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समीक्षा
            सीमित आकाश के बाहर अनंत उड़ान की कहानियां
                                                                  प्रताप दीक्षित
    


वर्तमान समय विपरीत भंगिमाओं का समय है. इस परिदृश्य में स्त्री की नियति कुछ ज्यादा ही त्रासद हुई. बदलते समय के साथ स्त्री कि दुनिया क्या वास्तव में बदली है? दार्शनिक-चिन्तक विटेंगेस्टीन के अनुसार (पैराडोक्स ऑफ ट्रुथ) यह सत्य का एक पक्ष है. स्त्री के संसार का द्वार उस अंतहीन जंगल में खुलता है जिसमें कितनी ऊबड़-खाबड़ संकरी पगडंडियाँ, खंदक, कांटेदार पेड़ और खाइयां हैं कि उसकी कोई मुक्कमिल तस्वीर नहीं बनती. पुराने अंधेरों से निकल कर वह चकाचौंध भरे अंधेरों में गुम हो गई है. उसके अस्तित्व का मापदंड एक मनुष्य की भांति उसकी मानसिक-बौद्धिक क्षमताओं के बजाय दैहिकता के आधार पर आज भी किया जाता है. आयातित स्त्री विमर्श की विडम्बना यह है प्रतिरोध स्वरुप स्त्री होने की अस्मिता से ही वह पलायन कर रही है. पुरुष के साथ सह-अस्तित्व के विपरीत सम्पूर्ण पुरुष समाज को शत्रु-शोषक के कटघरे में खड़ा कर दिया.
     इस परिप्रेक्ष्य में ‘स्वप्न, साजिश और स्त्री’ की कहानियां पल-प्रतिपल बदलती दुनिया में स्त्री के बहाने इतिहास, समाज, समय, मनोविज्ञान, परिवार के साथ समय और समाज को पर्त-दरपर्त खंगालती हैं. स्त्री विमर्श को दैहिक मुक्ति-दयनीयता तक सीमित करने की कोशिशों को नकारते हुए सामजिक मूल्य संरचनाओं को रचनात्मक अनुभवों में बदलती हैं. स्त्री के उस रूप की तलाश, जो बार-बार धुंधलके के आवरण में ओझल हो जाता है. यह कहानियां स्त्री के प्रचिलित, दैहिक-भावनात्मक विमर्श के बरक्स बदली हुई स्त्री के सपनों, अकेलेपन, अनंत आकाश के विस्तृत आयामों, आकांक्षाओं, त्रासदियों, विस्थापन के सतह के यथार्थ से परे, नए यथार्थ का सृजन करती हैं. गीता श्री स्त्री के अंदर की दुनिया की अनेक अनजान तहों का उत्खनन करती हैं.
       ‘डायरी, आकाश और चिडियाँ’, ‘कहाँ तक भागोगी’, ‘लकीरें’ स्त्री के अकेलेपन, सपनों, विद्रोह और स्वयं की तलाश की कहानियां हैं. किस्सागोई के प्रचिलित मिथक को तोड़ती ‘डायरी, आकाश और चिडियाँ’ की रोली आज के तथाकथित आधुनिक समाज में अकेली नहीं है जिसने अपने सपनो के सृजित काल्पनिक संसार में अपने को बंद कर लिया है. असीम आकांक्षाओं के बीच अकेलेपन की निपट यातना और उनसे निजात पाने के लिए उसके पास विकल्प भी नहीं. एक लड़की के अंदर छिपी दूसरी नितांत अपरिचित लड़की को जानना-पहचानना कितना कठिन होता है. सपने अँधेरे में देखे जाते हैं. सपनों और अंधरों में निरंतर द्वंद्व चलता रहता है यह. सफलता की होड़, पिता-माँ के संबंधों में दरार बच्चों को अकेलपन के अंधेरों में घिरने को विवश कर देते हैं. स्त्री में परकाया प्रवेश की शक्ति होती है. रागिनी (रोली की मौसी) रोली की व्यथा समझती है. आधुनिक जीवन शैली की विडंबना और विरोधाभास है कि माँ को रोली के मिल जाने    की खुशी उतनी नहीं है जितनी चिंता, ‘आखिर लड़की रात को कहाँ रह कर आई? कुछ किया तो नहीं?’   कहानी अकेले रोली की नहीं, अकेली पद गई पूरी पीढ़ी की है.
     एक स्त्री के लिए बाहरी बंदिशों से ज्यादा कठिन उसके अपने बनाये खुद के बंधन भी होते हैं.  धार्मिक आचार संहिताएं भी इन में एक है जिसके कारण वह दोहरी जिंदगी जीती रहती है. इनकी आड़ वह सब कुछ करना चाहती है जो ‘ऐसी’ लड़कियां करती हैं. मजहब से ज्यादा कठिन अपने से भागना होता है. ‘कहाँ तक भागोगी’ बताती है कि अपनी पहचान किसी नैतिक संहिता की मोहताज नहीं होती. ‘लकीरें’ का सत्य है कि स्त्री चाहे गाँव की हो जिसका बेटा चोर है या महानगर की कोठी की जिसके आंसू सूख चुके हैं- स्थिति एक सी होती है – सूख चुकी नदी की भांति. कही स्त्री ही नहीं समूची मानवीय बुनियाद की तलाश करती है.
