Tuesday, November 17, 2009

मां बनिए या फाइटर पायलट

गीताश्री
पुरुषवादी सोच का फरमान आ चुका है...अगर मां बनना है तो फाइटर प्लेन उड़ाने का सपना भूल जाइए। वायु सेना महिलाओ को फाइटर पायलट बनाने की योजना पर विचार तो कर रही है लेकिन सशर्त्त। इसमें शर्त्त ये है कि यह मौका उन्हीं महिलाओं को मिलेगा जो एक तय उम्र तक मां बनेगी। यानी पारिवारिक दायित्वों के कारण महिलाओं को युध्दक विमान उड़ाने की फिलहाल अनुमति देने को वायुसेना तैयार नहीं है। भारतीय वायुसेना के उप प्रमुख एयर मार्शल पीके बारबोरा ने कहा है कि अगले कुथ सालों में हम यह परिवर्तन देखेंगे महिलाए फाइटर प्लेन उड़ा रही हैं, लेकिन उन्हें एक शर्त्त माननी पड़ेगी। वो शर्त्त है...महिलाएं शादी तो कर सकती हैं लेकिन मां नहीं बन सकतीं। वायुसेना में 13-14 साल तक नौकरी कर लेने के बाद ही मां बनने की इजाजत होगी। यानी अपनी नौकरी पूरी कर लें फिर चाहे मां बनती रहें। सेवा में रहते उन्हें ये सौभाग्य नहीं मिलेगा।

कैसा संयोग है कि यह बयान तब आया है जब राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल सुखोई विमान में उड़ान भरने जा रही हैं। इसके साथ ही वे इतिहास में दर्ज हो जाएंगी। वे जंगी जहाज में उड़ान भरने वाली दुनिया की पहली महिला राष्ट्राध्यक्ष होंगी।

उसी देश में महिलाओं को फाइटर पायलट बनने की राह में कितने रोड़े अटकाए जा रहे हैं..देखिए..यहां औरत की कोख पर बवाल है। मार्शल का तर्क है कि एक महिला को फाइटर पायलट बनाने में लगभग 11 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। अगर वे बीत में ही मां बन गई तो उनकी कार्य क्षमता पर असर पड़ेगा और उन पर खर्च किए गए रुपये बेकार हो जाएंगे। जाहिर है बच्चा पैदा करनें में जो समय लगेगा वो उससे लंबा गैप आएगा। ये दिन तो हर कामकाजी महिला के जीवन में आता है। क्या सभी नौकरियों में एसी शर्त्ते रखी जाएंगी। देखा जाए तो नुकसान हर संस्थान को होता है तो क्या महिलाएं मां बनना छोड़ दें। भाई साहब..अब कोख पर तो पहरे ना लगाइए।

कुछ महिला संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई कि महिलाओं को लैंगिक भेदभाव के कारण लड़ाकू विमान नहीं उड़ाने दिया जाता है। इस पर मार्शल साहब बेहद तल्ख हो उठे। उनका बयान सुनिए...महिलाओं की प्रकृति कुछ अलग होती है। उन्हें पारिवारिक जीवन में प्रवेश के बाद 10 से 12 महीने तक मातृत्व अवकाश की जरुरत पड़ती है। इसीलिए उन्हें बतौर पायलट ट्रेंड करना लाभकारी नहीं है। दूसरे क्षेत्रों में महिलाओं की उपयोगिता भरपूर है तो फिर एसी जगह पर उन्हें क्यों जाना चाहिए, जहां उन पर खर्च कर तुलना में उनका उपयोग न हो पाए।

इनके मुताबिक महिलाओं को पारंपरिक क्षेत्रों में ही काम करना चाहिए। जोखिम वाले इलाके पुरुषों की बपौती है। उनके गढ में प्रवेश करने से क्या उनका वर्चस्व टूट जाएगा या इसके पीछे सचमुच कोई वाजिब चिंता है। चिंता जो साफ दिख रही है वो है पैसे की। ट्रेनिंग पर खर्च होने वाले पैसों की...मां बनना तो किसी भी औरत का अपना फैसला होता है। चाहे वह नौकरी करें या ना करें। आप थोप नहीं सकते। ये मामला स्वैच्छिक होता तो बात कुछ और होती। जैसे आज बहुत सी औरतें करियर को ध्यान में रख कर मां नहीं बनना चाहतीं। ये उनकी मर्जी। ना वहां जोर चलाएं ना यहां चलाएं।

