पहले मुक्ति, अब गुलामी की गोली

Posted By Geetashree On 9:57 AM 3 comments
गीताश्री


पिल का खेल सबको समझ में आ गया है। इनका बहुत बड़ा बाजार है। इसने औरतों को टारगेट किया। पुरुषो ने अपने स्पर्श के आनंद के लिए औरतो को गोली ठुंसाई। वे कंडोम को अपनी राह का रोड़ा मानते हैं। इसीलिए औरतो को मानसिक रूप से तैयार करते हैं कि वे पिल को अपना लें। औरतें ही गोली क्यो खाएं? इससे बेहतर है कि हम पचास साल की गुलामी से बाहर आएं।
-एक स्त्रीवादी लेखिका
बहुत योजनाबद्घ तरीके से पुरुष नियंत्रित कंपनियों और समाज ने पिल को प्रोत्साहित किया। जबकि हमारे पास उसका विकल्प कंडोम के रूप में मौजूद था। अब महिलाएं कंडोम के पक्ष में हैं। -- एक स्त्रीवादी उपभोक्ता
एक शांत-सा विज्ञापन- टेलीविजन पर आता है इन दिनों। कोई शोर शराबा नहीं, पति पत्नी के बीच आंखों-आंखों में बातें होती है और उसके बाद ‘आई-पिल’ का जिक्र।ऐसा नहीं कि इससे पहले कोई गर्भ निरोधक दवाई बाजार में नहीं आई। सिप्ला कंपनी की यह गोली शायद कुछ ज्यादा ही खास है। इसे गर्भधारण के 72 घंटे बाद लेने से भी काम चल जाता है। यही इसकी सबसे खास बात है। कंपनी ने इस के प्रचार में गुलाबी रंगों से लिखा है, ‘इसका उपयोग बिना डॉक्टरी सहायता के भी किया जा सकता है। साथ ही यह भी लिखा है कि यह गोली गर्भपात की गोली नहीं है।’पचास साल पहले जब गर्भनिरोध· गोली अस्तित्व में आई तब औरतों की दुनिया बदलने का अंदाजा शायद किसी को न रहा होगा। अनचाहे गर्भ का बोझ ढोती और साल दर साल बच्चे पैदा करती औरतें असमय बूढ़ा जाती थीं। आधी जिंदगी रसोई और आधी कोख यानी बच्चे पैदा करने में गुजर जाती थी। अपने साथ दैहिक आजादी का अहसास लेकर आई ‘जादुई पिल’ ने जब पश्चिम की औरतों को पहली बार उनकी आजादी का अहसास कराया होगा, तब औरतों ने ईश्वर के बदले वैज्ञानिको को धन्यवाद दिया होगा। औरतों की इस बेचारगी के बारे में मार्क्सवादी विचारक शुलामिथ फायर स्टोन ने भी स्पष्ट किया था कि जब तक स्त्री को गर्भाशय से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक उसकी वास्तविक मुक्ति संभव नहीं। इन गोलियों ने पश्चिम में 50 वर्ष पहले महिलाओं के लिए मुक्ति की दिशा में कदम बढ़ा दिए। आई पिल के पैकेट पर ऐसी औरतों का ही सूरते हाल छपा हुआ है। एक उदास औरत शून्य में देख रही है। उसके नीचे लिखा है, ‘असहजता, दुश्चिंता, क्रोध, खुद से खफा, भय, ग्लानि, क्षोभ, शर्म, अकेलापन... ऐसे अनेक तरह के संशय बोध से घिरी एक औरत अनचाही गर्भ का बोझ ढोने को खुद को तैयार नहीं पाती तो इससे उबार लेने के लिए ‘आई-पिल’ मदद करने आया।’ मदद के नाम पर स्त्रियां इनके जाल में फंसती चली गईं। जो चीज 50 साल पहले शुरुआती वर्षो में आजादी का प्रतीक थी, वह धीरे धीरे जबरन गुलामी का प्रतीक बन गई। अब पता चल रहा है कि जादुई पिल सेक्सुअल आजादी की सारी कीमत सिर्फ महिलाओं से वसूलता है, पुरुषों से नहीं। कोख से मुक्ति देने के नाम पर कंडोम की उपलब्धता के बावजूद स्त्रियां पिल की जादुई गिरफ्त में फंसती चली गईं। जबकि सच ये हैं कि पिल कंडोम की तरह यौन सुरक्षा नहीं दे सकता। बल्कि सिर्फ इस पर निर्भर रहे तो यौन संबंधी कई बीमारियां हो सकती है। कंपनियां भी इसे स्त्रियों की आजादी से जोड़कर प्रचारित करती हैं। इस दौर में पिल को स्त्री की आजादी से जोड़कर देखने को मैं मर्दवादी सत्ता की साजिश मानती हूं। ये ठीक है पिल ने मुक्ति दी थी। लेकिन 50 साल से स्त्रियां ही बचाव क्यो करें। आजादी के नाम पर उन्हें लुभाना बंद कर देना चाहिए। क्यों खाती रहें गोली। आप क्यो ना यह जिम्मेवारी उठाओ। अब मुक्ति दो गोली की गुलामी से। अपने लिए उपाय तलाशो और उन्हें आजमाओ। पिल के महत्व से हमें इनकार नहीं। दुनिया बदलने में उसका बहुत बड़ा हाथ रहा है। एक पुरानी फिल्म का संवाद यहां सटीक बैठता है, जिसमें लंपट नायक कुंवारी, गर्भवती-नायिका से कहता है, ‘ईश्वर ने तुम स्त्रियों को कोख देकर हम मर्दों का काम आसान कर दिया।’ लेकिन पिल ने आकर ईश्वर के काम में दखल दे दिया। ये गोलियां धार्मिक वर्जना के विरुद्ध एक औजार की तरह आईं जिसे स्त्रियों ने अपने बचाव के लिए इस्तेमाल किया। पचास साल पहले जब इन गोलियों का अस्तित्व सामने आया तब पश्चिमी विचार· मारग्रेट सेंगर ने टिप्पणी की थी, ‘गर्भ पर नियंत्रण वह पहला महत्वपूर्ण कदम है जो स्त्री को आजादी के लक्ष्य की ओर उठाना ही चाहिए। पुरुषों की बराबरी के लिए उसे यह पहला कदम लेना चाहिए। ये दोनों कदम दासता से मुक्ति की ओर हैं।’ मुक्ति का दौर आज भी जारी है। इस एक छोटी सी गोली ने औरतों की बड़ी दुनिया का नक्शा बदल दिया। औरतें खुदमुख्तार हुईं और देह पर उनका पहला नियंत्रण यही से आरंभ हुआ। उन्होंने तय किया कि उन्हें ‘महाआनंद’ की कीमत अनचाहे गर्भ से नहीं चुकाना है। बेखौफ औरतें पुरुषों के अराजक साम्राज्य से बाहर निकलीं। बस अब नई राह पर चलना है...आप समझ रही हैं ना..।
अब पुरुषों के लिए भी गोली
दौर में महिलाओं के लिए राहत की कई खबरें हैं। अब जो खबर है वह उन महिलाओं को खुश कर देगी जो इन गर्भनिरोध· गोलियों के इस्तेमाल से स्तन कैंसर और इसकी बीमारियों के खतरे को लेकर आशंकित रहती हैं।
ब्रिटेनमें एक ऐसी गर्भनिरोधक गोली का परीक्षण किया जा रहा है जो खासतौर से पुरुषों के लिए तैयार की गई है। ब्रिटिश प्रोफेसर रिचर्ड एंडरसन के अनुसार, ‘मौजूदा दौर में ज्यादातर महिलाओं का मानना है कि पुरुषों के लिए कोई गर्भ निरोधक गोली होनी चाहिए। महिलाओं की इसी चाहत को अमल में लाने की कोशिश की जा रही है।’ बतौर परीक्षण दो साल तक पुरुषों पर इन गोलियों के प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा।

