बैठा रहा चांद

Posted By Geetashree On 1:23 AM 6 comments
अविजीत घोष पिछले 18 सालों से पत्रकारिता में है। इन दिनों टाइम्स आफ इंडिया से जुड़े हैं। कभी कविता लिखने का शौक था। अब उपन्यास लिखने की चाहत है। अंग्रेजी में एक लिखा भी है। नाम है-bandicoots in the moonlight. कोशिश है कि इसका हिंदी अनुवाद भी हो।
इन दिनों भोजपुरी फिल्मों पर किताब लिखने की कोशिश कर रहे हैं। मेरे नुक्कड़ पर इनका स्वागत है। उनकी ताजा कविता पढिए..
बैठा रहा चांद
चबूतरे के करीब
कोई सिहरन कुरेदती रही
रीढ की हड्डी धीरे धीरे
उतार ना सका
तुम्हारे गंध के केंचुल को किसी तरह
तुम बहती रही रात भर
धमनियों में धीरे धीरे

मेरे शहर में मेरा बचपन

Posted By Geetashree On 4:31 AM 4 comments
साहित्यकार कृष्ण बिहारी आबूधाबी में रहते हैं. दिल उनका अपने शहर कानपुर में बसता है. मैं पिछले दिनों कानपुर गई थी. वहां से प्रो. दया दीक्षित ने बुलावा भेजा था. वो सामयिक प्रकाशन से आई मेरी किताब स्त्री आकांक्षा के मानचित्र पर गोष्ठी करना चाहती थी. कानपुर जाने से पहले मैंने कृष्ण जी को मेल करके पूछा कि आपके शहर का मिजाज कैसा है...वे परदेस में बैठे शहर की याद में भावुक हो उठे. यहां उनकी भावुकता शब्दों में दिखाई दे रही है. पढने के बाद लगता है, एक कानपुर हमारा शहर भी है...वही किरदार...वही चौक-चौराहे...वही मकान-गलियां..हमारी आत्माओं के बोझ से लदी. छोड़ आए हम वो गलियां...या कहें कि छोड़ नहीं पाये हम वो गलियां.... पढिए और तलाशिए अपने-अपने कानपुर को...अपने बचपन को....अपने होने को.-गीताश्री


मेरे शहर में मेरा बचपन

कृष्ण बिहारी


कानपुर, यह नाम यह संज्ञा मेरे लिए दूसरे नामों की तरह यह केवल एक नाम नहीं है और न दुनिया या हिन्दुस्तान के अन्य शहरों की तरह यह कोई शहर भर है. कानपुर वह शहर है जो मेरी सांसों में वैसे ही बसा है जैसे किसी आशिक के दिल में उसकी महबूबा. इसे ऐसे भी कह सकता हूं कि मेरे महबूब शहर का नाम कानपुर है. मैं इसका आशिक और इसकी महबूबा दोनों ही हूं. स्मृतियों में मिठास और दंश का विचित्र सा सम्मिश्रण होता है. यह शहर मुझे धक्के मार मारकर बाहर भगाता रहा है और मैं हूं कि हर बार लौट लौटकर इसके पास आता रहा हूं या शायद यह कि शहर मुझे बार बार अपने आगोश में बुलाता रहा है.

तीस साल से मैं इस शहर से बाहर हूं और यह है कि मेरे दिल में धड़कता रहता है. मैं क्या बताऊं कि ऐसा क्यों होता है कि जब यह मेरी आंखों में उभरता है तो इसकी छवि पर मेरी नम हो गई पुतलियों का धुंधलका छा जाता है. धुंधलका जितना गहरा होता है यह शहर उतनी ही चटक छवि के साथ उभरता है.

मगर अफसोस, रात दिन जागने वाले मेरे जिन्दा शहर को नेताओं और प्रशासन ने इस तरह मार डाला कि न अब यह जीने में है और न मरने में. जब मुम्बई को लोग आज की तरह जानते भी नहीं थे तब मेरा शहर हिन्दुस्तान का मेनचेस्टर कहलाता था. लोगों को रोजी रोटी देने वाला शहर परिवारों को जिलाने वाला मेरा शहर किसी कोरामिन की उम्मीद में सांस रोक रोककर जी रहा है. कि शायद कोई मसीहा उतर आए. कोई अवतार जन्म ले और इस शहर की किस्मत को भाग्योदय का नजारा देखने को मिले. उद्योग धंधे नेतागिरी लील गई और प्रशासन उन सुविधाओं को हजम कर गया जो आम लागों के लिए थीं. निर्भीक पत्रकार और देशभक्त गणेश शंकर विद्यार्थी का यह शहर थानेदारों को सलाम करके खबर जुटाने वाले पत्रकारों और लुच्चई की राजनीति करने वाले गुण्डों का शहर होता गया. खैर जो है वह भी मेरा ही अपना है. बात को अगर एक सिरा दे दूं तो शायद बात बने.

