Posted By Geetashree On 6:21 AM 0 comments

 रचना-सूत्र

-गीताश्री

एक कृति से दूसरी कृति जन्म लेती है. वह महान कृति होती है जिससे दूसरी कृति निकलती है. वह किताब महान जो दूसरी रचना का सूत्र देती है.

कसौटी कई तरह की होती है कृति को क़सने की. आज सबके पास एक कसौटी है.

जरुरी नहीं कि वह कसौटी सही हो. असली कसौटी की पहचान भी मुश्किल है. निगाहें चाहिए. सच आँख भर नहीं होता. आँख के रास्ते विवेक की आंच में सच को सींझना होता है. जैसे कोई बेटी , अपनी मां की नक़ल नहीं होती, उसकी अपनी मौलिक उपस्थिति होती है, अपने गुण दोष के साथ.

वैसे ही कोई कृति से जन्म लेने वाली दूसरी कृति होती है. अपनी स्वतंत्र चेतना और इयत्ता के साथ.

कहते हैं-

यह पृथ्वी अन्य ग्रहों की तरह एक ग्रह है. सूरज से टूट कर बनी हुई ठंडी पिंड.

इसके पास सूरज से ज़्यादा संसाधन हैं. इससे न सूरज का महत्व कम होता है न पृथ्वी उसकी कॉपी रह जाती है.

हमें कृतियों को उनकी स्वतंत्र चेतना के साथ स्वीकारने की तमीज़ हासिल करनी चाहिए.

 

 

 

Posted By Geetashree On 4:01 AM 0 comments

 

ब ह स

 

"क्या बाज़ार साहित्य का मूल्य तय कर सकता है? क्या बिक्री के आँकड़े साहित्य की श्रेष्ठता के मूल्यांकन के लिए कसौटी बन सकते हैं?"

 

बाज़ार साहित्य पर हावी है, कंटेंट से लेकर बिक्री तक. बाज़ार मूल्य अलग तरह से तय कर रहा है. एक जमात है जो बाज़ार को दिमाग में रख कर लिख रही है. उसका लक्ष्य किताब बेचना और पाठक बनाना है. उसे साहित्य की शुचिता या आग्रहों से कोई मतलब नहीं. वह पूरी तरह मुक्त है और मुक्ति की घोषणा कर चुकी है कि हमें साहित्य की श्रेणी में नहीं रखना तो मत रखो. हम आपके लिए लिख नहीं रहे. हम पाठकों के लिए लिख रहे. यानी टारगेटेडट ऑडियेंस के लिए लिख रहे. पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए लिख रहे. उन्हें ज़माने की नब्ज पता है कि नयी पीढी क्या पढ़ना चाहती है. भाषा से लेकर कंटेंट तक ख़ूब खिलवाड़ हुए हैं. पिछले कुछ सालों में स्वाद बदल गया है. सारे मानदंड टूट गए हैं. सब अपने हिसाब से, सुविधा से नये मूल्य गढ़ रहे हैं. ज़ाहिर है, नये मूल्य गढ़ते समय हम अपने समय का ध्यान रखते हैं. किताब की बिक्री का ध्यान रखते हैं. लेखकों पर दबाव रहता है कि किताब को कौन पढ़ेगा, क्यों पढ़ेगा? कैसा स्वागत होगा? बेस्ट सेलर बनेगी या नहीं.

क्योंकि बेस्ट सेलर होना साहित्य में सेलिब्रिटी होना है.

बेस्ट सेलर की अवधारणा बाज़ार की देन है. किताबें कब नहीं बिकी? पुराने लेखकों की किताबें आज भी ख़ूब बिकती हैं. पुस्तक मेले में जाकर देखे कोई कि बुक स्टॉल पर सबसे ज़्यादा किनकी किताब बिकती है? पुराने लेखक आज भी प्रासंगिक है, कंटेंट के लिहाज़ से भी और बिक्री के आधार पर भी. उनकी माँग कभी कम न हुई. मगर वे किसी प्रोपगेंडा का हिस्सा नहीं हैं. वे नहीं बोलते, उनकी किताबें बोलती हैं. बोलती रहेंगी. उनके मूल्य भी उनके तय किए हुए थे. तब उनके समक्ष बाज़ार नहीं, शुद्ध पाठक और अपना समाज था.

आज बाज़ार है और भिन्न रुचियों और व्यवसाय वाला पाठक है.