बुर्का से मुक्ति का समय

Posted By Geetashree On 7:57 AM 10 comments
एक कविता की पंक्तियां याद आ रही है...तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है, तू इस आंचल का एक परचम बना लेती तो अच्छा था....।

यह पृथ्वी पर बुर्का से मुक्ति का समय है। हमने अपने घूंघट उतार फेंके हैं। हमारे सिरों से आंचल खिसकर हमारी मुक्ति का परचम बन गया है। वक्त आ गया है। दुनिया की बुर्कानशीनों...समझो..सुनो..देखो...कि अब तक किस साजिश के तहत हम काले कपड़ो में लपेट कर छुपा दिए गए थे। हमारे सिऱ तपती गरमी में भी काले कपड़ो में जकड़े रहते थे। ये लबादा नहीं, हमारी पहचान छुपाने की साजिश थी। एक सुंदर लड़की सड़क पर चलती फिरती काली आत्माओं में बदल जाती थी। कहीं हिजाब, कहीं नकाब तो कही बुर्का...। परदानशीं हुए हम और आप बेपरदा होकर घूमते रहे। पोशाक से लेकर आत्मा तक गुलाम बना दी गई। हमें पाठ पढाया गया कि पोशाक भी हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। हमें उन्हें बचाना है तभी हमारी पहचान, हमारी संस्कृति बचेगी। हम इससे बाहर गए तो हमारा धरम खतरे में।
मैंने दुनिया के कई मुसलिम देश देखे हैं...वहां की लड़कियों को करीब से देखा है। हिजाब और बुर्के से मुक्ति की उनकी छटपटाहट देखी और महसूस किया है। सीरिया जैसे आधुनिक देश में भी आधुनिक लड़कियां हिजाब में लिपटी हुई मिलीं। उनकी पीड़ा ये थी कि उनके प्रेमियो ने लंबे समय तक उनके खुले गेसू नहीं देखें। जब तक निकाह नहीं हुआ तब तक क्या मजाल कि एकांत में भी वे गेसुओं को देखने की हिमाकत कर जाएं। ईरानी फिल्मों का तो अब तक ये हाल है कि परदे पर स्त्रियां खुले बालों में दिखाई ही नहीं जा सकती। चाहे घर के अंदर का दृश्य हो या खेल के मैदान का। इसके खिलाफ मुसलिम महिलाओं को ही क्रांति करनी होगी। प्रतिबंध की नौबत ही क्यो आए। काफी हद तक शहरी महिलाओं ने क्रांति की है,कठमुल्लों को कोप झेला है, झेल रही है, विरोध के आगे वे डट कर खड़ी हैं। देखादेखी हिम्मत आ रही है। मगर बहुसंख्यक अभी भी काली पोशाक की गिरफ्त में है।
जहां महिलाएं पहल नहीं कर रही वहां सरकार को दखल देना पड़ रहा है। हाल ही में फ्रंस सरकार ने क्रंतिकारी कदम उठाया और बुर्के पर रोक के विधेयक को मंजूरी दे दी। जिसमें सार्वजिनक जगहो पर मुसलिम महिलाओं के बुर्का पहनने पर पाबंदी का प्रावधान है। इसस जुलाई में इसे संसद में रखने का रास्ता साफ हो गया है। वहां की सरकार का तर्क है कि सावर्जनिक जगहो पर वैसे कपड़े पहनने की इजाजत नहीं होगी जिनका उद्देश्य चेहरा छिपाना हो। कानून के मसौदे केअनुसार यदि कोई महिला बुर्का या नकाब पहनती है तो उसे 150 यूरो का जुर्माना देना होगा। यही नहीं तालिबान की नजर में शाबाशी लायक काम करने वाले शख्स को फ्रांस जेल भेजने के लायक समझता है। कानून में साफ किया गया है कि किसी महिला को जबरन बुर्का पहनाने वाले व्यक्ति को एक साल की कैद और 20 हजार डालर के जुर्माने का प्रवधान किया गया है।
बुर्कानशीन महिलाओं को आर्थिक दंड इसलिए कम दिया जाएगा कि लोग यह मानतो हैं कि महिलाओं को बुर्का पहनाने के लिए मजबूर किया जाता है। जैसे ही लड़की बड़ी होती है उस पर परदा थोप दिया जाता है। बंद समाज की औरते क्या करें..उन्हें समाज की पाबंदी के साथ जीने की आदत डाल लेना पड़ता है।

