अपने आंगन का आतंक

Posted By Geetashree On 2:18 PM 22 comments

मनीषा मेरी बेहद करीबी दोस्त हैं. इनके स्वभाव के बारे में जानती थी. इनकी रुचियों, खूबियों का भी मुझे पता था, लेकिन और भी कुछ एसा था जो मुझसे या कहें जमाने से छुपा था (छुपाती रही हैं.). ये छुपा ही रहता. अगर मैंने कुछ लिखने को नहीं कहा होता. उदारमना मनीषा अपनी रचनाएं देने में इतनी कंजूस निकलेंगी ये भी अब पता चला. मनीषा अब भी नहीं चाहती थीं कि दुनिया को पता चले कि वे कविता या कहानी लिखती हैं. मेरे जिद करने पर उन्होने रचनाएं दे तो दीं मगर इस शर्त्त पर कि मैं इसे बिना नाम के लगा दूं. मै समझ सकती हूं उनका संकोच...लेकिन मैं नहीं मानी. कहानी भले कहानी की कसौटी पर खड़ी ना उतरे, कोई परवाह नहीं (हालांकि ये कौन तय करेगा). इस कहानी के सामाजिक सरोकार ने मुझे बेचैन किया. अपने आंगन के आतंक से लड़की की मुक्ति कहां संभव है. 

आज जहां एक कविता या एक कहानी लेकर लोग साहित्यिक मंडली का हिस्सा बन जा रहे हैं वहीं मनीषा के भीतर यानी मन और डायरी दोनो के पन्ने कहानी और कविताओं से भरे हैं और मुझे पता नहीं चला. वह दिल्ली विश्वविधालय में स्पेनिश भाषा पढाती हैं और अब तक कई क्लासिक उपन्यासों और महान लेखकों की जीवनी का अनुवाद कर चुकी हैं. इनका हिंदी में हाथ तंग नहीं है फिर भी हिंदी में लिखने मे संकोच है. अंग्रेजी में लिखती हैं और स्पेनिश में बोलती हैं (क्लास में).

कई रचनाओं का हिंदी में अनुवाद करने वाली की रचनाओं का मैं अनुवाद करुं, मुझे अटपटा लग रहा था. मगर वे माने तब ना. मुझ पर हमेशा की तरह विश्वास रखते हुए ये काम मेरे माथे मढ दिया. सबसे पहले पेश है उनकी कहानी का अनुवाद. इसमें मेरा कुछ भी नहीं है. कहानी ज्यों की त्यों आपके सामने रख रही हूं इस उम्मीद के साथ कि कहानी जहां, जिन सवालों के साथ खत्म होती है वहां से कई और बड़े सवाल खड़े हो जाते हैं. कहानी पढेंगे तो आप अपने भीतर खुद इन सवालो का जवाब तलाशेंगे कि क्या मरने वाले के सारे गुनाह माफ कर दिए जाने चाहिए. पढें और बहस में शामिल हों.... 

-गीताश्री

कहानी

कोई बात नहीं पापा


मनीषा तनेजा

मेरे पास उस घृणित व्यक्ति को माफ करने, नजरअंदाज करने या उसे इंकार करने के लिए तकरीबन 20 मिनट थे. वह मेरा बाप था.

हम अस्पताल के एक कमरे में बैठे, जहां एंटीसेपिटक्स की गंध थी और वहां बुझे चेहरों वाली नर्सों की आवाजाही लगी हुई थी, जिनके लिए जिंदगी और मौत में कोई फर्क नहीं था....

आज वह इंसान मर रहा था लेकिन मेरी दादी मां नहीं होतीं तो आज मैं यहां इसके पास नहीं आती. इस जगह, जहां जिंदगी के ऊपर मौत का साया मंडरा रहा था, उस बेजान होते इंसान ने अपनी आंखें खोली और कहा, 'मेरा ये अंदाजा है कि मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा बर्ताव किया है.' 

वह मुझसे यह जानना चाह रहा था कि क्या उसके ऐसे आचरण को माफ भी किया जा सकता है? क्या मैं उसे माफ कर पाऊंगी? उसे उम्मीद थी कि मैं कहूंगी, 'पापा, आप तो बुरे थे, फिर भी मैं आपको माफ करती हूं.' लेकिन...