     प्रेम, समर्पण और छलना की कहानियां हैं – ‘रिटर्न गिफ्ट’, ‘बदन देवी की मेहंदी का मनडोला’ और ‘ड्रीम्स अनलिमिटेड’. ‘रिटर्न गिफ्ट’ कच्ची उम्र के अनकहे प्रेम की कोमल-अप्रतिम गाथा है जिसमें कोई प्रतीक्षा नहीं. कहानी  केवल नीतू-नरेंद्र के वियोग की नहीं, दोनों के बीच आभाव, समाज, वर्ग के कारण आयी दूरी बिना कुछ कहे व्यक्त कर देती है. कहानी क्षण को समय-खंड से अलग कर देती है. उनका मिलना भी तो क्षण में ही सिमटा हुआ था जो देश-काल का हिस्सा नहीं होता. शायद स्त्री की नियति हमेशा ‘वन फॉर सारो’ की ही होती है. स्त्री को देह मात्र समझने की प्रवृत्ति से अलग स्त्री के समर्पित प्रेम के अनाम रिश्ते, आजादी-आत्मनिर्णय और उसकी असीम जिजीविषा कि कहानी है ‘बदन देवी की मेंहदी का मनडोला’. एक स्त्री में ही विकास-सुविधा विहीन स्थिति में भी जीने का जज्बा होता है. यह स्त्री ही है जिसकी चाहत में अधिकार नही होता. इस पेम को समझना आसान नहीं होता – ‘हिसाब-किताब रखने वाले रिश्ते नहीं समझते तो किसी की पीड़ा क्या समझेंगे?’ प्रेम में पवित्रता-नैतिकता ऐसा कुछ नहीं होता. इसी की काव्यात्मक अभिव्यक्ति हैं कहानी के अंश- ‘इनके बीच था एक अनाम रिश्ते का सुकूनदेह उजाला. नदी पर समुद्र का ज्वार था जो पूर्णिमा के चाँद को निर्वसन देख उफान पर था. लहरों ने चाँद पर फेनिल दुपट्टा फैला दिया था. इसमें न सती का सतीत्व भंग हुआ था और न तपस्वी का तप.’
     सपने हमेशा आयामहीन होते हैं. स्त्रियों की दुनिया में इन्हें और विस्तार मिला है. परन्तु वर्तमान बाजार ने प्रेम, संवेदना और सपनों को स्वार्थ सिद्धि के लिए पुल या जिंस में बदल दिया है. कहानी में दो स्त्रियां प्रेम में छली जाती हैं. हर स्त्री के अंदर एक नदी होती है. लेकिन इन स्त्रियों के अंदर की नदियों का संगम तब होता है जब उन्हें एक ही व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त किये जाने का भास होता है. मीडिया की चकाचौंध के पीछे अँधेरे की दुनिया में राइमा और सोनिया (ड्रीम्स अनलिमिटेड) का दुःख इन्हें एक डोर में बंधता है.
     माँ और बेटी का रिश्ता सबसे निकट का, एक अदृश्य प्राकृतिक डोर से बंधा हुआ, होता है. भले ही ऊपर से कितना द्वंद्व दिखाई दे, एक-दूसरे के दर्द, देह या देह से परे अतृप्त इच्छाओं को माँ ही  समझ सकती है और उसे करने के लिए बिना किसी नैतिक हिचक के किसी सीमा तक तत्पर रहती है. ‘उजड़े दायर’ में बेटी को माँ की सलाह –‘अपनी खुशियों का पता खुद ही ढूढना पड़ता है.’ इसी तरह ‘माई रे मैं तो टोना करिहों’ में माँ सिल्बी को मानसिक रूप से बीमार बेटी की चिंता है – ‘अब तो इसके लिए भी तैयार हूँ कि कोई पैसे लेकर भी इसके साथ कुछ कर ले, शायद ठीक हो जाए.’ देह की अनिवार्यता और उसके विकल्प और उसके हिस्से के सुख की तलाश की कहानियां हैं.
     ऊब, एकरसता और अकेलापन. इससे निजात पाने के लिए रिश्तों के गहराने के बजाय छीजते संबंधों के साथ संवादहीनता बढती गई. इस दूरी को पाटने के लिए बढ़ते  संचार साधनों के बीच खुशी ढूढने की कोशिश में हमने दूसरों को ही नहीं अपने को भी छलने के लिए अभिशप्त होते गए.  बाजार ने मुनाफे के लिए मोबाइल पर मीठी-आकर्षक-सेक्सी बातों के लिए आवाजें और सुनने वाले दोनों खरीद लिए हैं.  ‘आवाजों के पीछे’ इसी मृगतृष्णा के मायाजाल में पति-पत्नी दोनों धस चुके हैं. बरसों की घुटन के बाद रोशन अंधेरों गुम हो जाने के लिए अभिशप्त. गनीमत इतनी है कि मटमैले, जलकुम्भी के पत्तों से ढंके पानी में ‘सबसे बचा हुआ पानी चमक रहा था.’ इस व्यस्वस्था की दुरभिसंधि ने बौद्धिक जगत को भी जकड़ रखा है. ‘मेकिंग ऑफ बबीता सोलंकी’ सांस्कृतिक-बौद्धिक जगत में प्रायोजित तरीके से, विशेष रूप से स्त्री को प्रमोट करने छद्म का पर्दाफास करती है. परन्तु इस  ‘प्राप्य’ के पीछे धड़ विहीन कितने चेहरों की विडंबनाएं छिपी हैं.
     सपनों पर किसी का एकाधिकार नहीं होता. अभावग्रस बच्ची, घरेलू नौकर, सुरताली जैसी लड़कियों की आँखों में पलते सपने कुछ ज्यादा ही रंगीन होते हैं. घर में मालकिन की बेटी सुहानी को पहले तो सुरताली को अपने घुँघरू पहन नाचते देख गुस्सा आता है. परन्तु यह बालमन, जो वर्गभेद नहीं मानता, अगले दिन सुहानी थाप दे रही है और सुरताली बेसुध नाच. वर्गांतर की चेतना के साथ यह कहानी बाल नही स्त्री मनोविज्ञान की कहानी है. वह स्त्री जो दूसरी स्त्री की पीड़ा, सपनों, सुख-दुःख को समझती है.
     ‘भूत-खेली’ बदलते समय-समाज में गाँव और वहां के लोग भी दूसरे ध्रुव के बासिंदे हो चुके हैं. एक ओर दुलारे बाबू द्वारा भाई के हिस्से की सम्पति न देने के लिए स्वार्थ, तिकड़में, अन्धविश्वास दूसरी तरफ रिश्तों की बची स्मृतियों के संजोये रखने की कहानी है.
     गीता श्री की कहानियों में त्रासद दुष्चक्र में घिरने की नियति के  बजाय स्त्री के रूपांतर, विकल्प और दिशा-बोध दिखाई देता है. वैक्तिक अनुभूतियों को व्यापक मानवीय सरोकारों से जोडती हैं. एक निश्चित विषय, निश्चित शिल्प और निश्चित निष्कर्ष पर आधारित कहानियों से विपरीत प्रचिलित मिथक को तोडती हैं.   

