अपने आंगन का आतंक

Posted By Geetashree On 2:18 PM 22 comments

मनीषा मेरी बेहद करीबी दोस्त हैं. इनके स्वभाव के बारे में जानती थी. इनकी रुचियों, खूबियों का भी मुझे पता था, लेकिन और भी कुछ एसा था जो मुझसे या कहें जमाने से छुपा था (छुपाती रही हैं.). ये छुपा ही रहता. अगर मैंने कुछ लिखने को नहीं कहा होता. उदारमना मनीषा अपनी रचनाएं देने में इतनी कंजूस निकलेंगी ये भी अब पता चला. मनीषा अब भी नहीं चाहती थीं कि दुनिया को पता चले कि वे कविता या कहानी लिखती हैं. मेरे जिद करने पर उन्होने रचनाएं दे तो दीं मगर इस शर्त्त पर कि मैं इसे बिना नाम के लगा दूं. मै समझ सकती हूं उनका संकोच...लेकिन मैं नहीं मानी. कहानी भले कहानी की कसौटी पर खड़ी ना उतरे, कोई परवाह नहीं (हालांकि ये कौन तय करेगा). इस कहानी के सामाजिक सरोकार ने मुझे बेचैन किया. अपने आंगन के आतंक से लड़की की मुक्ति कहां संभव है. 

आज जहां एक कविता या एक कहानी लेकर लोग साहित्यिक मंडली का हिस्सा बन जा रहे हैं वहीं मनीषा के भीतर यानी मन और डायरी दोनो के पन्ने कहानी और कविताओं से भरे हैं और मुझे पता नहीं चला. वह दिल्ली विश्वविधालय में स्पेनिश भाषा पढाती हैं और अब तक कई क्लासिक उपन्यासों और महान लेखकों की जीवनी का अनुवाद कर चुकी हैं. इनका हिंदी में हाथ तंग नहीं है फिर भी हिंदी में लिखने मे संकोच है. अंग्रेजी में लिखती हैं और स्पेनिश में बोलती हैं (क्लास में).

कई रचनाओं का हिंदी में अनुवाद करने वाली की रचनाओं का मैं अनुवाद करुं, मुझे अटपटा लग रहा था. मगर वे माने तब ना. मुझ पर हमेशा की तरह विश्वास रखते हुए ये काम मेरे माथे मढ दिया. सबसे पहले पेश है उनकी कहानी का अनुवाद. इसमें मेरा कुछ भी नहीं है. कहानी ज्यों की त्यों आपके सामने रख रही हूं इस उम्मीद के साथ कि कहानी जहां, जिन सवालों के साथ खत्म होती है वहां से कई और बड़े सवाल खड़े हो जाते हैं. कहानी पढेंगे तो आप अपने भीतर खुद इन सवालो का जवाब तलाशेंगे कि क्या मरने वाले के सारे गुनाह माफ कर दिए जाने चाहिए. पढें और बहस में शामिल हों.... 

-गीताश्री

कहानी

कोई बात नहीं पापा


मनीषा तनेजा

मेरे पास उस घृणित व्यक्ति को माफ करने, नजरअंदाज करने या उसे इंकार करने के लिए तकरीबन 20 मिनट थे. वह मेरा बाप था.

हम अस्पताल के एक कमरे में बैठे, जहां एंटीसेपिटक्स की गंध थी और वहां बुझे चेहरों वाली नर्सों की आवाजाही लगी हुई थी, जिनके लिए जिंदगी और मौत में कोई फर्क नहीं था....

आज वह इंसान मर रहा था लेकिन मेरी दादी मां नहीं होतीं तो आज मैं यहां इसके पास नहीं आती. इस जगह, जहां जिंदगी के ऊपर मौत का साया मंडरा रहा था, उस बेजान होते इंसान ने अपनी आंखें खोली और कहा, 'मेरा ये अंदाजा है कि मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा बर्ताव किया है.' 

वह मुझसे यह जानना चाह रहा था कि क्या उसके ऐसे आचरण को माफ भी किया जा सकता है? क्या मैं उसे माफ कर पाऊंगी? उसे उम्मीद थी कि मैं कहूंगी, 'पापा, आप तो बुरे थे, फिर भी मैं आपको माफ करती हूं.' लेकिन...

तब मेरा सवाल था कि जो भाषा मैं और वह बोला करते थे, क्या उसे मैंने उसके शब्दकोश से सीखा था? मैं बुरी थी. तुम बुरे थे.

