वक्त का ज्वालामुखी और बर्फ जैसी औरतें

Posted By Geetashree On 5:06 AM


गीताश्री

“ सेक्स वर्कर दूसरी औरतो से अलग होती है। इसके चार कारण हैं...हम अपनी मर्जी की मालिक होती हैं। हमें खाना बनाकर पति का इंतजार नहीं करना पड़ता। हमें उसके मैले कपड़े नहीं धोने पड़ते। हमें अपने बच्चों को अपने हिसाब से पालने के लिए आदमी की इजाजत नहीं लेनी पड़ती। हमें बच्चे पालने के लिए आदमी की जायदाद पर दावा नहीं करना पड़ता। ”
......नलिनी जमीला (एक सेक्सवर्कर की आत्मकथा में )
साथ रहने वाला एक आदमी पति बन जाता था और दूसरा भाई।
ये वो रिश्ते थे, जो बाजार बनाता था और बाजार ही देता था रिश्तों को नाम।
रिश्तों को नाम देने के बावजूद ऐसे रिश्तों को समझना मुश्किल है क्योंकि अबूझ रिश्तों की ये एक ऐसी कहानी है, जो किसी औरत के जिस्म से शुरु होकर औरत के अरमानों पर आकर खत्म हो जाती है।
लेकिन किसी के अरमान मिटे या सपने लुटे, इसकी परवाह बाजार कब करता है? केरल में भी हमने अरमानों की ऐसी अनगिनत चिताएं देखीं, जिसे किसी की बेचारगी और लाचारी हवा दे रही थी ।
केरल में सेक्स वर्करो की दुनिया के अनचीन्हे दर्द से साझा करते हुए मैंने देखा कि जो आदमी खुद को पति बता रहा है वो पति नहीं दलाल है और जो खुद को भाई बता रहा है वो ग्राहक ढूंढलानेवाला बिचौलिया. । और दोनों जिस्म के सौदे के बाद मिले पैसों से करते थे ऐश। लेकिन ये सब एक बंद दुनिया का चेहरा था, जिससे खुली दुनिया के लोग कोई मतलब नहीं रखना चाहते । तभी तो हमने पाया कि सेक्सवर्कर समाज से वैसे ही नफरत करती है जैसे समाज सेक्स वर्कर से।
कोई पति बनकर दलाली करेगा और कोई भाई बनकर ग्राहक लाएगा, शायद सामजिक ताने-बाने पर रिसर्च करनेवाले रिश्तों की इस नई परिभाषा को कुबुल न कर पाए, लेकिन सच था।
केरल के कोझीकोड में इन्हें रोपर्स के नाम से जाना जाता है। रोपर्स, रोप(रस्सी) शब्द से बना है। यानी दो किनारों को जोड़ने वाला, रस्सी की तरह जोड़ने वाला रोपड़,ये खुलासा केरल की मशहूर सेक्स वर्कर नलिनी जमाली ने भी अपनी आत्मकथा में किया है। उनकी आत्मकथा खूब बिकी है और हिंदी में भी अनुवाद होकर आई है। इसे पढ़ने के बाद केरल की सेक्सवर्कर के बारे में और करीब से जानने-समझने का मन हुआ।
मैं केरल की यात्रा पर गई थी तंबाकू पर शोध करने, लेकिन वहां मेरे एक एकिटविस्ट मित्र साजू से मैंने अपनी इच्छा जताई।
शाम तक उनके आफिस में दो महिलाएं हाजिर थीं। रमणी और सरोजनी। कोट्टायम के उनके दफ्तर में बैठी, थोड़ी सकुचाई, झिझकती हुई दो सांवली-काली रंगत वाली यौन कर्मियों और मेरे बीच भाषा का संकट था। वे ना तो अंग्रेजी बोल सकती थीं, ना हिंदी समझती थी। ना मैं उनकी भाषा। मगर वे इस बातके लिए तैयार होकर आई थी कि एक पत्रकार को इंटरव्यू देना है। साजू खुद इंटरप्रेटर बन गया।
स्त्री का दर्द पहली बार पुरुष के मुख से अनुवाद होकर स्त्री तक आ रहा था। पता नहीं पुरुष ने उसमें क्या जोड़ा, क्या घटाया...मगर उन दोनों की दैहिक भाषा ने मुझे समझा दिया, सब कुछ। रमणी थोड़ी कम उम्र की थी। वह खुल रही थी, साहसपूर्वक, वैसे ही जैसे उसने यौनकर्म की दहलीज पर पैर रखा था।