होश संभालने की वह कोई ऐसी उमर भी नहीं थी जब तीन साल की अवस्था में पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के गांव कुण्डाभरथ से इस शहर के सबसे साफ सुथरे इलाके अर्मापुर इस्टेट में मुझे बाबूजी ले आए. उस उमर में क्या पता चलता कि वहां कौन लोग रहते हैं और मैं कानपुर के किस विशिष्ट क्षेत्र में रहने लगा हूं. यह तो बहुत बाद में पता चला कि इस बस्ती में सरकार के सुरक्षा विभाग से जुड़े वे कर्मचारी और अफसर रहते है, जो आयुध निर्माणी और लघु अस्त्र निर्माणी कारखानों में काम करते हैं.

आर्म्स बनाने वाली फैक्ट्री के निवासियों की इस बस्ती का नाम भी आर्म्स से अर्मापुर पंडा. कर्मचारियों को पद के हिसाब से क्वार्टर मिले थे. बाबूजी न तो लेबर थे और न अधिकारी. स्टाफ में सबसे निचला दर्जा. काउण्टर का पद. इस हिसाब से उन्हें जो क्वार्टर मिला वह लेबर को ही मिलता था. आर टाइप 45. इस क्वार्टर में एक कमरा एक बरामदा और एक आंगन होता था. बरामदे में ही खाना बनाने के लिए रसोईघर की व्यवस्था करनी होती थी. नहाने और बाथरूम जाने की कोई व्यवस्था नहीं थी.

एक लाइन में बारह क्वार्टर आगे और बारह उसके पीछे थे. दो लाइनों के दोनों सिरों पर सरकारी नल थे जिनसे पानी भरकर लोग अपने क्वार्टरों में रखते थे. क्वार्टर में आंगन के आगे मुख्य दरवाजा होता था, जिसके आगे बाहर की दुनिया थी. यूं तो इससे निचले दर्जों के भी क्वार्टर थे जिन्हें एस टाइप कहा जाता था.

एस टाइप में केवल एक कमरा और बहुत छोटा सा बराम्दा होता था. आर और एस टाइप के क्वार्टरों की कुल संख्या लगभग ढाई हजार थी. आज तक कहा जाता है कि अंगरेजों ने ये क्वार्टर अस्तबल के रूप में बनाए और इनमें घोड़े रहा करते थे.

आजादी के बाद इन क्वार्टरों को श्रमिकों को अलॉट किया गया और तब इनमें हिन्दुस्तानी गोरे साहबों के घोड़ेनुमा नौकर रहने लगे. इन क्वार्टरों के अलावा जो दूसरे टाइप के थे वे भी कई श्रेणियों के थे और पद के अनुकूल अलॉट किए गए थे. इस तरह कुल मिलाकर चार हजार से अधिक क्वार्टर थे जिनमें रहने वालों की संख्या लगभग पचीस हजार रही होगी. लेकिन इस स्थिति को क्या कहूं कि जहां श्रमिक अंग्रजों के बनवाए अस्तबलों में रहते थे वहीं उनके बंगलों में हिन्दुस्तानी गोरे अधिकारी रहने लगे. एक एक बंगला कई कई एकड़ में है.

खैर वक्त को क्राइटेरिया मानूं तो उस बस्ती में अमन चैन था. वातावरण गुलजार रहता था. अद्भुत् भाईचारा था. आज वही बस्ती भुतहे डेरे जैसी हो गई है. शायद मैं इसे आगे लिखूं. फिलहाल अभी तो यह कि जिस क्वार्टर में बाबूजी मुझे लाए थे उसके बाहर की दुनिया वह मेरे होने को बताने वाली मुझे बनाने वाली एक अलग किस्म की दुनिया थी.

बाहर की दुनिया में सबसे पहले तो बस बीस पचीस मीटर की दूरी पर निर्मल की चाय की दूकान थी. यह दूकान चौराहे पर थी और चौराहा पानी की टंकी नाम से मशहूर था. इतना मशहूर कि कानपुर रेलवे स्टेशन से अगर कोई सवारी अर्मापुर के लिए रिक्शे पर बैठती तो रिक्शेवाला पूछता “ कहां उतरना है, पानी की टंकी से पहले या आगे” यानी कि अर्मापुर बड़ा था और इसके दूसरे दो छोर मसवानपुर और रावतपुर गांवों से मिलते थे, तीसरा छोर पनकी को छूता था जो सन 65 के बाद से ही इंड्सट्रियल एरिया के रूप में विकसित होने लगा था.


आज बावन साल बाद जब मैं अपनी स्मृति से
गुजर रहा हूं तो यह सोचने के लिए ठहर सा गया हूं कि क्या नियति ने ही यह तय कर रखा था कि अपनी उमर का बहुत सा हिस्सा मैं इस्लामिक मुल्क में गुजारूंगा.

