जब हम ही हो जाते हैं अपने खिलाफ

Posted By Geetashree On 12:33 AM 5 comments

गीताश्री
सायमा वैद अपने ताजा-ताजा दोस्त के साथ लंच करके लौटी तो बेहद प्रफुल्लित थी- आज मैंने अरविंद के साथ लंच किया। बहुत अच्छी कविताएं लिखता है। लंच करते हुए उसकी कविताएं सुनकर मजा आ गया। सायमा ने अपनी सहेली को गदगद कंठ से यह सब बताया। सहेली ने चुटकी लेते हुए सत्य का उदघाटन किया। तुम्हें पता है, अरविंद ‘दलित’ है। ‘क्या?’ नहीं... सायमा ने प्रतिवाद किया। हां, ‘वह दलितों में भी वो है जिसका पानी नहीं चलता।’सायमा धाराशायी। लंच और कविता का खुमार झट से उतर गया।
‘ओह...’ कोई बात नहीं। उसने थाली नहीं छुई। आमने सामने बैठे थे। बच गए। धर्म भ्रष्ट ना हुआ। उसने राहत की सांस ली। इस घटना के बाद से सायमा ने अपने कवि मित्र अरविंद से एक सम्मानजनक दूरी बना ली। पनपने से पहले एक अच्छी दोस्ती जाति व्यवस्था की भेंट चढ़ गई। सायमा प्रगतिशील होते हुए भी अपनी संकीर्ण मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाई है। उसने बचपन से अपने घर, समाज में जो देखा, जो उसे समझाया गया था, उसके दिमाग में वे छवियां और वे पूर्वा ग्रह बुरी तरह पैठ चुके हैं। सायमा जैसी हजारों लड़कियां मौजूदा दौर में प्रगतिशीलता और संकीर्ण मानसिकता के बीच जूझ रही हैं। ये उनके विचारों का संकट काल है।दिल्ली के जमुनापार इलाके में आरती ने नई सोसाइटी में घर खरीदा। वहां कामवाली की तलाश शुरू की। हर रोज कामवालियां आने लगीं। आरती पैसे के साथ साथ उसकी जाति जरूर पूछती थी। जिन जातियों का छुआ खाने में कोई हर्ज नहीं, इसका ज्ञान आरती को बचपन से है। कई दिन तक वह जाति के आधार पर कामवालियों को भगाती रही।
एक दिन कामवाली मिल ही गई। रीना नामक कामवाली ने अपनी कोई ठीक-ठाक जाति बताई और आरती के यहां सेट हो गई। आरती ने चैन की साथ ली।
कुछ दिन बाद दिल्ली के अंग्रेजी अखबार में एक खबर छपी- ‘कभी सीमा कभी सलमा।’ इसमें उन कामवालियों की दास्तान लिखी थी जो मजबूरी में जाति बदल-बदल कर घरों में काम कर रही थीं। आरती के होश उड़ गए। रीना को टाइट किया तो रहस्य खुल गए। वो कभी रीना थी तो कहीं रेहाना।
जबकि वह ‘रेहाना’ थी।
सायमा, आरती.. जैसी और भी हैं समाज में। ये फैशनपरस्त महिलाओं की वो जमात है जो पबो, क्लबो में जाती तो हैं, विवाहेत्तर संबंध बनाती तो हैं, मगर जाति के सवाल पर इनके विचारो में कोई आधुनिकता नहीं है। ऐसी महिलाओं पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव दो टूक कहते हैं, अपने तो स्वीकृत कराने के लिए महिलाएं सबसे ज्यादा पुरुष मूल्यो को आत्मसात करती हैं। जबकि मूलत स्त्री की कोई जाति नहीं होती, पुरुष की होती है। जाति की रक्षा स्त्रियां कस्टोडियन बन कर कर रही हैं। इनके खून में इतनी ज्यादा है जाति व्यवस्था कि कभी बदल नहीं पाएंगी खुद को। बहुत हद तक राजेंद्र यादव की बात सही लगती है।
