दुखते हैं खुशबू रचते हाथ

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गीताश्री

यहां इस गली में बनती हैं
मुल्क की मशहूर अगरबत्तियां
इन्ही गंदे मुहल्ले के गंदे लोग
बनाते हैं केवड़ा, गुलाब, खस और
रातरानी अगरबत्तियां.
दुनिया की सारी गंदगी के बीच
दुनिया की सारी खुशबू
रचते रहते हैं हाथ।
---अरुण कमल की कविता

मैंने कुछ साल पहले अचानक नेट पर अपने प्रिय कवि अरुण कमल जी की कविता खूशबू रचते हाथ पढी थी। कविता मेरे जेहन में दर्ज हो गई थी। ये उस कौम पर लिखी गई है जिसकी तरफ हमारा ध्यान कभी जाता ही नहीं। मैं सोचती रही कि कहां किस शहर में मिलेंगी ये औरते जो हमारे लिए खूशबू रचती है। कवि ने उन्हें कहीं किसी गली में तो देखा होगा ना..अचानक मैं पिछले साल उज्जैन गई। ट्रेन से आने जाने का प्लान था। आदतन जब ट्रेन किसी शहर में प्रवेश करने लगती है तो मुझे जार्ज डो का एक प्रसिध कथन याद आने लगता है...किसी शहर को देखने का सबसे अच्छा तरीका है ट्रेन के दरवाजे पर खड़े होकर उसे देखें..और मैं एसा करती हूं जब भी कभी ट्रेन से जाती हूं। उज्जैन के करीब पहुंचते ही ट्रेन के दरवाजे पर आई..धीमी होती ट्रेन और धीमे धीमे आती हवा में महक सी थी। पहले लगा कि महाकाल की नगरी है मंदिर से आती होगी..लोकिन पटरियों के एकदम पास नजर गई और मैं दंग रह गई। अरुण कमल जी की कविता..साक्षात..लाइव..कविता की पंक्तियां याद आने लगीं..हाथ ही हाथ थे..जो खूशबू रच रहे थे। खिलखिला रहे थे..खूशबू में सने हाथ ट्रेन के यात्रियों को टा टा बाय बाय भी कह रहे थे। मुझे कविता के किरदार पहली बार मिले..निराला की भिक्षुक कविता के बाद..
फिर तो इन गलियों में गई अपनी लोकल सहेली मधुलिका के साथ। वहां जाकर जो कुछ मिला उसे यहां लिख डाला। कवि होती तो कविता लिखती..तब भी अऱुण कमल से ज्यादा अच्छा नहीं लिख पाती..पत्रकार हूं सो लेक लेश लिख डाला..फोटो खींचे..उनसे बातें की..खूशबू भरी..उनकी पीड़ा लेकर घर लौट आई..ट्रेन को लौटना होता है..

