीकार प्रियंवद का भी हस्ताक्षर है...पढिए...

मामला काफी तूल पकड़ चुका है. मैंने कुलपति महोदय से भी बात की। कल तक वे अपने बयान के बचाव में टिक कर खड़े थे...आज उन्होंने अलग एंगल दे दिया. आज वे कतरा गए। वह कहते हैं कि मैंने इंटरव्यू में छीनाल शब्द बोला ही नहीं है. मैंने सिर्फ बेवफाई शब्द बार बार बोला है। ये शब्द वहां कहां से आया, मुझे नहीं मालूम। कुलपति महोदय को नया ज्ञानपीठ के संपादक रवींद्र कालिया का इंतजार है. उनके दिल्ली लौटने पर वे बात करेंगे कि कैसे और कहां से ये शब्द इंटरव्यू में घुसा। विभूति आशंका जताते हैं कि मैगजीन के डेस्क पर ये शरारत हुई है। मजे की बात ये कि इस विवादास्पद इंटरव्यू का कोई रिकार्ड किसी के पास मौजूद नहीं है। ना लेने वाले के पास ना देने वाले के पास.अब ये दोनो ही जानते होंगे कि सच कौन बोल रहा है. रवींद्र कालिया खलनायक हैं या विभूति...दोनो जल्दी फैसला करले और जनता के बता दें, तो अच्छा होगा. दोष तो तय करना ही होगा। बात अब तक इतनी बिगड़ चुकी है कि विभूति की पत्नी और ममता कालिया तक पर छीनाल के छींटे पड़ रहे हैं। ये ठीक नहीं..हम प्रतिशोध में वही गल्तियां दुहरा रहे हैं..जो मर्दवादी मानसिकता वाले लोग कर रहे हैं. ये लड़ाई अब सीधे सीधे कहीं स्त्री-पुरुष के बीच की लड़ाई ना बन जाए. लेकिन जिस तरह से इस लड़ाई को स्त्रियां कम और पुरुष ज्यादा लड़ रहे हैं वो काबिले तारीफ है. मगर कुछ कुंठित लोग भी हैं जिनकी तड़पती आत्मा को चैन मिला होगा इस बयान से. विभूति उन्हें मौका दिया कि वे अपनी कुंठा शांत कर सके।


वीएन राय से बड़ा लफंगा नहीं देखा..

Posted By Geetashree On 12:42 AM 3 comments
मैत्रयी पुष्पा (लेखिका)

मेरी आत्मकथा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’कोई पढ़े और बताये कि विभूति ने यह बदतमीजी किस आधार पर की है। हमने एक जिंदगी जी है उसमें से एक जिंदा औरत निकलती है, जो लेखन में दखल देती है।

महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति वीएन राय लेखिकाओं को ‘छिनाल’कहकर अपनी कुंठा मिटा रहे हैं और उन्हें लगता है कि लेखन से न मिली प्रसिद्धि की भरपाई वह इसी से कर लेंगे। मैं इस बारे में कुछ आगे कहूं उससे पहले ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया और कुलपति वीएन राय को याद दिलाना चाहुंगी कि दोनों की बीबियां ममता कालिया और पदमा राय लेखिकाएं है,आखिर उनके ‘छिनाल’होने के बारे में महानुभावों का क्या ख्याल है।

लेखन के क्षेत्र में आने के बाद से ही लंपट छवि के धनी रहे वीएन राय ने ‘छिनाल’ शब्द का प्रयोग हिंदी लेखिकाओं के आत्मकथा लेखन के संदर्भ में की है। हिंदी में मन्नु भंडारी,प्रभा खेतान और मेरी आत्मकथा आयी है। जाहिरा तौर यह टिप्पणी हममें से ही किसी एक के बारे में की गयी, ऐसा कौन है वह तो विभूति ही जानें। प्रेमचंद जयंती के अवसर पर कल ऐवाने गालिब सभागार (ऐवाने गालिब) में उनसे मुलाकात के दौरान मैंने पूछा कि ‘नाम लिखने की हिम्मत क्यों न दिखा सके, तो वह करीब इस सवाल पर उसी तरह भागते नजर आये जैसे श्रोताओं के सवाल पर ऐवाने गालिब में।