जब पाकिस्तान जैसे दकियानूसी मुल्क में महिलाएं फाइटर पायलट हैं तो हमारे यहां एसी सोच क्यों। पाकिस्तान समेत दुनिया के पांच मुल्को में महिलाएं फाइटर पायलट हैं। मुझे नहीं लगता कि वहां एसा कोई बवाल है। मैं अभी इस विषय पर काम करुंगी ताकि पता चले कि इंगलैंड, अमरीका ने आखिर महिलाओं से क्या कुर्बानी ली है बदले में।

कुछ साल पहले हमने महिलाओं को सामाजिक पहलुओं के बारे में सोच कर वार में नहीं भेजने का फैसला किया था। क्योंकि वार के दौरान बंदी होने की संभावना होती है फिर उनके साथ महिला होने के कारण क्या व्यवहार होगा वो चिंताजनक बात थी। बाद में इस चिंता पर भी काबू पा लिया गया। आखिर देह की वजह से कबतक महिलाओं को वंचित और अपमानित होते रहना पड़ेगा।

अभी मन में बेहद आक्रोश हैं...कई तरह के सवाल हैं...मैं अभी ठीक से खुद को व्यक्त नहीं कर पा रही हूं..चाहती हूं आप सब इस बहस में हिस्सा लें..अपनी राय दें...क्या महिलाएं सुन रही है....कुछ बोलिए...

Sunday, November 15, 2009

प्रेम में वासना

कृष्ण बिहारी
मैं
इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकता कि प्रेम में वासना का कोई स्थान नहीं है. मैं न स्वयं से झूठ बोल सकता हूं और न दूसरों से. प्रेम में आदर्श और अशरीरी जैसी स्थिति की जो लोग वकालत करते हैं, वह मेरी समझ में केवल लाचारी है. हमारे देश में चूंकि प्रेम को लेकर समाज स्त्री- पुरूष की सोच में बंटा हुआ है और स्त्री आज भी यह कह पाने की स्वतंत्र स्थिति में नहीं है कि उसने अपने प्रेमी के साथ जिस्म शेयर किया है. इसलिए वह ज़ोर देकर झूठ बोलती है कि प्रेम में शरीर की मांग बेमानी है. वह डरती है कि यदि उसने शरीर के सच को स्वीकार किया तो उसका भविष्य नष्ट हो जाएगा.
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Saturday, November 7, 2009