                                                    प्रताप दीक्षित
                                                    एम डी एच 2/33, सेक्टर एच,
                                                    जानकीपुरम
                                                    लखनऊ 226 021
                                                                                                        M   9956 398 603
                                                                                                  dixitpratapnarain@gmail.com
    
    
   
    



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समीक्षा

प्रार्थना के बाहर एवं अन्य कहानियां
(वाणी प्रकाशन)
---कलावंती




यह नैतिकताओं का संक्रांतिकाल है । गीताश्री की कहानी की नायिकाएँ इस बात को बखूबी सिद्ध करती हैं। वे तेज हैं, समझदार हैं ,पढ़ी लिखी हैं और बेहद संवेदनशील भी हैं। उनकी बोल्डनेस में भी एक मासूमियत है। वे बस उतनी ही शातिर हैं, जितने में अपनी मासूमियत की रक्षा कर सकें। वे बोल्ड हैं पर क्रूर नहीं हैं। सबसे बड़ी बात कि वे अपनी भावनाओं के प्रति ईमानदार हैं और बहुत साफ ढंग से सोचती हैं। गीताश्री ने अपनी भूमिका में ही लिखा है "जो रचेगा, वही बचेगा। एक और जहां है उसी जहां की तलाश में मेरी आग चटक रही है। देर हो चुकी है ।जहां ढेर सारे मठ- महंत पहले से पालथी मारे बैठे हैं। वहाँ मैं अब बहुत देर से प्रवेश कर रही हूँ। इस रचनातमक यात्रा में क्या कभी देर हो सकती है।जब उठ चलो तब ही यात्रा शुरू हो गई ।"
वे लिखती हैं "मूल्यों के बीच पिसती हुई स्त्रियाँ खुद कहानी बनती जा रही हैं।मुक्ति के लिए छटपटाती हुई स्त्रियॉं का विलाप शायद मुझे ज्यादा साफ सुनाई देता है। वर्जनाओं के प्रति उनके नफरत का अहसास मुझे ज्यादा होता है।" गीताश्री ने स्त्री विमर्श के नाम पर सिर्फ स्त्रियॉं के गुण गायें हैं ऐसा नहीं हैं। उनकी कहानियों में कमजोर और मजबूत दोनों ही तरह के पुरुष और स्त्री  पात्र मिलते हैं जो आपकी चेतना पर बहुत सारे सवाल छोड़ जाते हैं।
"प्रार्थना के बाहर" संग्रह की पहली कहानी है। "बुरी लड़की को सब मिल गया , अच्छी ऐसे ही रह गई।" रचना को लगा जिंदगी उसके हाथ से फिसल गई है। यह अकेले रचना की छटपटाहट नहीं है ।बहुत सी रचनाएँ हैं पूरे हिंदुस्तान में। पर सोचिए संपन्नता के कितने भी ऊंचे पायदान पर पहुंचा आदमी देर सबेर खुद से मुखातिब होता ही है। बहुत आज़ाद समझे जाने वाले देशों में भी औरतें सुरक्षित नहीं  और औरतें सुरक्षित नहीं तो आपके बच्चे भी सुरक्षित  नहीं। क्या पुरुषों के बराबर बैठकर शराब पी लेने की आज़ादी ही स्त्री की वास्तविक आज़ादी है। गर्भपात अब वैधानिक है तो क्या मूँगफली खाने सा सुलभ हो। जीवन रचने की जो दुर्लभता स्त्री को मिली है वह पुरुष के पास कहाँ । इसलिए स्त्री के लिए शरीर मात्र आनंद की वस्तु हो भी नहीं सकती। प्रकृति ने माँ को बच्चे का सर्वाधिकार दिया है। बहुत झमेलों में उलझी जिंदगी में भी रचना ने चिड़िया सा मन बचाए रखा , क्या यह उसकी उपलब्धि नहीं ? किसी समारोह में पुरस्कार देते प्रार्थना ने क्या उस अजनमें बच्चे को नहीं याद किया होगा । किसी प्रकार का कोई अपराधबोध नहीं होना क्या रचना की उपलब्धि नहीं? आप जिन संस्कारों को छोडते हैं उसके बाद आप कितनी ग्लानि महसूस करते हैं या गौरान्वित होते हैं यह आप पर है।
एक अन्य  कहानी है – गोरिल्ला प्यार । अर्पिता, विशवास करती है और विशवास चाहती है । पर इंद्रजीत पुरुष है। उसे कमाने वाली , आत्मनिर्भर और बौद्धिक लड़की से प्रेम करने का शौक तो है पर बाहर जाती स्त्री के पल पल कि खबर भी उसे चाहिए। इधर अर्पिता बेहद स्वाभिमानी स्वावलंबी लड़की है। "अनुभूति को भी क्या कभी गिना जाता है ।क्या अश्रु और स्वेद की गणना मुमकिन है।" अर्पिता का कहना है कि "जिंदगी हमें  एक ही बार मिलती है। हम उसे दूसरों के हिसाब से जीने में खर्च कर देते हैं।... मेरे इस जीने के तरीके में स्पसटता रहेगी। " परंतु सहेली कि बात ही सच निकली "सोच लेना अर्पिता ... हर रिश्ता कुछ वक़्त के बाद एकनिषठता कि मांग करने लगता है।" अर्पिता का दिल यहाँ टूटा कि "नेह में पगी हुई देह वार दी ।वह बता नहीं पायी इंद्र को, कि कैसे उसने बॉस के प्रेम प्रस्ताव को खारिज करके हमेशा के लिए दफ्तर में अपने लिए एक शक्तिशाली दुश्मन पैदा कर लिया।" उसके बाद ऐसा सलूक। अर्पिता इंद्रजीत से आहत अपमानित होकर फेस्बूक पर मित्र तलाशती है। उसे लोगों का व्यवहार देखकर निराशा होती है ।"मछ्ली कि तरह फंसनेवाली औरत चाहिए …. शेरदिल औरत नहीं....."। इसी इमोशनल ट्रोमा में उस रात वह आकाश से गोरिल्ला प्यार कर बैठती है। सुबह जब इंद्रजीत का फोन आता है तब वह कहती है-" इट इज टू लेट इन्द्र।" अर्पिता क्या सिर्फ देह की प्यास में आकाश तक पहुँच गई या अपने को पूरी तरह टूटने से बचाने के लिए। पुरुष समाज को यह सोचना होगा।
