सुहाग चिन्हों के प्रति आग्रह

Posted By Geetashree On 2:40 AM 12 comments
जनसत्ता में छपा एक लेख पिछले कई दिनों से जेहन में गहरे धंस गया है। अभी तक बैग में उसकी कतरन लेकर चल रही हूं. उसमें जो छपा है वो विचलित कर देने वाला है। मैं नहीं जानती लेखिका को। दुनिया मेरे आगे स्तंभ में कोई स्मिता सिन्हा हैं, उनका फर्स्ट परसन में बेहद मार्मिक लेख छपा है, मीरा की मां। उसमें अपने वैधव्य के बाद मायके में जीने और माता पिता के व्यवहार के बारे में लिखा है। हम किसी कवि की तरह इसे विधवा विलाप नहीं कह सकते। यह लेख लोक और लोकाचार के साथ साथ पुरुष मानसिकता पर आहिस्ते से चोट कर देता है। लेख की नायिका विधवा हो चुकी है और अपने पिता द्वारा तय किए जीवन को अपना कर आजीवन वैधव्य ओढने को तैयार हो जाती है। मात्र 21 साल की उम्र में वह विधवा होती है, पिता को उस पर रहम नहीं आता, उसे दूसरी शादी की इजाजत नहीं देते। लेकिन एक औरत..जो उसकी मां है, वो अपनी बेटी के वैधव्य को देख कर उदासी की चादर ओढ लेती है। यह उदासी ना सिर्फ बातचीत बल्कि रहन सहन में भी दिखाई देती है। जब से बेटी की मांग उजड़ी, खाली हुई तो मां सिंदूर लगाना भूलने लगी...आगे नायिका की जुबानी सुनाती हूं--एक बार बाबूजी दो साड़ियां लाएं। मां के लिए छींटदार मेरे लिए हल्की आसमानी काले बार्डर वाली साड़ी। मां ने कहा कुछ नहीं। लेकिन उस साड़ी को कभी नहीं पहना। मां मुझसे अठारह साल ही बड़ी थीं। एक एक करके उसके सारे ऋंगार छूटते चले गए। सिंदूर भी बालों की अस्त-व्यस्तता में छिप जाता। इससे नाराज होकर बाबूजी चिल्लाएं थे...जिंदा हैं अभी हम...
तो सिंदूर की क्या दरकार है...।
चुप्पा मां के जवाब और झनाक से आंगन में थाली पटकाने से मैं हतप्रभ थी। ......बाबूजी औंधे मुंह लेटे पूरे दिन उपवास में रहे।

लेख बड़ा है...नायिका की मनस्थिति का ब्योरा दिया गया है। एक मां के जवाब में बहुत दमदार तर्क छिपा है। अगर रिश्ते मजबूत हैं, फिर आप सुहाग चिन्हों के प्रति इतने आग्रही क्यों है। क्या आपको जिंदा होने के लिए सिंदूर की दरकार है जो चीख चीख कर आपके जिंदा होने का सूबूत देता रहे। एक पति का अस्तित्व चुटकी भर सिंदूर का मोहताज है। हैरानी होती है...आज के समय में भी कोई पुरुष एक स्त्री के जीवन में अपना अस्तित्व सिंदूर में तलाशता हो। वैसे जिन प्रदेशों में सिंदूर का प्रचलन हैं वहां सिंदूर को लेकर ढेर सारे वहम हैं..जैसे मेंहदी को लेकर, मिथ है। मेंहदी गहरी चढी तो पति या प्रेमी ज्यादा मानता हैं कम चढी तो प्यार कम करता है। ये सब बेबकूफाना मिथ खूब प्रचलित है और इसका मजा स्त्री विरोधी नहीं है।

भारतीय समाज में ये सिंदूर बहुत शुभ-अशुभ से जुड़ा है। खास खास अवसरों पर, पूजापाठ के दौरान, शादी की विधियों के दौरान इनका बड़ा महत्व होता है। बिहार, यूपी में नाक से लेकर मांग तक एक लंबी लाइन खींच दी जाती है। वहां तो यह भी मान्यता है कि नहाने के बाद बिना मांग भरे खाना नहीं खाया जा सकता, अपशकुन होता है। सिंदूर लगाने के लिए खास दिशा तय होती है, आदि आदि...ढेर सारी मान्यताएं..किन किन का जिक्र करें। यहां तो मसला ही दूसरा है।

दरअसल सिंदूर या अन्य सुहाग चिन्हों के प्रति पुरुषो का आग्रही होना हास्यास्पद है। इससे उनकी मर्दवादी सोच साफ झलकती है। जहां औरतों को अपनी संपत्ति मानने का चलन है। शादी के दौरान सिंदूरदान पारंपरिक नहीं लोकाचार है। विवाह के लिए सप्तपदी यानी पांच तत्वों (क्षिति-जल-पावक-गगन-समीरा) की उपस्थिति में सात कदम चलना जरुरी होता है। सिंदूरदान तो बाद में आया होगा। जब पुरुषों को लगा होगा कि स्त्री हमारी मिल्कियत है और हमें इसे अपने लिए चिन्हित करना चाहिए। मर्द ने एक ठप्पा स्त्री के माथे पर लगा दिया और स्त्री इस तरह जागीर में बदलती चली गई। औरतों को भी भाने लगे..साजो-ऋंगार। इंद्रधनुष के सारे रंग भर दिए गए शादीशुदा स्त्री के जीवन में और इनसे परे कर दिया गया कुंवारियों और विधवाओं को। आप आधुनिक विचारधारा के पुरुषों से भी पूछे तो वे बता देंगे कि उनहें मांग भरी हुई औरतें, पत्नियां बहुत अच्छी लगती हैं। एसा नहीं होता तो राजनीति में आने वाली महिला नेताएं अपने चौड़े मांगों में सिदूर उड़ेल कर, माथे पर बड़ी बड़ी बिंदी लगा कर, जनता के बीच नहीं जाती...आखिर जनता में सती-सावित्री की अपनी छवि जो बनानी है। जनता का भावनात्मक दोहन जो करना है। कुछ औरतो को अपनी वफादारी का सबूत भी तो देना होता है। औरतो ने मर्दो को अपनी संपत्ति नहीं माना इसलिए कोई ठप्पा तलाश नहीं पाई। पश्चिम में जरुर मैरिज रिंग खोजा गया जिसे दोनों शादी के बाद पहनते हैं। रिश्ता टूटने पर वहां सबसे पहले रिंग ही उतार फेंकते हैं। जैसे हमारे यहां सिंदूर...।
दक्षिण भारत में मंगलसूत्र को यह दर्जा प्राप्त है। हालांकि पिछले दिनों एक बहुत दिलचस्प केस सामने आया। मद्रास उच्च न्यायालय की एक पीठ ने एक महिला के विवाह की मान्यता बरकरार रखते हुए यह दलील दी कि हिंदुओं के बीच शादी को साबित करने के लिए यह अनिवार्य नहीं कि दुल्हा अपनी दुल्हन के गले में मंगलसूत्र बांधे। इस फैसले के साथ अपनी शादी को साबित करने के लिए एक महिला 21 साल तक चली कानूनी जंग में जीत गई। कोर्ट ने हवाला दिया कि हिंदू विवाह कानून की धारा (सात) के मुताबिक किसी भी मान्यता प्राप्त विधि के तहत शादी को साबित करना पर्याप्त है। इस महिला के खिलाफ उसके पति ने यह दलील दी थी कि उसने महिला के गले में मंगलसूत्र नहीं बांधा था। फिर शादी कैसे मान्य हुई। कोर्ट ने रुख ने बहुत सी चीजें साफ कर दी हैं।