तब मेरा सवाल था कि जो भाषा मैं और वह बोला करते थे, क्या उसे मैंने उसके शब्दकोश से सीखा था? मैं बुरी थी. तुम बुरे थे.

जिस पल उसने अपनी बातें खत्म की थी, उस समय से मेरी समझदारी का मीटर तेजी से चलना शुरू हो गया. मेरी चुप्पी उसे कहने का मौका दे रही थी और वह कह रहा था कि मैं ऐसा कुछ चाहता नहीं था जो मैंने किया. उसकी यही बात अपने आप में एक जवाब थी. अगर मेरा जवाब उससे अलग होता तो उसे वहीं दिया जाना था. यही वह घृणित व्यक्ति था, एक बिल्कुल बददिमाग या शायद बेचैन.

अब वह व्यक्ति मुझसे सवाल पूछने के बाद काफी दीन-हीन सा लग रहा था. वह चाह रहा था कि बिना किसी लाग-लपेट के, बिना कोई दया दिखाए मैं उसकी आलोचना करूं. और फिर मैं उसकी पीड़ा को महसूस करके उसे संतुष्ट होने का मौका दूं.

मेरी मां आज से 20 साल पहले दुनिया छोड़ गई थीं. तब मेरी उम्र केवल सात साल की थी. अपने ही पिता द्वारा उन दिनों सताया जाना मेरे लिए आज भी एक डरावने सपने की तरह है. कई रातों तक वह अपनी आठ साल की बच्ची के साथ बलात्कार करता रहा जो इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकती थी कि उसके साथ क्या हो रहा है. किसी तरह मैं यह समझ पाई कि यह गलत है. बहुत गलत. उसके गंभीर परिणामों के बारे में जान कर इस पूरे मामले को समझना मेरे लिए और भी मुश्किल हो जाता.

हर दूसरे दिन दारू पीकर मारपीट से होने वाली दुश्वारियों को कम करने के लिए परिवार और पड़ोसियों ने कोई कदम नहीं उठाया. मेरी छह साल की छोटी बहन को इन प्रताड़नाओं से बचाने के लिए उस आदमी की बूढ़ी मां यानी मेरी दादी को बहुत अपमान और जिल्लत का सामना करना पड़ा. इन बातों को सोचकर मेरा खून खौल उठता है और अंदर से आवाज आती है, 'हां पापा, सच में तुम एकदम से हरामी थे.'

लेकिन मैंने ऐसा कभी नहीं कहा. मैंने फैसला किया कि मैं उसे अपनी माफी से महरूम नहीं करूंगी. फिर भी मैंने वह कहा, जिसे मेरे दिमाग ने, मेरी भावनाओं ने और यहां तक कि मेरे शरीर ने (जो अपनी तरह से सब कुछ जानता था) और मैंने एक झूठ माना. फिर भी मैंने कहा, 'नहीं पापा! कोई बात नहीं. हम पुरानी बातों को भूलें. यह तो बहुत पहले हुआ था.' 

वह मुझे टकटकी लगाकर देखता रहा और धीरे से कहा, 'शुक्रिया'.

कुछ ही घंटों के बाद वह मर गया. मुझे विश्वास है कि वह शांति से मरा. मुझे लगता है कि वह समझ रहा था कि उसे माफी मिल चुकी है. चूंकि मैंने उसे बहुत आसानी से माफ कर दिया था इसलिए उसने असीम शांति का अनुभव किया और उसे लगा कि वह इसका हकदार था.

तो क्या मुझे शांति की समझ नहीं? क्या हमें यह नहीं सिखाया गया कि उदारता दिखाकर और दूसरों को माफ करके हम सुकून पाते हैं? और करूणा और पवित्रता क्या इसी का पुरस्कार नहीं हैं? और ऐसा क्यों किया मैंने? क्या इसलिए कि मैं किसी सतह पर उससे प्यार करती थी और किसी दूसरे तरीके से मेरे लिए उसके प्यार को भी महसूस करती थी? या यह कुछ ऐसा ही था जो प्राय: एक बाप और बेटी के बीच होता है. यहां तक कि मौत के साये में भी वह मुझसे खुली माफी की उम्मीद कर रहा था. मैंने उसे माफ कर दिया. ऐसा मैंने खुलकर किया. या... क्या मैंने ऐसा ही किया? इन सबके बावजूद क्या खून पानी से ज्यादा गाढ़ा है?