बोलते हुए वह उसके भीतर की खड़खड़ साजू ने नहीं, मैंने सुनी। कुछ था जो खुलता और बंद होता था। खौफ के साथ अपने बाहर फैलने की ललक को वह रोक नहीं पा रही थी। रमणी को दिल्ली देखना है। उसने देखा नहीं, सुना भर है। बातचीत के दौरान वह लगभग गिड़गिड़ाती है-“ क्या आप मेरे लिए टिकट भेजोगे। अपने पास रखोगे। लालकिला, कुतुब मीनार देखना है। सुना है...बहुत सुंदर और बड़ा शहर है...।” मैं भी वादा कर देती हूं पर अभी तक पूरा नहीं कर पाई हूं। शायद कभी कर पाऊं...उनसे संपर्क का जरिया भी तो नहीं कोई. हम कौन सी भाषा में बात करेंगे, फोन पर? वो बोल रही थीं और मुझे मुझे निदा फाजली की पंक्तियां याद आ रही थीं-
“ इनके अन्दर पक रहा है वक़्त का ज्वालामुखीकिन पहाड़ों को ढके हैं बर्फ़ जैसी औरतें । ”
रमणी, बोलती कम है,हंसती ज्यादा है। हंसी हंसी में कहती है, मैं पहले एक दिन में पांच छह ग्राहक निपटा देती थी। अब थकान होने लगी है। अब संख्या कोई मायने नहीं रखती...दो तीन निपटा ले,यही बहुत है। वह थोड़ी गंभीर होती है---ग्राहको की संख्या मायने नहीं रखती, उनकी संतुष्टि मायने रखती है। धंधे में उतरने का कोई अफसोस? रमणी ईमानदारी से स्वीकारती है, अफसोस तो है, मगर जिंदगी चुनौती की तरह है, उसका सामना कर रहे हैं। अब भाग नहीं सकते। देर हो चुकी। इसके आगे का रास्ता बंद है। क्या करें?रमणी का यह वक्तव्य किसी अनुपस्थित को संबोधित था। साजू मुझे बता रहे थे और वह शून्य में देख रही थी।
बात-चीत से पता चला कि रमणी कोट्टायम शहर के एक संभ्रांत मुहल्ले में रहती है। वहां धंधा करने मे समस्या ही समस्या। उसने एक रास्ता निकाल लिया। जंगल ही उसका रेडलाइट एरिया बन गया है। वह ग्राहकों को पास के जंगल में ले जाती है। घास के बिछौने होते हैं। मोबाइल हैं, ग्राहक फोन करते हैं फिर जंगल में जगह तय होती है। कुछ ग्राहक जंगल नहीं जाना चाहते, तब सरोजनी की बन आती है। वह अपने ग्राहक उसकी तरफ भेज देती है। सरोजनी का घर भी तंग गलियो में हैं मगर वह घर से धंधा करती है। थोड़ी उम्र ज्यादा है इसलिए लोग शक कम करते हैं। साथ में एक पतिनुमा जीव रहता है।
पति का जिक्र आया तो नलिनी याद आ गई। नलिनी ने एसे पतियो के बारे में साफ लिखा है कि मकान वगैरह किराए पर लेना हो तो ये लोग बड़े काम आते हैं। लेकिन कुल मिलाकर ये किसी सिरदर्द से कम नहीं हैं। सरोजनी का पति भी एसा ही है। सरोजनी ही उसका खर्च चलाती है। बदले में वह उसे सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का नाटक करता है। घर पर अक्सर ग्रहको का आना जाना देख कर कई बार पड़ोसी पूछ लेते हैं, सरोजनी का जवाब होता है-“ये लोग प्रोपर्टी डीलर हैं, मेरा प्लाट खरीदना चाहते हैं। देखने आते रहते हैं।“
सरोजनी बताती है-“ कई बार उसके पास युवा लड़को का ग्रुप आता है। वह पांच मिनट में उन्हें मुक्ति देकर भेज देती है। भीतर से उसे ग्लानी होती है कभी कभी, उनकी और अपनी उम्र देखकर। लेकिन ग्राहक तो ग्राहक है, चाहे किसी भी वक्त या किसी भी उम्र का हो..। “ लेकिन पैसे की जरूरत ऐसी सोच पर लगाम लगा देती है ।