कौन समझाएं बाबूजी को कि आप जिंदा हैं तो इसे साबित करने के लिए सिंदूर की क्या दरकार है।

वैसे भी इन दिनों सिंदूर का चलन टीवी सीरियल में ज्यादा है। कामकाजी महिलाएं सिंदूर को गंभीरता से नहीं ले रही हैं। खास अवसरो पर जरुर इसे रिवाज की तरह बरता जाता है। करवाचौथ, तीज जैसे पर्व में ऋंगार की तरह सजा लेती हैं। लेकिन रोजमर्रा के जीवन और मेकअप-दोनों से गायब है। आखिर कब तक संपत्ति करार देने वाले चिन्हों को वे ढोती रहेंगी।

सम्मान से बड़ा नहीं कोई मुआवजा

Posted By Geetashree On 11:13 PM 8 comments

ये क्या कह रहा है राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग। क्या एक स्त्री की बेइज्जती करने के बाद, उसका रेप करने के बाद, उसका फर्जी एमएमएस और नकली ब्लू फिल्म बनाने और जारी करने के बाद जो उसकी इज्जत के साथ खिलवाड़ होता है उसकी भरपाई चंद रुपये पैसे से की जा सकती है। वो क्या करेगी इन रुपयों का..क्या अपनी गई इज्जत को दुबारा बहाल कर पाएगी। ये पैसा उसके दामन पर लगे दाग को धो पाएगा। वह पहले की तरह अपने घरवालों, समाज में पहले की तरह सिर उठा कर जी पाएगी। नहीं, कभी नहीं। जीवन भर संताप उसका पीछा नहीं छोड़ता।
हाल ही में आयोग ने मिस जम्मू रहीं अनारा गुप्ता की इज्जत से खिलवाड़ करने वाली जम्मू पुलिस से अनारा को मुआवजा देने की मांग की है। यहां बता दें कि जम्मू पुलिस ने अनारा को वेश्या और अश्लील सीडी की कारोबारी और ना जाने क्या क्या घोषित कर रखा था। अब आयोग की रिपोर्ट के बाद उसके सारे आरोप धराशायी हो गए। हैदराबाद की फोरेंसिक लैब ने अपनी रिपोर्ट ने सारे आरोपो को धो दिया है। पुलिस सीडी में जिस लड़की को अनारा बता रही थी वह कोई और निकली। एक महिला की इज्जत के साथ खिलवाड़ पर आयोग ने नाराजगी जताई है और राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह अनारा को बेवजह बेइज्जत करने और झूठे केसों में फंसाने पर पर्याप्त मुआवजा दे। पुलिस ने 2004 में अनारा के खिलाफ अनैतिक व्यापार रोकथाम एक्ट, आईटी एक्ट तथा सिनेमाटोग्राफी एक्ट के तहत केस दर्ज किए थे। इसकी जांच के लिए ईमानदार पुलिस अधिकारियों को लेकर बनी एक उच्च स्तरीय टीम की रिपोर्ट के बाद आयोग ने साफ कह दिया कि अनारा को फंसाया गय़ा था।
एक घटना और...हाल ही में यूपी में बलात्कार की एसी घटना हुई जिसने देश की राजनीति के प्याले में तुफान उठा दिया। इलाहाबाद के पास एक गांव की लड़की का बलात्कार होता है और पुलिस अधिकारी मुआवजा देने गांव पहुंचते हैं। पीड़िता के पति को 25000 रुपये का चेक गांव वालों के सामने थमाया जाता है। यह माया सरकार की तरफ दिया जाने वाला मुआवजा है। बलात्कार के बदले रुपये। सरकार का उदारवादी रवैया,,,एक तो इज्जत गई दूसरे उसके पति को सबके सामने चेक देकर रही सही कसर भी पूरी कर दी गई। क्या बीती होगी इस परिवार के दिल पर..क्या रुपया पैसा..मुआवजा किसी स्त्री की इज्जत की बराबरी कर सकता है। क्या इस लड़की का सम्मान वापस आ सकता है इस पैसे से। बलात्कार से एक लड़की की आत्मा घायल होती है...एक लड़की पूरी जवानी इसी भय में गुजारती है...पता नहीं, कब,,कहां..किस मोड़ पर..। जीवन भर यह भय उसकी आत्मा से चिपका रहता है।
कितना बड़ी हो रकम, मुआवजे क्या आत्मा पर लगे घाव का दाग धो पाएंगे।
रीता बहुगुणा ने जो बयान दिया वह भी गलत है। लेकिन गलत बयान देकर वह एक सही बात कह गईं। उन्होंने एक बात तो सही कही कि बलात्कार की कीमत, मुआवजा से नहीं चुकाया जा सकता। बस उन्होंने प्रदेश की महिला मुख्यमंत्री का नाम गलत ले लिया। यहां भी मुआवजा शब्द का इस्तेमाल कर बैठी...नहीं करना था। बस अपनी बात कहनी थी, बलात्कार के बदले मुआवजे का प्रतिकार करना था, इसके खिलाफ आवाज बुलंद करनी थी ना कि दूसरी औरत को बेइज्जत करना था।
हालांकि जनवरी 2007 में मायावती भी कुछ इसी तरह का बयान दे चुकी हैं। एक पीड़िता को बलात्कार के बाद मुआवजा देने पहुंची थीं उस वक्त वह भी जहर उगल आई थीं। इसकी क्लिपिंग सभी चैनलों के पास है और जो इन दिनों खूब दिखाई गई। तब मुलायम सिंह यादव के रिश्तेदारी की लड़कियों के बारे में एसी अभद्र टिप्पणी मायावती ने की थी। राजनीति में एसे बयानों का सिलसिला बड़ा पुराना है, हम इसकी पड़ताल में नहीं पड़ेंगे। राजनीति में इस आकंठ डूबी महिलाएं पुरुषों की भाषा बोलने लगती हैं।