मैं कभी भी मुंह उठाए निर्मल की दूकान पर पहुंच जाता और लेमनचूस या बिस्कुट जो भी चाहता वह ले लेता. शायद मैं अकेला बच्चा था जो निर्मल की दूकान पर इस तरह पहुंचकर मनमानी कर लेता था.

लेकिन इससे पहले कि मैं निर्मल की चाय की दूकान पर जाऊं दो काम रूटीन बन चुके थे, एक तो सुबह बिस्तर से उठते ही सुलेमान के घर जाना और उनकी अम्मी के सामने आंख मलते हुए बैठना. अम्मी चाय के साथ एक रोटी देतीं. उसे खाने के बाद घर आना.

दातून या मंजन करना भी जरूरी है यह बात उन दिनों कोई मायने नहीं रखती थी. सुलेमान का छोटा भाई उस्मान मेरी ही अवस्था का था लेकिन उससे कभी मेरी दोस्ती रही हो ऐसा याद नहीं पड़ता. आज बावन साल बाद जब मैं अपनी स्मृति से गुजर रहा हूं तो यह सोचने के लिए ठहर सा गया हूं कि क्या नियति ने ही यह तय कर रखा था कि अपनी उमर का बहुत सा हिस्सा मैं इस्लामिक मुल्क में गुजारूंगा.

जब पन्द्रह- बीस साल का ही था तो मुझे गांव घर के लोग तुर्क कहने लगे थे. तुर्क माने उनकी दृष्टि में मुसलमान. आज यह भी सोचता हूं कि कट्टर ब्राह्मण परिवार का सबसे बड़ा लड़का मैं बचपन से ही इतना विद्रोही क्यों था. खैर, सुलेमान के अब्बा और अम्मी मुझे बहुत प्यार करते थे. मुझे भी मेरी अम्मां और बाबूजी ने सुलेमान के घर जाने से कभी मना नहीं किया.

दूसरा काम. बाबूजी को गाय पालने का शौक था.

जब मैं सुलेमान के घर से लौटता तो खूंटे से बंधी गाय को खोलता. उसका पगहा पकड़कर आगे आगे चलता और कवार्टरों की लाइन के सामने से गुजरते हुए जोर से बोलता 'नून सुर्ती तमाकू ले लो, ले लो नून सुर्ती तमाकू' गाय बहुत सीधी थी. वह पीछ- पीछे चलती और मैं जहां रूकता. वह भी रूक जाती. सामने के क्वार्टरों में से कोई निकलता और मुझसे पूछता कि गाय का दाम कितना है. मैं बताता कि एक रूपया. वह मुझे कोई सिक्का देकर गाय का पगहा पकड़ लेता. मैं उससे पूंछ का दाम भी मांगता. वह मुझे एक सिक्का और देता और गाय को आस-पास किसी खूंटे से बांध देता.

अम्मां क्वार्टर से बाहर नहीं निकलती थीं. गांव का परदा शहर में भी लागू था. दूसरी बात कि अपनापे और भाईचारे के उस माहौल में किसी खतरे या दुर्घटना की आशंका किसी को भी नहीं थी. आज क्या तीन साल के बच्चे को कोई इस तरह निर्द्वन्द्व घर से बाहर छोड़ सकता है.

शाम को साढे पांच बजे बाबूजी आते और गाय को वापस खूंटे पर लाते. सानी पानी करते. उसे दूहते और फिर कच्चे गर्म दूध का एक गिलास भरकर मुझे पिलाने के लिए निर्मल की दूकान के पास खड़े होते.

वहीं उस समय एक गुब्बारे वाला आ जाता था. उसके पास गैस वाले गुब्बारे होते थे. एक पैसे का एक गुब्बारा. एक पैसे का सिक्का छोटा भी होता था और बड़ा भी. जो बड़ा होता था उसमें छेद होता था. उसे छेदहा पैसा कहते थे. ये दोनों सिक्के तांबे के होते थे. मैं एक घूंट दूध पीता और एक गुब्बारा उड़ाता. कभी गिलास दस पैसे में खाली होता तो कभी बीस पैसे में. निर्मल की दूकान का हिसाब होता और शाम ढलने को हो जाती.

