तंबाकू मुक्त पहला देश भूटान

Posted By Geetashree On 11:53 PM 9 comments
गीताश्री

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक बैठक में 172 देशो के प्रतिनिधि तंबाकू उत्पादो की बिक्री और इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए सहमत होगए हैं।
इससे जहां तंबाकू के खिलाफ अभियान चलाने वाली एजेंसियों को काफीराहत मिली है, वहींभारत में केंद्र सरकार के इस मसले पर ढीले ढाले रवैयेपर खासी नाराजगी भी है। ऐसे में यह खबर सूकूनदायक है कि भारत का पड़ोसी देश, दुनिया का पहला तंबाकूमुक्त राष्ट्र बन गया है।
अपने बगलगीर से मिले तंबाकू के धुंए से परेशान, सब्जी बाजारों, पार्कोंऔर स्टेशनों में तंबाकू-गुच्छे के पाउचों के सताए आप अगर वाकई किसी ऐसीजगह की तलाश में हैं जहां स्वच्छ हवा फेफड़ों तक पहुंचे, तो हिमालय कीगोद में बैठा ‘भूटान’ आपकी राह देख रहा है। दरअसल, यह देश अपनेमूल्यों के अनुरूप नीतियां बनाने का रिकॉर्ड बनाता जा रहा है। स्वच्छ पर्यावरण और नागरिक स्वास्थ्य के साथ ‘सकल राष्ट्रीय खुशी’ के प्रतिअपनी प्रतिबद्धता जताते हुए भूटान ने तंबाकू नियंत्रण कानून 2010 इसीवर्ष जून में ही पारित कर दिया। तारीफ इस कानून की तो होनी ही चाहिए पर उससे कहीं अधिक भूटान शासन के उस जज्बे की भी दाद दी जानी चाहिए जिसने एकबार तंबाकू निषेध की दिशा में असफल होने के बाद दोबारा प्रयास करने की ठानी।
सर्वेक्षण बताते हैं कि 1960-70 में करीब 50 प्रतिशत भूटानी शहरीजनता तंबाकू उत्पादों का सेवन करती थी। फिर बौद्ध धर्म के साथ जोडक़र एक उग्र आंदोलन तंबाकू सेवन के खिलाफ चलाया गया जिससे तंबाकू सेवन करनेवालों की संख्या में कुछ कमी देखी गई। फिर यकायक दिसंबर 2004 में दुनिया का ध्यान भूटान की ओर तब गया जब यहां के कानून ने तंबाकू उत्पादन के सेवन और बिक्री पर पूरी तरह रोक का कानून बना दिया और भूटान, तंबाकू पर पूर्णप्रतिबंध लगाने वाला पहला राष्ट्र घोषित हुआ। थिंपू में सिगरेट के पैकेट सावर्जनिक तौर पर जलाकर धूम्रपान का विरोध दर्ज किया गया। इन सबके बीच सरकार ने पाया कि अचानक बाजार में सिगरेट का दाम चौगुना हो गया और कालाबाजारी बढ़ती गई। परेशान होकर भूटान सरकार ने उस निषेध को वापिस लेलिया ताकि पूर्ण तैयारी के साथ एक बार फिर तंबाकू मुक्त भूटान की दिशामें नए प्रयास किए जा सकें। करीब ढाई साल की जमीनी चर्चाओं, सर्वेक्षणों और तीन बार भूटानी संसद में बहस के उपरांत जून 2010 में तंबाकू नियंत्रण कानून भूटानी संसद में बहुमतसे पारित हुआ। इस कानून की विशेषता इसका सीधा और स्पष्ट दृष्टिकोण है,साथ ही जिस तरह से इसमें सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों कीजिम्मेदारियां बताते वक्त स्पष्टता बरती गई है वो किसी भी कानून के सफल क्रियान्वयन के लिए बेहद आवश्यक है।