"दो पन्ने वाली औरत" कैरिएर बनाने की होड में लगी औरतों की आपसी प्रतिस्पर्धा की कहानी है। आसावरी और रंजना दोनों अपने अपने तरीकों से संपादक को प्रभावित करने की चेष्टा में है। जब योग्यता देह है तो हर लड़की थोड़े दिन बाद अयोग्य हो जाएगी। सत्ता जिसके पास होगी ऐसी लड़कियां भी उसके पास होंगी ।क्या थोड़ी बड़ी गाड़ी, ज्यादा बड़ा मकान यही उपलब्धि है जीवन की । अपनी नज़रों में न गिरनेवाला कोई काम न करना क्या कोई उपलब्धि नहीं? आसावरी अपनी बौद्धिकता को, ज्ञान को मांजेगी। ऊपर उठेगी, यह आत्मविसवास उसमें क्यों नहीं दिखता ? बल्कि कभी रंजनाओं की कहानी भी लेखिका को  लिखनी चाहिए  कि वे बहुत सारे सम्बन्धों और समझौतों से गुजरने के बाद मिली उपलब्धियों के साथ अपने जीवन में कितनी मजबूत और संतुष्ट हैं? "मेरी प्रतिभा को रोज रोज परीक्षाओं से गुजरना होगा?" हर उस लड़की का द्वंद है जो खुद को बचाए भी रखना चाहती है। मूल्यों का महत्व है उसके लिए।
अपने परिवार से मिले संस्कारों से मिले को ना छोड़ पाने वाली लड़कियों की यह सोच बहुत स्वभाविक है।पर उन्हें यह भी समझना होगा की आखिर कितने समझौते करेंगें आप । सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। यदि इतने ओछे समझौते कर ही धन कमाना है तो फिर इतनी पढ़ाई लिखाई क्यों? शुरू  में समझौते कर आगे बढ़नेवाली लड़कियां थोड़े दिन बाद बाज़ार से बाहर हो जाती हैं। ज्ञान और मस्तिस्क को लगातार अपडेट करती स्त्रियाँ ही इस गलाकट प्रतियोगिता में स्वयं को टिकाये रख सकेंगी।
"दो लफ्जों कि एक कहानी" एक बेहद सुंदर प्रेम कहानी है। पूरी कहानी एक सुंदर सी लयबद्ध  कविता है। डेविड का स्वयं का चरित्र एक मजबूत पुरुष चरित्र है। वान्या और पैरीन दोनों ही उसे बहुत प्यार करती हैं। प्रेम क्या सिर्फ सुख भरे पलों को जीने का नाम है ? या उसकी अपनी कोई प्रतिबद्धता भी है। दुख भरे पलों को साथ जीना भी तो प्रेम है। जो आपसे प्रेम करेगा वह आपको किसी तकलीफ में कैसे छोडकर जा सकता है। पैरीं का यह कहना कि उसे जिंदा रखना मेरी पहली प्राथमिकता है। उसके चरित्र की उदादत्ता को दिखाता है।
"अंधेरे में किसी दोस्त के साथ चलना, रोशनी में अकेले चलने से कहीं बेहतर है।"  वह इस यात्रा में वान्या का भी साथ चाहती है भले ही वह साथ मानसिक साहचर्य या संबल कि तरह ही क्यों ना हो।  
"रुकी हुई पृथ्वी" एक साधन सम्पन्न रचनात्मक स्त्री के दिनचर्या से ऊब की कहानी है।"कई बार लगता है कि कामनाएँ भी बेताल कि तरह डाल पर लटक गई हैं।" उसके जीवन में शांतनु हवा के एक ताज़े झोंके की तरह है। उसकी बात सुनने और समझने वाला। घर में पति है पर उसे नेहा की बात सुनने का धीरज नहीं। " वह क्यों नहीं सोचता कि उसे कोई साथी चाहिए जो उससे खूब बातें करें ...प्रोत्साहित करे ... हौसला बँधाये ... उसकी उपलब्धियों पर उसके इतना ही खुश हो ....।" वह अपनी भावनाएं बताती है पर शांतनु डर गया ... एक प्रेम से भरी हुई स्त्री के आवेग से ....।पर अंतत नेहा फैसला करती है कि वह जीवन को बहुत कंप्लीकटेड नहीं बनाएगी...। यहाँ शांतनु की भी तारीफ करनी होगी कि उसने आम पुरुषों कि तरह उसकी ऊब को अपने पक्ष में भुनाने कि कोशिश नहीं की।
"सोनमछरी" की नायिका रूमपा शंकर से बहुत प्यार करती है। पर परिस्थितिवश जब उसे अमित का सहारा लेना पड़ता है तो वह शंकर के लौटने पर भी अमित को छोड़ने को तैयार नहीं होती। गीताश्री की नायिकाएँ साहसी हैं और अपने किए का समूचा दायित्व वे स्वयं लेने को तैयार दिखती हैं। चाहे वह मान सम्मान हो या घोर लांछना। वे प्रेम भी अपनी शर्तों पर करती हैं।
"चौपाल " के बीजू साहब एक अलग ही किस्म के चरित्र हैं॰ शिवांगी के खामोश प्रेमी। जिन्हें बस शिवांगी को देख लेना ही काफी है। उनके चले जाने के बाद शिवांगी उन्हे खोजती फिरती है। धन्यवाद कहने का मौका भी ना मिल सका । पर ऐसे पात्र क्या जीवन भर भुलाए जा सकते हैं?
"ताप" कहानी पाठकों को थोड़े असमंजस में डालती हैं। ऐसा व्यावहारिक रूप से संभव है क्या?" बह गई बैगिन नदी " का असगर जब यह कहता है कि "मैं ... सरजी , पहले तो मैं पैसा ही लेता था लेकिन हमारी अम्मी हराम का पैसा घर लाने को मना करती है।" तो लगता कि यह पृथ्वी अबतक नष्ट नहीं हुई, क्योकि आदमी का जमीर कभी ना कभी जग जाता है।
इन कहानियों का एक कमजोर पक्ष, दूसरे पक्ष यानि रंजना, इंद्रजीत की भावनाओं का पूरी तरह नहीं खुल पाना है।
लेखिका से यह आशा की जा सकती है कि कभी हम उनकी ऐसी कहानियाँ भी पढ़ पाएंगे  जो इन पात्रों के तरफ से लिखी गई होगी , उनकी मनोदशा को दर्शाती हुई।  इसके अलावा लबरी ,फ्री बर्ड , उर्फ देवीजी, एक रात जिंदगी भी अच्छी कहानियाँ हैं।
ये कहानियाँ पितृसत्तातमक समाज की जड़ों पर प्रहार करती हैं और पाठकों को मजबूर करती हैं कि वे भी स्त्रियॉं को मनुष्य की तरह देखना सीखेँ। उनका धीरज अब जबाब देने को है।
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कलावंती, आवास स0 टी 32 बी , नॉर्थ रेल्वे कॉलोनी , रांची 834001, झारखंड. मो 9771484961।