ऐसा करीब चार साल तक चला. मेरी प्रारम्भिक शिक्षा उसी क्वार्टर में शुरू हुई. दामोदर त्रिपाठी मेरे पहले शिक्षक थे. घर आकर पढाते थे. हिंदी और अंकगणित. अंग्र्रेजी मुझे बाबूजी ने पढाई. बाबूजी गांव के पहले व्यक्ति थे जिसने हाई स्कूल यू. पी. बोर्ड से अंग्रेजी विषय लेकर पास किया था. उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी जो उन्होंने स्वाध्याय से अर्जित की थी. बाबूजी ने मुझे चार पांच साल ही पढाया होगा क्योंकि उमर के बहुत कच्चे मुकाम पर ही मैं उनका घोर विरोधी हो गया और ऐसी स्थिति हो गई कि हम एक दूसरे को सहने लगे. लेकिन यह उनकी पढाई हुई अंग्रेजी ही है जिसके बल पर मैं कहीं भी किसी भी जगह आत्मविश्वास के साथ खड़ा हो सकता हूं.

अपनी प्रारंभिक शिक्षा के उस दौर की एक घटना बताना चाहूंगा. दामोदर त्रिपाठी मुझे पढाने आते थे. आए. बैठे. पढाना शुरू किया.

मैंने कहा 'आप आंखें बन्द कीजिए' उन्होंने आंखें बन्द कीं. मैं घर में गया. वापस आया. उनकी आंखें तब तक बन्द थीं. जब उन्होंने चीखते हुए आंखें खोलीं तब तक मैं अपना काम कर चुका था.

मैंने उनकी नाक पर चाकू फेर दिया था. वह हड़ाबड़ा हुए खून पोंछ रहे थे और मैं हकबकाया हुआ इस अप्रत्याशित स्थिति से उत्पन्न परिस्थिति के आसन्न संकट को सोचते हुए थरथरा रहा था. हुआ यह था कि बीती रात को बाबूजी मुझे रामलीला दिखाने ले गये थे और मैंने सुर्पणखा अंग भंग देखा था. मैं लक्ष्मण क्यों बना, याद नहीं. आज मैं स्वयं अध्यापक हूं और अपने बचपन की इस गतिविधि पर लज्जित हूं मगर ऐसा दूसरी बार भी हुआ और इससे भी ज्यादा दुखद ढंग से. कभी आगे या अगले भाग में इस घटना के बारे में लिखूंगा और तब तक शहर को कुछ और सांद्रता के साथ जियूंगा.

साढ़े सात की आख़िरी बसः हेमंत शर्मा की कहानी

Posted By Geetashree On 8:36 AM 3 comments
एक कहानी और

अपने नुक्कड़ पर एक और दोस्त पत्रकार हेमंत शर्मा की पहली कहानी लेकर मैं हाजिर हूं. हेमंत चाहते थे मैं अपनी राय इस कहानी के बारे में दूं. मैंने पढा और लगा कि अकेले पढना और भय और अवसाद से भर जाना ठीक नहीं. ज्यादा से ज्यादा दोस्त पढ़ें. हेमंत का संकोच दूर कर दिया और कहानी मेरे कब्जे में.


हो सकता है प्रचलित अर्थों और मुहावरों में यह कहानी, कहानी की कसौटी पर खरी ना उतरे. शिल्प की दृष्टि से कोई कमी रह गई हो. कथा के कई तत्व नदारद हों, लेकिन इतना जरुर कहूंगी कि एक पत्रकार किस्सागो चाहे जैसा हो, कहन में कमजोर नहीं होते. कहानीकार को अंधेरे कमरों की रहस्यमयता को नैरेट करना आता है. कहानी को ज्यों का त्यों आपके सामने धर दिया गया है.


पढिए और बताइए...कि क्या कहानी अपने अंधेरे से बाहर निकल रही है....गीताश्री


साढ़े सात की आख़िरी बस


हेमंत शर्मा


इस कहानी की मुख्य पात्र असल में माँ हैं. पिता की जो छवि होश संभालने के बाद मेरे जेहन में बनी थी दरअसल उसे 'लार्जर देन लाइफ' माँ ने ही बनाया था. शायद यही कारण था कि पिता के आसपास मुझे हमेशा एक औरा नज़र आता. इस औरे की रोशनी खासकर ठंड और बरसात के दिनों में मुझे और माँ को डर और बुरे ख्यालों से बचाए रखती.


पिता इंजीनिअर थे और पता नहीं क्यों, उनका तबादला हमेशा छोटे-छोटे गाँवों में होता रहता. यहाँ पक्की सड़क नहीं बनी होती थी और यह जिम्मेदारी पिता पूरी करते थे. गाँव में बसें आती थी लेकिन सिर्फ़ सुबह और शाम को. अगर पिता शहर गए होते तो मैं और माँ शाम होते ही घड़ी पर टकटकी लगाये रहते. माँ के इसी इंतज़ार ने मुझे बहुत ही कम उम्र में घड़ी देखना सीखा दिया था.