मनोविज्ञान में एक स्थिति मानी गई है कि लंबी कैद के बाद कैदी अपने को कैद रखने वाले के साथ सहानुभूति रखने लगता है। जरुरत पडऩे पर वह अपने कैदी साथी के बजाए खुद को यातना देने वाले का साथ देता है और उसकी नजर से दुनिया को देखने लगता है। स्त्रियो के मामले में यही मानसिकता काम करती है। जाति व्यवस्था का शिकार होते हुए भी वे इसके प्रति सदय हैं। उसे पूरी कट्टरता के साथ पाल पोस रही हैं। यातनादायक जाति व्यवस्था के प्रति उनका नजरिया उस कैदी सरीखी हो जाता है।
राजेंद्र यादव की मान्यता का समर्थन करता हुआ नारीवादी चिंतक दीप्ता भोग का बयान एक बेबसाइट पर उपलब्ध है--पितृसत्ता केवल वैचारिक व्यवस्था भर नहीं है, यह ठोस भौतिक रुप और आधार रखती हैं। यह स्त्रियों के सामने परिस्थितियां बनाती है कि अगर स्त्रियां अमुक कार्य व्यवहार और भूमिकाएं करेंगी तो वे अच्छी, चरित्रवान. योग्य और देवी सदृश्य होंगी। सायमा, आरती सरीखी महिलाएं इसी जाल में फंसी हुई हैं। जाने अनजाने जाति के नाम पर समाज के ठेकेदारो की साजिश को पालने पोसने का औजार भी बन गई हैं साथ ही जातियों के बीच विभाजन सीमाएं बनाए रखने के लिए में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा रही हैं।
आखिर क्या वजह है कि पुरुष सत्ता की मारी महिलाएं उनके जाल से बाहर नहीं आ पा रही हैं? इसके पीछे असली वजह क्या है? इसका जवाब देते हैं धर्मशास्त्र पढाने वाले दलित लेखक अजय नावरिया। उनके अुनसार स्त्रियों का समाजीकरण समाज के कायदे कानून के हिसाब से ही होता है। हम उनसे यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे समाज के नियमों से बाहर जाएंगी। भारतीय समाज, जाति आधारित समाज है और स्त्रियां भी वैसी ही जातिवादी हैं, जैसा कि पुरुष होते हैं। कुछ मामलों में स्त्रियां अधिक जातिवादी हैं क्योंकि वे पुरुषों की तुलना में अधिक धार्मिकवृति की होती है। स्त्रियां जातिवाद का धार्मिक रूप से भी पालन करती है। जब कोई प्रथा या रिवाज, धार्मिक और सामाजिक प्रथा के रूप में वैधता प्राप्त कर लेता है, तब वह लगभग अकाटय हो जाता है।