‘तंबाकू नियंत्रण कानून 2010’ भूटान के इस नए कानून के तहत, सभीव्यवसायिक केंद्रों, मनोरंजन केंद्रों, संस्थानों, कार्यालयों,मोनेस्टरीज, म्यूजियम, जोंग, स्कूल और कॉलेज, सार्वजनिक स्थानों,पारंपरिक उत्सवों, सब्जी बाजार, गाडिय़ों, टैक्सी स्टैंड पर धूम्रपान या उत्पादों के सेवन को जुर्म करार दिया गया है। इतना ही नहीं, इनजगहों पर देखरेख करने वाले अफसरों पर उन स्थानों को तंबाकू उत्पादों सेमुक्त रखने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है।पर्यटकों और धूम्रपान के आदि लोगों को ध्यान में रखते हुए इस कानून नेसार्वजनिक व्यवसायिक क्षेत्रों के मालिकों को उनके लिए एक धूम्रपान विशेष स्थल का इंतजाम करने के निर्देश भी दिए है ताकि आम जनता को उस धुंए से बचाया जा सके। यह कानून तंबाकू सेवन करने वालों से कहीं ज्यादा तंबाकू मुहैया कराने वालों पर सख्त नजर आता है। हालांकि इसके तहत धूम्रपान केआदी व्यक्ति को सभी प्रकार के कर चुकाने के बाद अपने निजी इस्तेमाल के लिए तंबाकू आयात की स्वतंत्रता प्रदान की गई है पर साथ ही वित्त मंत्रालय को भी अयाजित तंबाकू की मात्रा पर नजर रखने को कहा गया है। भूटान का यह नया कानून तंबाकू की खेती और बिक्री को तस्करी के बराबर का जुर्म मानताहै और दोनों ही जुर्मो की वही सजा नीयत की गई है जैसी सजा तस्करी के लिएहै। भूटान के इस कानून में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि तंबाकू उत्पादनसे जुड़ी कोई भी कंपनी अपने लोगो के साथ न तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षविज्ञापन कर सकती है और न ही किसी आयोजन का प्रायोजक बन सकती है।तंबाकू मुक्त जीवन शैली के प्रचार की जिम्मेदारी जहां शिक्षा मंत्रालय को सौंपी गई है, वहीं तंबाकू से स्वास्थ्य को होने वाले नुकसानों के प्रतिजागरुकता फैलाने की जिम्मेदारी स्वास्थ्य मंत्रालय को दी गई है। इन सबसेअलग पुलिस के साथ-साथ गृह मंत्रालय को कानून के सफल कार्यान्वयन कीजिम्मेदारी सौंपते हुए विभिन्न नियमों, सर्वेक्षणों, कार्यक्रमों औरअभियानों के लिए तंबाकू नियंत्रण बोर्ड स्थापना भी कर दी गई है।
भूटान में हालांकि अब तक इस कानून को लेकर कुछ संशय जाहिर किए जा रहे हैंऔर इसमें बरती गई सख्ती पर सवालों के बादल भी आते दिखाई पड़ते हैं, पर यह बात काबिले गौर है कि एकाएक आपको किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र पर स्मोकिंग करता हुआ नजर नहीं आएगा।भूटान में जगह-जगह पर स्पष्ट अक्षरों में तंबाकू सेवन के विरूद्घ संदेश दिखाई दे जाएंगी। सरकार का नजरिया बिलकुल स्पष्ट है कि मुक्त स्वास्थ्यसेवाओं को वो तंबाकू का सेवन करने वाले पर बल भी प्रयोग करने से बच रहीहै बल्कि वो चाहती है कि लोग स्वयं तंबाकू से किनारा करें, फिर कारण चाहे स्वास्थ्य की चिंता हो या फिर तंबाकू का सुलभ न होना हो। वैसे भी यहांअन्य देशो की तरह कोई मॉनिटरिंग एजेंसी नहीं है। इसीलिए चालान भी नहीं कटता।
थिंफू के एक कैफे की दीवार पर लगा पोस्टर बेहद दिलचस्प और मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने वाला है। पोस्टर में दो लडक़े सिगरेट पी रहे हैं।
दो लड़कियां अलग खड़ी हैं।
लडक़े उनसे पूछते हैं, हे लड़कियों, क्या तुम हमारे साथ कॉफी पीना पसंद करोगी?