सवाल नहीं रुकते लेकिन इनका जवाब मेरी पहुंच के बाहर है. कई रातों तक मैं बिस्तर पर जागती आंखों से अपने अतीत में उन तर्कों को ढूंढती, जो मुझे मिल नहीं पाते....

एक फसाना ऐसा भी

Posted By Geetashree On 12:01 PM 13 comments

ये है अपनी इरा दीदी. पत्रकारिता के शुरुआती दौर में मुझ जैसी कई नई लड़कियो की प्रेरणा. हमने जब सोचा कि इस पेशे में जाएंगे तब तलाश शुरु हुई अपने आदर्श की. महिलाओं में चंद नाम ही थे सामने. उनमें एक इरा जी का भी था जो बाद में मेरी इरा दीदी बनी. अपने पेशे में उनकी संघर्ष गाथा का लोहा सभी मानते है. जुझारुपन उनके स्वभाव का हिस्सा है. इरा बहुत बेबाक हैं, मस्त हैं, बेहद खुली हुई, लेकिन अगर उन्हें गुस्सा आ जाए तो फिर आपकी खैर नहीं. प्यार और नफरत, दोनों हाथ से उड़ेलती हैं. इन दिनों एक किताब तैयार करते हुए मैंने उनसे एक लेख का अनुरोध किया और वे मान गईं. मेरे लिए ठीक-ठीक कह पाना तो मुश्किल है कि ऐसा क्यों हुआ, लेकिन लेख को पढ़ते हुए मुझे लगा कि किताब जब आए तब आए (किताब जल्दी ही आ रही है) उससे पहले इस लेख को सार्वजनिक किया जाना चाहिए. सो नुक्कड़ पर इरा झा का यह आलेख.

यह आलेख यूं तो एकवचन में है, लेकिन है बहुवचन के हिस्से का सच. मीडिया में एक अकेली स्त्री के संघर्ष और उसके जय-पराजय की यह कहानी केवल इरा झा के हिस्से की कहानी नहीं है, यह उन हज़ारों स्त्रियों की कहानी है जो देवघर से दिल्ली तक पुरुषों के वर्चस्व वाली इस दुनिया में अपनी सकारात्मक और सार्थक उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. 

-गीताश्री


गली बहुत तंग है
इरा झा

युवा माता-पिता की जिस जवां गोद में मैंने आंखें खोलीं वहां लड़की होने का कोई खास मतलब नहीं था. मेरे भी पैदा होने पर वैसे ही बंदूक चली थी जैसी मेरे इकलौते भाई की पैदाइश पर. संगी-साथी से लेकर सहपाठी तक छोकरे ही थे. इसलिए खेल-कूद और धमाचौकड़ी का अंदाज उन जैसा ही था. लड़कों को कूटा भी और कुटी भी पर लड़कपन को भरपूर जिया. उस पर रही-सही कसर घर पर बुजुर्गों की कमी ने पूरी कर दी. टोका-टाकी करने को घर पर न दादी, न नानी. उलटे परी-सी खूबसूरत मेरी चंचल मां और युवा पिता. जिन्हें बिनाका गीत माला सुनने की धुन चढ़ती तो नया रेडियो खरीद लाते. जमकर फिल्में देखते और देर रात तक बैठक करते. बेटियों की हर फरमाइश मुंह से निकलते ही पूरी होती. पूरे व्यक्तित्व में स्त्रियोचित गुणों की खासी किल्लत थी. ऊपर से नसीहत यह कि भला किस मामले में कमजोर हो.