एक घटना और..दिल्ली के करीब दादरी क्षेत्र में एक महिला का कुछ गुंडों ने नहाते वक्त एमएमएस बना लिया। मामला थाना तक पहुंचा, तो पुलिस का रवैया देखिए..दोषियों को कोई सजा देने या दंडित करने के बजाए महिला को 200 रुपये मुआवजे के तौर पर देने की बात कर दी। पुलिस को यह बहुत छोटी बात लगी, इसीलिए रिपोर्ट भी दर्ज तक नहीं की। महिला ने जब दबंगों का विरोध किया था तब उसके साथ छेड़छाड़ भी की गई थी। क्रूर पुलिस के लिए एक गरीब घर की स्त्री के मान सम्मान का कोई अर्थ नहीं। उसकी कीमत लगाई 200 रुपये। ये सोचा होगा कि 200 रुपये से मुंह बंद किया जा सकता है। स्त्री चाहे गरीब परिवार से हो या अमीर...सम्मान सबका एक सा होता है।
अब मुआवजे की बात छोड़िए...और दोषियों को कड़ा दंड देने के बारे में सोचिए। मुआवजे से किसी स्त्री का खोया सम्मान, उसकी खोई मुस्कान, वापस नहीं लाई जा सकती।

प्रमाण मिल गए आपके गुनाह के सरकार

Posted By Geetashree On 1:24 AM 8 comments


राष्ट्रीय महिला आयोग को इस बात के पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि मध्य प्रदेश के शहडोल में कन्यादान योजना का लाभ देने से पहले जिला प्रशासन ने आदिवासी एवं अनुसूचित जनजाति की युवतियों का कौमार्य परीक्षण करवाया था। आयोग के समक्ष परीक्षण की प्रक्रिया से गुजरने वाली लड़कियों के बयान से पूरा मामला साफ हो गय़ा है और दोषियों का चेहरा बेनकाब हो गया है। अब क्या जवाब देंगे और कहां जाकर मुंह छिपाएंगे वे लोग, जिन्होंने सरेआम लड़कियों को बेइज्जत किया।
सारा कांड जिलाधिकारी के निर्देश और नेतृत्व में हुआ। प्रशासन की देखरेख में जो घिनौवना खेल खेला गया, उसकी क्या सफाई. उसका क्या पक्ष। संसद में हंगामा हुआ तो कहा गया कि आयोजको का पक्ष तो सुनिए। कितनी हास्यास्पद बात है। पहले इज्जत लूटो फिर कहो हमारा भी पक्ष सुनो, क्योंकि ये जरुरी था...। क्यों सुने आपका पक्ष। चोरो, बेईमानों का भी अपना पक्ष होता है। उनकी सुनें तो अराजकता ना फैल जाएगी। प्रशासन किस मुंह से रखेगा अपना पक्ष, क्या कहेगा कि कैसे चालाकी को औजार बना कर, लालच देकर सौ से ज्यादा लड़कियों को बेईज्जत कर दिया। किसने आपको ये अधिकार दिया कि आप लड़कियों को कौमार्य परीक्षण करें। आपके बेहुदा तर्को का कोई अर्थ नहीं इस लोकतांत्रिक समाज में। आपने पहले लालच दिया, उन गरीब घर की लड़कियों को, कि मेडिकल परीक्षण करवा लो तभी सरकार की तरफ से 6500 रुपये की कीमत का घरेलु सामान दिया जाएगा। ये सरकार की तरफ खुलेआम दिया जाने वाला (गैरकानूनी) दहेज है। जबकि उन्हें दहेज शब्द से ही घिन आनी चाहिए।
इस योजना के लिए जारी सरकारी घोषणा के अनुसार इसमें विधवा, तलाकशुदा या परित्यक्त औरतें भी शामिल हो सकती हैं। बशर्ते वे खुद से अपने विवाह का खर्च उठाने की स्थिति में ना हों। गरीबों के लिए सरकारी खजाने से दी जाने वाली यह बड़ी सहायता है। लोग आसानी से झांसे में आ जाते हैं।

लड़कियां आसानी से मान गईं। वे गरीब थीं, लाचार थीं, जिन्हें मां बाप गाय की तरह किसी खूंटे से बांधने के लिए ले आए थे। उनके सामने रास्ता क्या था। एसी सामूहिक शादियों मे अपनी पसंद की कोई जगह नहीं होती। उन्हें तो यह भी नही पता होता कि उनकी जीवन किस खूंटी में बंधने जा रहा है..क्या लिखा है उनके भाग्य में। कौन होगा जीवन साथी। बस शादी करनी है और उनके होने का मतलब यही है। लड़की हो तो शादी एक अनिवार्य शर्त्त है। ये भारतीय समाज की सच्चाई है। लड़की के पैदा होते ही उसकी शादी के दिन रात सपने देखने वाले मां बाप से और क्या उम्मीद की जा सकती है कि जितनी जल्दी हो एक खूंटा तलाश लें और गंगा नहाए। गांव में दो कहावतो का एक ही मतलब है...आज मैं घोड़ा बेचकर सोया या एसे सोया जैसे बेटी की विदाई कर दी हो।
दोनों में घरवाले एक जैसी नींद लेते हैं।
प्रशासन चला एसे घरवालों का बोझ हल्का करने। जिस वक्त परीक्षण के दौर से लड़कियां गुजर रही थीं तब क्या उनके घरवाले बहरे-गूंगे हो गए थे। उन्हें दिखाई नहीं दिया कि मेडिकल परीक्षण के नाम पर उनकी लड़कियों को नंगा किया जा रहा है।
वैसे भी इस योजना में लाभान्वित होने वाली लड़कियों में ज्यादातर आदिवासी थीं और आदिवासी संस्कृति में यौन वर्जनाएं दूसरे समाजो की तरह नहीं है। आपको यह सच स्वीकारना चाहिए।
उन लड़को का क्यों नहीं परीक्षण करवाया जो शादी के लिए लपलपाए चले आए थे यो सोचकर कि एकदम वर्जिन लड़की मिलेगी। लड़के चाहे किसी समाज के हों, वे क्या दूध के धुले होते हैं। खुलापन तो उनका मौलिक अधिकार है, जिसका वे भरपूर फायदा उठाते हैं और शादी के लिए वर्जिन लड़की तलाशते हैं। एक हिंदी फिल्म का संवाद है जो मुझे कभी नहीं भूलता...ईश्वर ने तुम औरतो को कोख देकर हम मर्दो का काम आसान कर दिया है। क्या लड़कियों को गर्भवती हवा ने कर दिया था। एसी ही मानसिकता वाले लड़को की वजह से हालात एसे बनते हैं। इनको जांचो और पूछो कि क्या ये वर्जिन हैं, किसी लड़की को कभी छुआ नहीं। इनके पास कोख नहीं इसलिए पूछने या शक करने का आधार नहीं।
कुछ लड़कियां गर्भवती पाई गईं इसलिए सारी लड़कियों की जांच हुई।
ये लड़कियों की निजता पर सीधा हमला है। इससे प्रशासन का स्त्री विरोधी रवैया जाहिर होता है। वैसे भी कूपमंडको को औरतो की आजादी पर हमला बोलने का बहाना चाहिए। कभी ड्रेस कोड लागू करो, कभी वैलेंटाइन डे मत मनाने दो...पुरुष मित्रों के साथ हाथ में हाथ डाल कर मत घूमने दे...कुछ भी एसा ना करने दो जिससे इनकी तथाकथित संस्कृति खतरे में पड़ जाए।