लड़कियां-सॉरी, हम उन लडक़ो को पसंद नहीं करते जो सिगरेट पीते हैं।

मंत्रसिक्त हवाओं में नई राहो की तलाश

Posted By Geetashree On 2:49 AM 6 comments

गीताश्री
तो सुख-दुख, आकांक्षा
और हार,उदासी और उत्साह,
वर्तमान भविष्य के अनुभव को धीमा कर देना
और हर दो तस्वीरों के बीच
नई राहें और नए शार्टकट ढूंढना,मेरे जीवन में सिगरेटों का यही मुख्य उद्देश्य था,
जब ये संभावनाएं नहीं रहती,
आदमी खुद को नंगा जैसा महसूस करने लगता है,
कमजोर और असहाय।
- ओरहान पामुक (तुर्की के नोबेल पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार)
सिगरेट छोडऩे के बाद पामुक का अनुभव ये था।
लेकिन सिक्किम बिना धुआं उड़ाए, बिना तंबाकू चबाए अपने भविष्य की नई राहें चुनने वाला देश का पहला राज्य बन गया है। वह खुद को पहले से ज्यादा मजबूत और शक्तिशाली पाने लगा है। उसका उद्देश्य अब धुंआरहित उपादानों से जुड़ गया है। पर्यटकों के लिए स्वर्ग सरीखे सिक्किम की फिजां में बौद्ध तांत्रिको की रहस्यमता आपको आसानी से गिरफ्त में ले लेती है। जैसे जैसे गंगटोक के करीब जाते हैं, आकर्षक लामाओं की कतारें उतनी लंबी दिखती हैं। बौद्ध भिक्षुणियों का मौन कितनी आसक्ति पैदा करता है, देखें तो जानें। एक पल के लिए मुस्कान चमकती और बुझती है।
अमोल पालेकर ने शायद इसी से मंत्रासिक्त होकर फीचर फिल्म बनाई थी-वंस अगेन। बौद्ध भिक्षुणी और सामान्य पुरुष का प्रेम और इनके बीच काव्यात्मक उपस्थिति के साथ पसरा सिक्किम का अनछुआ सौंदर्य। बागडोगरा से गंगटोक तक की यात्रा में ड्राइवर भुवन थापा अपने धुंआरहित राज्य को लेकर कुछ ज्यादा ही उत्साहित दिखा। स्वभाव से बातूनी लेकिन निगाहें बेहद पैनी। इकत्तीस मई 2010 को जब से उसका राज्य धुएं के जाल से मुक्त घोषित हुआ, उसने सबसे पहले अपनी गाड़ी में नो स्मोकिंग के स्टिकर चिपकाए। उसके बाद उसे आदत सी हो गई है राज्य में आने वाले हरेक यात्री को विस्तार से जानकारी देने की।
भुवन बताता है, ‘नए माहौल में पर्यटक और जनता तो धीरे-धीरे तालमेल बिठा रहे हैं लेकिन जो प्रतिबंध लगाता है, वही सबसे ज्यादा तोड़ता है।’भुवन का इशारा सिक्किम पुलिस की तरफ था।भुवन के पास अपार जानकारी है कि प्रतिबंध के बाद कौन और कहां चोरी छिपे तंबाकू बेचता है। मगर वह जगह बताने से साफ मना करता है।
बागडोगरा से सिक्किम तक की सडक़ बारिश में बेहद खराब हो जाती है। ये अक्टूबर महीने के शुरूआती दिन थे। पहाड़ी झरनों और अभिमंत्रित हवाओं के बावजूद टूटी-फूटी सडक़ों पर सफर बहुत लंबा और ऊबाऊ हो जाता है।
भुवन मूड भांपते हुए कहता है, ‘शुक्र है, आप चार पांच दिन पहले आ गए। जल्दी लौट जाइए, नहीं तो लौट भी नहीं पाएंगे। गोरखालैंड आंदोलन की तैयारी शुरू हो गई है। लोग सडक़ों पर उतर आएंगे। सडक़े जाम हो जाएंगी। जैसे ही पहाड़ों से बारिश उतरती है, सैलानियों के आने का मौसम शुरू होता है, यहां आंदोलन तेज हो जाता है। वे लोगों का ध्यान खींचना चाहते हैं।’