भोर के इंतजार में एक गली

अब खूशबू रचते हाथ दुखने लगे हैं।
उज्जैन की ऊंची नीची, आड़ी तिरछी, तंग गलियों में अगरबत्ती बनाते बनाते तीस वर्षीया संध्या गोमे की उंगलिया पीड़ा गई हैं। कंधे दुखने लगे हैं। अब दुआ के लिए भी हाथ उठाने में दिक्कत होती है। फिर भी एक दिन में वह पांच किलो तक अगरबत्ती बना लेती है। रीना आकोदिया के गले में हमेशा खराश रहती है। कच्चे माल से निकलने वाला धूल उसके फेफड़े में जम रहा है। परिवार चलाना है तो उसे किसी भी हालत में अगरबत्ती बनाना ही होगा। पुष्पा गोमे बताती है, हम रोज का बीस से पचास रुपये तक कमा लेते हैं। घर के बाहर काम करने नहीं जा सकते। हमें घर बैठे काम चाहिए। इसके अलावा और कोई रोजगार यहां है नहीं..क्या करे?
ये महाकाल और कालिदास की नगरी उज्जैन की एक गली है योगेश्वर टेकरी। शायद ऐसे ही किसी गली में कभी अरुण कमल ने संध्या, पुष्पा, रीना, पिंकी जैसो की बहदाली देखी होगी। तमाम पूजाघरो को सुंगध से भर देने वाले हाथ अब बेहाल हैं। लगातार एक ही जगह बैठकर अगरबत्ती बनाते बनाते उनका जीवन कई तरह की मुश्किलो से भर गया है। उनका स्वास्थ्य तो खराब हो ही रहा है घर की माली हालत भी ठीक नहीं हो पा रही है। फैक्ट्री मालिक और बिचौलिए के शोषण दौर निरंतर जारी है। रीना बताती है, बहुत सी औरतो का घर इसी से चलता है। क्या करें। सभी हमारा शोषण करते हैं। कच्चा माल देते हैं साढे सात किलो, लेकिन बनाने के बाद वे पांच किलो तौलते हैं। धूल से बीमारी हो रही है। रीना की तरह ही इस गली की तमाम औरतें शोषण के दोहरे मार से बिलबिलाई हुई हैं। इनका कोई ना कोई संगठन है ना इनके हक में आवाज उठाने वाला कोई स्थानीय नेता। घर के पुरुष सदस्यो को भी इनकी सुधि नहीं है। खुद तो वे दिनभर बैठकर इसतरह का काम करेंगे नहीं। घर की महिलाओं के ऊपर लाद दिया है पूरा कारोबार। उनका ज्यादातर वक्त चौक चौराहो पर बैठकर चाय पीने या बीड़ी का धुंआ उड़ाने में जाता है। शाम को बिचौलिए से पैसे लेने जरुर पहुंच जाते हैं। कम रकम हाथ लगी तो हो हल्ला मचाते हैं। औरत पर दोहरी मार। कम अगरबत्ती बनाने का इल्जाम भी झेलो। अब तक किसी स्वंयसेवी संगठन की नजर इनकी बदहाली पर नहीं पड़ी है। नवगठित एनजीओ भोर की सर्वेसर्वा मधुलिका पसारी ने जब पहली बार फरवरी, 2010 को मेरे साथ इस गली का दौरा किया तो मेरे साथ साथ वह दंग रह गईं। उन्हें अंदाजा ही नहीं था कि खुशबू रचने वाले हाथों को किन मुश्किलो को सामना करना पड़ रहा है। अब तक उपेक्षित इस धंधे में लगी महिला मजदूरो का कोई यूनियन भी नहीं है। पिंकी टटावत बताती है यहां यूनियन नहीं बनती। मैं अगर बनाना चाहूं तो बीच के लोग खत्म कर देते हैं। हम काम करना तो नहीं बंद कर सकते ना। काम बंद होगा तो परिवार कैसे चलेगा?
