वैध बनेंगे अवैध रिश्ते

Posted By Geetashree On 1:40 AM 10 comments

आज 2 जुलाई है। सुबह से एक समूह की धड़कने बढी हुईं थीं..पता नहीं कोर्ट में क्या होगा..क्या फैसला आएगा..वो घड़ी आ ही गई। दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिक रिश्तों पर आज फैसला सुना दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार 18 साल की उम्र से ऊपर रजामंदी से किया गया समलैंगिक रिश्ता अपराघ नहीं है। समलैंगिकता को कानूनी तौर पर मान्यता देते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को गैरआपराधिक करार दिया है। हाईकोर्ट के अनुसार स्त्री का स्त्री से या पुरूष का पुरूष से सहमति से संबंध बनाना अपराघ नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट के अनुसार धारा 377 वैघ नहीं है और यह मौलिक अधिकार का हनन है। गे संबंघ को कानूनन अपराध नही माना जाता है। 1861 में अंग्रेजों ने यह कानून बनाया था।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद गे समूह ने राहत की सांस ली होगी। इनकी राह में जहां सबसे बड़ा रोड़ा भारतीय समाज का पारंपरिक रवैया था, वहीं धारा 377। फैसले के बाद अवैध रिश्ते वैध बन जाएंगे और कोई मुंह छिपा कर अपनी जिंदगी नहीं जिएगा। समान सेक्स के बीच संबंधों को स्वीकृति देने वाले इस फैसले को अभी एक बड़ी लड़ाई और जीतनी है..उन्हें, अभी उनके सामने कठमुल्लों के कोप से जूझने की चुनौती है। वे लोग हार नहीं मानेंगे..अभी उच्च अदालत का रास्ता बचता है..फिलहाल जिन्न बोतल से बाहर आ गय़ा है।
इसे एक लीक से हटकर, एतिहासिक फैसला करार दे सकते हैं। यह भारत के लिए बड़ा फैसला है। भारतीय समाज की बनावट को देखते हुए बहुत आसान नहीं रही होगी फैसले की डगर। इस फैसले के बाद भारत उन 16 देशों में शामिल हो जाएगा जहां समलैंगिकता को कानूनी मान्यता प्राप्त है। नीदरलैंड, नार्वे, बेलज्यिम, स्पेन, कनाडा, द.अफ्रीका, समेत कई अन्य देशो में समलैंगिकता को कानूनी मान्यता प्राप्त है।
यहां बता दें कि ये अधिकार पाने की लड़ाई कहां से शुरु हुई। दिल्ली स्थित नाज फाउंडेशन ने सन 2001 में हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर इस धारा में संशोधन की मांग की थी। अर्जी में कहा गया था कि दो व्यस्को(होमो या हेट्रो) के बीच अगर आपसी सहमति से अप्राकृतिक संबंध बनाए जाते हैं, यानी दो लोग अगर होमो सेक्सुआलिटी में संलिप्त हैं तो उनके खिलाफ धारा 377 का केस नहीं बनना चाहिए। मामले की सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय और हेल्थ मिनिस्ट्री की दलीलें भी अलग अलग थीं...गृह मंत्रालय जहां धारा 377 में संसोधन के पक्ष में था वहीं हेल्थ ने भी पक्ष लिया...इस तरह माहौल बनता चला गया..। हालांकि सरकारी वकील ने नाज की अर्जी के खिलाफ खूब दलीलें दीं..लेकिन पक्ष की दलील भारी पड़ी..जिसमें कहा गया कि धारा 377 मूलभूत अधिकारों में दखल दे रहा है। मैंने भी तो पिछले पोस्ट में कुछ एसी ही दलील दी थी..
मुझे यहा जिक्र करना लाजिमी लग रहा है। मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई ने महिला समलैंगिकता पर जब लिहाफ कहानी लिखी तब जोरदार हंगामा हुआ था और उन पर ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा चलाया था। वैसी कहानी जब जब लिखी गई..हंगामा हुआ..दीपा मेहता ने फिल्म फायर बनाई...हंगामा हुआ..धरने प्रदर्शन हुए..पुतले जलाए गए..नैतिकता और भारतीय संस्कृति खतरे में जो पड़ गई थी..।
अब तो बात कहानियों से ऊपर उठ गई है...अब परदे के पीछे का सच सामने आने लगा है...आपके आसपास दिखाई देगा..। साहित्य में झेलने के बाद अब जीवन में देखने की आदत समाज को डालनी पड़ेगी। तभी ये सियापा रुकेगा। मेरे एक मित्र ठीक ही कहते हैं, आधुनिकता और रिश्तों की निजता उन्हें सिर्फ कहानी-कविता में चाहिए, जीवन में नहीं। हमारे समाज में जो तथाकथित आधुनिक मनबोध के लोग हैं, वे बहस में अपनी शताब्दी से आगे नजर आते हैं, लेकिन उनका जीवन पिछली शताब्दी से भी पीछे रहता है।
समय की मांग को सुनने की ताकत पैदा करना जरुरी है, नहीं तो समय ही आपको खारिज कर देगा। यह मसला समय की मांग है। कब तक इनकार करते रहते। आपको दिखाई नहीं दे रहा था जब ये चीजें आपके घर में ही घट रही थीं..। वैसे भी चंद लोगो के वाहियात विरोध की कोई अहमियत नहीं होती। युवा आबादी वाले देश में आप युवाओं में सर्वे करा लो..। सारा भ्रम टूट जाएगा। नौजवान पीढी मानती है कि यह मामला निहायत ही व्यक्तिगत है। एक अखबार में युवाओं की बेखौफ राय छपी है जिसमें उन्होंने अपनी राय साफ जाहिर कर दी है... किसी को भी हक है अपनी पसंद चुनने का। अगर आप इसके खिलाफ हैं... तो रहिए, ये आपकी राय हो सकती है लेकिन आप कृपया इसे अपराध नहीं मानें।