शाम साढ़े सात बजे शहर से आखिरी बस आती और हम दोनों मान कर चलते कि पिता इस बस से जरूर आ गए होंगे. घर आते हुए वे अपने दोस्तों से मिलते और सिगरेट के कश लगाकर तुंरत ही घर आ जाते. बस के गाँव पहुँचने, और पिता के घर पहुँचने के बीच, लगभग बीस मिनट लगते थे. माँ पाँच मिनट और इंतज़ार करतीं, फिर मुझे यह पता लगाने भेजती कि बस समय से आई है या नहीं? बस शायद ही कभी देर से आती थी और इस बात का पता माँ को भी था. पिता भी बस की तरह कभी देर से नहीं आते थे और यह बात भी पता होने के बावजूद माँ मुझे बस की ख़बर लेने भेजती और मैं डर जाता.

मुझे गाँव की कच्ची सड़क का अँधेरा या उस पर हर समय काटने को तैयार बैठे रहने वाले कुत्ते नहीं डराते थे बल्कि माँ का वह डर डराता था कि- पिता नहीं आए तो? वैसे कभी-कभार ही ऐसा होता कि बस आती और पिता नहीं आते.

जिस सड़क से पिता घर आते वह गाँव के बीच से होकर आती थी और मेरे लिए खेल के मैदान की तरह थी, जिसके हर गड्ढे को मैं जानता था. सड़क पर पड़े गिट्टी-पत्थर भी मुझे जान-पहचान के लगते. कई बार मैं आँखें बंद कर कुछ कदम चलता और और फिर ख़ुद को ही यह बताकर चमत्कृत हो जाता कि कीचड़ के बीच से भी मैं पैर गंदे किए बिना निकल सकता हूँ. रास्ते के सारे कुत्ते मुझे अपने लगते और हमेशा उनसे आँखें मिलते हुए मुझे लगता कि वे भी मुझे जानते हैं. कई बार मैं रात को भी इस रास्ते से निकलता और पिता के पास जाता. तब पिता बाज़ार में कहीं होते थे और मेरी पेंसिल जवाब दे जाती थी तो मैं पेंसिल लेने बाज़ार दौड़ जाता. मैं बिना डरे रास्ते पिता के पास पहुंचता और पेंसिल खरीद कर उनके साथ घर लौटता.

कई बार जब पिता देर से आते तो माँ का डर धीरे-धीरे उनके शरीर से निकल कर मुझ तक पहुँचने लगता. फिर मेरे शरीर से फ़ैल कर पूरे घर में पसर जाता. कई बार माँ घर की देहरी पर नमक रखकर इस डर को रोकने की कोशिश करती. माँ को लगता था कि इसमें घर के पीछे वाले हिस्से में बने उन दोनों अंधेरे कमरों का हाथ है जहाँ जाने की मुझे मनाही थी. माँ कहती थी कि वहां कुछ है. घर के सामने रहने वाली अनीसा चाची हमारे घर के बारे में माँ को कई बातें बताती थीं. माँ को लगता था कि अनीसा चाची इन मनहूस कमरों का इलाज़ कर सकती हैं जो ऐसे हालात पैदा करते थे कि पिता की आखिरी बस छुट जाए. माँ को मैंने कई बार यह कहते भी सुना था कि किसी 'रतलाम वाले चाचा' से उन्होंने ऐसा तावीज़ बनवाया है जो पिता के दाहिने हाथ पर बंधने के बाद इन कमरों की मनहूसियत ख़त्म कर देगा और फिर यहाँ का बल्ब बार-बार फ्यूज़ नहीं होगा. मैं भी इन कमरों में जा सकूँगा और पिता की आखिरी बस कभी नहीं छूटेगी.

लेकिन वह ताबीज़ अभी आया नहीं था इसलिए पिछ्वाड़े के अंधेरे कमरे इस कोशिश में थे कि पिता की आखिरी बस छुट जाए. माँ को गुस्सा भी आ रहा था कि पिछले हफ्ते यदि उनकी तबियत ख़राब नहीं होती तो हम तीनों रतलाम जाकर उन चाचा से ताबीज़ ले आते और आखिरी बस के छूटने का झंझट ही ख़त्म हो जाता. लेकिन रतलाम नहीं जा पाने के लिए भी वे इन कमरों को ही जिम्मेदार मानती थीं. माँ ने एक रात पहले ही नीली बास्केट में ज़रूरी सामान भी रख लिया था और मुझसे वादा किया था कि वे मुझे चोकलेट का बड़ा पैकेट और आवाज़ करने वाली कार दिलवायेंगी. लेकिन सुबह-सुबह माँ को इतना तेज़ बुखार हो गया कि वे बिस्तर से ही नहीं उठ पा रही थीं. बुखार तो अगले ही दिन उतर भी गया लेकिन इससे माँ का ये विश्वास और भी पक्का हो गया कि कोई है जो उन्हें उस ताबीज़ को लाने से रोक रहा है. मुझे लग रहा था कि पीछे वाले कमरों को मेरी कार और चोकलेट वाली बात का भी पता चल गया था.