संध्या बौखला कर कहती है, हमें साढे सात किलो माल देता है बदले में पांच किलो लेता है। वजन में माल कम हो गया ना। हमारी मजदूरी वैसे भी कम है ऊपर से डंडी मार देते हैं। कमसेकम हमारी मजदूरी तो बढा देते।
पूरी तरह से औरतो के कंधो पर टिका है ये धंधा। पांच साल की उम्र से लड़कियां भी निपुण हो जाती है अगरबत्ती बनाने में। घर में जिनती महिला सदस्य होती हैं वे सब घरेलु कामकाज निपटाने के बाद सुबह 11 बजे से शाम पांच या छह बजे तक एक ही जगह पर बैठकर बांस की पतली स्टिक पर मसाला चढाती रहती हैं, सुखाती हैं फिर इनका बंडल बना कर बिचौलिए का इंतजार करती हैं। बदले में वो चंद रुपये दे जाता है। इन पैसो से ना पेट भर पा रहा है ना किस्मत बदल पा रही है। पूरे शहर में और कोई धंधा नहीं है। सारे मिल बंद हो चुके हैं।
देश में उज्जैन पांचवे नंबर का अगरबत्ती उत्पादक शहर है। लगभग 100 अगरबत्ती बनाने वाली फैक्ट्री वहां है। यहां से बनने वाली अगरबत्ती की आपूर्ति देश के कई राज्यो जैसे, गुजरात, राजस्थान, उतर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली में होती है। इस व्यसाय को गृह उधोग का दर्जा प्राप्त है इसलिए सरकार ने कई तरह की छूट दे रखी है। अगरबत्ती व्यसाय से पिछले पचास साल से जुड़े व्यवसायी फखरुद्दीन से बातचीत के दौरान उन वजहो का पता चलता है जो मजदूर महिलाओं के शोषण
का वायस बनी हुई हैं।
वह बताते हैं, उज्जैन की अगरबत्ती गुणवत्ता में कमजोर है। सस्ती बिकती है, मजदूर भी निपुण नहीं हैं। ये कारोबार वहीं फले-फूलेगा जहां गरीब वर्ग है। वैसे भी राजनीति की वजह से कपड़ा मिलें, पाइप फैक्ट्री समेत कई कारखाने बंद हो गए। मजदूर क्या करें। मजबूरन उन्हें इस धंधे में लगना पड़ा।
फरुद्दीन महिला मजदूरो के शोषण के लिए छोटे छोटे कारोबारियो को दोषी ठहराते हैं। उनका कहना है कि छोटे कारोबारियो से हम बड़े कारोबारी बेहद परेशान हैं। उनकी वजह से मध्य प्रदेश के हर गांव में अब अगरबत्तियां बनने लगी हैं। चूंकि किलो के हिसाब से बेचना है तो मोटी अगरबत्तियां बनने लगीं हैं। बारीक बनाएंगे तो वजन कम होगा। धीरे धीरे बारीक बनाना भूल जाते हैं। इसीलिए कच्चा मान बाहर नहीं भेजते, अपनी फैक्टरी में ही मजदूरो को रखकर काम करवाते हैं और उन्हें मीनीमम वेजेस से ज्यादा देते हैं।
अंत में..मधुलिका कहती हैं, अब मुझे कुछ करना पड़ेगा। भोर को एक उद्देश्य मिल गया है। हो सकता है इनकी पहल पर एक नई भोर इन गलियों में आए।