Posted By Geetashree On 8:14 PM 2 comments
युवा कथाकार कवि पंखुरी सिन्हा की कहानी का आश्चर्यलोक 

पंखुरी सिन्हा के मन मिजाज को उसके बचपन से जानती हूं। उसके लेखन को बहुत देर से जान पाई। होस्टल में फुदकती हुई, गौरेया-सी, शाम को मस्ती में मेरे पास आने वाली एक नन्ही लड़की कब कहानीकार में बदल गई, पता ही नही चला। कुछ हम गाफिल रहे जमाने से, या जमाना हमसे रहा..। दोनों तरफ से दूरियां रहीं। पर जब दूरियां कम हुईं तो पंखुड़ी की कहानियां मेरे सामने आश्चर्यलोक की तरह खुली और खुलती चली गईं। उसने जब पहला संग्रह किस्सा-ए-कोहिनूर दिया, तभी से उसकी कहानियों को लेकर रोमांच रहा। जिसे आप करीब से जानते हो, उसकी कहानियां कुछ ज्यादा ही खुलती हैं आपके आगे। वह बोले न बोले, कहानियां खुद बोलती हैं। पंखुरी के मामले में मैंने यही पाया कि उसकी कहानियां बात करती है। बातूनी कहानियां हैं तभी उसकी कहानियों के भीतर से गुजरना जिंदगी से होकर गुजरने जैसा लगा कई बार। मैं जिस कहानी पर खास बात कर रही हूं, वह प्रदूषण कहानी है। नाम पढ कर पहली बार मुझे अटपटा लगा। पत्रकारीय भाषा में कहे तो सरकारी टाइप शीर्षक। पर कहानी को अंत तक पहुंचते ही शीर्षक के अर्थ खुलने लगते हैं। बहुत सांकेतिक हेडिंग है। ये प्रदूषण बाहरी नहीं, भीतरी है जिससे हम जूझते रहते हैं और दिमाग में कचरे का पहाड़ खड़ा कर लेते हैं। इससे जिंदगी हराम हो जाती है और हम रास्ता भटक जाते हैं। जिंदगी के कुछ फैसले कठोर तो होते हैं लेकिन वे आपको मजबूत बनाते हैं, आत्मनिर्भर भी। रिश्तो के मायाजाल में फंसी हुई नायिका कहानी के अंत में न सिर्फ खुद को समझाती है बल्कि अपने पाठको तक अपना संदेश पहुंचाने में सफल दिखती है...अपने शहर को प्रदूषण से बचाइए। पर्यावरण के बहाने जिंदगी की ओर संकेत देती है और बाकी पाठको के विवेक पर छोड़ देती है।
कहानी में कई किरदार है। रचना, शिशिर, सौम्या, अनिर्वाण, चाचा जी इत्यादि। कुछ अनुपस्थित लोगो का भय भी जैसे मकान मालिक। महानगरो में रह रही सिंगल लड़की या लिव इन में रहने वाली लड़कियों-युगल जोड़ो को इस तरह के खौफ से साबका पड़ता है। कहानी में इस भय की छाया है जो बहुत जेनुइन लगती है। सारे किरदार सहज स्वभाविक हैं। यह कहानी अपने समय का सच है। एक पढने लिखने वाली, कम आय वाली नौकरी करने वाली लड़की को अपने लिए घर में भी स्पेस चाहिए और जिंदगी में भी। वह कभी, प्रेम में पड़ कर तो कभी आर्थिक कारणो से घर साझा कर तो लेती है लेकिन वह खुद खो जाती है। वह बोल्ड तो है लेकिन अपने चाचा की परवाह करने वाली सुघड़ लड़की भी। रचना शहरी और कस्बाई दोनो लड़की का काकटेल है। सौम्या पूरी तरह महानगरीय लड़की है, बिंदास और बेलौस। उसे शादीशुदा पुरुष से प्यार हो जाता है। फिर भी एक घर में रहने वाली सहेली के पुरुष मित्र पर फिदा हो जाती है। कहानीकार ने यहां बड़ी सधी हुई भाषा का इस्तेमाल किया है। वह कहीं भी सौम्या के प्रति कठोर नहीं दिखती पर कटाक्ष वाली भाषा का जरुर इस्तामल करती है। यह लाजिमी भी है कि एर पुरुष से प्यार करते हुए दोस्त के मित्र के सथ गणित पढने के बहाने फ्लर्ट करने लगना। और वही होता है, जो अक्सर इन मामलो में होता है। रचना और सौम्या के रास्ते अलग हो जाते हैं।रचना उसे घर छोड़ने को साफ साफ कह देती है पर घर का किराया उसे अखरने लगता है। फिर अनिर्वाण को उस घर में जगह मिलती है। एक घर में लेकिन अलग अलग कमरे में जीते हुए दो लोग। प्यार को लेकर एकदम स्पष्य विचार वाली ल़ड़की। वह खुद कहती है...जैसे जैसे समय बीतता गया. मैंने पाया कि प्यार नामक वह चीज बजाए कुछ खूबसूरत होने के अक्सर विस्फोटक झगड़ों में उबल पड़ती थी।
पंखुड़ी ने इस कहानी को रोचक शैली में लिखा है। कई बार रचना तटस्थ दिखती है या निस्संग। जैसे बाहरी चीजें उसे ढंकने का प्रयास कर रही हों और वह खुद को फंदे से छुड़ाने की तड़प में हो। वह समान्य लड़कियों से थोड़ी अलग है। किस्सागो पंखुड़ी आत्मविश्वास से लैस एक जटिल किरदार को रोचक ढंग से पेश करती है।

कहानी की दोनों लड़कियां महानगर में जीने वाली लड़कियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। अपने फैसले खुद लेने वाली लड़कियां हैं जो नैतिकता के किसी बंधे बंधाएं ढांचे या व्यामोह में नहीं फंसती। उन्हें गलत सही, पाप पुण्य का बोध परेशान नहीं करता। दोनों अपने समय संघर्ष के साथ जुड़े हैं और उन्हें अपने किए का कोई अफसोस नहीं। इन सबके बीच दोनों पुरुष पात्र अपनी अलग छाप छोड़ते हैं। अनिर्वाण भी रचना के लिए बहुत सहयोगी साबित होता है। उसकी देखरेख करता है और सौम्या के आग्रह पर उसे पढाता भी है। सौम्या का ब्वाय फ्रेंड शिशिर पहले से शादीशुदा है और दो बच्चो का बाप भी है। उसकी अपनी पत्नी से नहीं पटती। पर वह तलाक नहीं लेना चाहता। दो बच्चो की खातिर। सौम्या ने उसे इसी रुप में स्वीकार कर लिया है। वह शिशिर से हमबिस्तर भी होती है, कहानी में संकेतो के जरिए इसका जिक्र है। चादर पर पड़ी सिलवटे बताती हैं कि वहां क्या हुआ होगा। इसका ब्योरा देने की जरुरत नहीं होती। इसी तरह के छोटे छोटे रोचक ब्योरे कहानी को बड़ा फलक दे जाते हैं। हिंदी साहित्य की छाती- कूट आलोचना से परे, यह छोटी कहानी, नई लड़की की बात इस ग्लोबल समय में ठोस रुप में दर्ज करती है।   