माँ का बुखार उतरते ही पिता को अगले दिन फिर शहर जाना पड़ा. उस दिन जब अनीसा चाची ने लाल मिर्च से माँ की नज़र उतारी और मिर्च को आग पर जलाया तो मुझे ज़रा भी खांसी नहीं आई. अनीसा चाची की आँखें तब काफी बड़ी-बड़ी हो गई थीं. माँ ने भी तय कर लिया था कि इस रविवार चाहे जो हो जाए, वे रतलाम जाकर ताबीज़ लेकर आएँगी. बाद में अनीसा चाची ने मुझे और माँ को काला धागा बांधा. अंधेरे कमरों के खिलाफ माँ की लड़ाई में वे हमेशा माँ के साथ खड़ी दिखाई देती थीं. माँ कहती थीं कि उनके चार साल के बेटे की मौत के पीछे भी इन्हीं कमरों का हाथ था क्योंकि इन कमरों को बच्चों की हँसी पसंद नहीं थी. हमारे आने के पहले तक यह घर खाली पड़ा था और मकान मालिक ने पिता से काफी खुशामद की थी कि वे यह घर किराये पर ले लें. मकान मालिक शराबी था और उसकी माली हालत ऐसी नहीं थी कि वह घर की पुताई भी करवा पाता.

गुरुवार को अनीसा चाची और माँ फिर से अंधेरे कमरों के खिलाफ़ इतनी धीमी आवाज़ में बातें कर रहे थे कि मुझे काफी कोशिशों के बावजूद कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था. मैं जब पास गया तो दोनों चुप हो गए. बस मैं इतना सुन पाया कि माँ इस रविवार किसी भी हालत में रतलाम जाने जाने वाली हैं और अनीसा चाची अपने घर बैठकर उन अंधेरे कमरों को रोकेंगी जो चाहते थे कि कि माँ रतलाम नहीं जा पाए.

लेकिन रविवार अभी तीन दिन दूर था और पिता को शहर जाना पड़ा. मैं जब स्कूल से घर लौटा तो बारह बजे थे. माँ और अनीसा चाची खिड़की के पास बैठे थे फिर भी उनका चेहरा मुझे साफ़ नज़र नहीं आ रहा था. माँ के चेहरे पर एक अज़ीब सा दर्द था जो अक्सर मुझे तब दिखाई देता था जब उनकी तबियत ठीक नहीं होती थी. तब मुझे अपने हाथ से खाना लेना पड़ता था. माँ बिस्तर पर लेटी होतीं और मुझे अपनी अधखुली आंखों से इशारा कर देतीं कि मैं अपना खाना ख़ुद ले लूँ. आम तौर पर तब मुझे रात की ठंडी रोटियां दूध के साथ खानी पड़ती थीं. खाना लेने के लिए मुझे रसोईघर में जाना होता जो सीढ़ियों के दूसरी ओर था. रसोईघर इतना बड़ा था कि मुझे कई बार डर लगता कि यदि भागना पड़ा तो मैं वहां से बाहर ही नहीं निकल पाऊंगा.

उस दिन भी मैंने ख़ुद जाकर खाना लिया और वहीँ बैठकर खाने लगा. जब माँ के पास लौटा तो अनीसा चाची जा चुकी थीं पर माँ के चेहरे की सूज़न साफ़ दिखाई दे रही थी. मुझे पता था अब माँ सो जाएँगी और मुझे अकेले ही शाम तक रहना होगा. लेकिन उस दिन मेरे डर की उम्र थोड़ी कम थी और माँ चार बजे ही उठ गईं. उन्होंने हम दोनों के लिए चाय बनाई और शाम के खाने की तैयारी करने लगीं. मैं उस सड़क पर निकल आया जहाँ मुझे डर नहीं लगता था और मेरे सारे दोस्त जहाँ मेरा इंतज़ार करते थे. शाम के साढ़े छः बज चुके थे. गिल्ली-डंडे की न जाने पारियां हो चुकी थी. फुटबॉल भी खेला जा चुका था और क्रिकेट भी. हालाँकि जबसे मेरा बल्ला टूटा था क्रिकेट में कोई मज़ा नहीं बचा था लेकिन कपड़े धोने की मोगरी ने हमारे बल्ले की कमी पूरी कर दी थी. मगर आज़ तो माँ की मोगरी का हत्था भी टूट गया था और मैं चुपचाप जाकर उसे पिछवाड़े की उसी खुली जगह में रख आया था जो उन अंधेरे कमरों के पास थी, जो चाहते थे कि पिता की आख़िरी बस छूट जाए.