हम नहीं, आंकड़े बोलते हैं

Posted By Geetashree On 12:36 AM 13 comments

एक दिन पहले मैंने पोस्ट लिखा, अगले दिन एक अखबार में एक सर्वे छपा जो मेरी राय को सपोर्ट कर रहा है। मैं यहां उस खबर को ज्यों का त्यों डाल रही हूं, ताकि शादी की उम्र को को लेकर जो भयावह सच है वो सामने आ जाए। सहयोग संस्था के सर्वे के मुताबिक य़ू पी में 62 प्रतिशत युवाओं की शादी 18 साल से कम उम्र में हो रही है।
यह सर्वे आजमगढ, चंदौली, मिर्जापुर, झांसी, लखनऊ और मुजफ्फरपुर के 1003(एक हजार तीन) लोगो के बीच किया गया। इनमें पुरुष एवं महिला अभिभावको के अलावा शिक्षक, एएनएम, डाक्टर और युवा शामिल थे। सहयोग की ओर से यशोधरा ने जो रिपोर्ट तैयार की है उसमें कहा गया है कि अभी भी यूपी में 62 फीसदी युवाओं का विवाह 18 वर्ष से कम उम्र में हो रहा है। 13 से 18 वर्ष की सिर्फ 3.23 लड़कियां ही एसी हैं जिन्हें अपनी मर्जी से घर बाहर जाने की इजाजत है।

सर्वे के दौरान इसके अलावे कई और चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। यूपी की ही एक सामाजिक कार्यकर्त्ता तीखी प्रतिक्रिया देती है--लोग कच्ची उम्र में बच्चियों की शादी करने से परहेज नहीं करते पर यौन शिक्षा देने के नाम पर उनकी झूठी नैतिकता जाग उठती है। वह हैरान थी कि इन इलाको में लड़कियां अपने शरीर में होने वाले परिवर्तनों के बारे में एकदम अनभिज्ञ थी। लड़को की भी कमोवेश यही हालत थी। 92 फीसदी युवाओ ने बताया कि उन्हें अपने बदलावों के बारे में जानकारी अपने दोस्तों, सहेलियों से मिलती है, जो काफी हद तक गलत होती है। ग्रामीण इलाको के डाक्टर भी नीम हकीम भी होते हैं। कभी कभी वे भी गलत जानकारी दे देते हैं। नतीजा..शादी तो हो जाती है मगर ज्ञान शून्य।
एसे में धड़ाधड़ बच्चे ना पैदा होंगे तो क्या होगा।
क्या एसे पिछड़े इलाको में युवा परामर्श केंद्र नहीं खोले जाने चाहिए जहां जाकर बेहिचक ग्रामीण युवा लड़के, लड़कियां अपनी जिज्ञासा शांत करसकें, अपने सवाल पूछ सकें। क्या घरवालो को नहीं चाहिए कि अपने बच्चे को प्राथमिक स्तर की यौन शिक्षा दे सकें या दिला सकें। साधारण जानकारी तो घर में भी दी जा सकती हैं। नहीं तो बच्चों की शादी की उम्र बढा दो, समय के साथ कुछ बातें अपने आप समझ में आने लगती हैं। उनकी समझ पकने से पहले ही ब्याह देंगे तो क्या होगा। लड़कियों के मामले में मां बाप ही फैसला लेते हैं। यहां उनकी जवाबदेही ज्यादा बनती है। इनकी मानसिकता तो एसी होती है कि लड़की पैदा हुई नहीं कि उनका एक एक दिन इसी इंतजार में कटने लगता है कि कब जल्दी बड़ी हो और ब्याह दें। लड़के के बारे में सोचते हैं कि कब कमाने लगे कि घर में आर्थिक सहयोग करने लगे।
लड़की को जाना है अपने घर..इसलिए उससे एसी उम्मीद करना पाप है। लड़की की कमाई..ना बाबा ना..सोचना भी पाप है। जिस घर में जाएगी वहां तय होगा कि क्या करना है इसे आगे..हम तो पालक हैं, भाग्य विधाता कोई और..। अभी तक इस मानसिकता से पूरा समाज ग्रस्त है, खासकर ग्रामीण इलाको में तो घोर स्त्री विरोधी माहौल है।
एसे माहौल में उनसे ये उम्मीद करना कि वे लड़कियों को यौन शिक्षा देंगे, मूर्खता है। अज्ञानता का यह आलम है कि सर्वे में सिर्फ 32 फीसदी युवाओ को पता था कि गर्भपात क्या होता है। गर्भ निरोधको की जानकारी की तो बात ही मत पूछो।
यह चेहरा एक राज्य का नहीं है, एसे हालात देश के कई राज्य के ग्रामीण इलाके में है। बिहार में सर्वे करा लीजिए, इससे भी भयावह नतीजे मिलेंगे। जल्दी ही वहां के आंकड़े भी बोलेंगे..। हालात तो मेरा आंखों देखा है। बताएंगे विस्तार से..।