रास्ते में भुवन सडक़ के किनारे बने ढाबों, रेस्टोरेंट की तरफ इशारा करता है। जगह जगह नो स्मोकिंग, से नो टू टोबैको... जैसे नारों वाले पोस्टर, बैनर लगे हैं। भुवन हरेक यात्री को यह जानकारी देना अपना परम कर्तव्य समझता है। सिक्किम का मुख्य बाजार। जगह-जगह शराब की दुकानें। विक्रेता ज्यादातर बिहारी हैं। हर दुकान के बाहर नो स्मोकिंग जोन का बोर्ड लगा है। एक विक्रेता हैं, छपरा निवासी रामजी साहू। वह बताते हैं, ‘यहां लोग खूब सिगरेट पीते हैं। गुटका भी खाते हैं। बिक्री भी खूब होती है। जितना चाहिए मिल जाएगा। लेकिन उत्पाद दिखाई नहीं देने चाहिए। खासकर बच्चों की नजर न पड़े, इसका ध्यान रखना पड़ता है।’
सिक्किम यूं ही नहीं हुआ ‘तंबाकू रहित’ राज्य।
दो साल की लंबी कहानी है। दो साल तक जन जागरण अभियान चलाया गया। सरकारी मशीनरी के साथ मिलकर राज्य में वोलंन्टरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने जीतोड़ मेहनत की, तब जाकर इस काम को अंजाम दिया जा सका। वीएचएआई से जुड़ी हारका मोती सुब्बा बताती हैं कि उनके संगठन को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा।सिक्किम सरकार के नियोजन, निगरानी एवं मूल्यांकन विभाग के उपनिदेशक सी. खेवा बताते हैं, ‘यह विजन हमारे मुख्यमंत्री का था। उन्होंने सोचा, चाहा और सपना साकार हो गया।’ इसके पीछे एक स्वस्थ राज्य ‘हेल्दी सिक्किम’ बनाने का उद्देश्य था। बताते है कि राज्य के ‘स्वास्थ्य विभाग’ ने राज्य सरकार को एक रिपोर्ट दी जिसमें सर्वाधिक मौत का कारण तंबाकू को बताया गया था। राज्य में होने वाली कुल मौतों में पचहत्तर प्रतिशत मौतें इसके इस्तेमाल से होती थीं। इस सर्वे ने सरकार को चौकन्ना कर दिया। खेवा बताते हैं, ‘गुटखा सिक्किम में सात साल पहले ही प्रतिबंधित हो गया था। उसकी बिक्री पर भी रोक लग गई थी। अब सरकार सिगरेट की खुली बिक्री पर प्रतिबंध के बारे में गंभीरता से विचार कर रही है।’वह यह भी बताते हैं, ‘बाकी जगह लोग सार्वजनिक जगहों पर मॉनिटर नहीं कर रहे। हमारे यहां होता है। यहां कोई खुले में सिगरेट पीए तो कोई भी नागरिक आपको टोक देगा कि यहां पीना मना है।’ डॉ. पूर्णोमन प्रधान (अतिरिक्त निदेशक, स्वास्थ्य सेवाएं एवं तंबाकू नियंत्रण का राज्य केंद्र) के पास जब्त की गई सिगरेटों के पैकेट्स हैं जिन्हें वे एक-एक कर हमें दिखाते हैं। किसी पर भी सचित्र चेतावनी नहीं छपी हुई है।
ब्रांड के नाम हैं, खुकरी, सहारा, शिखर, ब्लू रिवर, रॉयल आदि-आदि। प्रधान बताते हैं, ‘वर्ष 2008 से पहले सिक्किम का बाजार इसी तरह के सिगरेटों से भरा पड़ा था। यहां ज्यादातर नेपाल की सिगरेट बिकती हैं जिन पर कोई सचित्र चेतावनी नहीं छपी होती है। जब से प्रतिबंध लगा है, 15 प्रतिशत खपत कम हुई है। हमें राजस्व की हानि से ज्यादा लोगों के स्वास्थ्य की चिंता है। गैरकानूनी तरीके से नेपाल से आने वाली इन सिगरेटों पर रोक लगाने पर हमारा ज्यादा जोर है।’प्रधान तंबाकू अधिनियिम का हवाला देते हुए कहते है, ‘कोटपा’ में स्पष्ट लिखा है कि बिना सचित्र चेतावनी के कोई तंबाकू उत्पाद नहीं बेच सकते। हमने इसी नियम को आधार बनाया और इसकी बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया। पहले जागरूकता अभियान चलाया, फिर कानूनी डंडा। अब समाज की पूर्ण सहभागिता है इसमें।’
