शाइना नेहवाल के रैकेट और शटल कॉर्क नहीं, देखिए उसकी उछलती स्कर्ट!

Posted By Geetashree On 5:06 AM 4 comments


विभा रानी


छम्मक्छल्लो का उन सबको प्रणाम, जो हमें सेक्स ऑबजेक्ट बनाने पर आमादा हैं.
पोर्न साहित्य देखें, पढें तो आप अश्लील. छम्मक्छल्लो उन्हें अधिक ईमानदार मानती है. छम्मक्छल्लो उनकी बात कर रही है, जो आम जीवन के हर क्षेत्र में हमारी आंख में उंगली डाल डालकर ये बताने में लगे रहते हैं कि ऐ औरत, तुम केवल और केवल सेक्स और उन्माद की वस्तु हो. भले ही तुममें प्रतिभा कूट कूट कर भरी हो, तुम सानिया हो कि शाइना, हमें उसका क्या फायदा, जब हम तुम्हारे हाथों की कला के भीतर से झांकते तुम्हारे यौवन के उन्माद की धार में ना बहें? हाथों की कला तो बहाना है, हमें तो तुहारे यौवन के मद का लुत्फ उठाना है.

आज (22/4/2011) के टाइम्स ऑफ इंडिया के चेन्नै टाइम्स में विश्व के तीसरे नम्बर की बैडमिंटन खिलाडी शाइना नेहवाल द्वारा रुपम जैन को दिए इंटरव्यू में शाइना नेहवाल कहती है कि वह बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन के इस फैसले से खुश नहीं है कि खेल के दौरान महिला खिलाडी शॉर्ट्स के बदले स्कर्ट पहने. मगर, फेडरेशन मानता है कि इससे खेल और पॉपुलर होगा. भाई वाह! समाज में जो दो चार अच्छे पुरुष हैं, इस मानसिकता के खिलाफ आप तो आवाज उठाइए. कामुकों की कालिख की कोठरी में आप पर भी कालिख लग रही है. शाइना कह रही है कि लोग खेल देखने आते हैं, खिलाडियों की पोशाक नहीं. पर फेडरेशन यह माने, तब ना!

अब भाई लोग यह फतवा न दें मेहरबानी से कि ऐसे में शाइना को विरोध करना चाहिये, उसे खेल छोड देना चाहिए. जो भाई लोग स्त्रियों के सम्मान के प्रति इतने ही चिंतित हैं, जिसका ठेका कुछ ने लिया हुआ होता है तो उनसे छम्मक्छल्लो का निवेदन है कि बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन पर दवाब डालें. शाइना मानती है कि ड्रेस का फैसला खिलाडियों पर छोड दिया जाना चाहिए. उसने स्वीकारा है कि अकेला चना भाड नहीं फोड सकता. वह इंतज़ार में है कि अन्य खिलाडी भी स्कर्ट से होनेवाली असुविधा के खिलाफ बोलेंगे और तब सामूहिक स्वर उठेगा, जिसको फायदा खिलाडियों को होगा. मगर तबतक बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन की भोगवादी मानसिकता के प्रति शत शत नमन कि वह विश्व की महिला खिलाडियों के खेल का आनंद तो आगे-पीछे, इसके बहाने उनकी देह, यौवन और यौन का आस्वाद आपको कराएंगे.

अब यह न कहिएगा कि यह फैसला बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन में बैठी किसी महिला अधिकारी ने लिया होगा, क्योंकि महिलाएं ही महिलाओं की सबसे बडी दुश्मन होती हैं.