अधिक बिक्री कभी साहित्य की कसौटी नहीं हो सकती. बाज़ार तय नहीं कर सकता कि श्रेष्ठ साहित्य क्या है, बस यही काम बाज़ार नहीं कर सकता. बाज़ार तात्कालिक मोल दे सकता है, कालजयी होने का भाव नहीं.

इतना तो सबको पता है साहित्य में वक़्त से बड़ी कसौटी कोई नहीं और पाठक से बढ कर कोई ईश्वर नहीं.

यह ईश्वर नष्ट होने वाली प्रजाति है. इसकी अपनी समझ और विवेक की सीमाएँ हैं. जरुरी नहीं कि लेखक के स्तर के पाठक भी हो. हम उस अदृश्य प्रजाति पर दांव खेलते हैं जिस पर इतना भरोसा नहीं कि वह लेखक से ज़्यादा पढ़ा लिखा होगा. लेखक संवेदना के जिस धरातल पर खड़ा होकर लिख रहा है, पाठक की संवेदना उससे मिलती हो, उसके समानांतर हो. कम न हो.

मौजूदा समय में साहित्य को लेकर फ़ास्ट फ़ूड वाली प्रवृति दिखाई देती है. अख़बार की तरह बाँच कर किसी बेंच पर छोड़ कर चल देने की लापरवाही.

झटपट ...झट और पट !

किताबें झट से आती हैं पट से बिला जाती हैं.

जो दिमाग में अटक जाती है जिसे पीढ़ियाँ दोहराती हैं, सुनाती है वो है - सामाजिक मूल्यों और मानवीयता के पक्ष में खड़ी कृतियाँ. जिसमें प्रवेश करते की पाठक पनाह और विश्राम पा जाए.

जहाँ वह घबरा कर बार -बार घुसना चाहे.

एक उदाहरण देकर समझाना चाहूँगी कि बेस्ट सेलर किताबें किसी मशहूर डिज़ाइनर की उस डिज़ाइन की तरह होती है जिसे प्रेट लाइनबोलते हैं, यानी एक डिज़ाइन की लाखों कॉपी, वह बेस्ट सेलर होती है. कभी डिज़ाइन की वजह से तो कभी नाम की वजह से. श्रेष्ठ साहित्य सव्यसाची के लहंगे की तरह है जिसका एक पीस ही तैयार होता है.

बाज़ार इसे भौंचक्का होकर देखता है, सराहता है, तरसता है, मूल्य नहीं लगा सकता.

बेस्ट सेलर उसी प्रेट लाइन डिज़ाइन की तरह है... बिकाऊ किताबें जो प्रकाशक और लेखक दोनों की जेब भर देती है.

समय के साथ फ़ैशन और जरुरत समाप्त !

बाज़ार बहुत ख़राब चीज़ नहीं मगर उसे किसी पुण्य की तरह चाहना ख़राब है. वो हावी होगा तो आप अपने साथ छल करेंगे. अपनी नहीं सुनते जो वे बाज़ार की आवाज़ें सुनते हैं. सुरीली पार्श्व गायकी के वाबजूद  कोरस के गायकों की पहचान कितनी स्थायी !!

बाज़ार यहाँ विफल है. उसकी अपनी सीमाएँ हैं. हैसियत है. वह निर्जीव चीजों पर प्राइस टैग लगा सकता है, उसे अमर नहीं कर सकता.

बेचना कसौटी नहीं है. कसौटी है समय ! उस पर छोड़ देना चाहिए.

 

 

 

 

 

 

Posted By Geetashree On 8:39 PM 0 comments

 वरिष्ठ लेखिका अनामिका का खत, गीताश्री के नाम

राजनटनी उपन्यास पढ़ने के बाद उपजी प्रतिक्रिया जो खत में ढली....


प्रिय गीता,

 

इतिहास के साथ, वह भी मिथिलांचल ओर तिरहुत - जैसे श्रुतिबहुल क्षेत्रों के साथ महाकाल की लुकाछिपी अपने साहित्य में मंचित करने वाली उषाकिरण खान की परम्परा में आज तुम भी खड़ी हो -अपनी राजनटनीकी मृणाल-सदृश बाँहें गले में लपेटे हुई। यह देखकर मेरी माँ, तुम्हारी जायसी-स्पेशलकी पुरानी प्रोफेसर कितनी खुश है, यह तो यहाँ आकर ही देख सकती हो !