यहां एक तर्क दिया जा सकता है कि जब स्त्रियो की कोई जाति नहीं होती तो वे क्यो इसे पाल पोस रही हैं। कई बार यह मानना मुश्किल हो जाता है कि स्त्रियों की कोई जाति नहीं होती। भारत में स्त्री भी एक धन या संपत्ति समझी जाती है। स्त्री धन को छिपाए रखने अर्थात पर्दे में रहने के अक्सर निर्देश दिए जाते हैं। अगर स्त्री की जाति नहीं है तो आए दिन होने वाली ऑनर किलिंग्स क्यों हो रही है? खाप पंचायतें क्यों इतनी शक्तिशाली हो गई हैं। कहीं ना कहीं उन्हें स्त्रियों का समर्थन हासिल है। पुरुषों के इस खेल में वे भी शामिल कर ली गई हैं। कहीं अच्छा बनने के लिए खेल का हिस्सा हो गई हैं तो कहीं जबरन शामिल कर ली गई हैं।
जाहिर है, सोच में बदलाव की जरुरत है। मगर आएगी कैसे? प्रमुख चिंतक गोविंदाचार्य अपने लेख में लिखते हैं, भारत में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए केवल लैंगिक असमानता को ध्यान में रखने से बात नहीं बनेगी। इसका जो सामाजिक आयाम है जिसे हम जाति कहते हैं, उसे भी समझना होगा। कई बार यह लिंग की तुलना में ज्यादा प्रभावकारी होती है।
दरअसल जाति व्यवस्था के सबसे नीचले पायदान पर स्त्रियां शूद्रो के साथ खड़ी हैं मगर वे इस सच को ना देख पा रही हैं ना समझ पा रही हैं। इन दोनो को काम पारंपरिक रुप से सेवा करना है। दोनों को समय समय पर अछूत बना दिया जाता है। क्योंकि मुंडन(कुछ प्रदेशों और जातियों में) और यज्ञोपवित जैसे संस्कारो से वंचित स्त्रियां द्वीज नहीं होतीं। जैसे दलितो के कान में वेद पढना वर्जित है वैसे ही स्त्रियो के कान में वेद नहीं पढते। ब्राहम्ण भोज के दौरान ब्राहम्ण स्त्रियां शामिल नहीं की जाती, वहां भी पुरुष ही जाते हैं। ये हालात अब भी नहीं बदले हैं, बस नई पीढी की लड़कियो की सोच में हल्का बदलाव दिखाई दे रहा है। मगर प्रतिशत कम है। जिन घरो में कामवालियां रखी जाती हैं, वहां घर के पुरुषो का दखल नहीं होता ना ही वे उनकी जाति के प्रति आग्रही होते हैं। जाति ही पूछो साधो की- की तर्ज पर यहां स्त्री ही स्त्री के विरुध्द तन कर खड़ी हो जाती है। उन्हें ये अहसास ही नहीं होता कि किस कदर पुरुषसत्ता ने उन्हें मानसिक विकलांगता की तरफ ढकेल दिया है। औरत होने के नाते एक तरफ पहाड़ जैसी मुश्किल लड़ाईयां हैं तो दूसरी तरफ मानसिक विकलांगता।
विचारक जॉन स्टुर्अट मिल ने कहा है, जब हम पृथ्वी की आधी आबादी के ऊपर अनचाही विकलांगता गढने के दोहरे दुष्प्रभावों को देखते हैं तो एक तरफ उनसे जीवन का सबसे सहज स्वभाविक और ऊंचे दर्जे का आनंद छिन जाता है और दूसरी तरफ उनके लिए उकताहट, निराशा और गहरी असंतुष्टि का पर्याय बन जाता है। .. ..पुरुषों के खोखले भय सिर्फ स्त्रियों को बंधनग्रस्त किए हुए है।