मेरी आत्मकथा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’कोई पढ़े और बताये कि विभूति ने यह बदतमीजी किस आधार पर की है। हमने एक जिंदगी जी है उसमें से एक जिंदा औरत निकलती है और लेखन में दखल देती है। यह एहसास विभूति नारायण जैसे लेखक को कभी नहीं हो सकता क्योंकि वह बुनियादी तौर पर लफंगे हैं।

मैं विभूति नारायण के गांव में होने वाले किसी कार्यक्रम में कभी नहीं गयी। उनके समकालिनों और लड़कियों से सुनती आयी हूं कि वह लफंगई में सारी नैतिकताएं ताक पर रख देता है। यहां तक कि कई दफा वर्धा भी मुझे बुलाया,लेकिन सिर्फ एक बार गयी। वह भी दो शर्तों के साथ। एक तो मैं बहुत समय नहीं लगा सकती इसलिए हवाई जहाज से आउंगी और दूसरा मैं विकास नारायण राय के साथ आउंगी जो कि विभूति का भाई और चरित्र में उससे बिल्कुल उलट है। विकास के साथ ही दिल्ली लौट आने पर विभूति ने कहा कि ‘वह आपको कबतक बचायेगा।’ सच बताउं मेरी इतनी उम्र हो गयी है फिर भी कभी विभूति पर भरोसा नहीं हुआ कि वह किसी चीज का लिहाज करता होंगे।

रही बात ‘छिनाल’ होने या न होने की तो, जब हम लेखिकाएं सामाजिक पाबंदियों और हदों को तोड़ बाहर निकले तभी से यह तोहमतें हमारे पीछे लगी हैं। अगर हमलोग इस तरह के लांछनों से डर गये होते तो आज उन दरवाजों के भीतर ही पैबस्त रहते,जहां विभूति जैसे लोग देखना चाहते हैं। छिनाल,वेश्या जैसे शब्द मर्दों के बनाये हुए हैं और हम इनकों ठेंगे पर रखते हैं।

हमें तरस आता है वर्धा विश्वविद्यालय पर जिसका वीसी एक लफंगा है और तरस आता है 'नया ज्ञानोदय' पर जो लफंगयी को प्रचारित करता है। मैंने ज्ञानपीठ के मालिक अशोक जैन को फोन कर पूछा तो उसने शर्मींदा होने की बात कही। मगर मेरा मानना है कि बात जब लिखित आ गयी हो तो कार्रवाई भी उससे कम पर हमें नहीं मंजूर है। दरअसल ज्ञोनादय के संपादक रवींद्र कालिया ने विभूति की बकवास को इसलिए नहीं संपादित किया क्योंकि ममता कालिया को विभूति ने अपने विश्वविद्यालय में नौकरी दे रखी है।

मैं साहित्य समाज और संवेदनशील लोगों से मांग करती हूं कि इस पर व्यापक स्तर पर चर्चा हो और विभूति और रवींद्र बतायें कि कौन सी लेखिकाएं ‘छिनाल’हैं। मेरा साफ मानना है कि ये लोग शिकारी हैं और शिकार हाथ न लग पाने की कुंठा मिटा रहे हैं। मेरा अनुभव है कि तमाम जोड़-जुगाड़ से भी विभूति की किताबें जब चर्चा में नहीं आ पातीं तो वह काफी गुस्से में आ जाते हैं। औरतों के बारे में उनकी यह टिप्पणी उसी का नतीजा है।

(अजय प्रकाश से हुई बातचीत पर आधारित)
जनज्वार से साभार

कुलपति वी एन राय ने लेखिकाओं को कहा 'छिनाल'