देर से शादी का फैसला कौन करे

Posted By Geetashree On 9:21 PM 9 comments



जनसंख्या कम करने के लिए क्या शानदार फार्मूला दिया दै हमारे आजाद ख्याल के स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने। उनका सुझाव है कि लोग शादी देर से करें तो देर तो तेजी से बढती हुई जनसंख्या पर जल्दी से काबू पाया जा सकेगा। तब लोग देर होने की वजह से कम बच्चे पैदा करेंगे। कितना सीधा सुझाव है। इसमें नई बात क्या है। मंत्री जी का एक और मजेदार सुझाव सुनें..गांवों में बिजली होने से भी जनसंख्या की समस्या पर काबू पाया जा सकता है। लोग रात के 12 बजे तक टीवी देखेंगे और बच्चे कम पैदा करेंगे। बहुत हल्के फुल्के मूड में मंत्री जी ने दो अलग अलग दुनिया की सच्चाईयों की तरफ ध्यान खींच दिया है। शहरो में लोग पहले से ही शादी देर से कर रहे हैं और जीवन की आपाधापी, काम के तनाव और व्यस्तता की वजह से रिश्तों में दूरियां वैसे ही आ गई है। कई रिश्ते टूट गए, कुछ टूट के कगार पर हैं तो कुछ ढोए जा रहे हैं। जहां समझदारी है वहां घुटन भी है जो सिर्फ एक को खाए जा रही है, वह है सिर्फ स्त्री। तमाम सेक्स सर्वे उठा कर देख लीजिए। इसकी भयावहता का अंदाजा लग जाएगा।
कामकाजी महिलाएं तो किसी तरह वक्त काट ले रही हैं, उनसे पूछिए जो घरेलु मोर्चे परतैनात हैं। यहां हम उनकी तरफ से विलाप नहीं करेंगे लेकिन कुछ सवाल उठाए जाने लाजिमी हैं। निपट देहात और झुग्गियों में वैसे भी स्त्रियां मनोरंजन का पर्याय हैं। एक अमेरिकी फिल्मकार का कोटस याद आ रहा है---जिन लोगों को अपने हिस्से का प्यार नहीं मिला सेक्स उनके लिए सांत्वना भर है। बिजली पंहुचा दे तो टीवी आसानी से उनकी जगह ले सकता है, मंत्री जी का इशारा शायद इसी तरफ था।
जहां तक देर से शादी की बात है तो बड़े शहरों में ज्यादतर लड़के लड़कियां शादी देर से कर रहे हैं..छोटे शहरो में नहीं। महनगरो की बात तो ना ही करें। यहां लोग बच्चे भी अपनी हैसियत देख पैदा कर कर रहे हैं। लेकिन इसकी असली जड़ तो छोटे शहर, कस्बा और गांव में है। वहां कौन समझाएं। मैं पिछड़े राज्यों की बात कर रही हूं, जहां आज भी लड़कियों को सिर्फ इसलिए पढाया लिखाया जाता है कि किसी अच्छे, कमाऊ लड़के से शादी हो जाए, कोई संपन्न परिवार मिल जाए और उनका पीछा छूटे। कुछ मां बाप को जमाने की हवा लगी तो सोचने लगे, थोड़ा पढ लिख जाएगी तो कभी ऊंच नीच(मतलब, परित्यक्ता, तलाकशुदा या विधवा) हुआ तो कमा खा लेगी। रोटी के लिए जमाने का मुंह नहीं जोहना पड़ेगा।
छोटे कस्बे में आज भी यही मानसिकता है। मां बाप अभी तक इसी सोच के हैं कि पढा लिखाकर मालिको (पति-ससुराल) के हाथों सौंप दो, भाग्यविधाता तय करेंगे कि आगे और पढाई जारी रखनी है या उन्हें बच्चा पैदा करने की मशीन में बदल देना है। गांव और छोटे कस्बे में देर से शादी के बारे में लड़की फैसले नहीं ले सकती। मां बाप चाहे तो भी नहीं ले सकते। वहां समाज बहुत प्रभावी होता है। उन्हें हर दिन सवालों के जबाव देने पड़ते हैं। लड़की को कब तक बिठा कर रखोगे, शादी क्यों नहीं हो रही, लड़की में कहीं खोट तो नहीं..ज्यादा उम्र हो गई तो कुंवारे लड़के मिलने मुश्किल है...जल्दी जो मिल रहा है कर दो। गांव-कस्बे के मध्यवर्ग में लड़की मैट्रिक पास करने के बाद से ही शादी के लायक हो जाती है। तभी से लडको पर नजर रखने लगते हैं लोग। आज भी ज्यादातर बीए पास करने से पहले लड़कियों की शादी हो जा रही है। एमए पास करने का मतलब लड़की का उम्रदराज हो जाना है। वहां तक पहुंचने का रिस्क मां बाप नहीं ले सकते। लड़के भले जिस उम्र में शादी करे। उनपर कोई हुकुम नहीं चलता। वे चाहे कितनी देर से शादी करें, उन्हें लड़की तो कमसिन-सी मिल ही जाएगी।
अब जिस समाज में लड़कियां अपनी शादी का फैसला नहीं कर सकती वहां बच्चा देर से पैदा करने के बारे में सोच भी कैसे सकती हैं। रहना उन्हें उसी समाज में है। महानगरों में लड़कियों का जीवन ज्यादा खुला और आजाद है। वे अपने लिए लड़-भिड़ लेती हैं। जब रहना हो कस्बे में तो कैसे लड़े-भिड़े। यहां कवि मित्र आलोक श्रीवास्तव की कविता की कुछ पंक्तियां सुनाती हूं..
इस समाज में / शोषण की बुनियाद पर टिके संबंध भी / प्रेम शब्द से अभिहित किए जाते हैं / एक स्त्री तैयार है मन-प्राण से / घर संभालने, खाना बनाने, कपड़ा धोने, और झाड़ू-बुहारु के लिए / मुस्तैद है पुरुष उसके भरण पोषण में.(कविता संग्रह-वेरा उन सपनो की कथा कहो)

यहीं पर स्त्रीमुक्ति की देवी सीमोन अपने एक इंटरव्यू में कहती हैं, जब पुरुष हमसे कहते हैं, एक अच्छी और सभ्य स्त्री बनने के रास्ते पर चलो। सारी भारी और कठिन चीजें जैसे ताकत, प्रतिष्ठा और कैरियर हमारे लिए छोड़ दो...तुम जैसी हो उसी में खुश रहो, पृथ्वी की लय में निमग्न, अपने मानवीय सरोकारों में तल्लीन....। दरअसल यह बहुत खतरनाक है।

हालांकि यह बहुत ही लंबे लेख और बहस का विषय है। इस पर फिर कभी। फिलहाल देर से शादी का मामला सामने है और इस पर पूरे समाज को गंभीरता से सोचने की जरुरत है। यह चेंज तभी संभव है जब अभिभावक लड़िकयों के बारे में वही रवैया रखें जैसे लड़को के बारे में रखते हैं। पहले लड़की के मन को टटोले और फिर उसकी नौकरी हो जाने तक का सपना देखें। फिर देखिए...