थोड़ा सा बादल, थोड़ा सा धुंआ

Posted By Geetashree On 8:31 AM 5 comments
गीताश्री
मेघालय की पहाडिय़ों पर कितना बादल है और कितना धुंआ....इसका अंदाजा अब लगाना मुश्किल है। ठंडी हवाओं में तंबाकू की गंध पैठ गई है।
जहां जाइए, वहां धुंआ उड़ाते, तंबाकू चबाते, खुलेआम तंबाकू बेचते खरीदते लोग..कानून की धज्जियां उड़ाते लोग-बाग। शिलांग की एक तंग गली में भीड़ ठुंसी हुई है। रोजमर्रा की चीजें खरीदने वालो की भीड़ और विक्रेताओं का बिक्री राग जोरो पर है। सब्जी वालो की लंबी कतार में आलू प्याज के साथ कुछ सूखी मछलियां रखी हैं और पास के टोकरे में तंबाकू के सूखे पत्ते। लोगबाग पत्ते ही खरीद रहे हैं। कुछ विक्रेता ऐसे भी हैं जो तंबाकू के चूर्ण बड़ी बड़ी टोकरियों में भर कर रखे हैं। औरते, बच्चे, मर्द अलग अलग क्वालिटी के तंबाकू-चूर्ण खरीद रहे हैं साथ ही सिरगेट बनाने वाला सफेद कागज भी। हाथ से सिगरेट बनाने वाला कागज अलग तरह का होता है जिसे तंबाकू के साथ ही बेचा जाता है। इस बिक्री पर कोई कानून नहीं लागू होता। सचित्र चेतावनी की यहां कोई जरुरत नहीं। केंद्र सरकार ने सचित्र चेतावनी छापने की अवधि बढा कर जहां तंबाकू कंपनियों को राहत दी है वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में खुलेआम तंबाकू बिना किसी पैक और चेतावनी के बिक रहे हैं।
तंबाकू बिक्री और इस्तेमाल के मामले में मेघालय में तो खुल्लमखुल्ला नियमों का उल्लघंन हो रहा है और राज्य सरकार इसकी अनदेखी कर रही है। वोलेंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया से जुड़े रोनाल्ड दोरजे तंबाकू की खुली बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध की हिमायत कर रहे हैं। वह चाहते हैं इस पर रोक लगे और इसे पैकेट में सचित्र चेतावनी के साथ बेचा जाए। इस पर रोकथाम के लिए वह डायरेक्ट्रेट ऑफ हेल्थ सर्विसेज के पास गए थे, पुलिस को पास गए, एक्साइज विभाग के पास गए। सबके सामने मुद्दा उठाया। तंबाकू की कुली बिक्री पर कानून में कोई रोक नहीं है। सूचना के अधिकार के तहत आवेदन भी किया। एक साल हो गए, इस पर कोई जवाब नहीं आया। रोनाल्ड कहते हैं, खुला बिकने वाले तंबाकू का कोई रिकार्ड नहीं रखा जा सकता। इसके विक्रेता टैक्स भी नहीं भर रहे। इसे कानून के दायरे में लाना चाहिए, तभी इसकी पैके जिंग होगी और सचित्र चेतावनी की योजना सफल हो पाएगी और सरकार को टैक्स भी मिलेगा।
शिलांग शहर में तो लोग खुलेआम, बेखौफ धुंआ उड़ाते हैं, किसी का चालान नहीं कटता। रोनाल्ड बताते हैं कि यहां कोई चालान सिस्टम नहीं है। पुलिस अधिकारी से पूछो तो बताते हैं कि अभी तक उन्हें ना चालान बुक मिले हैं ना कोई निर्देश। इसीलिए वे सार्वजनिक जगहो पर किसी को धुंआ उड़ाने से नहीं रोक सकते। रोनाल्ड निराश नहीं हैं। वह इस बात पर आमादा हैं कि जल्दी ही इसे मुद्दा बनाएंगे और सभी स्वंय सेवी संगठनों की मदद से राज्य सरकार पर दबाव बनवाएंगे। वह बताते हैं कि हम सभी महिला सगठनों, सामाजिक कार्यकत्र्ताओं और सरकार के नुमाइंदो को भी आमने सामने बिठा कर बात करेंगे और उन्हें ये घोषणा करने के लिए मजबूर कर देंगे कि अमुक तारीख से चालान सिस्टम लागू हो जाएगा। इससे शिलांग तंबाकू रहित हो ना हो, धुंआरहित तो हो ही जाएगा। रोनाल्ड इस सच को जानते हैं कि धुंआरहित कराने में भले उन्हें सफलता मिल जाए, तंबाकू रहित कभी नहीं हो पाएगा। फिर भी वह सरकार पर दबाव बनाना जारी रखेंगे। उनकी चिंता च्विंग टोबैको को लेकर ज्यादा है। स्कूली बच्चों से लेकर घरेलू औरते तक इस आदत का शिकार हैं।
तांबूल उनकी संस्कृति का हिस्सा है। लगभग 99 प्रतशित औरते, शहरी हो या ग्रामीण, तांबुल, कच्ची सुपारी चबाना उनकी आदत में शामिल है। धीरे धीरे उसमें तंबाकू के पत्ते शामिल हो जाते हैं। इसीलिए मेघालय में सबसे ज्यादा मुख कैंसर और आंत कैंसर के रोगी पाए जाते हैं। शिलांग में एंटी टोबैको लॉबी ने जागरुकता जगा कर कुछ काम जरुर किया है जिसके निशान शहर में इधर उधर दिखाई दे जाते हैं। चौराहो पर, सरकारी इमारतो पर तंबाकू के खतरे वाले पोस्टर लगे हुए दिख जाते हैं। सरकारी बाबुओ ने अपने दफ्तर में नो स्मोकिंग जोन लिख कर टांग दिया है। इनके प्रयासो से ईस्ट खासी हिल्स में टोबैको कंट्रोल सेल बन गया है भले ही वह निष्क्रिय है।

कई बार प्रतिबंध भी आजादी देता है...