(विभा रानी हिंदी और मैथिली की साहित्यकार है। चेन्न्ई में नौकरी कर रही हैं। फेसबुक पर खूब सक्रिय है। बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। अपना ब्लाग है..छम्मक छल्लो कहिस. थियेटर करती हैं, नाटक लिखती है। स्त्री के अधिकारो पर बेहद मुखर हैं। यह लेख उन्होंने हमारे लिए लिखा है। मुझ पर उनका बहुत स्नेह है। हम एक जैसा सोचती हैं और एक सा रिएक्ट करती हैं। हम दोनो के भीतर खौलता लावा है। आप पढेंगे तो अंदाजा हो जाएगा।)

मर्दाने चरित्र प्रमाण-पत्र

Posted By Geetashree On 4:18 AM 9 comments


मनीषा

चरित्र चरमराने से परेशान औरतों में लेखक, साहित्यकार, पत्रकार, बैंकर, अदाकार, कवि, कलाकार, डॉक्टर, इंजीनियर, से लेकर भाजी वाली, घरेलु काम वाली, बीपीओ में रात्रि-पाली करने वाली, नर्स, घरवाली, मास्टरनी या बाबूगिरी करने वाली सभी शामिल हैं। अपने समाज में औरत होने का मतलब ही है, दुविधाओं में ग्रस्त रहना। दूसरों यानी पुरूषों के लिए शोक में लिपटी रहना। आचार-व्यवहार पर चरित्र की चाशनी का मुलम्मा चढ़ाये फिरना। पुरूषों ने बेहद चतुराई से स्त्री के चरित्र को हमेशा अपनी दया का मोहताज प्रचारित किया है। औरतों पर त्वरित टिप्पणी कर उनकी छवि बनाने-बिगाडऩे का ठेका वे हमेशा से अपने अंगूठे के नीचे रखने को स्वतंत्र रहे हैं। आज भी उनके लिए यह निर्णय सुनाना कि अमुक लडक़ी बहुत ‘घटिया’ है, काफी पौरुषेय दंभ देने वाला होता है। लड़कियों को लेकर पुरुषों में काफी अलग किस्म की शब्दावली प्रयोग होती है, जिसका जिक्र भी करना अभद्रता माना जा सकता है। बुरी, चरित्रहीन, छिनाल, बाजारू, रंडी जैसी शब्दावली इनके लिए आम है। दरअसल, ये आज भी औरत को प्रोडक्ट से ज्यादा नहीं समझते। अपनी बीवी और बच्ची के अलावा इनको बाजार में टहलती, दफ्तर में काम निपटाती, बस में सफर करती, बैंक में नोट गिनती, सडक़ पार करती, भाजी-सौदा-सुलभ खरीदती हर औरत का चरित्र गंदा लगता है।
जबकि, असलियत यह है कि समाज की सारी औरतों को चरित्र-प्रमाण पत्र बांटने में जुटे ये लोलुप किसी औरत को साफगोई से देखना जानते ही नहीं! मनोविज्ञान चीख-चीख कर अब कहता है कि पुरुषों के दिमाग में हर छठे मिनट पर सेक्स घूमता है। अपनी इस कामुकता पर उन्हें लगाम लगाने की जरूरत महसूस नहीं होती। मेरी एक पत्रकार मित्र बड़ी आहत हैं, ऐसे ही कुछ उद्दंडी पुरुषों की टिप्पणियों से।
हिंदी की एक बड़ी उपन्यासकार भी आहत हो जाती हैं, ऐसी ही छींटाकशी से। ये प्रबुद्ध औरतें हैं। इनकी समाज-परिवार में अपनी पहचान है। अपनी बात भी उचित ढंग से रखने में सक्षम हैं ये। बावजूद इसके, ये उन्हीं दकियानूस जंजालों में उलझ जाती हैं। कोई (पुरुष) हमारे चरित्र का निर्माता कैसे हो सकता है? ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो उन्हें निर्णायक मानने पर मजबूर करती हैं? जो पुरुष किसी भी औरत को कपड़ों की तमाम परतों में लिपटी होने के बावजूद अपनी नजरों से नग्न ही निहारता है, उसके बारे में क्या कहा जाए? हम सब औरतों को यह अहसास नहीं है कि पुरुष जब औरतों को देखते हैं तो सबसे पहले उनकी नजरें छाती पर अटकती हैं। वे जुबान से कुछ भी बोलें, पर उनके चेहरे के हाव-भाव पढ़ कर हम समझ ही लेते हैं कि पुरुष मन में क्या चल रहा है।