वहां से आई एक अन्य खबर के अनुसार पकड़े जाने पर महिलाओं को जुमार्ना भरने के स्थान पर नागरिकता का पाठंयक्रम पूरा करना होगा। फ्रांस सरकार मुसलिम समुदाय से कह रही है कि वे इस कानून को दिल पर ना लें और इस प्रतिबंध को सकारात्मक दृष्टि से देखें।
लेकिन इस पर दुनिया भर में प्रतिक्रियाएं होंगी। कठमुल्ले बौखलाएंगे। स्त्रियों को राहत मिलेगी। अपनी देह पर संस्कृति के नाम पर अतिरिक्त पहरा लेकर चलने से आजादी मिल जाएगी। सवाल ये है कि क्या इस तरह के प्रतिबंध की जरुरत भारत में नहीं है। समाज अगर खुद को बदल ले तो सरकार को एसे कानून बनाने की जरुरत ही क्यो पड़े। सदियो से चली आ रही रुढियो को अब तक ढोए जाने का कोई अर्थ नहीं बचता। वो भी इस दौर में...जब लड़कियां जीवन के सभी वर्जित क्षेत्रो में सेंध लगा रही हैं, आगे बढ रही हैं। सारे बैरियरस तोड़ रही है। एसे में उन्हें लपेट कर रखना कहां तक जायज है। भारत में एसा प्रतिबंध तभी नहीं लगाया जा सकेगा। यहां संभव ही नहीं। हमारी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं. धर्मभीरुता और रुढियों के प्रति हमारा अतिरिक्त मोह कभी संभव नहीं होने देंगा। इस पर सोचना तक दुश्वार है। यह यूरोप में ही संभव है, जहां संसद के 100 प्रतिशत सदस्यो ने पक्ष में मतदान किया। भारत में रायशुमारी करके देख लीजिए...। बहस शुरु हो जाएगी और जातीय अस्मिता का सवाल खड़ा हो जाएगा। तालिबान कही ना कहीं भारतीय मानसिकता में भी जड़े जमा चुका है।

एसा नहीं होता तो गांव की औरते पंचायत की बैठको में सिर पर पल्लू रख कर ना भाषण देतीं। राजनीतिक महिलाएं सल्लज नारी बन कर वोट मांगने ना जातीं। कुछ गांवो में मैंने देखा है कि औरते स्कूटर चला रही है, मगर सिर पर पल्लू कस कर बांधा हुआ है। उसे उतारने की हिम्मत नहीं उनमें। गांव की सीमा में घुसते ही उन्हें अपने खोल में वापस आ जाना है। समाजसेवी भी उन्हें सारी प्रेरणा देते हैं, उन्हें घर की चहारदीवारी से बाहर निकलने को उकसाते हैं, मगर उनके सिर पर पड़े पल्लू से मुक्ति का रास्ता नहीं दिखा पाते। इतनी हिम्मत नहीं कि सामाजिक ताने बाने से टकरा जाएं। भारतीय परिवेश में उनकी एसी मदद कोई और नहीं कर सकता, खुद ही करना होगा। मुसलिम महिलाएं भी चाहे तो शबाना, सईदा हमीद, शबनम हाशमी जैसी अनेक महिलाओं के प्रेरणा लेकर खुद को आजाद घोषित कर दें। बस एक यही बाधा पार करने की जरुरत है...। एक धक्का और...।