आपका क्या होगा जनाबेआली

Posted By Geetashree On 10:33 PM 9 comments



ये दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है, इसका अंदाजा इन दिनों कुछ ज्यादा ही हो रहा है। अभी समलैंगकिता पर उठा तूफान थमा नहीं था कि वैज्ञानिको ने एक और नई बहस छेड़ दी। समलैंगिकता को अवैज्ञानिक करार देने वाले इस नई वैज्ञानिक खोज के बारे में क्या कहेंगे.
ताजा ताजा खोज है-नजर डालें। पूरी दुनिया में हलचल मची है। लंदन के वैज्ञानिको ने पहली बार लैब में कृत्रिम मानव स्पर्म बनाने का दावा किया है। कहा तो ये भी जा रहा है कि इसके पूरी तरह से सफल होने पर बच्चा पैदा करने के लिए पुरुषों की जरुरत नहीं रह जाएगी। लगता है मर्दो ने इस बात को दिल पर ले लिया है। खोज जारी रही तो जल्दी ही औरतो की भी जरुरत नहीं पड़ेगी। उन्हें लग रहा है कि आगे चलकर अगर यह तकनीक प्रचलन में आई तो महिलाएं शायद बच्चे पैदा करने के काम से भी उन्हें अलग ना कर दें। तब तो उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। उनके घबराने की और भी वजहें हैं..तनाव, व्यस्तता, प्रदूषण की मार से पुरुषों में पिता बनने की क्षमता कम हो रही है। वंश चलाने के लिए पिता तो बनना ही पड़ेगा ना। विज्ञान उनका काम आसान कर रहा है तो सहजता से स्वीकारने में हर्ज क्या है।

विज्ञान की रफ्तार बहुत तेज है। वह सारी नैतिक बहसो से आगे निकल चुका है। नैतिकतावादी कृत्रिम बच्चे का विरोध कर सकते हैं। उन्हें भय सताने लगेगा कि आगे चलकर पूरी तरह से कृत्रिम रुप से बच्चे पैदा किए जाने लगेंगे।
वैज्ञानिको का कहना है कि अगर आगे भी टेस्ट में लैब में बनाए गए इन स्पर्म को नेचुरल स्पर्म की तरह साबित कर दिया गया तो इससे मेल इनफर्टिलिटी के मामले में बहुत सहायता मिल सकेगी। उनका कहना है कि अभी महिलाओं की कोशिकाओं से स्पर्म बनाने की संभावनाओं की भी स्टडी की जा रही है, ताकि लेस्बियन महिलाओं के लिए बच्चे को जन्म देना मुमकिन हो सके। यह सिर्फ समलैंगिको को लिए ही खुशी की बात नहीं है, पति में कमी की वजह से बच्चा पाने से वंचित जोड़ों के लिए भी नयी उम्मीद जागी है। आंकड़े बताते हैं कि हर छठे दंपत्ति को किसी ना किसी वजह से औलाद का सुख नहीं है। अब कमसेकम उनकी त्वचा की मदद से ही उन्हें संतान सुख मिल सकता है।
हालांकि अभी इस संबंध में कई सबूतो की मांग हो रही हैं। अभी इसे आसानी से नहीं माना जा सकता। फिर भी आप इस खोज को हल्के से नहीं ले सकते। ये बहुत ही क्रांतिकारी खोज होगी जो दुनिया का चेहरा बदल देगी। औरतों की दुनिया एकदम से बदल जाएगी। रिश्तों के मायने बदल जाएंगे। अभी समलैंगिकता ने जो तूफान उठाया उससे पुरुषों की दुनिया उबर नहीं पाई है। उनके अस्तित्व को जो खतरा समलैंगिकता से दिख रहा था, उससे ज्यादा खतरा यहां है। उन्हें खतरे की घंटी सुनाई दे रही है। जहां पुरुष इसे चौकन्ना करने वाली बात मान रहे हैं वहीं स्त्रियां अभी मौन हैं। इस मामले में अभी कोई राय कायम करना जल्दीबाजी ही होगी। लेकिन कुछ लोगों में त्वरित प्रतिक्रियाएं हो रही हैं जो बेहद दिलचस्प है।
कोई कह रहा है, कृत्रिम चीजें ज्यादा दिन नहीं चलने वाली।
पुरुष कभी अप्रासंगिक नहीं होगा।
-प्रकृति के करीब रहना ज्यादा जरुरी है। ये चीजें आएंगी और चली जाएंगी।
-स्त्री-पुरुष में एक दूसरे के प्रति जो आदिम ललक है, वह कायम रहेगी।
-हमें कुछ चीजों की आदत होती है, जो आसानी से नहीं छूटती...कितना भी साजिश रचे जाएं, रोमांटिसिज्म की परिकल्पना कभी खत्म नहीं होगी।
-स्त्री-पुरुष संबंधों में भावनाओं के साथ साथ देह की उपस्थिति अनिवार्य है।
-मैं भ्रम में हूं..इस खोज का समर्थन करें या खिलाफत। दोनों ही उलझा देने वाला है। हम विज्ञान के खिलाफ जाएं या ईश्वर के विऱुद्ध किसी मानवीय आयोजन में शामिल हों या सामाजिक बहसो को आमंत्रित करें। खोज करने वाले वैज्ञानिक तर्क दे रहे हैं कि विज्ञान हमेशा से सामाजिक बहस और मुद्दों से आगे रहता है। वह नैतिक बहसो के चक्कर में नहीं पड़ता। विज्ञान इनसे आगे चलता है। लेकिन यहां इतना तो सोचा ही जा सकता है कि प्रजनन सिर्फ बायोलोजिकल प्रक्रिया भर नहीं है। थ्योरिटिकल रुप से तो सही हो सकता है मगर इजाजत देने से पहले मनोवैज्ञानिक, सामाजिक पहलुओ पर क्या विचार नहीं करना चाहिए। आप क्या सोचते हैं....