नवल जी की कविता

Posted By Geetashree On 3:24 AM 1 comments

हर कहानी के बाद,
खाली पड़े हिस्से में,
रक्तबीज के वेश में सवाल रक्तपात मचाते हैं,
कहीं कोई अपने कपड़े ठीक कर रही होती है,
तो कोई जीतने का भ्रम पाल,
अपनी मुंछों पर ताव देता है,
कुछ रुदालियां रोती हैं,
कुछ लाशें जमीन पर बीती रात का सच बताती हैं।
अखबारों के पन्नों में भी कभी कभार,
किसी कहानी के बाद की कहानी छप जाती है,
और कोने में खून की कुछ बुंदें या फ़िर कभी,
फ़ुलों का गुच्छा लिये गजगामिनी की तस्वीर,
आंखों के सामने कहानी का अंत बताने का प्रयास करती है,
लेकिन कहानियां तो कहानियां ही हैं,
उनका आदि क्या और अंत क्या,
यह सच वह भी जानती हैं,
समझती हैं इसलिए मौन हैं,
एक बुत के जैसे किताब के शक्ल में,
या फ़िर रंग बिरंगे अखबारों के पन्नों में,
जैसे कोई खुबसूरत सी टिकुली,
ललाट के जगह रुम्पा के गालों को चूम रही हों,
चौपाल की नायिका भी “बन्द गली के आखिरी मकान” के पास,
रुकती है और देखती है उन सभी को,
जिनके लिए एक हसरत है वो,
वह रचना बने या फ़िर प्रार्थना,
दुनिया से ताल ठोककर सवाल करती है,
सोन पुष्प लाने गये राजा की कहानी,
बहुत कुछ कहना चाहती है,
लेकिन अलफ़ाज तब कहां उसे इसकी इजाजत देते हैं,
दुनियावी दस्तूर भी तो नहीं है ऐसा,
हर कहानी के खत्म होने के बाद,
एक नयी कहानी की परंपरा निभानी ही पड़ती है।






























बदनाम बस्ती की जिद्दी लड़की की एक और जिद

Posted By Geetashree On 3:51 AM 8 comments
देसी चीयर्स लीडर के ठुमके गीताश्री बदनाम बस्ती की सबसे जिद्दी लडक़ी इन दिनों बेहद चिंतित और गुस्से में है। उसे बेचैन कर दिया है इस खबर ने कि उस बस्ती की लड़कियां अब बिहार के गांवों, कस्बों में होने वाले रात्रिकालीन क्रिकेट मैचों में चीयर्स लीडर बनकर जा रही हैं। बात सिर्फ चीयर्स लीडर की नहीं है, इसकी आड़ में देह के धंधे का एक नया रूप शुरू हो गया है। लोगो की जरुरत के हिसाब से बस्ती की चीजें बदल गई हैं। मंडी के हिसाब से चीजें नहीं बदलीं। खुद को कलाकार कहने वाली लड़कियां अपनी कला अब अपने कोठो पर नहीं, लोगो की मांग के अनुसार कहीं भी दिखाने पर आमादा है। इनमें से कोई भी खुद को सेक्सवर्कर नहीं कहती। इन्हें अपना फन पेश करने का लाइसेंस मिला है। इन गलियों में कभी सूरज उगने का नहीं ढलने का इंतजार रहता था। दरवाजे तभी खुलते थे जब कोई दस्तक देता था। वहां एक परदा था जो हर किसी की जिंदगी से लिपटा हुआ था। उन गलियों से गुजरकर अक्सर हवा अलसाई हुई सी बहने लगती थी। अब हवा में शोखी है। रौनक गली अब किसी पुरानी रंग उड़ी पेंटिंग की तरह दिखती है। नई पीढी ने बहुत कुछ बदल दिया है यहां। उनके पुकारे कोई आए या ना आए, लोगो की पुकार, मांग उन्हें खेतो, खलिहानो से लेकर क्रिकेट के मैदानो तक ले जा रही हैं। इन दिनों देशभर में आईपीएल का खुमार सिर चढक़र बोल रहा है, वहीं बिहार में आईपीएल की तर्ज पर क्रिकेट नाइट टूर्नामेंट का चलन शुरू हो गया है। वहां भी दर्शकों के मनोरंजन के लिए सेक्सवर्कर मौजूद हैं। हर चौक्के-छक्के पर उनके ठुमके दर्शकों को सिसकारियों से भर देते हैं। ज्यादा दिन नहीं हुए, समस्तीपुर जिले के अधारपुर जगदेव मध्य विद्यालय परिसर में टी-20 नाइट क्रिकेट का आयोजन। मैच के दौरान फूहड़ गानों का शोर उत्तेजना जगाता है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति और चौंकाने वाली है। पूरा ग्राउंड दर्शकों से खचाखच भरा हुआ है। ग्राउंड पर मैच चल रहा है और मंच पर डांस। मैदान में मौजूद ग्रामीण क्रिकेट टीम के कई सदस्य नाबालिग भी हैं। न पुलिस का ध्यान इस तरफ गया और सरकारी स्कूल परिसर में इसके आयोजन पर प्रशासन से अब तक कोई आपत्ति जताई है। हैलोजन लाइट के सुरमई अंधेरे में जलवाफरोश बालाएं चंद पैसों की खातिर भरे मैदान में ठुमक रही हैं। इन सबसे बेचैन लडक़ी नसीमा कहती हैं, धंधे का यह नया रूप ‘लॉन्च’ हुआ है, कहां पहले मुजरा और कव्वाली के दौर चलते थे। फिर आया आर्केस्ट्रा और अब ये चीयर्स लीडर का नया चलन। चतुर्भुज स्थान, मुज्जफरपुर में परचम संस्था से जुड़ी नसीमा हंसती हैं, ‘आईपीएल में विदेशी लड़कियां हैं, हमारे यहां लोग ‘हाई प्रोफाइल’ चीजों को तुरंत अपना लेते हैं। देखिए, कैसे इस प्रवृत्ति ने एक मुजरे वाली को चीयर्स लीडर में बदल दिया।’ नसीमा बताती हैं कि इस तरह के क्रिकेट मैच ज्यादातर छपरा, सिवान, मोतिहारी, आरा, बक्सर, रक्सौल इलाके में खूब हो रहे हैं, जहां हर टीम का अपना चीयर्स लीडर होता है।’ यहां सवाल उठ रहा है कि आखिर क्या सिर्फ आईपीएल की लोकप्रियता या उसकी नकल करने की प्रवृत्ति की वजह से बदनाम बस्ती की लड़कियां मैदान में चीयर्स लीडर बनकर पहुंच गई। इस सवाल का उत्तर देते हैं, बदनाम बस्ती पर किताब लिख रहे युवा कहानीकार प्रभात रंजन। वह बताते हैं, ‘अब तो मेलों और मैचो में रंग जमाने के लिए इनका इस्तेमाल होता है। दुख की बात है कि वहां अच्छी गानेवालिया रह गई हैं, न अच्छी नर्तकी। तवायफों ने इलाका छोड़ दिया। बस उनकी कहानियां बच गई हैं। करीब 100 सालों के इतिहास वाली यह बस्ती अब सिर्फ जिस्म की मंडी में तब्दील हो गई है।’ नसीमा तो सारा दोष प्रशासन को देती है, जिसे यह सब दिखाई नहीं देता। वह कहती हैं, ‘क्यों नहीं सरकार देह व्यापार का लाइसेंस दे देती है। कम से कम ये सब अलग-अलग रूप तो चलन में नहीं आते। क्या विडंबना है कि जो लोग इस व्यापार के खिलाफ है, वही लोग देह व्यापार के नए-नए रूप निकाल रहे हैं। चीयर्स लीडर के लिए क्या है? चौक्को-छक्को पर ठुमके? उनके जीवन का क्या?’ इस बस्ती की नई उम्र की लड़कियों में परंपरागत हुनर (मुजरा-कव्वाली) से कटकर हाई प्रोफाइल महफिलों में जाने का आकर्षण ज्यादा है। पहले कद्रदान इनकी दहलीज तक आते थे। अब नई लड़कियां उनके बुलावे पर कहीं भी उपलब्ध हैं-हर रूप में। चाहे वह आर्केस्ट्रा गल्र्स हो या चीयर्स लीडर। कभी महफिल की शान रही जीनत बेगम कहती हैं, क्या करे? कुछ तो करना होगा ना। महफिलें उजड़ गई हैं। राते बेमजा। समाज बदल गया है। पहले रतजगा हुआ करता था। रात रात भर संगीत की महफिल। जमींदार गए, कौन सजाएगा महफिल। पढी लिखी, मुंहफट नसीमा भी दार्शनिक हो उठती हैं, ‘पहले घर में बैठकर रोटी मिलती थी। अब रोटी का टुकड़ा खिसकता जा रहा है। हम उसके पीछे-पीछे जाते जा रहे हैं...।’ वह दुष्यंत का शेर सुनाती है..दुकानदार तो मेले में लुट गए यारो, तमाशबीन दूकानें सजा कर बैठ गए।