क्या पुरुष दाता है और स्त्री याचक

गीताश्री

लव गुरु की प्रेमिका का महान लेख मेरे सामने हैं। इनके ब्लाग और एक अखबार में छपा हुआ। तमाम महिला संगठनो और महिला आंदोलनो को मुंह चिढाता हुआ. उसे व्यर्थ साबित करने पर आमादा। स्त्रियों ने अपने अधिकारो के लिए अब तक जितनी लड़ाईंयां लडी और सशक्तिकरण का अधूरा-सा ही सही, लक्ष्य हासिल किया, उसपर सवाल खड़े कर दिए। मेरे समेत तमाम महिलाओं के होठो पर एक सवाल खौल रहा है..कि ये कौन बोल रहा है उनकी जुबान से। कौन है जो उनके भीतर पुरुष भाव बन बैठ गया है। कौन है जो एक स्त्री को महिला संगठनो को अप्राकृतिक घटना मानने पर विवश कर रहा है और उसकी असफलता के लिए बददुआएं दे रहा है। कोई तो हैं इसके पीछे। हम अंदाजा लगा सकते हैं कि कौन छिप कर वार कर रहा है, अपनी ही छाया से छाया-युद्द के लिए तैयार कर रहा है। इनके बारे में ये नहीं कहा जा सकता कि हे महिलाओं इन्हे माफ करना कि ये नहीं जानती ये क्या कर गई है। ये कहना जरुरी है कि ये जानती हैं कि उनसे क्या लिखवा लिया गया है। अभी जिस फंतासी में ये जी रही है वहां पुरुषों का महिमा गान अनिवार्य है। इनके पास उपाय क्या है। कहां जाएंगी..क्या करेंगी। दूसरी महिला का हक छिनने वाली सित्रयां हमेशा पुरुषो की भाषा बोलती हुई पाई गई हैं। इस अंधेरे और क्रूर समय में जहां स्त्री के लिए उजाला अब भी एक उम्मीद की तरह है...एसे में कोई स्त्री अपनी ही बिरादरी की अस्मिता को कैसे नकार सकती है। हैरानी के सिवा क्या किया जा सकता है। अब इनकी बातें सुनिए....ये कहती हैं, पुरुष वीर्यदान करता है और स्त्री उसे ग्रहण करती है। ये कैसी आत्मस्वीकारोक्ति है...क्या कोई स्वाभिमानी स्त्री इनकी इस स्थापना को स्वीकार कर पाएगी। कभी नहीं...तब तो बलात्कार करने वाला पुरुष भी इनके हिसाब से वीर्य दान करता है और लड़कियों को चुपचाप उन्हें ग्रहण कर लेना चाहिए। हाय तौबा मचाने की क्या जरुरत। इनकी नजर में स्त्री- पुरुष का यही पारंपरिक रिश्ता है। एक सवाल पूछना चाहती हूं कि क्या कभी कोई पुरुष प्लान करके वीर्य दान करने चला है क्या। क्या स्त्री याचक है...पुरुष कर्ण की तरह दानवीर। कर्ण जैसे बड़े बड़े दानवीर भी बिना मांगे दान नहीं देते। फिर ये पुरुष किस स्त्री से पूछ कर अपनी वीर्य दानदिया। ये दान है या स्त्रियों को गटर समझ कर उड़ेल दिया गया कचरा है,कुंठा है, राहत है, आंनंद है, शरीर का वो तत्व है जिसकी नियती प्रवाहित होना है... ये पुरुष कब से दाता हो गए। क्या औरते उनसे उनका कचरा मांगने याचक की मुद्रा में खड़ी है..कहीं दिखती हैं क्या।ये स्त्री-पुरुष के बीच दाता और याचक का रिश्ता कौन बना रहा है। कौन दे रहा है अपनी नई स्थापनाएं। कवि राजकमल चौधरी का एक वक्तव्य यहां लिखना जरुरी है। वह लिखते हैं...स्त्री का शरीर बहुत स्वास्थ्यप्रद है। लेकिन कविता के लिए नहीं, संभोग करने के लिए। स्त्री शरीर को राजनीतिज्ञों,सेठो, बनियों और इनके प्रचारको ने अपना हथियार बनाया है, हमलोगो को अपना क्रीतदास बनाए रखने के लिए.... राजकमल जी बहुत साल पहले कैसी नंगी सचाई लिख गए हैं..पढिए। स्त्री शरीर को एसा स्टोरेज मत बनाए कि कई बार जबरन उड़ेला गया कचरा भी ग्रहण करने के भाव से कबूल किया जाए। आगे मैं राजकमलजी के स्त्री के बारे में और भी बयान लिखने वाली हूं..ताकि पता चले कि पुरुष क्या सोचते हैं। बेहतर होता कि पुरुषों को हितैषी बताने वाले वक्तव्य देने से पहले कुछ महान लोगो के विचार पढ लिए जाते। उदाहरण और भी हैं...

क्या एक पुरुष के प्रति अगाध प्रेम एक स्त्री को घोर स्त्री विरोधी बना देता है। यही तो पुरुषो की चाल है...वह प्रेम करता है स्त्री को पाने के लिए, उस पर आधिपत्य जमाने के लिए..स्त्री सदियों से उसकी चाल नहीं समझ रही है और शिकार हो रही है। स्त्री के धड़ पर कई पुरुष चेहरे इन दिनों दिखने लगे हैं...अब आवाज भी भारी हो गई है। ये एक स्त्रीद्रोही मुद्रा है। आप महिला संगठन में शामिल ना होइए..आंदोलन ना चलाइए...मगर आप सालों के संघर्ष पर ऊंगली ना उठाइए। आप क्या जाने कि इस लड़ाई में कितनी महिलाओं ने अपना सबकुछ छोड़ा, सुरक्षा और सुविधाओं का लालच छोड़ा, आवाजे बुलंद की तब जाकर आधी आबादी ने सम्मान से सिर उठाना शुरु किया।


