Posted By Geetashree On 6:21 AM 0 comments

 रचना-सूत्र

-गीताश्री

एक कृति से दूसरी कृति जन्म लेती है. वह महान कृति होती है जिससे दूसरी कृति निकलती है. वह किताब महान जो दूसरी रचना का सूत्र देती है.

कसौटी कई तरह की होती है कृति को क़सने की. आज सबके पास एक कसौटी है.

जरुरी नहीं कि वह कसौटी सही हो. असली कसौटी की पहचान भी मुश्किल है. निगाहें चाहिए. सच आँख भर नहीं होता. आँख के रास्ते विवेक की आंच में सच को सींझना होता है. जैसे कोई बेटी , अपनी मां की नक़ल नहीं होती, उसकी अपनी मौलिक उपस्थिति होती है, अपने गुण दोष के साथ.

वैसे ही कोई कृति से जन्म लेने वाली दूसरी कृति होती है. अपनी स्वतंत्र चेतना और इयत्ता के साथ.

कहते हैं-

यह पृथ्वी अन्य ग्रहों की तरह एक ग्रह है. सूरज से टूट कर बनी हुई ठंडी पिंड.

इसके पास सूरज से ज़्यादा संसाधन हैं. इससे न सूरज का महत्व कम होता है न पृथ्वी उसकी कॉपी रह जाती है.

हमें कृतियों को उनकी स्वतंत्र चेतना के साथ स्वीकारने की तमीज़ हासिल करनी चाहिए.