Posted By Geetashree On 4:35 AM 5 comments
गीताश्री
मैं पिछले साल सीरिया की यात्रा पर गई थी। 10 दिन वहां रही और वहां के समाज को करीब से देखा समझा. खासतौर से औरतो को। ब्लाग के पुराने पोस्ट देखे तो वहां के समाज पर मैंने कई पोस्ट लिखे मिल जाएंगे। आज फिर से मन हुआ कि वहां के बारे में लिखे। बीच बीच में सीरिया मुझे लिखने को उकसाता रहता है।
पिछले कुछ दिनों से बुर्का प्रकरण खबरो में छाया हुआ है। हमने भी लिखा था, ब्लाग और अखबारो में. फ्रांस के कारण यह मुद्दा बना हुआ था। फ्रांस ने अपने देश में बुर्का पहनने पर रोक लगाई और इसके लिए जुर्माना का प्रावधान भी रखा। इसके साहसिक फैसले के बाद इस्लामिक देशो में रिएक्शन जरुर हुए होंगे। सुखद खबर ये कि सीरिया ने अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखने के लिए विश्व विधालयो में बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया। एक तरफ यूरोप में एसे कदमो पर मुस्लिमों के खिलाफ भेदभाव करने के आरोप लग रहे हैं, वहीं सीरिया के शिक्षा मंत्रालय ने नकाब पर प्रतिबंध लगा दिया। ये प्रतिबंध सरकारी और निजी विश्वविधालयो में लगाए गए हैं। इसका सीधा सीधा मकसद अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को बरकरार रखना है। हालांकि इसमें सिर पर बांधे जाने वाले स्कार्फ शामिल नहीं है। जिसे वहां की ज्यादातर महिलाएं बांधती हैं। हमने देखा है कि वहां पर बुर्का का चलन पहले से ही कम है। परदा के नाम पर ज्यादतर महिलाएं स्कार्फ बांधती हैं। कुछ समुदायो में बुर्का का चलन दिखा था। लेकिन जब हम कई शिक्षा संस्थानों में गए तो वहां स्कार्फ पहनी लड़कियां नजर आईं, बुर्का पहने शायद ही दिखी हों। बाजार में जरुर एकाध बुजुर्ग महिलाएं दिखी थीं। इस फैसले से कठमुल्लों के पेशानी पर बल जरुर पड़ गए होंगे। लेकिन सीरिया ने कभी खुद को इस्लामिक देश नहीं माना है। अत्यंत आधुनिक देश के तौर पर उभरने वाला यद देश बेहद अन्य इस्लामिक देशो के लिए एक उदाहरण बन सकता है। पोस्ट से साथ जो फोटो है, ये एक शिक्षा संस्थान का ही है। यहां के माहौल को देख कर कुछ कुछ दिल्ली विश्वविधालय की मस्ती याद आ गई। थोड़ा फन..थोडी पढाई। यहां तक कि स्कार्फ भी गायब थे लड़कियो के सिर से।
अब जिन घरो में लड़कियो को नकाब पहनने को मजबूर किया जाता होगा, वे अब मुक्त हुईं। कमसेकम शिक्षा प्रांगण में इस बंदिश से आजाद होंगी। जिन्हें पढना है उन्हें इस प्रतिबंध को मानना ही होगा।
मुझे लगता है कि इस्लामिक देशो में धीरे धीरे ही सुधारवादी फैसले लिए जाएंगे। काले चोगे से औरतो की रिहाई का वक्त आ गया है। कुछ हिम्मत औरतो को भी जुटानी होगी। प्रशासन बहरा हो तो चोट इतनी जोर से करनी चाहिए कि कान के परदे झनझना जाएं।
सीरिया ने मन खुश कर दिया। वाह सीरिया।
इस खबर के साथ एक और खबर आई कि एक ब्रिटिश मंत्री ने मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने के अधिकारो का बचाव करते हुए तर्क दिया है कि बुर्का पहनने की स्वतंत्रता से महिलाएं सशक्त होती हैं। यह बयान एसे समय में आया है जब पूरे यूरोप में महिलाओं के सावर्जनिक जगहो पर बुर्का पहनने पर बहस छिड़ी है...। मंत्री का तर्क है कि प्रतिबंध ब्रिटिश संस्कृति के खिलाफ होगा और सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान की परंपरा वाले समाज के विपरीत होगा।
मंत्री महोदय के इस मासूम तर्क पर क्या कहें। इतना वाहियात तर्क हमने आज तक नहीं सुना। क्या पारस्परिक सम्मान के नाम पर हम बबर्रता की इजाजत दे सकते हैं। कैद में रखने वाले रिवाज को कायम कैसे रहने दे सकते हैं। ये महज राजनीतिक बयान है..शिगूफा है खुद को एक खास समुदाय में लोकप्रिय़ बनाने का। इससे किसी का भला नहीं होने वाला। बेहतर हो वे अपना ध्यान किसी और दिशा में लगाए।मुक्ति के रास्ते में रोड़े ना अटकाएं।