स्त्री स्वाधीनता का क्या अर्थ है इनके लिए नहीं, लेख से पता नहीं चलता। ये पुरुष के दिमाग से सोचने वाली लेखिकाएं नहीं जानतीं। क्योंकि खुद वे अपना मन भी नहीं जानती कि वो क्या चाहता है। उनका हाथ थामे कोई आगे आगे चल रहा है, जो उसे डिक्टेट भी कर रहा है...अपना मन तो बहुत पीछे छूट गया है। राजकमल जी के आईने में ही देखें तो इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि स्त्री स्वाधीनता का अर्थ है स्त्री जिस पारंपरिक संबंध को निभा रही है उससे मुक्त हो। ये मुक्ति कैसे संभव है। उसे सबसे पहले अपने लिए जीना होगा ना। स्वंय को कामना की वस्तु बनाए रखने के जतन करने में उम्र गुजारने वाली औरतो से क्या उम्मीद की जाए। पुरुष को तो वहीं स्त्री पसंद है जो आसानी से उसकी अधीनता स्वीकार कर ले।लेखिका जिसे दान कह रही हैं, वो पुरुषो की भाषा है। पुरुष की असली भाषासुनना हो तो राजकमल को पढा जाना चाहिए। वे जैसे नशा लेते हैं वैसे ही औरत लेते हैं। वे लेते हैं...देते नहीं। गौर फरमाए... भाषा को ध्यान से सुनिए...डिक्टेशन से ध्यान हटा कर। आदिम संबंधों में दान पुण्य जैसी कोई भावना नहीं होती। वहां आनंद का खेल है..एक दूसरे को परास्त करने और स्त्री को दमित करने का खेल.. यहीं से स्त्री को गुलाम बनाए रखने का कुचक्र शुरु होता है। स्त्री समझ नहीं पाती..वह याचक होने के आंनंद में डूब कर दानी के दर्शन कर धन्य हो जाती है। लेखिका ने जो कुछ भी कहा लिखा है वो एक मामूली सा सच है। अभी राजकमल का उल्लेख कर रही हूं. इनसे आगे पीछे जाने में बहस लंबी हो सकती है। सोउन्ही का कहा सामने रख कर अपनी बात समाप्त करती हूं....कोई भी मामूली-सा सच कह लेने के बाद खुश हो कर, निवृत्त होकर, औरतें शरमाती है..यह शर्म गलत नहीं है। लेकिन कविता नहीं है। एसी शर्म में सुंदरता नहीं होती, एक हल्के किस्म का नंगापन होता है। लेकिन अपना नंगापन कह लेने के बाद वे या तो फिर सिर झुका कर फैसले की प्रतीक्षा करने लगती है या फिर अपनी जीत का एलान करके वहां से चली जाती हैं। फिर कभी वापस आने के लिए। वापस जाना स्त्रियो की विवशता है।

स्त्री-पुरुष को एक दूसरे का पूरक मानने वाले लोग किस मानसिकता में जी रहे हैं। क्या ये कोई वस्तुएं हैं जो बिना एक दूसरे के पूरी नहीं होंगी। वे दिन गए जब पूरक और अन्योनाश्रय संबंध वाली बातें की जाती थीं। ये अवधारणा भी मर्दवादियों की फैलाई हुई है। एसा नहीं कहेंगे तो स्त्री में पूर्ण होने की ख्वाहिश कैसे जागेगी और वह फिर उनके चंगुल में आएगी। ये सब स्त्री को गुलाम बनाए रखने वाली अवधारणाएं हैं। कुछ मामले में मैं मान सकती हूं कि एक दूसरे का साथ बहुत जरुरी है...मगर एक दूसरे के बिना बात नहीं बनेगी ये बात पुराने प्रतीको की तरह ही बहुत पुरानी पड़ चुकी है।अगर एक दूसरे के बिना अधूरे हैं तो एसा मानने वालों को तर्क देकर, उदाहरण देकर बताना चाहिए कि कैसे और किस तरह अधूरे हैं। दुनिया भर में एसे उदाहरण भरे भरे हैं कि एक अकेली स्त्री भी अपनी दुनिया बना सकती है, जहां पुरुष का साथ उसे गुलाम नहीं बना सकता। कहा जा रहा है कि स्त्री-पुरुष आपसी लड़ाई में झुलस जाएंगे, पस्त हो जाएंगे। एसा नहीं हुआ अब तक ना आगे होगा। अपनी चहारदीवारी से बाहर निकल कर जरुर झांकना चाहिए। इस निर्णायक लड़ाई ने दुनिया की सूरत कितनी बदल दी। ये लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं है। ये लड़ाई प्रवृत्ति के खिलाफ है, उस मानसिकता के खिलाफ है जो औरतो को गुलाम बनाए रखने की हिमायत करती है। जब लक्ष्य पवित्र हो, सामने हो, तो कोई झुलसता नहीं। हौसले पस्त नहीं होते। हौसलो का जो सिलसिला शुरु होता है उसकी धमक कई पीढियों तक जाती है। तभी विरासत में आजादी भी हासिल होती है। जैसे अंधड़ में जंग लगे दरवाजे भी भरभरा कर खुल जाते हैं, उसी तरह ये लड़ाई भी बंद दरवाजो और खिड़कियों के सांकल खोल देती है। साहस पूर्वक वह एक आजाद दुनिया की दहलीज पर पैर रखती है...देवी की छवि से मुक्त होकर वह साथी बनती हुई दिखती है। जिस घरेलु हिंसा का हवाला दिया गया है वो गलत है। कुछ केस इस तरह के आए हैं जिसमें ऊपरी तौर पर एसा लगता है कि घरेलु हिंसा कानून का इस्तेमाल गलत किया गया है। मगर उसकी तह में जाए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना गलत होगा। पता नहीं कैसे इन्हें पुरुष-प्रताड़ना का लंबा इतिहास दिख रहा है।ये इतिहास ज्ञान कितना छिछला है। एक तरफ पूरक होने की बात कही जा रही हैदूसरी तरफ कहा जा रहा है कि पुरुषत्व को स्त्रीत्व द्वारा ही पराजित किया जा सकता है। रणचंडी बन कर नहीं...स्त्री को कोमलता और सहिष्णुता बनाए रखनी चाहिए। ये जुबान किसी समकालीन स्त्री की नहीं हो सकती। ये डिक्टेशन का असर है। यहां स्त्रीत्व की परिभाषा स्पष्ट नहीं की गई है। कोमलता और सहिष्णुता तो सदियों से रही है फिर क्यों नहीं जीत पाए पुरुषत्व को। ना जाने कितने सवाल हैं जो अनुत्तरित हैं। खारिज करना बेहद आसान है, लड़ाई के पीछे छुपे दर्द को मर्दो के चश्मे से समझना बहुत मुश्किल।