Posted By Geetashree On 12:30 AM 7 comments

नई दिल्ली, 31 जुलाई। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति और भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी वीएन राय ने हिंदी की एक साहित्यिक पत्रिका को दिए साक्षात्कार में कहा है कि हिंदी लेखिकाओं में एक वर्ग ऐसा है जो अपने आप को बड़ा ‘छिनाल’साबित करने में लगा हुआ है। उनके इस बयान की हिंदी की कई प्रमुख लेखिकाओं ने आलोचना करते हुए उनके इस्तीफे की मांग की है।
भारतीय ज्ञानपीठ की साहित्यिक पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’को दिए साक्षात्कार में वीएन राय ने कहा है,‘नारीवाद का विमर्श अब बेवफाई के बड़े महोत्सव में बदल गया है।’भारतीय पुलिस सेवा 1975बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के अधिकारी वीएन राय को 2008 में हिंदी विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया था। इस केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना केंद्र सरकार ने हिंदी भाषा और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए की थी।
हिंदी की कुछ प्रमुख लेखिकाओं ने वीएन राय को सत्ता के मद में चूर बताते हुए उन्हें बर्खास्त करने की मांग की है। मशहूर लेखक कृण्णा सोबती ने कहा,‘अगर उन्होंने ऐसा कहा है तो,यह न केवल महिलाओं का अपमान है बल्कि हमारे संविधान का उल्लंघन भी है। सरकार को उन्हें तत्काल बर्खास्त करना चाहिए।’
‘नया ज्ञानोदय’ को दिए साक्षात्कार में वीएन राय ने कहा है,‘लेखिकाओं में यह साबित करने की होड़ लगी है कि उनसे बड़ी छिनाल कोई नहीं है...यह विमर्श बेवफाई के विराट उत्सव की तरह है।’ एक लेखिका की आत्मकथा,जिसे कई पुरस्कार मिल चुके हैं,का अपमानजनक संदर्भ देते हुए राय कहते हैं,‘मुझे लगता है इधर प्रकाशित एक बहु प्रचारित-प्रसारित लेखिका की आत्मकथात्मक पुस्तक का शीर्षक हो सकता था ‘कितने बिस्तरों में कितनी बार’।’
वीएन राय से जब यह पूछा गया कि उनका इशारा किस लेखिका की ओर है तो उन्होंने हंसते हुए अपनी पूरी बात दोहराई और कहा,‘यहां किसी का नाम लेना उचित नहीं है लेकिन आप सबसे बड़ी छिनाल साबित करने की प्रवृत्ति को देख सकते हैं। यह प्रवृत्ति लेखिकाओं में तेजी से बढ़ रही है। ‘कितने बिस्तरों में कितनी बार’का संदर्भ आप उनके काम में देख सकते हैं।’
वीएन राय के इस बयान पर हिंदी की मशहूर लेखिका और कई पुरस्कारों से सम्मानित मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं,‘राय का बयान पुरुषों की उस मानसिकता को प्रतिबिंबित करता है जो पहले नई लेखिकाओं का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं और नाकाम रहने पर उन्हें बदनाम करते हैं।’ वे कहती हैं, ‘ये वे लोग हैं जो अपनी पवित्रता की दुहाई देते हुए नहीं थकते हैं।’पुष्पा कहती हैं,‘क्या वे अपनी छात्रा के लिए इसी विशेषण का इस्तेमाल कर सकते हैं?राय की पत्नी खुद एक लेखिका हैं। क्या वह उनके बारे में भी ऐसा ही कहेंगे।’पुष्पा,वीएन राय जैसे लोगों को लाइलाज बताते हुए कहती हैं कि सरकार को उनपर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाना चाहिए।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति के इस बयान को ‘घोर आपराधिक’करार देते हुए ‘शलाका सम्मान’ से सम्मानित मन्नू भंडारी कहती हैं,‘वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी एक सिपाही की तरह व्यवहार कर रहा है।’वे कहती हैं कि वे एक कुलपति से वे इस तरह के बयान की उम्मीद नहीं कर सकती हैं। भंडारी कहती हैं,‘हम महिला लेखकों को नारायण जैसे लोगों से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं है.'
(जनसत्ता से साभार)