रमणी भी कहती है, पैसा बड़ी चीज है। उन्हें कैसे लौटा दें। मैंने कहा, छोड़ क्यो नहीं देती ये धंधा...दोनों एक साथ बोल पड़ी, इतना पैसा किस काम में मिलेगा। अब हमें कौन काम देगा। हम किसी काम के लायक बचे ही नहीं...अब तो आदत सी पड़ गई है...। अब छोड़ भी दे तो लोग हमें चैन से नहीं जीने देंगे।
रमणी अब बातचीत में सहज हो चुकी है और उसे ये स्वीकारने में झिझक नहीं होती कि इस पेशे में भी वो कभी-कभार आनंद ढूंढ लेती है।
कैसे,मैं चकित होती हूं... ।
वह स्वीकार करती है कि एक स्थाई ग्राहक से वह भी आनंद लेती है। यहां पैसा गौण है। उससे मोल-भाव नहीं करती। रमणी के पास किस्से बहुत है...। एक बार पैसे वाला अधेड़ ग्राहक आया, कहा—“मैं अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता हूं, मगर मैं जिस उत्तेजना की तलाश में हूं, वहां नहीं है। चलो, सेक्स में ‘फन’ करते हैं...।“ लेकिन रमणी अच्छी तरह जानती है कि दूसरों को भले ही उसके जिस्म में ‘फन’ की तलाश हो, लेकिन वो खुद अपने पति के मर जाने और कंगाल हो जाने के बाद यातना के जिस रास्ते पर चल रही है,वो रास्ता
कहां खत्म होगा। न घर बचा न कोई जमीन का टुकड़ा, जिसे वह अपना कह सके। रिश्तेदारो ने शरण देने से मना कर दिया। कम पढी लिखी थी, सो नौकरी ना मिली। एक शाम उसने खुद को पीकअप प्वाइंट पर पाया। जिस्म की कमाई से पहले बेटियो को पाला, अब खुद को पाल रही है। इसी नरक में अपने लिए सुख का एकाध कतरा भी तलाश लेती है। यह सब बताते हुए उसकी आंखों में कहीं भी संकोच या शरम नहीं..है तो बस थोड़ी शिकायत, थोड़ा धिक्कार।
दोनों से बातचीत करते हुए ही हमने जाना कि केरल में कहीं भी कोई रेडलाइट एरिया नहीं है। इसीलिए वहां सेक्सवर्कर पूरे समाज में घुली मिली है। उन्हें अलग से चिनिहत नहीं किया जा सकता। इसकी दिक्कते भी हैं। बताते हैं कि केरल में 10,000 स्ट्रीट बेस्ड सेक्सवर्कर हैं। इनमें हिजड़े भी शामिल हैं। इसके बावजूद सोनागाछी की एकता उनके लिए रोल माडल की तरह है। वहां एक अनौपचारिक रुप से संगठन बना है, सेक्सवर्कर फोरम केरला(एस डब्लू एफ के) जो इनके हितो का ध्यान रखने लगा है। गाहे-बगाहे आंदोलनों में शिरकत भी करने लगा है।मगर एसडब्लूएफके सोनागाछी के दुर्वार महिला समन्य समिति की तरह ताकतवर नहीं है। रमणी,सरोजनी उसकी सदस्य बन चुकी हैं।
सरोजनी की दो बेटियां हैं, चेन्नई में रहती हैं। वे हिंदी नहीं जानती, किताब नहीं पढ सकती, तो क्या हुआ, फोटो तो पहचान सकती है। रमणी और सरोजनी ने फोटो तो खिचवाए लेकिन न छपवाने का आग्रह किया। बेटियां हालांकि अब जान गई हैं कि मां क्या काम करती हैं। पहले तो बहुत विरोध हुआ अब नियति को कुबुल कर चुकी है । साथ कुछ वक्त बिताने के बाद जब वो जाने की अनुमति मांग रहीं थीं
तो वहां मौजूद आंखें उन्हें संशय से घूर रही थीं. तभी मुझे निशांत की कविता(वर्त्तमान संदर्भ में छपी हुई) की पंक्तियां याद आने लगी....
इन औरतो को,
गुजरना पड़ता है एक लंबी सामाजिक प्रक्रिया से
तय करना पड़ती है एक लंबी दूरी
झेलनी पड़ती हैं गर्म सलाखों की पैनी निगाहें
फाड़ने पड़ते हैं सपनो को
रद्दी कागजो की तरह
चलाना पड़ता है अपने को खोटे सिक्कों की तरह
एक दूकान से दूसरे दूकान तक.