Friday, October 30, 2009

चित्रलेखा, पाप और प्रेम

राजकिशोर जी ने चित्रलेखा(उपन्यास-भगवती चरण वर्मा) पर लंबा लेख लिखा और मुझे पढने को भेजा। वे मेरी इस पर मेरी पाठकीय प्रतिक्रिया चाहते थे। लेख बहुत लंबा था.. लगभग 6 हजार शब्दों का। ब्लाग के लिहाज से ज्यादा बड़ा। नहीं तो मैं पहले ही इसे पोस्ट कर चुकी होती। हाल ही में हंस के अगले अंक में समूचा लेख छपने की घोषणा देखी। मैंने इसके कुछ अंश छांट कर अपनी पसंद के निकाल लिए हैं आप भी पढें...आनंद आएगा। चित्रलेखा मेरे जीवन की उन किताबों में शामिल हैं, जिन्होंने मुझे बिगाड़ा और हमेशा हमेशा के लिए पाप-पुण्य को लेकर जो मन में कुंठाएं थीं..वो गांठे खोल कर मुझे अपनी ही कैद से मुक्त कर दिया। मैं राजकिशोर जी से कई प्रसंगो में असहमति रखती हूं...मगर यह लेख चित्रलेखा को नए सिरे से समझने में मदद तो करता ही है...आगे आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा है...गीताश्री



राजकिशोर

भगवतीचरण वर्मा का उपन्यास ‘चित्रलेखा’ कई दृष्टियों से एक मोहक उपन्यास है। इसकी शुरुआत इस प्रश्न से होती है कि पाप क्या है और उत्तर यह निकलता है कि हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है। जाहिर है, सवाल जितना ठोस है, उत्तर उतना ही भुरभुरा -- और भ्रामक भी। अगर हम हमेशा वही करते हैं, जो हमें करना पड़ता है, तो पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक आदि के आग्रह समाज से, और व्यक्ति के मन से भी, कभी के खत्म हो चुके होते। लेकिन ये प्रश्न हर पीढ़ी के सामने नए सिरे से उपस्थित हो जाते हैं और क्या करणीय है तथा क्या करणीय नहीं है, इस पर बहस बनी रहती है। फिर भी यह उपन्यास पाठकों में लगातार लोकप्रिय रहा है, तो इसका अकेला कारण यह नहीं हो सकता कि कथा और भाषा-शैली की दृष्टि से यह बहुत सरल है और कुछ कम पढ़ा-लिखा आदमी भी इसका स्वाद ले सकता है। ‘चित्रलेखा’ की सफलता का रहस्य मुझे यह लगता है कि इस उपन्यास में प्रेम तथा स्त्री-पुरुष संबंध के बारे में कुछ बुनियादी सत्यों को उजागर करने में लेखक को जबरदस्त सफलता मिली है। आलोचकों के लिए ‘चित्रलेखा’ विशेष काम की नहीं है, क्योंकि वे जो मानते हैं या मनवाना चाहते हैं, उसके लिए समर्थन सामग्री इस उपन्यास में नहीं है। इसकी भाषा भी कुछ पुराने ढंग की है। मुझे लगता है कि अगर भाषा और विचार के पूर्वाग्रहों को दरकिनार रख कर देखना संभव हो, तो यह उपन्यास कुछ ऐसे सत्यों को प्रकाश में लाने में सक्षम है जिनकी चर्चा आज और अधिक प्रासंगिक है।