एक लंबी चुप्पी के बाद.....

Posted By Geetashree On 3:40 AM 9 comments

दोस्तो

मैं एक बार फिर से हाजिर हूं...लंबी चुप्पी के बाद। मैंने पिछले दिनों अपने शोधकार्य के सिलसिले में खूब यात्राएं की..
वन वन भटकी..देश विदेश चक्कर काट आई..अब थिर हो गई हूं...अब लिखने का काम शुरु...इन दिनों कविताएं, कहानियां..रचनात्मक लेखन का जुनून सा है...दोबारा ब्लाग से जुड़ रही हूं...सो सोचा..पहले आपको एक अनगढ कविता पढवाऊं..अनछपी..यात्रा के दौरान लिखी गई..किसी एकांत में..गीताश्री

तुम अपनी देह पहले अनुपस्थित करो यहां से,
मैं उठूंगी यहां से और मन के उस सिरे से उस सिरे तक जाऊंगी
तुम्हारी दुर्दम्य आकांक्षाओं को तुमसे बेदखल करके
उतर जाऊंगी उस पार

मैं जाऊंगी तुम्हारी अनुपस्थित देह के पास
जो धरी है किसी विस्तर पर
खाली चादर सी
धुली धुली खुली खुली.

तुम जब भी आओ मेरे पास
अपनी देह को इसी तरह वहीं कहीं छोड़ आया करो,
कि मुझे नहीं मालूम कि प्रेम में देह का दाखिल होना
कितना रौनक है कितना विराना
प्रेम है तो उत्सव-स्वांग है तो विराना...तुम उठते हो, इतना कहते हो
और अपनी देह को थामे दोनों हाथों से
प्रस्थान बिंदु के पास जाकर धर आते हो.

दुखते हैं खुशबू रचते हाथ

Posted By Geetashree On 2:37 AM 4 comments




गीताश्री

यहां इस गली में बनती हैं
मुल्क की मशहूर अगरबत्तियां
इन्ही गंदे मुहल्ले के गंदे लोग
बनाते हैं केवड़ा, गुलाब, खस और
रातरानी अगरबत्तियां.
दुनिया की सारी गंदगी के बीच
दुनिया की सारी खुशबू
रचते रहते हैं हाथ।
---अरुण कमल की कविता

मैंने कुछ साल पहले अचानक नेट पर अपने प्रिय कवि अरुण कमल जी की कविता खूशबू रचते हाथ पढी थी। कविता मेरे जेहन में दर्ज हो गई थी। ये उस कौम पर लिखी गई है जिसकी तरफ हमारा ध्यान कभी जाता ही नहीं। मैं सोचती रही कि कहां किस शहर में मिलेंगी ये औरते जो हमारे लिए खूशबू रचती है। कवि ने उन्हें कहीं किसी गली में तो देखा होगा ना..अचानक मैं पिछले साल उज्जैन गई। ट्रेन से आने जाने का प्लान था। आदतन जब ट्रेन किसी शहर में प्रवेश करने लगती है तो मुझे जार्ज डो का एक प्रसिध कथन याद आने लगता है...किसी शहर को देखने का सबसे अच्छा तरीका है ट्रेन के दरवाजे पर खड़े होकर उसे देखें..और मैं एसा करती हूं जब भी कभी ट्रेन से जाती हूं। उज्जैन के करीब पहुंचते ही ट्रेन के दरवाजे पर आई..धीमी होती ट्रेन और धीमे धीमे आती हवा में महक सी थी। पहले लगा कि महाकाल की नगरी है मंदिर से आती होगी..लोकिन पटरियों के एकदम पास नजर गई और मैं दंग रह गई। अरुण कमल जी की कविता..साक्षात..लाइव..कविता की पंक्तियां याद आने लगीं..हाथ ही हाथ थे..जो खूशबू रच रहे थे। खिलखिला रहे थे..खूशबू में सने हाथ ट्रेन के यात्रियों को टा टा बाय बाय भी कह रहे थे। मुझे कविता के किरदार पहली बार मिले..निराला की भिक्षुक कविता के बाद..
फिर तो इन गलियों में गई अपनी लोकल सहेली मधुलिका के साथ। वहां जाकर जो कुछ मिला उसे यहां लिख डाला। कवि होती तो कविता लिखती..तब भी अऱुण कमल से ज्यादा अच्छा नहीं लिख पाती..पत्रकार हूं सो लेक लेश लिख डाला..फोटो खींचे..उनसे बातें की..खूशबू भरी..उनकी पीड़ा लेकर घर लौट आई..ट्रेन को लौटना होता है..