बताते हैं, तंबाकू लॉबी ने यहां भी अपना जोर लगाया होगा। लेकिन उसे भनक नहीं लगने दी गई।
राज्य को पूर्णत: धुंआरहित घोषित करने से पहले इसका ज्यादा प्रचार नहीं किया गया। प्रधान कहते हैं, ‘हमने धीरे-धीरे जमीनी स्तर पर काम किया। मीडिया को भी ज्यादा कुछ नहीं बताया। काम होने से पहले उसका ढोल नहीं पिटा।’
वोलन्टरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ सिक्किम के कार्यकारी निदेशक वी.वी. राय इस सफलता से बेहद उत्साहित हैं। उन्हें लक्ष्य मिल गया है। वह बताते हैं कि जो पहले तंबाकू का धंधा करते थे, वह किसी और धंधे में लग गए हैं। सिगरेट पीने वालों पर उनकी बेहद तल्ख टिप्पणी है, ‘मेरी नजरों में सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीने वाले आतंकवादी हैं जो धुंए से दूसरों को मार रहे हैं और खुद भी मर रहे हैं।’वी.वी. राय के टेबल पर आवेदन पत्रों का ढेर लगा है। वह ‘पत्र अभियान’ चला रहे हैं। राज्य भर से पत्र इकठ्टा कर रहे हैं जिसमें केंद्र सरकार से तंबाकू उत्पादों पर सचित्र चेतावनी में देर न करने की अपील की गई है। यह अभियान देशव्यापी चलाया जा रहा है ताकि सरकार पर दबाव बनाया जा सके। तंबाकू लॉबी के दबाव में आकर एक बार सरकार ने घोषणा के बाद अपने कदम पीछे खींच लिए थे।
गंगटोक से पहले रंगपो एक बड़ा कस्बा है।
वहां बिहारी जागरण मंच बेहद सक्रिय है। न सिर्फ अपने राज्य की संस्कृति बचाए रखने के लिए बल्कि तंबाकू उन्मूलन के लिए भी। रंगपो के व्यापारी स्वामीनाथ प्रसाद का इस अभियान ने हृदय परिवर्तन ही कर दिया है। उन्होंने तंबाकू आपूर्ति का धंधा बदल कर राशन का काम शुरू कर दिया है। एक और व्यापारी रतन कुमार हैं। वह बाकायदा अभियान से जुड़ गए हैं। वह लोगों को जागरूक कर रहे हैं। वह बताते हैं, ‘लोग कहते हैं कि हाईवे पर कानून लागू नहीं होता। हमने मैदान संभाला और हाईवे को दुरुस्त कर लिया।’ मंच के एक सदस्य अजित कुमार इस बात से चिंतित हैं कि रंगपो से पं. बंगाल की सीमा मिलती है। एक पुल पार करते ही नेपाल के सिगरेट खुलेआम बिक रहे हैं। लोग वहीं से भर-भर कर ले आते हैं। बंगाल की वजह से हम चुनौतियां झेल रहे हैं।
पश्चिम बंगाल सरकार सुन रही है ना..।

देसी लड़कियां चाहिए

Posted By Geetashree On 2:59 AM 4 comments

हिंदी सिनेमा के नायक और दर्शकों को नहीं भातीं लडक़ों जैसी लड़कियां

गीताश्री
इंटरनेट की दुनिया में सवालो की एक वेबसाइट है। उसमें अजीबो गरीब सवाल पूछे जाते हैं और जवाब उतने ही दिलचस्प। कई बार सोचने पर मजबूर कर दे। एक सवाल है, कौन सी हिंदी फिल्म भारतीय स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है?
