शादीशुदा मर्द के प्यार में औरत की गत बुरी

Posted By Geetashree On 9:09 AM 6 comments

रविवार के नवभारत टाइम्स, दिल्ली के संपादकीय पेज पर रंजना कुमारी का यह विचारोत्तेजक लेख छपा है.चांद और फिजा के मोहबब्त का जो हश्र हुआ है, उसके बाद इस तरह के संबंधों पर बहस जरुरी है. हालांकि ऐसा न तो पहली बार हुआ है और ना ही इसे आखिरी माना जा सकता है. बहसें तो चलती रहती हैं. रंजना जी का यह लेख उसी बहस का हिस्सा है.

एक स्त्री जब किसी दूसरी स्त्री का घर उजाड़ रही होती है तो उसके सामने यह सवाल क्यों नहीं आता कि किसी की उज़ड़ी दुनिया की राख से कोई अपने आंगन में कैसे रंगोली बना सकता है..कितनी दुर्दांत कल्पना है..जहां एक चालाक पुरुष एक औरत को दूसरी औरत के खिलाफ औजार की तरह इस्तेमाल कर लेता है. 

रंजना जी ने जो सवाल उठाए हैं मैं उन्ही का जवाब अपने सजग दोस्तो, अनदेखे साथियों से चाहती हूं- गीताश्री

शादीशुदा मर्द के प्यार में औरत की गत बुरी

रंजना कुमारी


 


एक परिपक्व शादीशुदा आदमी जब नया प्रेम संबंध बनाता है तो वह सिर्फ प्रेम को नहीं देखता है. इसमें स्टेटस, फाइनेंशल सिक्युरिटी और फैमिली जैसे फैक्टर भी जुड़े होते हैं. यह भी तय है कि वह व्यक्ति अपने परिवार के प्रति प्रतिबध्द नहीं है और परिवार की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहा है. वह दूसरी महिला से रिश्ता बना तो लेता है, लेकिन उसे निभाना इतना आसान नहीं होता. शुरूआती आकर्षण जल्द ही खत्म हो जाता है और जिंदगी की हकीकत सामने आती है. ऐसे में दोनों के बीच तनाव बढ़ता है और रिश्ता टूटने के कगार पर पहुंच जाता है. इस सबमें बेशक पुरुष को भी दिक्कतें आती हैं लेकिन अंतत: भुगतना महिला को ही पड़ता है. 

चांद मोहम्मद और फिजा (पहले चंद्रमोहन और अनुराधा बाली) के मामले में भी अभी तक मिली जानकारी से यही लगता है. वैसे भी धर्म बदल कर दूसरी शादी करने को किसी कीमत पर जायज नहीं ठहराया जा सकता. खुद सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धर्म परिवर्तन करके अगर कोई दूसरी शादी करता है तो वह पहली पत्नी की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता.

इस तरह के मामलों में एक नहीं, बल्कि दोनों महिलाओं के साथ नाइंसाफी होती है. जो लोग ऐसा करते हैं, वे सही सामाजिक और कानूनी व्यवस्था नहीं अपना रहे हैं. सामाजिक इसलिए कि वे पहली पत्नी से पति धर्म नहीं निभा रहे हैं. अगर किसी को दूसरी शादी करनी है तो उसे पहले तलाक लेना चाहिए. ऐसा न होने पर दूसरी महिला को कभी भी पत्नी का उचित दर्जा नहीं मिलता. उसे हमेशा धिक्कार की निगाहों से देखा जाता है. इस मामले में तो चांद मोहम्मद ने अपनी जायदाद पहले ही पहली पत्नी के नाम कर दी. इससे दूसरी महिला की आर्थिक सुरक्षा भी खत्म हो गई. जो प्रेम धोखाधड़ी की बुनियाद पर खड़ा हो, उसकी नींव कितनी मजबूत होगी, यह साफ है. 

लेकिन सच यही है कि इन सब तमाम खामियों के बावजूद लोग इस तरह के संबंध बनाते हैं. इसकी वजह यह है कि प्रेम किसी भी समाज में पनपने वाली सतत भावना है. लेकिन हमारा समाज प्रेम संबंधों के प्रति अनुदार है. प्रेम को जाति और धर्म के दायरे में शादी के बंधन में बांधा जाता है. खासकर लड़कियों को शादी के रूप में जबरन प्रेम (फोर्स्ड लव) के लिए मजबूर किया जाता है. शादी जैसी संस्था प्रेम के लिए नहीं, बल्कि वंश चलाने या यूं कहें कि मानव जाति को बचाए रखने के लिए बनाई गई थी, जबकि शादी के बिना या शादी के बाहर भी प्रेम हो सकता है.

यह बड़ी बात है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों के चरित्रों से लेकर देवताओं तक को प्रेम में लिप्त दिखाया गया है और हम बड़े गर्व से उन्हें स्वीकार करते हैं. कृष्ण की रासलीलाएं खुले प्रेम की स्वीकृति देती हैं. कुंती के बारे में कहा जाता है कि कर्ण की प्राप्ति उन्हें सूर्य से हुई. तो क्या मानें कि कुंती और सूर्य के बीच कोई प्रेम प्रसंग था! हम इन प्रसंगों पर गर्व के साथ बात करते हैं लेकिन जब हकीकत में प्रेम की बात आती है तो विरोधी हो जाते हैं. असलियत यह है कि औरत और मर्द होंगे तो प्रेम होगा.

बहरहाल, इस तरह के मामलों से उपजने वाला सबसे बड़ा सवाल यह है कि महिलाएं इस तरह के रिश्ते में पड़ती ही क्यों हैं? आखिरकार प्रताड़ता तो उन्हें ही झेलनी पड़ती है. उन्हें कोई भी कदम उठाने से पहले सोचना-समझना चाहिए. फिर उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि वे किसी दूसरी महिला की जिंदगी बर्बाद करने की वजह न बनें. यह सच भी स्वीकारना चाहिए कि जो व्यक्ति उसके लिए पहली पत्नी को छोड़ सकता है, वह किसी तीसरी के लिए उसे भी छोड़ सकता है. पहली पत्नी को भी यह समझना होगा कि जबरन किसी को बांधकर नहीं रखा जा सकता, लेकिन उसे आर्थिक रूप से सबल बनना चाहिए और पति से पूरा भरण-पोषण आदि लेना चाहिए.

(लेखिका सेंटर फॉर सोशल रिसर्च में डायरेक्टर हैं.)
बातचीत : प्रियंका सिंह