पाप से प्रारंभ
‘और पाप?’ -- इस गूढ़ प्रश्न का उत्तर पाने के लिए आचार्य रत्नांबर अपने शिष्य श्वेतांक को सामंत बीजगुप्त के पास भेजते हैं, तो यह समझ में आता है। गुरुवर बीजगुप्त का परिचय भोगी के रूप में देते हैं, ‘उसके हृदय में यौवन की उमंग है और आंखों में मादकता की लाली। उसकी विशाल अट्टालिकाओं में भोग-विलास नाचा करते हैं; रत्नजटित मदिरा के पात्रों में ही उसके जीवन का सारा सुख है। वैभव और उल्लास की तरंगों में वह केलि करता है, ऐश्वर्य की उसके पास कमी नहीं है। उसमें सौंदर्य है, और उसके हृदय में संसार की समस्त वासनाओं का निवास। ...’ जहां वासना है, भोग है, विलास है, मदिरा है, वहां पाप का निवास असंभावित नहीं। ‘चित्रलेखा’ के पात्र जिस युग के हैं, उस युग में ऐश्वर्य को निन्दा की निगाह से नहीं देखा जाता था। पर सौंदर्य की उपासना और मदिरा के उपभोग में सुख की खोज की बहुत प्रशंसा भी नहीं की जाती होगी। इसलिए पाप की खोज के लिए बीजगुप्त का विलासी जीवन सहज ही एक उपयुक्त क्षेत्र था।

परंतु योगी कुमारगिरि? क्या उसके जीवन में भी या उनके आसपास पाप को समझने की गुंजाइश थी? कुमारगिरि के बारे में बताते हुए महाप्रभु रत्नांबर जिन विशेषणों का उपयोग करते हैं, उन सभी में कुछ पेच है : ‘कुमारगिरि योगी है, उसका दावा है कि उसने संसार की समस्त वासनाओं पर विजय प्राप्त कर ली है। संसार से उसको विरक्ति है, और अपने मतानुसार उसने सुख को भी जान लिया है; ...जैसा कि लोगों का कहना है, उसने ममत्व को वशीभूत कर लिया है। कुमारगिरि युवा है; पर यौवन और विराग ने मिल कर उसमें एक अलौकिक शक्ति उत्पन्न कर दी है। ...’ यानी कुमारगिरि की जो छवि या आत्मछवि है, उसकी हकीकत में आचार्य को पर्याप्त शक है।

बीजगुप्त और कुमारगिरि में साम्य यह है कि दोनों युवा हैं और दोनों के पास शक्ति है – एक के पास वैभव की शक्ति है, तो दूसरे के पास विराग की। जहां शक्तिहीनता है, निर्बलता है, वहां पाप क्या होगा, बशर्ते निर्बल होने या निर्बलता को स्वीकार कर लिए जाने को ही पाप न मान लिया जाए? इस दूसरे तर्क को आज हम समझ सकते हैं, बल्कि समझते भी हैं। इसीलिए शक्तिशाली को घृणा की निगाह से देखने का नया रिवाज अनुचित नहीं है। पर बीजगुप्त और कुमारगिरि के जमाने में भी शक्ति-संग्रह में पाप की संभावना देखी गई, यह एक आधुनिक विचार है। नि:संदेह भगवतीचरण वर्मा एक तरह से नियतिवादी (‘सबहिं नचावत राम गोसाइ’ वर्मा जी का एक और महत्वपूर्ण उपन्यास है) दिखाई देते हुए भी अपने अनेक विचारों और स्थापनाओं में आधुनिक हैं।

प्रेम का परिपाक
अब यह आपत्ति सर्वमान्य हो चुकी है कि पाप को स्त्री-पुरुष संबंधों या उनकी यौन क्रियाओं के दायरे तक सीमित रखना अपने आपमें ही पापपूर्ण है। पाप-पुण्य या नैतिकता-अनैतिकता पर विचार करने का दायरा बड़ा होना चाहिए। लेकिन यह धारणा अभी भी बौध्दिक समाज तक सीमित है। साधारण आदमी की नजर में पाप का सबसे नजदीकी रिश्तेदार सेक्स ही है – या, कहिए अवैध सेक्स। यह मान्यता भी आधारहीन नहीं कि जहां भी स्त्री-पुरुष संबंध होगा, वहां सेक्स का होना अनिवार्य है। इसलिए पाप की ओर इशारा करनेवाली सुई इस संबंध की ओर अपने आप मुड़ जाती है। दिलचस्प है कि ‘चित्रलेखा’ में दोनों का ही संतोषजनक विवेचन मिलता है।