औरत का पर-पति की तरफ देखना भी पुरुषावली के अनुसार घृणित है परंतु पर-स्त्री को प्रणय-निमंत्रण देने को वे विजेता के तौर पर देखते हैं। पुरुषों को भ्रम है कि उनके जीवन में जितनी औरतें (अंतरंग) आती हैं, उनका पौरुष उतना ही स्ट्रांग होता जाता है। इसकी महिमा बखानते समय उनको ना तो अपने चरित्र के तार-तार होने का भय होता है, ना ही अपने यौन उच्छृंखलताओं पर किसी तरह की कोई ग्लानि ही। पुरुषों को हमेशा से भ्रम रहा है कि औरतों का वजूद उनकी दया के भरोसे ही धरती पर शेष है। वे औरतों को अपना शिकार मानते हैं और अपने पौरुष को परखने के लिए उसकी देह का इस्तेमाल शौक से करते फिरते हैं। चरित्र को केवल यौन शुचिता से जोडऩे की नासमझी रखने वालों की माफ करके हम महानता के खांचे में नहीं बने रह सकते। हमको जबरन उनके भ्रम को चकनाचूर करना होगा। उनकी दया को दुत्कारना होगा। साथ ही, उनके झूठे पौरुषेय दंभ को कुचलने में कोई संकोच नहीं करना होगा। सुविधाजनक स्थिति में जीने की इसी आदत के चलते निन्दा-रस के साथ-साथ चरित्र उधेडऩे की रसीली बातों से वे खुद को बचा नहीं पाते। अपने पास यह अधिकार सुरक्षित रखने को लालायित पुरुष ‘बुरी’ औरतों की श्रेणी में उन्हीें औरतों को रखते हैं, जो उनकी पहुंच से बाहर नजर आती हैं। अदभूत तर्क तो यह है कि हर मर्द मानकर चलता है कि वे औरतों का चरित्र प्रमाण-पत्र चुटकियों में खड़े-खड़े ही दे सकते हैं। चरित्र चाशनी का यह भ्रम-रस औरतों के दिमाग में इस कदर ठूंस दिया जाता है कि वे इस पर जरा सी खरोच से भी घबरा जाती हैं। यह जानते हुए भी कि इन बातों में तनिक भी दम नहीं है, औरतें कछुए के इस छद्म खोल मे खुद को छिपाने की हर पल कोशिश करती हैं। चरित्रवान औरतों की काबिलियत के कशीदे पढऩे वाले ही कीचड़ उछालने का काम भी करते हैं।

पौरुषेय उद्दंडताओं से त्रस्त औरतों की संख्या अकेले दिल्ली में 80 फीसद है जो घर से बाहर निकलने में ही खुद को असुरक्षित मानती हैं। नन्हीं-नन्हीं बच्चियों को पुरुषों की यौन कुंठाओं से बचाने में हमारी तमाम ऊर्जा लग जाती है, बावजूद इसके रोजाना पुरुष उनको हवस का शिकार बनाते हैं। चारित्रिक दोषों से घबराने वाली हमारी मानसिकता कब खत्म होगी, कहना मुश्किल है क्योंकि इसके लिए ना तो सरकारें काम करेंगी और ना ही कोई आरक्षण काम आएगा। यह मानसिक दशा है, प्रेशर बनाने की साजिश। जिससे बचने का काम ऊर्जावान, सक्षम स्री को ही करना होगा। मर्दों के गढे पैमानों/ पैटर्न को उखाड़ फेंकना होगा और भयभीत हुए बिना ही उनको ललकारना होगा।
यह आज की समस्या नहीं है, भगवान राम पीढिय़ों से पुरुषोत्तम हैं यानी समस्त पुरुषों में उत्तम, पर उन्होंने भी अपनी गर्भवती पत्नी सीता के चरित्र पर लगे दोष के आधार पर उन्हें घर से निकाला दे दिया था। औरत के ‘चरित्र’ का पैमाना कौन तय करेगा और कैसे करेगा, यह सब पुरुष की निर्णय करते रहे हैं। चरित्र को दूध पर पड़ी मलाई बना दिया गया है, जिसको जो चाहे, आकर उतार दे? यह कोई आवरण तो नहीं है ढक कर रखा जाए।