भोर के इंतजार में एक गली

अब खूशबू रचते हाथ दुखने लगे हैं।
उज्जैन की ऊंची नीची, आड़ी तिरछी, तंग गलियों में अगरबत्ती बनाते बनाते तीस वर्षीया संध्या गोमे की उंगलिया पीड़ा गई हैं। कंधे दुखने लगे हैं। अब दुआ के लिए भी हाथ उठाने में दिक्कत होती है। फिर भी एक दिन में वह पांच किलो तक अगरबत्ती बना लेती है। रीना आकोदिया के गले में हमेशा खराश रहती है। कच्चे माल से निकलने वाला धूल उसके फेफड़े में जम रहा है। परिवार चलाना है तो उसे किसी भी हालत में अगरबत्ती बनाना ही होगा। पुष्पा गोमे बताती है, हम रोज का बीस से पचास रुपये तक कमा लेते हैं। घर के बाहर काम करने नहीं जा सकते। हमें घर बैठे काम चाहिए। इसके अलावा और कोई रोजगार यहां है नहीं..क्या करे?
ये महाकाल और कालिदास की नगरी उज्जैन की एक गली है योगेश्वर टेकरी। शायद ऐसे ही किसी गली में कभी अरुण कमल ने संध्या, पुष्पा, रीना, पिंकी जैसो की बहदाली देखी होगी। तमाम पूजाघरो को सुंगध से भर देने वाले हाथ अब बेहाल हैं। लगातार एक ही जगह बैठकर अगरबत्ती बनाते बनाते उनका जीवन कई तरह की मुश्किलो से भर गया है। उनका स्वास्थ्य तो खराब हो ही रहा है घर की माली हालत भी ठीक नहीं हो पा रही है। फैक्ट्री मालिक और बिचौलिए के शोषण दौर निरंतर जारी है। रीना बताती है, बहुत सी औरतो का घर इसी से चलता है। क्या करें। सभी हमारा शोषण करते हैं। कच्चा माल देते हैं साढे सात किलो, लेकिन बनाने के बाद वे पांच किलो तौलते हैं। धूल से बीमारी हो रही है। रीना की तरह ही इस गली की तमाम औरतें शोषण के दोहरे मार से बिलबिलाई हुई हैं। इनका कोई ना कोई संगठन है ना इनके हक में आवाज उठाने वाला कोई स्थानीय नेता। घर के पुरुष सदस्यो को भी इनकी सुधि नहीं है। खुद तो वे दिनभर बैठकर इसतरह का काम करेंगे नहीं। घर की महिलाओं के ऊपर लाद दिया है पूरा कारोबार। उनका ज्यादातर वक्त चौक चौराहो पर बैठकर चाय पीने या बीड़ी का धुंआ उड़ाने में जाता है। शाम को बिचौलिए से पैसे लेने जरुर पहुंच जाते हैं। कम रकम हाथ लगी तो हो हल्ला मचाते हैं। औरत पर दोहरी मार। कम अगरबत्ती बनाने का इल्जाम भी झेलो। अब तक किसी स्वंयसेवी संगठन की नजर इनकी बदहाली पर नहीं पड़ी है। नवगठित एनजीओ भोर की सर्वेसर्वा मधुलिका पसारी ने जब पहली बार फरवरी, 2010 को मेरे साथ इस गली का दौरा किया तो मेरे साथ साथ वह दंग रह गईं। उन्हें अंदाजा ही नहीं था कि खुशबू रचने वाले हाथों को किन मुश्किलो को सामना करना पड़ रहा है। अब तक उपेक्षित इस धंधे में लगी महिला मजदूरो का कोई यूनियन भी नहीं है। पिंकी टटावत बताती है यहां यूनियन नहीं बनती। मैं अगर बनाना चाहूं तो बीच के लोग खत्म कर देते हैं। हम काम करना तो नहीं बंद कर सकते ना। काम बंद होगा तो परिवार कैसे चलेगा?
संध्या बौखला कर कहती है, हमें साढे सात किलो माल देता है बदले में पांच किलो लेता है। वजन में माल कम हो गया ना। हमारी मजदूरी वैसे भी कम है ऊपर से डंडी मार देते हैं। कमसेकम हमारी मजदूरी तो बढा देते।
पूरी तरह से औरतो के कंधो पर टिका है ये धंधा। पांच साल की उम्र से लड़कियां भी निपुण हो जाती है अगरबत्ती बनाने में। घर में जिनती महिला सदस्य होती हैं वे सब घरेलु कामकाज निपटाने के बाद सुबह 11 बजे से शाम पांच या छह बजे तक एक ही जगह पर बैठकर बांस की पतली स्टिक पर मसाला चढाती रहती हैं, सुखाती हैं फिर इनका बंडल बना कर बिचौलिए का इंतजार करती हैं। बदले में वो चंद रुपये दे जाता है। इन पैसो से ना पेट भर पा रहा है ना किस्मत बदल पा रही है। पूरे शहर में और कोई धंधा नहीं है। सारे मिल बंद हो चुके हैं।
देश में उज्जैन पांचवे नंबर का अगरबत्ती उत्पादक शहर है। लगभग 100 अगरबत्ती बनाने वाली फैक्ट्री वहां है। यहां से बनने वाली अगरबत्ती की आपूर्ति देश के कई राज्यो जैसे, गुजरात, राजस्थान, उतर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली में होती है। इस व्यसाय को गृह उधोग का दर्जा प्राप्त है इसलिए सरकार ने कई तरह की छूट दे रखी है। अगरबत्ती व्यसाय से पिछले पचास साल से जुड़े व्यवसायी फखरुद्दीन से बातचीत के दौरान उन वजहो का पता चलता है जो मजदूर महिलाओं के शोषण
का वायस बनी हुई हैं।
वह बताते हैं, उज्जैन की अगरबत्ती गुणवत्ता में कमजोर है। सस्ती बिकती है, मजदूर भी निपुण नहीं हैं। ये कारोबार वहीं फले-फूलेगा जहां गरीब वर्ग है। वैसे भी राजनीति की वजह से कपड़ा मिलें, पाइप फैक्ट्री समेत कई कारखाने बंद हो गए। मजदूर क्या करें। मजबूरन उन्हें इस धंधे में लगना पड़ा।
फरुद्दीन महिला मजदूरो के शोषण के लिए छोटे छोटे कारोबारियो को दोषी ठहराते हैं। उनका कहना है कि छोटे कारोबारियो से हम बड़े कारोबारी बेहद परेशान हैं। उनकी वजह से मध्य प्रदेश के हर गांव में अब अगरबत्तियां बनने लगी हैं। चूंकि किलो के हिसाब से बेचना है तो मोटी अगरबत्तियां बनने लगीं हैं। बारीक बनाएंगे तो वजन कम होगा। धीरे धीरे बारीक बनाना भूल जाते हैं। इसीलिए कच्चा मान बाहर नहीं भेजते, अपनी फैक्टरी में ही मजदूरो को रखकर काम करवाते हैं और उन्हें मीनीमम वेजेस से ज्यादा देते हैं।
अंत में..मधुलिका कहती हैं, अब मुझे कुछ करना पड़ेगा। भोर को एक उद्देश्य मिल गया है। हो सकता है इनकी पहल पर एक नई भोर इन गलियों में आए।