माँ ने मुझे खाने के लिए बुलाया लेकिन मैंने साफ़ इनकार कर दिया था. मैं पिता के ही साथ खाना चाहता था क्योंकि तब माँ गर्म-गर्म रोटियां उतारतीं और उन्हें थोड़ा ज्यादा सेंक कर उस पर इस तरह घी लगाती कि मैं दो के बजाय पाँच-छः रोटियां खा जाता. पिता मुस्कुराते और माँ मुझे देखकर पिता की तरफ़ देखतीं और फिर वे भी मुस्कुरा देतीं. मुझे इस तरह पिता के साथ बैठना बहुत अच्छा लगता था क्योंकि तब सामने चूल्हा जल रहा होता था और उसकी लाल लौ में पिता का चेहरा ज्यादा सुर्ख हो जाता. चूल्हे की लौ और पिता का औरा पूरे रसोईघर को रोशन कर देते थे और मुझे यकीन था कि अंधेरे कमरे इस रोशनी से बेहद डरते थे. लेकिन पिता के आने में अभी भी एक-डेढ़ घंटा बाकी था इसलिए अंधेरे कमरे अब तक डरे नहीं थे.

सात बजते-बजते माँ ने मुझे अपने पास बुला लिया. आकाशवाणी इंदौर पर शायद खेती-गृहस्थी कार्यक्रम चल रहा था और नंदाजी किसान भाइयों को बता रहे थे कि चने की फसल को इल्लियों से बचाने के लिए क्या करना चाहिए? माँ और मैं यह कार्यक्रम रोज सुनते और मैं सोचता- क्या अंधेरे कमरों से हमें बचाने का कोई उपाय नंदाजी कभी बताएँगे? मुझे इस कार्यक्रम की धुन बहुत अच्छी लगती थी क्योंकि उसमें गले में घंटी बंधे गाय-बैलों के भागने की वैसी ही आवाज़ होती थी जो शाम को सामने वाली कच्ची सड़क पर सुनाई देती थी.

पिता के आने का समय हो रहा था, और जैसा कि उस आख़िरी बस के बूढे ड्राईवर के बारे में सब लोग बताते थे, उसकी बस को कभी किसी ने देर से आते नहीं देखा था. माँ ने एक बार फिर घड़ी पर नज़र डाली, और कहा- बस आ गई होगी ना? पता नहीं, उनका भरोसा पिता के आने को लेकर अधिक था या उस बूढे ड्राईवर पर, जो कभी बस को देर से नहीं लाता था. अब तक धीरे-धीरे हाथ चला रही माँ के हाथों में अचानक फुर्ती आ गई थी. अंधेरे कमरे हारने वाले थे और अनीसा चाची की मदद से माँ जीतने वाली थीं. मैं कल्पना कर रहा था अब पिता बस-स्टाप से निकले होंगे...अब वे चौराहे पर करोड़ी की होटल पर खड़े होंगे...हमेशा की तरह करोड़ी ने उनके लिए चाय तैयार रखी होगी और बिना मांगे उन्हें दी होगी...अब उनके हाथ में सिगरेट होगी जिसे देखते ही पाठक सर उनके पास आए होंगे ताकि उसी सिगरेट में से वे भी एक-दो कश लगा सकें...और अब पिता किसी भी समय दरवाजे पर दस्तक दे सकते हैं....लेकिन घड़ी की लगातार टिक-टिक के बावजूद दरवाजे पर कोई दस्तक नहीं हुई. घड़ी की सुई अब आठ बजा रही थी. तो क्या अंधेरे कमरे पिता को आखिरी बस से आने से रोकने में सफल हो गए?

माँ के चेहरे पर अब मैं परेशानी को साफ़ पढ़ सकता था. माँ ने कहा- बस तो आ गई होगी अब तक? माँ चाहती थीं कि मैं उनकी बात की पुष्टि करूँ. लेकिन वे यह भी चाहती थीं कि काश मैं इस भरोसे को ही झुठला दूँ कि बस आ गई होगी. माँ ने देहरी पर नमक रखा और बुदबुदा कर किसी से पिता के जल्द से जल्द घर पहुँचने कि मन्नत कर डाली. माँ का डर एक बार फिर उनके शरीर से होते हुए मुझमें प्रवेश कर रहा था और अब धीरे-धीरे मेरे शरीर से होते हुए पूरे घर में फैलता जा रहा था सिवाय पिछवाड़े के उन दो अंधेरे कमरों के.