वो चली गईं, लेकिन दोनों मेरे सामने एसे खुली जैसे अंधड़ में जंग लगे दरवाजे-खिड़कियो की सांकलें भरभरा कर खुल जाती है। उन्होंने अपने दर्द को कही से भी अतिरंजित नही किया...बल्कि भोगे हुए को ज्यों का त्यों रख दिया। शायद उन्हें लग रहा था कि इस जलालत से भरी दुनिया में कोई है, जो उसकी व्यथा सहानूभूति पूर्वक सुन रहा है। उसके भीतर मुझे लेकर प्रश्नाकुलता थी। भाषाई संकट के कारण पूछ नहीं पा रही थी,शायद साजू की उपस्थिति भी संकोच पैदा कर रही थी। फिर भी साजू के बावजूद उन्हें जो कुछ कहना था साफ-साफ कह गई। सुना गई अपनी कहानी। उस कहानी में गुड गर्ल बनने का सिंड्रोम नहीं था । ये रास्ता उन्होंने खुद चुना था। शिकायतें कम थीं और लहजे में.मुक्ति की चाह भी खत्म थी। उनके जाने के बाद भी रमणी की खिलखिलाहट मेरे सामने गूंज रही थी और दर्द की दरिया में भींगने के बाद पनपे अवसाद को कम कर रही थी । सरोजनी ने भी अपनी चालबाजियो को चटखारे लेकर सुनाया था, और उसे सुनाने में मजा भी आ रहा था, लेकिन क्या वो सचमुच चालबाज है ।

उनके जाने के बाद मैं सोच रही थी और बगल में बैठा साजू शरमा रहा था ।
शिवराज गूजर
August 24, 2010 at 6:44 AM

मन को छूने वाली रचना। सेक्सवर्कर्स की जिंदगी को आपने जिस तरह परत दर परत और वह भी बेहद शालीन तरीके से खोला है पाठक को बांधे रखता है। पढ़ते-पढ़ते पता नहीं कब चुपके से उनका दर्द पाठक का दर्द बन जाता है। बधाई।

वन्दना
August 24, 2010 at 6:55 AM

एक कटु सत्य को जिस तरह आप समाज के सम्मुख लाईं हैं वो कोई आसान काम नही है……………कुछ कहने की हिम्मत नही है इससे आगे।