यह पुरुषवादी प्रपंच की देन है जिसने औरतों को मुटï्ठी में भींचे रखने की चतुराई में गढ़ा है। पांच पतियों के साथ रहने वाली द्रोपदी चरित्रवान है, मॉडल से हीरोइन बनी पायल रोहतगी ने ज्यों ही फिल्म डायरेक्टर दिबाकर बनर्जी पर कास्टिंग काउच का आरोप लगाया तो सारा मीडिया (पुरुषवादी) अचानक फायर-बैक करने में जुट गया। सुधीर मिश्रा जैसा संवेदनशील नजर आने वाला गंभीर फिल्मकार बनर्जी की तरफदारी करने लगा। यह सच है कि आज की तारीख में पायल जाना-माना चेहरा है, वह चतुर है। उसको काम पाना आता है पर इसका यह मतलब तो नहीं कि उसके साथ जो हुआ, वह सिर्फ स्टंट था। फिल्म वाले तो प्रचार के नाम पर जाने क्या-क्या करने को पहले से ही तैयार रहते हैं। कुल मिलाकर, सारे आरोप अकेली लडक़ी पर मढऩे की यह घिनौनी सोच कब बदलेगी? लड़कियों को अपना चरित्र संभाल कर रखना चाहिए, पर लडक़ों को यह पाठ पढ़ाने की जरूरत क्यों नहीं होनी चाहिए? ठंडा पेय बेचने वाली मल्टीनैशनल कंपनी विज्ञापन करती है कि अपनी गर्लफैंड के सामने लड़कियों को कैसे ताको, पर उनमें इतना साहस है कि वे कहें कि किसी दूसरे मर्द को कोई ब्याहता कैसे देखेगी, क्योंकि यह फार्मूला पुरुष-विरोधी है, प्रोडक्ट की बिक्री पर इसकी निगेटिविटी दिख जाएगी। टीवी पर आने वाले सारे सीरियल्स यही बेचते हैं ना कि बुरी औरतें दूसरों के पतियों का शिकार करती हैं, जबकि भली औरतें पति से प्रताडि़त होने के बावजूद भी रोती-बिसुरती घुटती रहती है। यह सच है कि पुरुषों को छलने, उनको प्रलोभन देने, अपना काम बनाने और उनको बेवकूफ बनाने की उतावली में जनाना चालबाजी आम है। पर यह दुतरफा खेल है, यहां ना कोई कीचड़ है ना कमल। यहां दोनों रोग (एक)चरित्र हैं। 50-50, आपसी सहमति से बनाया गया कोई भी संबंध बेमानी नहीं होता। हां, ये गेट टू गेदर होता है, लाभ-अलाभ इसी में शामिल होते हैं। इसमें दोनों बराबरी से भागीदारी करते हैं इसलिए चरित्र केवल स्री का ही धूमिल हो, यह बात जमती नहीं। स्री को चरित्र में उलझाकर, पुरुष के भाग्य भरोसे छोडऩे वाली चतुराई के दिन पूरे हो चुके हैं।
पुरुष को चरित्र प्रूफ बनाये रखने की साजिश और परिवार का भाग्यविधाता होने का भ्रम अब खत्म हो चुका है। औरतें बेहद चतुराई से पुरुषों का चरित्र हरण करके अपना भाग्य बनाने की राह पर निकल चुकी हैं। उनको खोने के दर्द से ज्यादा आनन्द ‘झपटने’ का है।

(मनीषा दिल्ली के राष्ट्रीय सहारा अखबार में फीचर एडीटर है और स्त्री विमर्श पर धारदार लेखन के लिए जानी जाती हैं।)