माँ ने मुझे बस-स्टॉप जाकर आखिरी बस के बारे में पता लगाने को कहा. उन्हें उम्मीद थी कि शायद बस आई ही नहीं होगी. मैं भी ख़ुद को यही दिलासा दे रहा था कि काश बस न आई हो. आठ बजकर दस मिनट पर जब मैं चप्पल पहनकर घर से बाहर निकला तो दरवाज़ा बंद करते हुए मुझे दरवाजे की ओर देखना पड़ा जहाँ से पिछवाड़े के अंधेरे कमरे साफ़ दिखाई देते थे. मैंने दरवाज़ा बंद किया और जल्दी-जल्दी उसी सड़क पर चलने लगा जो मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी. बाहर निकलते ही मेरा पैर एक पत्थर पर पड़ गया जिसके कारण मैं लगभग गिरते-गिरते बचा. इतना बड़ा पत्थर सड़क पर कहाँ से आया इस बारे में मैं सोचना नहीं चाहता था. तभी दो कुत्ते धीरे-धीरे मेरे पास आए और अचानक भौंकने लगे. ये वही कुत्ते थे जिनसे दोस्ती का दम मैंने कहानी की शुरुआत में भरा था. डर के मारे मैं दौड़कर सड़क पार करने लगा और मेरा पैर उस गड्ढे में जा गिरा जो हमेशा कीचड़ से भरा रहता था और जिसे मैं आँखें बंद कर भी हमेशा पार कर लिया करता था. अब मेरे दोनों पैर कीचड़ में सने हुए थे. चप्पल भी पूरी तरह कीचड़ से लथ-पथ थी. मैंने चप्पल और पैरों से कीचड़ हटाया और आगे बढ़ गया. कुत्ते अब भी मेरा पीछा कर रहे थे और मुझे यकीन होने लगा था कि ये सब अंधेरे कमरों की ही चाल है.

जिस समय मैं बस-स्टॉप पर पहुँचा, समय लगभग सवा आठ से ऊपर हो रहा था. वहां रौनक बरक़रार थी और चाय की दुकान पर अब भी चाय बन रही थी. मुझे यकीन हो गया कि आख़िरी बस अभी नहीं आई है. लेकिन आज यहाँ सब कुछ बदला हुआ सा था. वहां मौजूद सारे लोग जोर-जोर से बातें कर रहे थे और उनके चेहरों पर हड़बड़ी साफ़ दिखाई दे रही थी. पता चला कि बस रतलाम से निकली तो समय पर थी लेकिन शहर के बाहर निकलते ही पहाडी की ढलान पर पहली बार बूढा ड्राईवर बस से अपना नियंत्रण खो चुका था और बस खाई में जा गिरी थी. बस-स्टॉप पर मौजूद लोग अब मोटर साइकिलें लेकर वहां जाने की तैयारी कर रहे थे. मुझे पहचाना सब ने लेकिन कोई मेरी और देख नहीं रहा था. मैं इतना बड़ा भी नहीं था कि उन लोगों के साथ पहाडी की ढलान पर जा पाता और इतना छोटा भी नहीं था कि चुपचाप घर जाकर माँ को इस बात की जानकारी देता और पिता के आने का इंतज़ार करता.
पिता उसके बाद कभी नहीं आए. उस दुर्घटना में बीस लोगों की मौत हो गई थी और कई लाशें ऐसी थीं जिन्हें पहचाना नहीं जा सका था. पिता के बारे में कोई पक्की ख़बर कभी नहीं मिल पाई. कोई कहता था कि जिन लाशों को पहचाना नहीं जा सका, उनमें से ही एक पिता की थी. लेकिन पाठक सर, जो ख़ुद उस बस में सवार थे और इस दुर्घटना के बाद अपनी याददाश्त खो बैठे थे, को किसी ने यह कहते हुए सुना था कि पिता बस के टूटे कांच से बाहर निकल गए थे. पिता से दुश्मनी रखने वाला मंगल ठेकेदार बाद में लोगों को यह कहते देखा गया कि उसने पिता को एक सुंदर डॉक्टरनी के साथ जयपुर में देखा था. उसने दबी जुबां यह भी कहा था कि माँ को डॉक्टरनी वाली बात पहले से पता थी.

गाँव छोड़ने के बाद किसी ने हमें बताया था कि अंधेरे कमरों की कहानियों को लेकर जायसवाल मकान मालिक का अनीसा चाची और उनके पति से जमकर झगड़ा हुआ था. मकान मालिक कहता था कि उनका मकान हड़पने के लिए वे दोनों अंधेरे कमरों के किस्से उड़ाते थे. वह यह भी कहता था कि अनीसा चाची के बेटे की मौत के लिए कमरे नहीं, बल्कि चाची ख़ुद जिम्मेदार थी. चाची कई बार अपने रोते बच्चे को अफीम का पानी पिलाकर सुला चुकी थी. यह अफीम उन्हें मकान मालिक से ही मिली थी. एक दिन ज्यादा अफीम देने के कारण उनके बेटे की मौत हो गई थी और पति से यह छुपाने के लिए उन्होंने अंधेरे कमरों की कहानी गढ़ ली थी. बताते हैं कि वह घर अब एक खंडहर में तब्दील हो चुका है. अनीसा चाची पूरे समय बीमार रहती हैं. और माँ अब भी आखिरी बस का इंतज़ार करती है…