दे टुक मी एंड टोल्ड मी नथिंग

Posted By Geetashree On 2:17 AM 5 comments
इराकी महिलाओ की सुन्नाह प्रथा पर एक सनसनीखेज रिपोर्ट

सचिन यादव

मानव जाति ने भले ही चांद से लेकर मंगल तक पांव पसार दिए हो पर मानसिकता अभी भी जमीन चांट रही है। मामला मध्य एशिया के एक देश इराक के कुर्दिश्तान प्रांत का है जहां इंसानियत का सरेआम बलात्कार हो रहा है। कुर्दिश्तान में ह्यूमन राइट वाच (एच आर डब्ल्यू) नामक मानवाधिकार संस्था की रिपोर्ट उजागर करती है कि स्थानीय सरकार की नाकामी के कारण यहां की सुन्नाह प्रथा का अंत नही हो पा रहा है।

सुन्नाह प्रथा का मतलब छोटी – छोटी लड़कियो के जननांग काटने से है।

मानवता को शर्मशार कर देने वाली इस फीमेल जेनेटाइल म्यूटीलेशन (सुन्नाह) प्रथा की शिकार बहुत सी इराकी कुर्दिश लड़किया और महिलाए हैं। दे टुक मी एण्ड टोल्ड मी नथिंग- फीमेल जेनेटाइल म्यूटीलेशन इन इराकी कुर्दिश्तान नामक 73 पन्नो की रिपोर्ट उन लड़कियो और महिलाओ के अनुभवो पर आधारित है जो इसकी शिकार है और जो अब कुछ धर्मगुरू एवं स्वास्थ्य कर्मियो के साथ मिलकर इस कुप्रथा के खिलाफ मुहिम चला रही है। रिपोर्ट बताती है उस खौफ को जो लड़कियो और महिलाओ के जननांगो के काटे जाने के पहले और वो असर जो बरसो बाद तक इनकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर पड़ता रहता है। मात्र ये सुनकर कि इन बेगुनाहो को बिना बताए कुछ दाई स्वरूप औरते इनके जननांगो के बाहरी हिस्से को ब्लेड से काट देती हैं, पूरे शरीर में एक सनसनाहट हो जाती है। 17 साल की गोला कहती है कि मुझे याद है कि मेरी मां और मामी हम दो लड़कियो को लेकर कहीं गई। वहां पर चार और लड़किया थी। वे मुझे बाथरुम में लेकर गए और मेरे पैरो को फैलाकर कुछ काट दिया। वे सबको एक एक करके ले गए और एक ही ब्लेड से सबका सुन्नाह कर दिया। मैं डरी हुई थी और बहुत दर्द हो रहा था। जब भी मेरा मासिक रजोधर्म होता है मुझे उस हिस्से मे बहुत तकलीफ होती है।

फीमेल जेनेटाइल म्यूटीलेशन (एफजीएम) शब्द 70 के दशक में चर्चा में आया। वर्ष 1990 में अद्दाबी अबाबा में हुई ‘‘इंटर अफ्रीकन कमेटी ऑन ट्रेडिशनल प्रेक्टिस अफेक्टिंग द हेल्थ ऑफ वूमेन एण्ड चिल्ड्रन’’ के कांफ्रेस में इस शब्द को अपना लिया। लेकिन इसका अस्तित्व के प्रमाण मिस्त्र की पुरातन सभ्यता में मिले हैं। हालांकि आज मिस्त्र में इसको ख़त्म करने के लिए कानून भी बनाया गया है। इस कुप्रथा के मूल में इसाई और इस्लाम धर्म की गलत व्याख्या है। मिस्त्र में इसाई समुदाय के धर्मगुरू का कहना है कि पवित्र बाइबल में इस प्रथा का अस्तित्व ही नही है। यूनिसेफ के कथनानुसार मिस्त्र की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था ‘’अल-अजहर सुप्रीम काउंसिल ऑफ इस्लामिक रिसर्च’’ ने एक बयान जारी किया था कि शरियत में इस प्रथा का कोई आधार नही है।