यह भगवतीचरण वर्मा की चतुराई, या भीरुता, है कि प्रेम प्रसंगों से भरे हुए इस रसीले उपन्यास में सिर्फ एक स्थान पर यौन गतिविधि दिखाई देती है - वहां, जहां यह सर्वथा वर्जित था। पाटलिपुत्र की असाधारण सुंदरी और पेशे से नर्तकी चित्रलेखा योगी कुमारगिरि की अलौकिक शक्तियों और विरक्त यौवन से आकर्षित हो कर उससे दीक्षा लेने उसके आश्रम पहुंच जाती है और कुमारगिरि की वासना जाग उठती है। हालांकि योगी बार-बार दुहराता है कि उसे चित्रलेखा से प्रेम है, पर चित्रलेखा को उसके इस दावे में कोई सार नजर नहीं आता। नि:संदेह वह एक समर्पित नायिका की तरह ही कुमारगिरि के पास गई थी - बीजगुप्त के प्रति अपने प्रेम को थपकी दे-दे कर सुलाते हुए। योग की सच्ची साधना करते हुए कुमारगुप्त ने उसका लौकिक स्तर पर प्रत्युत्तर दिया होता, तो दोनों के बीच एक लंबा चलनेवाला प्रेम संबंध विकसित हो सकता था। शायद यौन स्तर पर भी यह चित्रलेखा के लिए यह ज्यादा आनंदमय होता, क्योंकि निरंतर भोग-विलास और अनवरत मदिरा पान से सामंत बीजगुप्त शारीरिक स्तर पर जरूर खोखला हो गया होगा।

पर कुमारगिरि को स्त्री का साथ नहीं, स्त्री का सुख चाहिए था। वह चित्रलेखा के ‘यौवन के अथाह सागर’ में डूबने में सफल हो जाता है और चित्रलेखा भी मन से उसका साथ देती है। पर चित्रलेखा के इस हृदय परिवर्तन की जड़ में एक भयानक झूठ था : कुमारगिरि ने उसे यह गलत सूचना दी थी कि बीजगुप्त ने सामंत मृत्युंजय की पुत्री यशोधरा से विवाह कर लिया है। चित्रलेखा अगर सचमुच किसी से प्यार करती थी तो वह बीजगुप्त ही था। पर योगी कुमारगिरि के प्रति उसका आकर्षण भी कम गंभीर नहीं था। हो सकता है, यह आकर्षण जीवन के एक नए स्वाद के प्रति रहा हो, जिसके केंद्र में भोग नहीं, त्याग और नियंत्रण था। पर इसका माध्यम तो कुमारगिरि ही था। योगी कुमारगिरि के यौवन और सुंदरता ने भी चित्रलेखा को आकर्षित किया था - वह अगर अधेड़ या कुरूप होता, तो चित्रलेखा उसकी ओर शायद नहीं खिंचती। फिर भी चित्रलेखा ने योगी कुमारगिरि को लौकिक प्रेमी के रूप में नहीं देखा था। वह तो योग और साधना की सीढ़ियां चढ़ने के लिए उसके पास गई थी।

लेकिन प्रेम आखिर प्रेम ही होता है और पूर्णता में ही उसे शांति मिलती है। इसीलिए जब योगी से उसे यह खबर मिली कि बीजगुप्त अब विवाहित जीवन बिता रहा है, तो उसने अपने आपको बीजगुप्त के प्रति किसी भी नैतिक बंधन से मुक्त मान लिया। उसके बाद कुमारगिरि से उसका पूर्ण मिलन असंभव क्यों रह जाता? जो कुमारगिरि प्रणयी के रूप में चित्रलेखा को किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं था, उसके अधर चित्रलेखा के अधरों को खींचने लगे और आलिंगन पाश में दोनों ओर से दृढ़ता आ गई। कुमारगिरि के आमंत्रण को मुंदी आंखों से टिक करते हुए चित्रलेखा कह उठी- “तो फिर ऐसा ही हो।” यह प्रेम का परिपाक है। ‘पीली छतरीवाली लड़की’ में जिस तरह के मनोविज्ञान का सहारा लिया गया है, उसके आधार पर यह कहने का लालच हो सकता है कि ऐसा करके चित्रलेखा दरअसल बीजगुप्त से प्रतिशोध ले रही थी। लेकिन मैं चित्रलेखा जैसी परिपक्व और बुध्दिमती स्त्री को इतना नीचे गिरते हुए नहीं देखना चाहता। ज्यादा संभावना इस बात की है कि उसने अपने आपको परिस्थिति के हवाले कर दिया हो। कुछ लोगों ने प्रेम के आनंद की उपमा निर्विकल्प समाधि से दी है। लौकिक सत्य यह है कि कई बार जीवन में निर्विकल्प हो जाने के बाद भी प्रेम बाढ़ के पानी की तरह उमड़ पड़ता है।