इतिहास रचती भली स्त्रियां

Posted By Geetashree On 7:54 AM 13 comments

ब्लात्कार के आरोप में न्यायिक हिरासत झेल रहे अभिनेता शाइनी आहूजा की पत्नी बनी हुई हैं। वह लगातार अपने पति के पीछे खड़ी हैं, सारा सच जानते हुए भी..सारे सबूत शाइनी के खिलाफ जा रहे हैं...फिर भी वे तनी हुई हैं। ये अनुपमा अकेली नहीं हैं अपने समाज में..एसी कई अनुपमाएं हैं..खासकर एक सफल पति के पीछे...। अब अनुपमा एक प्रतीक बन चुकी हैं...एक एसी स्त्री जो अपने सफल पति के हर गुनाह को जायज बना देती हैं। उसे कुछ दिखाई नहीं देता...ना डीएनए टेस्ट की रिर्पोट ना पति गुनाह कबूलना...ना वे तमाम साक्ष्य जो चीख चीख कर उसके गुनाह का प्रमाण दे रहे हैं। एसी पत्नी की कामना कोई भी पुरुष कर सकता है..। पति पर चाहे जितने आरोप लगे..चाहे कितना गुनाह करें....ये छायाएं कभी साथ नहीं छोड़तीं। एसी स्त्रियों की आदर्श हि्लेरी क्लिंटन हैं...भारत में अनुपमा हो जाएंगी। ये तो किस्से सेलिब्रिटी लोगो के हैं। अपेक्षाकृत कम मशहूर किंतु सफल पतियों की पत्नियां भी इनसे कम नहीं हैं। अपने आसपास नजर दौड़ाइए...याद करिए...ढेरो उदाहरण मिल जाएंगे। पति पर बलात्कार के आरोप लग रहे हैं...जांच हो रही है...आरोप सच सिध्द हो रहे हैं...पति सजा पा रहे हैं..कुछ केस लड़ रहे हैं..कुछ हार रहे हैं..कुछ जीत रहे हैं..इन सबके बीच कहीं कुछ है जो दरक रहा है..टूट रहा है..
पति पर आरोप लगा नहीं कि वकील से पहले पत्नी मैदान में तैनात कर दी जाती है, कुछ अपनी मर्जी से तो कुछ अपनी मजबूरी में...ज्यादा मामले मजबूरी के। वो मजबूरी कई किस्म की हो सकती है। आखिर क्या वजह है कि पत्नी उनका साथ देती है। कौन सी मजबूरी...ये कैसी औरतें हैं जो खुद को मार रही हैं। दूसरी औरत के खिलाफ खड़ी होकर झूठ का साथ दे रही हैं। क्या इसमें उनका लाभ है।

कोई तो बात है...कि ये आधुनिकाएं बलात्कार जैसे जघन्य पाप करने वाले मर्द के पीछे खड़ी है..इतनी नासमझ भी नहीं वे..उन्हें पता है कि सच किस खिड़की से झांक रहा है..झूठ किस दरवाजे पर खड़ा दहाड़ रहा है। दोनों दिख रहा है...मगर ने कहां देख रही हैं...उन्हें दिख रहा है अपना भविष्य...अपनी छवि..एक भली स्त्री की छवि...जिससे गुनाहगार पति जीवन भर नहीं उबर पाएगा...और समाज, परिवार देवी बनाकर पूजेगा। इतनी प्रशंसा... कि वे जीवन भर इस नशे से ऊबर नहीं पाएंगी। ये पेज 3 की स्त्रियां हैं..जिनकी महफिल में रेप-वेप कोई बड़ी बात नहीं। कौन कहता है कि भली स्त्रियां इतिहास नहीं रचती..इन्हें देखिए..रच रही हैं ना। पुरुष जब इतिहास लिखेंगे तब स्त्रियां दर्ज होंगी, सम्मान के साथ...। वे नकार दी जाएंगी जिन्होंने गुनाहगार का साथ नहीं दिया और उन्हें सजा दिलाई। सुना है कभी उनका नाम...नहीं ना। अनुपमा के समर्थन में कई पेज3 महिलाएं बयान दे रही हैं...रीतू बेरी हों या अदिति गोवित्रीकर या अर्चना पूरन सिंह या सुचित्रा कृष्णमूर्ति...सबकी एक ही बानी...पता नहीं शाइनी गुनाहगार है या नहीं..मगर अनुपमा जो कर रही है उसकी सराहना करनी चाहिए। वह अपने पति के साथ पूरी ताकत के साथ खड़ी है..उसे संकट की इस घड़ी में खड़ा भी होना चाहिए...वह जानती है कि उसका पति दोषी नहीं है..एक पत्नी को अपने पति के पीछे खड़ा होना भी चाहिए..सार्वजनिक जगहो पर पत्नी को रिएक्ट भी नहीं करना चाहिए..बंद दरवाजे के पीछे चाहे पति को लताड़ लगाए...
इन औरतो से क्या पूछा नहीं जाना चाहिए...कि अगर कभी उनके साथ एसा होगा तो उनके पति क्या करेंगे. क्या इतनी ही उदारता बरतेंगे। शादी के बाद पत्नी का एक पुरुष मित्र तक तो बर्दाश्त नहीं होता...प्रेमी का पता चले तो या तो मार डालेंगे या मामला तलाक तक पक्का पहुंचेगा। पूरे समाज में घूम घूम कर गालियां बकेंगे सो अलग. वाइफ स्वैपिंग करने वालो को छोड़ दें,वहां तो सब काम आपसी सहमति के आधार पर चलता है। सामान्य किस्म के पति कभी प्रेस कांफ्रेंस करके अपनी पत्नी की बेगुनाही का ढोल नहीं पीटेंगे। कभी नजर उठाकर समाज में चल नहीं पांएगे। इज्जत मिट्टी मे मिल जाएगी। औरतों की कोई इज्जत ही नहीं होती। इसका ठेका सिर्फ पुरुषो ने ले रखा है।

आज से लगभग 20 साल पहले महेश भट्ट की फिल्म अर्थ आई थी.. फिल्म प्रेमी जानते हैं कि विवाहेत्तर संबंधों पर यह फिल्म कैसे रिश्तों की परतें खोली थीं। फिल्म के अंत में...जब शादीशुदा नायक अपनी प्रेमिका से हताश होकर पत्नी के पास लौटता है, तब पत्नी एक सवाल पूछती है...अगर मैंने एसा किया होता और लौट कर आती तो क्या तुम मुझे स्वीकार लेते। जवाब के मामले में इमानदार पति थोड़ी देर सोचता है, फिर कहता है...नहीं। पत्नी को शायद इसी जवाब का इंतजार था...वह पुर्नमिलन की उम्मीद लगाए पति को थैंक्यू कह कर चली जाती है।
अपने किशोरावस्था में देखी गई इस फिल्म ने मेरे मन पर एसी छाप छोड़ी कि भली पत्नी बनने की जगह एक अच्छी नागरिक बनना ज्यादा जरुरी लगता है..ये अच्छी पत्नियों को कौन समझाए, जो सफल पति से मिले एशोआराम, नाम, प्रतिष्टा किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ना चाहती...वे इस मानसिकता से ग्रस्त हैं कि मेरा पति कोठा जाए...आपको क्या...