बात अगर पूरे वैश्विक परिदृश्य की करे तो विश्व के अधिकांश देश इस प्रथा की चपेट में हैं। एम्नेस्टी इंटरनेश्नल के आंकड़ो को माने तो पूरे विश्व में 13 करोड़ महिलाए और लड़किया इससे पीड़ित हैं और हर साल 30 लाख लड़किया पर ये ज़ुल्म ढ़ाया जाता है। सबसे ज्यादा इस घ्रणित प्रथा को अफ्रीका के 28 अलग-अलग देशो में किया जाता है। पश्चिमी अफ्रीका के सेनेगल से पूर्वी तट तक और मिस्त्र से लेकर तंजानिया तक की महिलांए और लड़कियां इसकी शिकार हैं।

अफ्रीका के बारकीनो फासो में 71.6%, सेन्ट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक में 43.4%, डिजीबुआती में 90 –98%, मिस्त्र में 78-97%, इरिट्रिया में 90%, इथियोपिया में 69.7-94.5%, घाना में 9-15%, गुनिया में 98.6%, नाइजीरिया में 25.1%, सिनेगल में 5-20%, सुड़ान में 91%, तंजानिया में 17.6%, टोगो में 12%, युगांडा में 5% से कम एफजीएम से पीड़ित हैं।

ये वे देश हैं जो इस कुप्रथा के शिकार है और ये सभी इस प्रथा के खिलाफ कानून बनाकर लड़ रहें हैं इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, इटली, नीदरलैण्ड, न्यूजीलैण्ड, स्वीडन, युनाइटेड किंगडम और युनाइटेड स्टेट्स जैसे देशो ने अपने नागरिको के हित के लिए एफजीएम विरोधी कानून बना कर उसको सख्ती से लागू करवा रहें हैं। संयुक्त राष्ट्र ने तो 6 फरवरी को इंटरनेशनल डे ऑफ जीरो टॉलरेंस टु फीमेल जेनेटाइल म्यूटीलेशन घोषित कर दिया है। लेकिन एशियाई देशो में इराक के कुर्दिश्तान प्रान्त में एफजीएम से 72.7 फीसदी महिलाओ और लड़कियों के पीड़ित होने के बावजूद इराकी इस कुप्रथा को अपना नसीब मानकर बैठ गए है।

सन् 2008 में स्थानीय इराकी सरकार ने इस प्रथा को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए थे, पुलिस ने भी सुन्नाह करने वालो के ख़िलाफ सख़्त कार्रवाई की थी। कुर्दिश्तान नेशनल असेंबली के बहुसंख्यक सदस्यो ने भी सुन्नाह पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक का समर्थन किया लेकिन इच्छाशक्ति में कमी के चलते यह बिल ठंडे बस्ते में चला गया। वर्ष 2009 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्थानीय एनजीओ के साथ मिलकर फिर से सुन्नाह के खिलाफ एक सुनियोजित मुहिम चलाई लेकिन इस बार भी नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात रहा, मंत्रालय ने अपने कदम खी़च लिए और मुहिम किसी मुकाम तक पहुंचने से पहले ही खत्म हो गई।

एचआरडब्ल्यू के रिसर्चर्स ने मई और जून 2009 में कुल 31 लड़कियो और महिलाओ (जो कि उत्तरी इराक के हलबजा कस्बे के चार में रहती हैं) का इंटरव्यू किया। नादिया खलीफी जो कि मध्य एशिया में महिला अधिकारो की लड़ाई लड़ रहीं हैं कहती हैं कि इराकी कुर्दिश्तान में महिलाओ और लड़कियो की अच्छी खासी तादाद इस विनाशकारी प्रथा की शिकार है। एच आर डब्ल्यू की रिपोर्ट के मुताबिक स्थानीय सरकार इस ख़तरनाक और समाज को कमजोर करने वाली इस प्रथा को ख़त्म करने में ठोस कदम उठाने में नाकाम रही है। इसके अलावा रिपोर्ट कहती है कि एफ जी एच प्रथा महिलाओ और बच्चो के मौलिक अधिकारो का हनन करने के साथ ही साथ उनके जीवन को भी चुनौती दे रहा है। ऐसे में लाज़िमी है कि कुर्दिश्तान में इस घिनौनी प्रथा को रोकने के स्थानीय सरकार को एक सुनियोजित तरीके से कठोर कानून लागू करना चाहिए।

(सचिन, बिजनेस भास्कर, दिल्ली में पत्रकार हैं।)