जिस पल उसने अपनी बातें खत्म की थी, उस समय से मेरी समझदारी का मीटर तेजी से चलना शुरू हो गया. मेरी चुप्पी उसे कहने का मौका दे रही थी और वह कह रहा था कि मैं ऐसा कुछ चाहता नहीं था जो मैंने किया. उसकी यही बात अपने आप में एक जवाब थी. अगर मेरा जवाब उससे अलग होता तो उसे वहीं दिया जाना था. यही वह घृणित व्यक्ति था, एक बिल्कुल बददिमाग या शायद बेचैन.

अब वह व्यक्ति मुझसे सवाल पूछने के बाद काफी दीन-हीन सा लग रहा था. वह चाह रहा था कि बिना किसी लाग-लपेट के, बिना कोई दया दिखाए मैं उसकी आलोचना करूं. और फिर मैं उसकी पीड़ा को महसूस करके उसे संतुष्ट होने का मौका दूं.

मेरी मां आज से 20 साल पहले दुनिया छोड़ गई थीं. तब मेरी उम्र केवल सात साल की थी. अपने ही पिता द्वारा उन दिनों सताया जाना मेरे लिए आज भी एक डरावने सपने की तरह है. कई रातों तक वह अपनी आठ साल की बच्ची के साथ बलात्कार करता रहा जो इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकती थी कि उसके साथ क्या हो रहा है. किसी तरह मैं यह समझ पाई कि यह गलत है. बहुत गलत. उसके गंभीर परिणामों के बारे में जान कर इस पूरे मामले को समझना मेरे लिए और भी मुश्किल हो जाता.

हर दूसरे दिन दारू पीकर मारपीट से होने वाली दुश्वारियों को कम करने के लिए परिवार और पड़ोसियों ने कोई कदम नहीं उठाया. मेरी छह साल की छोटी बहन को इन प्रताड़नाओं से बचाने के लिए उस आदमी की बूढ़ी मां यानी मेरी दादी को बहुत अपमान और जिल्लत का सामना करना पड़ा. इन बातों को सोचकर मेरा खून खौल उठता है और अंदर से आवाज आती है, 'हां पापा, सच में तुम एकदम से हरामी थे.'

लेकिन मैंने ऐसा कभी नहीं कहा. मैंने फैसला किया कि मैं उसे अपनी माफी से महरूम नहीं करूंगी. फिर भी मैंने वह कहा, जिसे मेरे दिमाग ने, मेरी भावनाओं ने और यहां तक कि मेरे शरीर ने (जो अपनी तरह से सब कुछ जानता था) और मैंने एक झूठ माना. फिर भी मैंने कहा, 'नहीं पापा! कोई बात नहीं. हम पुरानी बातों को भूलें. यह तो बहुत पहले हुआ था.' 

वह मुझे टकटकी लगाकर देखता रहा और धीरे से कहा, 'शुक्रिया'.

कुछ ही घंटों के बाद वह मर गया. मुझे विश्वास है कि वह शांति से मरा. मुझे लगता है कि वह समझ रहा था कि उसे माफी मिल चुकी है. चूंकि मैंने उसे बहुत आसानी से माफ कर दिया था इसलिए उसने असीम शांति का अनुभव किया और उसे लगा कि वह इसका हकदार था.

तो क्या मुझे शांति की समझ नहीं? क्या हमें यह नहीं सिखाया गया कि उदारता दिखाकर और दूसरों को माफ करके हम सुकून पाते हैं? और करूणा और पवित्रता क्या इसी का पुरस्कार नहीं हैं? और ऐसा क्यों किया मैंने? क्या इसलिए कि मैं किसी सतह पर उससे प्यार करती थी और किसी दूसरे तरीके से मेरे लिए उसके प्यार को भी महसूस करती थी? या यह कुछ ऐसा ही था जो प्राय: एक बाप और बेटी के बीच होता है. यहां तक कि मौत के साये में भी वह मुझसे खुली माफी की उम्मीद कर रहा था. मैंने उसे माफ कर दिया. ऐसा मैंने खुलकर किया. या... क्या मैंने ऐसा ही किया? इन सबके बावजूद क्या खून पानी से ज्यादा गाढ़ा है?

सवाल नहीं रुकते लेकिन इनका जवाब मेरी पहुंच के बाहर है. कई रातों तक मैं बिस्तर पर जागती आंखों से अपने अतीत में उन तर्कों को ढूंढती, जो मुझे मिल नहीं पाते....