रिक्त स्थानों की पूर्तिवैसे तो स्कूली बच्चों का प्रिय होमवर्क होता है, पर यही होमवर्क जब लेखक करने बैठते हैं ऐतिहासिक उपन्यासों के लेखकतो उनसे एक चूक यह हो जाती है कि वे उस समय की भाषा और तत्कालीन परिवेश ज्यों की त्योंधर दीनी चदरियाभाव से उतार नहीं पाते।

तुमने लोकका बायस्कोप पकड़ा है जो मिथिलांचल में अभी भी बहुत नहीं बदला है, और बोली-बानी,  प्रकृति-पर्यावरण की छाँव में यह पूरा प्रसंग मंचित किया है कि कैसे एक अज्ञातकुलशील स्त्री या (जाति-वर्ण -संप्रदाय आदि के) फ़्रेम से बाहर पड़ने वाली तथाकथित रूप से अवर्णस्त्री भी उतनी ही उच्चाशाय हो सकती है, जितनी सामान्य स्त्री नहीं होती। गीता की नायिका, रवींद्रनाथ ठाकुर के गोराकी तरह देशकी सामान्य चौहद्दी के बाहर की है यानी मिथिला के बाहर की, कहीं और से आकर बसी हुई अदर है वह फिर भी  देशहित के लिए उतनी प्रतिबद्ध है जितनी स्थानीय जनता भी नहीं। इस बहाने तुमने, ‘देशप्रेमकी संकीर्ण परिभाषा को स्पष्ट चुनौती दी है और यह काम आज के संदर्भ में बहुत जरूरी माना जाएगा जब बाहर से आकर बसे हुओंको अपनामानने को जल्दी कोई तैयार ही नहीं होता।

दूसरी बात इसमें यह ध्यान देने लायक है कि  पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआकी श्रेणी में पड़ने वाले, सार  तुम्हारे अपने शब्दों में सारा दिन किताब में मुण्ड घुसाए रखने वालेवाले राजकुमार की तुलना में एक सामान्य लोक कलाकार की चेतना अधिक विकसित हो सकती है! स्वयं औपचारिक शिक्षा से विरत रहकर भी वह अपनी नैसर्गिक प्रज्ञा से यह समझ सकती है कि देश किसी देश प्रदेश की असली थाती उसकी कलाकृतियाँ और पाण्डुलिपियाँ होती हैं, उसके साधना ग्रंथ! और किसी लूट-पाट से अधिक दूरगामी व्याप्ति रख सकती है ज्ञान-थाती की चोरी! बंगाल का राजा अपनी सांस्कृतिक निधि चौगुनी करने की सूक्ष्म लालसा से प्रेरित है जो वह छल-बल से स्वयं हासिल नहीं कर पाता, वैचारिक राग-द्वेष से पीड़ित गद्दारों की मदद से उसका बेटा हासिल करता है, पर शठे शाठ्यं समाचरेतकी नीति आजमाती हुई राजनटनी उसका पासा पलट देती है, अपनी जान हथेली पर लिए हुए साथी नटों की मदद से पाण्डुलिपियों वाले बक्से ही बदल देती हे नाव पर लदवाने के पहले

हालाँकि राजकुमार उसे नए देश की महारानी बनाकर साथ ले जा रहा है! उसका यह निर्णय फॉर्स्टर के निर्णय की याद दिला देता है :

" I have to choose between betrayaing my country and but betraying my friend, I would rather betray my country."  

नटनी का जीवन फॉस्टर्र की उक्ति का सजग प्रतिपक्ष गढ़ता है और उसी शिद्दत से यह अनपढ औरत ग्रंथों का मोल चुकाती है जिस शिद्दत से रोजेविक की कविता में ऋवान्त अपने प्रतिपक्ष का मोल

‘‘और सफेदी का सही बखान है

रंग सुरमई

पक्षी का पत्थर

सूरजमुखी का दिसम्बर...

रोटी का सबसे सटीक बखान

भूख...

उसके भीतर ही है

एक नम छिद्रकोष

एक ऊष्म, भीतरी सतह,

सूरजमुखी रात के...

प्यास की स्रोत-सदृश परिभाषा है

राख, रेगिस्तान...

 

इस क्रम में आगे कहें तो गीताश्री का सही बखान हैं यह उपन्यास, लिट्टी चोखाके बाद की ये रचनाएँ जो आम्रपाली  गाथा से होती हुई अब राजनटनीके मनोलोक तक पहुँची है और गंगा उस पारवाले नैतिक भूगोल के बतरसप्रवण भाषिक अवचेतन तक। उपन्यास अपने निर्बाध, रोचक कथाप्रवाह के कारण भी पठनीय है।

 

तुम्हारी

अनामिका