प्रेम होता भी है?
दार्शनिक-विचारक ज्यां पाल सार्त्र की मान्यता है कि “प्रेम एक असंभव चीज है। हम जिससे प्रेम करते हैं, उसे संपूर्णत: नहीं तो कुछ हद तक खा जाना चाहते हैं। हमारा प्रेमी भी हमें खा जाना चाहता है। जब तक दोनों अस्तित्व मिल कर एक -अखंड- नहीं हो जाते, तब तक चैन नहीं मिलता। लेकिन चूंकि दोनों में से कोई भी वस्तु नहीं है, दोनों जीते-जागते प्राणी हैं, इसलिए प्रेम में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की स्थिति मुलायम लफ्जों में कहा जाए तो कठिन है और साफ-साफ कहा जाए तो असंभव है। इसलिए कोई भी प्रेम संबंध अंतत: विफल हो जाने के लिए अभिशप्त है। यह पत्ता हवा में कांपते हुए ही पेड़ के गर्भ से बाहर आता है। ”

दर्शन के क्षेत्र में यह मान्यता सार्त्र के नाम के साथ जुड़ी हुई है, पर अगर यह सत्य है तो इसका अनुभव प्राय: सभी विचारकों ने किया है। कबीर की यह स्थापना मशहूर है कि प्रेम गली अति सांकरी, तामे दुइ न समाहिं। यहां जगह बहुत कम है। इसमें दो के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। एक का ही राज चलेगा। उसका, जो ज्यादा मजबूत और कम भावनामय होगा। और तीसरा? अधिकांश प्रेमियों का कहना है कि उसका तो सवाल ही नहीं उठता। प्रेमचंद के उपन्यास गोदान में मेहता भी दार्शनिक है। दार्शनिक क्या है, कॉलेज में दर्शन पढ़ाता है। उसकी शेखी देखने लायक है- “प्रेम सीधी-सादी गऊ नहीं, खूंख्वार शेर है, जो अपने शिकार पर किसी की आंख भी नहीं पड़ने देता। ”

मेहता और मालती दोनों एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। एक नाजुक अवसर पर मेहता पूछता है,- “अच्छा, मान लो, मैं तुमसे विवाह करके कल तुमसे बेवफाई करता हूं तो तुम मुझे क्या सजा दोगी?” मालती जवाब देती है कि “मैं उसका कारण खोजूंगी और उसे दूर करूंगी। ” मेहता जानना चाहता है, “मान लो, मेरी आदत न छूटे?” मालती कहती है, “फिर मैं नहीं कह सकती क्या करूंगी। शायद विष खाकर सो रहूं।” यह एक तरह का प्रेम है। लेकिन प्रेम की एक दूसरी किस्म भी है : मेहता अपना पक्ष रखता है, “मैं पहले तुम्हारा प्राणांत कर दूंगा, फिर अपना। ”

दिलचस्प यह है कि प्रेम के बारे में मालती की राय भी इतनी ही इकतरफा है-लेकिन दूसरे कोण से। उसकी परिभाषा में आक्रामकता नहीं, समर्पण है – “मैं प्रेम को संदेह से ऊपर समझती हूं। वह देह की वस्तु नहीं, आत्मा की वस्तु है। संदेह का वहां जरा भी स्थान नहीं और हिंसा तो संदेह का ही परिणाम है। वह संपूर्ण आत्म-समर्पण है। उसके मंदिर में तुम परीक्षक बन कर नहीं, उपासक बन कर ही वरदान पा सकते हो।”

आधुनिक दिमाग कहेगा, यह प्रेम नहीं, श्रध्दा है। जहां श्रध्दा या आदर न हो, वहां प्रेम का पनपना कठिन है। पर जहां सिर्फ श्रध्दा है, वहां प्रेम इकरंगा हो जाता है। प्रेम पूजा नहीं, अनुराग है।