कई जवाब हैं। कई लोगो ने मदर इंडिया, सुजाता, बंदिनी की नायिका को भारतीय स्त्री की सच्ची छवि से जोड़ कर देखा। ऐसा मानने वालो में महिलाएं ज्यादा थीं। समीर नामक युवक का जवाब था, राजश्री बैनर की फिल्म विवाह, जो भारतीय नारी की सच्ची छवि पेश करती है। विवाह जिन्होंने देखी है वे समझ सकते हैं कि उसकी नायिका अमृता राव ने कैसा किरदार निभाया है। सीधी सादी, लंबे बालों वाली शर्मीली, खांटी घरेलू भारतीय लडक़ी जो अपनी जिंदगी का फैसला तक खुद नहीं ले सकती। समाज हो या जीवन, दोनो ही जगह ऐसी छवि वाली लड़कियों के प्रति खासा मोह दिखाई देता है। समीर की सोच समाज के उस पारंपरिक सोच का प्रतिधिनित्व करती है जिसमें लडक़े टाइप लडक़ी के लिए कोई जगह नहीं होती। हिंदी सिनेमा में शुरुआती दौर से लेकर हालिया रिलीज फिल्म एक्शन तक यह रवैया दिखाई देगा।
हाल ही में आई फिल्म एक्शन रीप्ले में अपनी टॉम ब्वॉय जैसी मां (ऐश्वर्या राय बच्चन) और दब्बू पिता (अक्षय कुमार) की लव-स्टोरी का भविष्य बदलने के लिए इनका बेटा (आदित्य) टाइम मशीन की मदद से 35 साल पीछे जाकर अपनी मां के ‘स्त्री रुप’ को जगाने और अपने पिता को ‘असली मर्द’ बनने में मदद करता है। यही सच है। नायक को अगर हमारे दर्शक मर्द, बने हुए देखना चाहते हैं तो नायिका को स्त्री। उन्हें नायिका के चेहरे में टॉम ब्वॉय की नहीं बल्कि देसी गर्ल की तलाश रहती है। सिनेमा के रवैये के अनुसार तो पुरुष लहरो पर उठती हुई देवी वीनस ( कुछ कुछ होता है की रानी मुखर्जी) को देखना चाहता है, फुटबॉल पर किक मारती हुई (केकेएचएच की काजोल) लडक़ा टाइप लडक़ी को नहीं। 1998 में आई करण जौहर की पहली फिल्म कुछ कुछ होता है की लडक़ों की तरह रहने वाली नायिका (काजोल) जब अपने सब से अच्छे दोस्त (शाहरुख खान) को किसी और लडक़ी की ओर झुकते हुए देखती है तो लड़कियों की तरह सज-संवर कर नायक के सामने आती है। नायक उसका मजाक उड़ाते हुए कहता है कि वह तो लडक़ी ही नहीं है। अभिनेत्री और निर्देशक पूजा भट्ट इस मुद्दे पर बेहद तल्ख हैं। वह दो टूक कहती है, यह मर्दो की इंडस्ट्री है। वे ही फैसला करते हैं कि नायिका कैसी होगी। मैं स्त्री को एक आब्जेक्ट के रुप में पेश करने के सख्त खिलाफ हूं।
दरअसल हमारी फिल्मों के नायक हमेशा से ही ऐसी नायिकाओं की ओर आकर्षित होते आए हैं जिनमें ‘लडक़पन’ नहीं बल्कि ‘लड़कीपन’ हो। असल में नायिका को स्त्री की रुढ़ छवि में देखने की यह चाहत पुरुष दर्शकों की उस ख्वाहिश से भी जुड़ी हुई है जिसमें दर्शक किसी स्त्री को पुरुष की तरह से बर्ताव करते हुए नहीं देखना चाहते। यहां सीमोन की एक पंक्ति सटीक बैठती है-पुरुष स्त्री की देह रुप को पसंद करता है, वह उसमें फलों और फूलों का सौंदर्य देखना चाहता है.. ।
यहां यह गौरतलब है कि आजादी से पहले अपने सिनेमा में नाडिया नाम की नायिका को पुरुषों की तरह से देखना हमारे दर्शकों को भाता था। उनके स्टंट दृश्यों के चलते उन्हें ‘हंटरवाली’ तक कहा जाता था। लेकिन आजादी के बाद पर्दे की नायिका को स्त्री की रुढि छवि में ही देखना ज्यादा पसंद किया गया। यहां तक कि अभिनेत्री बिंदु हंटरवाली 77 नाम की एक फिल्म की तो उस फिल्म को दर्शक मिलने मुश्किल हो गए।