बोल..कि बोलना है जरुरी

Posted By Geetashree On 3:49 AM 9 comments

फांसीघर में चीख

गीताश्री

स्त्रियों के खिलाफ हो रहे पारिवारिक आतंकवाद पर आधारित फिल्म ‘बोल’ (निर्देशक-शोएब मंसूर) देखते हुए भारतीय महिला प्रेस कोर्प, दिल्ली की सभी सदस्यों की आवाजें एक अंधेरी और गहरी चुप्पी में बदल गई थी। मूक, स्तब्ध और अवाक। तीन घंटे लंबी फिल्म आपको वांछित मनोरंजन नहीं, किसी यातना शिविर से गुजरने जैसा अहसास दे रही थी। शायद कलेजा मसोस कर देखने वाली यातना का लाइव टेलीकास्ट। फिल्म प्रभाग के उस हॉल में जहां रिलीज होने वाली फिल्मों के सर्टिफिकेट की किस्मत तय होती है, उस हॉल में बैठे-बैठे जैसे धडक़नों का संगीत फांसीघर के उस चीख में शामिल हो गया था, जब नायिका चीखती है, ‘खिला नहीं सकते तो पैदा क्यों करते हो? मारना जुर्म है तो पैदा करना जुर्म क्यों नहीं है?’ यह सवाल फांसीघर से उठता है और विकासशील देशो के कैनवस पर पसर जाता है। सवाल दर सवाल उठाती यह फिल्म कातिल और गुनाहगार होने में फर्क का खुलासा करती है। अपने पिता का कत्ल करने वाली नायिका फांसीघर में अपनी कहानी टीवी पर लाइव बताती है, यही उसकी आखिरी ख्वाहिश है। वह पूरे मुल्क को आधी रात के अंधेरे में बताती हैं कि वह कातिल जरुर है, गुनाहगार नहीं। वह अपनी फांसी चढते चढते मुल्क के सामने कई सवाल छोड़ जाती है और साथ ही आजाद कर जाती है परदानशीं औरतो को, उनके बुरके नोच कर मानो कट्टपंथियों के चेहरे पर फेंक जाती है जिन्होंने औरतो को अपनी संपत्ति समझ कर ढंक दिया था। नायिका उस मानसिकता की भी मुखालफत करती है जो एक स्त्री को बच्चा पैदा करने की मशीन में तब्दील कर देती है। वह परदानशीं औरतो की चुप्पी को पररिवर्तनकामी चीख में बदल देती है।
वह यातना शिविर में सिर्फ सुंदर सुंदर सपने देखने वाली (यातना शिविर में सपने ज्यादा सुंदर आते हैं) औरतो को अंखुआने का मौका समाज से छीन लेने की हिमायत करती है। यह फिल्म औरतो की उस चुप्पी के खिलाफ है जिसके कारण वे अपने घरो की कैदी बना दी जाती हैं। फिल्म ठोकर मारती है उस व्यवस्था को जिसमें एक पुरुष को नैतिक पाखंड करने की इजाजत हैं लेकिन एक औरत को खुली हवा में सांस लेने की इजाजत नहीं। इस्लामिक समाज में औरतो की बगावत की बुनियाद डालती है। स्त्रीमुुक्ति का रास्ता आखिर पुरुष सत्ता की समाप्ति से होकर ही जाता है। संस्कृति और सभ्यताएं किस कदर औरतो को आतांकित करती और उन पर कहर ढाती है, उसका एक उदाहरण यहां देखिए।
शोएब मंसूर पाकिस्तान के सबसे साहसी फिल्मकार हैं, जो एक परिवार, समाज और देश की समस्या को उठाकर दुनिया के सीने में दर्द की तरह भर देते हैं।
‘बोल’ के जरिए उन्होंने समाज में व्याप्त दोहरे मापदंड की पोल खोली है। पाकिस्तान में कुछ सप्ताह पहले ‘बोल’ रिलीज हुई होगी तब निश्चित तौर पर गरमागरम बहसें शुरु हुर्ह होगी। शोएब की पहली फिल्म ‘खुदा के लिए’ की तरह ‘बोल’ भी पाकिस्तान की सामाजिक पृष्ठïभूमि पर आधारित है।
फिल्म में एक बेटी अपने कट्टïर रूढि़वादी पिता के खिलाफ आवाज बुलंद करती हैं। महिलाओं को पुरुषों के सामने तुच्छ समझने की सदियों पुरानी परंपरा का मुकाबला करने का साहस करती हैं। हकीम साहब की दिल दहलाने वाली कहानी है। वह चाहते हैं कि उनकी पत्नी एक बेटे को जन्म दे जिससे भविष्य में उनका खानदान चलता रहे और उनका नाम रोशन रहे। इस चक्कर में उनकी पत्नी 14 बेटियों को जन्म देती हैं, जिनमें सात ही जिंदा रहती हैं। उनकी आठवीं औलाद ‘किन्नर’ है। फिल्म में हकीम साहब के परिवार की दुश्वारियों और उनके प्रति हर सदस्य की प्रतिक्रिया दिखाई गई है। फिल्म में भावनाओं का उफान गजब का है। बड़ी बेटी ( हुमैमा मलिक) और पिता (मंजर सेहबाई) की सोच हर मुद्दे पर अलग-अलग है। जब भी पिता और बेटी एक साथ परदे पर आते हैं, दोनों के बीच का तनाव दर्शकों के मन पर भी दिखने लगता है। स्त्री-पुरुष के बीच गैरबराबरी और पुरुष सत्ता के खिलाफ आक्रोश फिल्म के केंद्र में है।
चूंकि पाकिस्तान के किसी एक फिल्मकार ने इस कथानक पर फिल्म बनाने का साहस किया, इसलिए शोएब की सराहना दुनिया भर में की जा रही है।
फिल्म के कथानक से जुड़े उपकथानक और कहानी में आए उतार-चढ़ाव भी हैरान करने वाले हैं। इस तरह के जटिल विषय पर बड़े पर्दे के लिए फिल्म विरले ही बनती है। फिल्म के माध्यम से सीमा के दोनों तरफ कट्टïरपंथ को लेकर चेतावनी भी दी गई है कि इसमें दोनों देशों को नुकसान ही होगा, फायदा नहीं।
ऐसा नहीं कि फिल्म में कुछ कमियां नहीं हैं। कहानी कहीं कहीं बिखरी नजर आती है। एक गाना जबरदस्ती ठूंसा हुआ लगता है। डार्क पक्ष कुछ ज्यादा गहरा है। यह आपको उदास कर सकता है बोर नहीं। नसीरुद्दीन शाह को इस फिल्म का हिस्सा ना बन पाने का अफसोस लाजिमी है। बकौल नसीर-यह फिल्म ऐसी होती जिस पर वह गर्व कर सकते थे। फिलहाल शोएब की ईमानदारी फिल्मकारो के लिए गर्व करने लायक है।