अन्ना की आंधी में हम भी उड़े, आप भी जुड़े

Posted By Geetashree On 6:41 AM 6 comments


गीताश्री

दोस्तो, जल्दी में थोड़ी सी बात...आज अन्ना की आंधी में मैं भी उड़ी। दिन भर एसएमएस भेजे..दोस्तो से अपील की कि वे जंतर मंतर जाए..भले थोड़ी देर के लिए। एक इतिहास वहां रचा जा रहा है, उसके हिस्से बनें, अपना योगदान दें। जो लोग व्यक्ति केंद्रित प्रलापो विलापो में जुटे हैं उन्हें सदज्ञान आए कि इस वक्त मुद्दे कितने महत्वपूर्ण हैं। आप दूर हैं, कोई बात नहीं..हुक्मरानों को हिला देने वाले एक आंदोलन को अपना नैतिक समर्थन तो दे ही सकते हैं। तरीका कोई भी हो सकता है। लेकिन वक्त आ गया है कि आप जाग जाएं..अपने लिए ना सही..भावी पीढी के लिए जो एक भष्ट्राचार मुक्त समाज में सांस ले सकेगी। अपनी भावी पीढी को आप कुछ तो दे जाएं।
जंतर मंतर पर एक तरफ भूख हड़ताल पर बैठे अन्ना और उनके कुछ समर्थक..भूख हमें लगी थी। वहां खाने पीने का छोटा सा ढाबा है जो बहुत साल पहले रिपोर्टिंग के दौरान रोज खाने का हमारा अड्डा हुआ करता था। खाना टेस्टी होता है। दूर दूर से लोग खाने आते हैं। आज भी कुछ लोग खा रहे थे...ये वो लोग थे जो बहुत दूर से अन्ना के समर्थन में चल कर आए थे और जिनका खाना जरुरी था कि बहरी सरकार के कान के परदे फाड़ सके उनकी बुलंद आवाज।

मन हुआ कि कुछ खा लूं..खाया नहीं गया। दूर मंच पर बैठे अन्ना दिखाई दिए.खाना तो घर पर भी खा लेंगे लेकिन नारा लगाने और तालियां बजा कर हौसला बढाने का अवसर फिर ना मिलेगा। रोज के काम निपटाने ही हैं, आफिस जाना ही है, घर लौटना ही है। विनोद शुक्ल याद आते हैं...घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता, जितना लौटने के लिए होता है....

गरमी है इन दिनों। सिर पर धूप चमकती है। सफेद रंग के शामियाने तने हैं सिर पर। पर गरमी सारे बंधन तोड़ कर सिरो को जलाती है। आंदोलनकारियो को इसका एहसास नहीं। कोई केरल से चला आ रहा है तो अलीगढ मुस्लिम विश्वविधालय से छात्रों का हुजुम चला आ रहा है। एनआरआई मेहमान भी टीवी पर खबरे देख मुहिम को समर्थन देने चले आए। एक 78 साल का बूढा, कैसे देश के नौजवानो को झकझोर रहा है..यहां देखिए।

एक पल के लिए भीड़ का चेहरा एक सा हो जाता है। सब एक से हैं..क्योंकि सबका मकसद एक है। ललकार में सबकी आवाज एक सी होती है। इस आंदोलन का किसी राजनीतिक पार्टी से कोई लेना देना नहीं है। राजनीतिक दलो को यहां रोटियां सेंकने का मौका नहीं मिलेगा।

जेपी आंदोलन की हल्की सी याद है। याद करुं तो कोलाहल सा उठता है जेहन में। स्मृतियो के धुंधले आकाश में एक बूढा चेहरा चमकता है। एक भीड़ दिखाई देती है। सायरन और भगदड़ सी सड़को पर.पूरा याद होतो आज से तुलना करें। लेकिन आज जो कुछ देखा..वह कितना आश्वस्तिदायक है। लोग अपने आप आ रहे हैं। खुद ही अपील कर रहे हैं। किसी का निजी स्वार्थ नहीं। एक ही एजेंडा। मीडिया की सकारात्मक भूमिका। वहां खड़े होकर आप टीवी चैनलो के रिपोर्टर का पीटीसी सुनें तो अंदाजा हो जाएगा। मगर सरकार हिल कर भी हिलती दिखाई नहीं दे रही। और कितने दिन अन्ना को बिना अन्न के रहना पड़ेगा।
मन अजीब सा हो रहा है। कुछ खाओ तो अपराध सा लगता है। आज रात सोच रहे हैं वहां डेरा डालें। कमसेकम देर तक रुका तो जा सकेगा। हाथ में कैंडिल लेकर रोशनी तो जलाई जा सकती है। देखें, क्या होता है। फिलहाल खबरो पर गहन नजर है। अन्ना का चेहरा गांधी की तरह होता जा रहा है...