जिन फिल्मों में नायिका लडक़ों की तरह की पोशाकों, उनकी तरह की हरकतों या उन जैसे मैनरिज्म में नजर आईं उन में नायक को वह तभी भाईं जब उन्होंने अपने इस ‘टॉम ब्वॉय’ वाले रूप को त्याग कर औरत बनना स्वीकार किया। पुरानी चर्चित फिल्म जिद्दी की जुबिली गर्ल यानी टॉम ब्वाय आशा पारेख याद हैं ना। जब तक वह लडक़ों की तरह दिखीं, नायक उनसे दूर रहा, छेड़छाड़ करता रहा, नोकझोंक होती रही, और जैसे ही साड़ी में लिपटी कि नायक का दिल जीत लिया। टॉम ब्वाय टाइप लड़कियों की छवि मौज मस्ती करने वाली लडक़ी के रुप में होती है। जैसे हालिया रिलीज फिल्म गोलमाल 3 में करीना कपूर को देखिए।
मजेदार कोटेशन वाली टी-शर्ट पहने, फेसबुक नामक अपने कुत्ते के पीछे भागने और चंद दोस्तों के साथ धींगामुश्ती करने के अलावा उन्हें काम ही क्या था। प्रेम की स्वीकारोक्ति तक का तो वक्त निर्देशक ने नहीं दिया और नायको के बूढे मां बाप की प्रेम कहानी में ही पूरी फिल्म निपटा दी।
राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर की एक नायिका (पद्मिनी) भी लडक़ों की तरह रहती है। नायक को तबतक उसमें कोई दिलचस्पी नहीं होती। एक दिन नायक उसे नहाते हुए देख लेता है और प्यार करने लगता है। सायरा बानो तो कई फि ल्मों में इस तरह के किरदारों में आईं। आखिरी दोस्त और नहले पे दहला जैसी उनकी फिल्मों में उनके रूप ऐसे ही थे।हेमा मालिनी ने सीता और गीता, दो ठग, राजा जानी में ऐसे रूप धरे। शिकार में आशा पारिख ऐसे रूप में थीं। रेखा ने एक बेचारा और जीनत अमान ने चोरी मेरा काम में। कैद में लीना चंद्रावरकर ने विनोद खन्ना को लुभाया। दिल्ली का ठग में नूतन का किरदार भी कुछ-कुछ ऐसा ही था।पिछले कुछ बरसों में देखें तो 2000 में आई जोश में नायिका ऐश्वर्या राय अपने मवाली भाई शाहरुख खान की तरह बिंदास रहती है लेकिन नायक चंद्रचूड़ सिंह की मोहब्बत उसे यह रूप त्याग कर वापस ‘लडक़ी’ बनने के लिए प्रेरित करती है। 2001 में आई कभी खुशी कभी गम में करीना कपूर नायक हृतिक रोशन को लुभाने के लिए अपनी टॉम ब्वॉय लुक को तो छोड़ती ही है, उसके लिए बिना सगाई-शादी किए करवा चौथ का व्रत भी रखती है। 2003 में आई इश्क-विश्क में नायक शाहिद कपूर ‘बहनजी’ टाइप की अमृता राव को छोड़ बोल्ड और बिंदास शहनाज ट्रेजरीवाला की ओर भागता है लेकिन बाद में उसे वही स्त्री रूप वाली नायिका ही भाती है। 2004 में आई मैं हूं ना में एकदम टॉम ब्वॉय लुक वाली नायिका अमृता राव को शाहरुख खान, सुष्मिता सेन की मदद से ‘लडक़ीनुमा’ बनाते हैं ताकि जाएद खान उसे देखे और बस देखता ही रह जाए। 2009 में आई आशुतोष गोवारीकर की व्हाट इज योर राशि की बारह नायिकाओं में से जो टॉम ब्वॉय इमेज वाली नायिका होती है बाद में वही अपना रूप बदल कर नायक की पसंद बनती है। अगर नायिका अपनी मर्जी से ना बने तो लाडला फिल्म के नायक अनिल कपूर की तरह पूरी जान लगा देता है और किसी तरह नायिका (श्रीदेवी) को औरत होने का अहसास करा कर ही दम लेता है।
सिनेमा की चाल कभी भी स्त्रीमार्गी नहीं रही, अलबत्ता प्रेममार्गी जरुर रही, जिसकी वजह से स्त्री काम्या की तरह बरती गई। सजना है मुझे सजना के लिए..जैसी छवि नायिकाओं की बना दी गई। युवा फिल्म निर्देशक प्रवेश भारद्वाज इस बारे में खिन्नता प्रकट करते हुए कहते हैं कि अधिकतर फिल्मों में नायिकाएं होती ही इसलिए थी कि नायक उससे रोमांस कर सके। हीरोइन का काम हीरो को रिझाना था, जिसने उसे कभी पारंपरिक छवि से मुक्त नहीं होने दिया।