वैध बनेंगे अवैध रिश्ते

Posted By Geetashree On 1:40 AM 10 comments

आज 2 जुलाई है। सुबह से एक समूह की धड़कने बढी हुईं थीं..पता नहीं कोर्ट में क्या होगा..क्या फैसला आएगा..वो घड़ी आ ही गई। दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिक रिश्तों पर आज फैसला सुना दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार 18 साल की उम्र से ऊपर रजामंदी से किया गया समलैंगिक रिश्ता अपराघ नहीं है। समलैंगिकता को कानूनी तौर पर मान्यता देते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को गैरआपराधिक करार दिया है। हाईकोर्ट के अनुसार स्त्री का स्त्री से या पुरूष का पुरूष से सहमति से संबंध बनाना अपराघ नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट के अनुसार धारा 377 वैघ नहीं है और यह मौलिक अधिकार का हनन है। गे संबंघ को कानूनन अपराध नही माना जाता है। 1861 में अंग्रेजों ने यह कानून बनाया था।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद गे समूह ने राहत की सांस ली होगी। इनकी राह में जहां सबसे बड़ा रोड़ा भारतीय समाज का पारंपरिक रवैया था, वहीं धारा 377। फैसले के बाद अवैध रिश्ते वैध बन जाएंगे और कोई मुंह छिपा कर अपनी जिंदगी नहीं जिएगा। समान सेक्स के बीच संबंधों को स्वीकृति देने वाले इस फैसले को अभी एक बड़ी लड़ाई और जीतनी है..उन्हें, अभी उनके सामने कठमुल्लों के कोप से जूझने की चुनौती है। वे लोग हार नहीं मानेंगे..अभी उच्च अदालत का रास्ता बचता है..फिलहाल जिन्न बोतल से बाहर आ गय़ा है।
इसे एक लीक से हटकर, एतिहासिक फैसला करार दे सकते हैं। यह भारत के लिए बड़ा फैसला है। भारतीय समाज की बनावट को देखते हुए बहुत आसान नहीं रही होगी फैसले की डगर। इस फैसले के बाद भारत उन 16 देशों में शामिल हो जाएगा जहां समलैंगिकता को कानूनी मान्यता प्राप्त है। नीदरलैंड, नार्वे, बेलज्यिम, स्पेन, कनाडा, द.अफ्रीका, समेत कई अन्य देशो में समलैंगिकता को कानूनी मान्यता प्राप्त है।
यहां बता दें कि ये अधिकार पाने की लड़ाई कहां से शुरु हुई। दिल्ली स्थित नाज फाउंडेशन ने सन 2001 में हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर इस धारा में संशोधन की मांग की थी। अर्जी में कहा गया था कि दो व्यस्को(होमो या हेट्रो) के बीच अगर आपसी सहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाए जाते हैं, यानी दो लोग अगर होमो सेक्सुआलिटी में संलिप्त हैं तो उनके खिलाफ धारा 377 का केस नहीं बनना चाहिए। मामले की सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय और हेल्थ मिनिस्ट्री की दलीलें भी अलग अलग थीं...गृह मंत्रालय जहां धारा 377 में संसोधन के पक्ष में था वहीं हेल्थ ने भी पक्ष लिया...इस तरह माहौल बनता चला गया..। हालांकि सरकारी वकील ने नाज की अर्जी के खिलाफ खूब दलीलें दीं..लेकिन पक्ष की दलील भारी पड़ी..जिसमें कहा गया कि धारा 377 मूलभूत अधिकारों में दखल दे रहा है। मैंने भी तो पिछले पोस्ट में कुछ एसी ही दलील दी थी..
मुझे यहा जिक्र करना लाजिमी लग रहा है। मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई ने महिला समलैंगिकता पर जब लिहाफ कहानी लिखी तब जोरदार हंगामा हुआ था और उन पर ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा चलाया था। वैसी कहानी जब जब लिखी गई..हंगामा हुआ..दीपा मेहता ने फिल्म फायर बनाई...हंगामा हुआ..धरने प्रदर्शन हुए..पुतले जलाए गए..नैतिकता और भारतीय संस्कृति खतरे में जो पड़ गई थी..।
अब तो बात कहानियों से ऊपर उठ गई है...अब परदे के पीछे का सच सामने आने लगा है...आपके आसपास दिखाई देगा..। साहित्य में झेलने के बाद अब जीवन में देखने की आदत समाज को डालनी पड़ेगी। तभी ये सियापा रुकेगा। मेरे एक मित्र ठीक ही कहते हैं, आधुनिकता और रिश्तों की निजता उन्हें सिर्फ कहानी-कविता में चाहिए, जीवन में नहीं। हमारे समाज में जो तथाकथित आधुनिक मनबोध के लोग हैं, वे बहस में अपनी शताब्दी से आगे नजर आते हैं, लेकिन उनका जीवन पिछली शताब्दी से भी पीछे रहता है।
समय की मांग को सुनने की ताकत पैदा करना जरुरी है, नहीं तो समय ही आपको खारिज कर देगा। यह मसला समय की मांग है। कब तक इनकार करते रहते। आपको दिखाई नहीं दे रहा था जब ये चीजें आपके घर में ही घट रही थीं..। वैसे भी चंद लोगो के वाहियात विरोध की कोई अहमियत नहीं होती। युवा आबादी वाले देश में आप युवाओं में सर्वे करा लो..। सारा भ्रम टूट जाएगा। नौजवान पीढी मानती है कि यह मामला निहायत ही व्यक्तिगत है। एक अखबार में युवाओं की बेखौफ राय छपी है जिसमें उन्होंने अपनी राय साफ जाहिर कर दी है... किसी को भी हक है अपनी पसंद चुनने का। अगर आप इसके खिलाफ हैं... तो रहिए, ये आपकी राय हो सकती है लेकिन आप कृपया इसे अपराध नहीं मानें।