पिता बस्तर जिले में बड़े वकील थे और उनकी कमाई उड़ाने को मेरी मां काफी थी. पिताजी को पाक कला में पारंगत अपनी पत्नी का किचन में घुसना गंवारा नहीं था. वजह यह नहीं कि रांधने में कहीं कमी थी. उन्हें किसी भी महिला का पकाने-खिलाने जैसे कामों में लगना वक्त की बर्बादी लगता रहा. मेरी मां अब से 40 बरस पहले भी बस्तर जिले की नामी सोशल वर्कर थी और इसी नाते बाल न्यायालय की ऑनरेरी मजिस्ट्रेट भी. जब भी मीटिंग के सिलसिले में वह तब के बस्तर से कई-कई ट्रेन बदलकर मुंबई-दिल्ली, भोपाल-जबलपुर अकेली घूमतीं पर न उन्हें कभी आवाजाही के लिए अपने पति की जरूरत महसूस हुई, न मेरे पिता कभी उन्हें लेकर असुरक्षित लगे. उन्हें बाहर जाने के लिए अपने पति से इजाजत की दरकार कभी नहीं रही, उनको सूचित कर देना ही काफी था. वह बस्तर के सुदूर गांवों में आदिवासी महिलाओं और बच्चों को हाईजीन का पाठ पढ़ातीं. उनके देहांत के बाद मुझे यह भी पता लगा कि आदिवासी महिलाओं के आपराधिक ट्रेंड पर उन्होंने बढ़िया अध्ययन किया था.

अब लगता है कि आदिवासी मसलों पर लेखन का यह रुझान शायद उन्हीं की देन है. यह माहौल ही था जिसकी बदौलत युवा होने पर भी हम चारों बहनों को कभी पाक कला में हाथ आजमाने या कढ़ाई, बुनाई-सीखने की नसीहत नहीं मिली. डटकर फैशन, खूब घूमना, पूरी दुनिया घूमे विद्वान पिता से अंतर्राष्ट्रीय कानून, एटॉमिक मसलों से लेकर गांधी फिल्म, पेटेंट उरुग्वे राडुंड तक की तमाम तकनीकी और प्रशासनिक पेचीदगियों पर दुनिया जहान की बातें, यही थी हमारी दिनचर्या. अब परिवार चलाते हुए कभी-कभार यह परवरिश खटकती जरूर है पर उस घर का माहौल ही कुछ ऐसा था, जूते पहनने से लेकर चोटी गुंथवाने या बाल काढ़ने तक के लिए लोग थे. वक्त ने हमें बदल दिया पर मेरे पिता को आज भी अपनी बहू का उन्हें दूध गरम करके देना सख्त नागवार गुजरता है.

पर यह परवरिश पिता की हैसियत के कारण नहीं थी. पूरे छत्तीसगढ़ में लड़कियों की परवरिश का कुछ ऐसा ही आलम है. पढ़ने की मनचाही आजादी, घरेलू कामकाज का दबाव नहीं पुरुषों से मेलजोल को लेकर कोई पूर्वग्रह नहीं, न ही शादी का दबाव. सबसे अहम है लड़की की पढ़ाई और स्वावलंबन. उसके कॅरियर के लिए पूरा परिवार कंप्रोमाइज करने को तैयार. स्त्री सुबोधिनी जैसी किसी चीज का अस्तित्व ही नहीं. छत्तीसगढ़ की आबो-हवा शायद 50 बरस पहले भी ऐसी थी और आज तो लड़कियों के हक में फिजा और खुशगवार है. उन्हें सेकेंड सेक्स का अहसास दिलाने वाले परिवार तब भी विरले थे और तब भी ऐसे लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाता है. दिल्ली से बैठकर छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े इलाके की लड़कियों का अगड़ापन और आत्मविश्वास नहीं समझा जा सकता. एक बार वहां पहुंचकर कोई हकीकत से रूबरू हो तो कोई बात है. 

उस पर मुझे तो बस्तर के उन अबूझे माड़िया-मुरियाओं का निपट आदिवासी परिवेश मिला जो रहन-सहन और संस्कारों के मामले में यूरोपीय समुदाय के देशों के बाशिंदों से भी ज्यादा एडवांस हैं; रहन-सहन के नाम पर मिनी स्कर्ट की तरह लपेटी गई साड़ी खुले स्तन (ये मातृत्व का प्रतीक हैं, सेक्स का नहीं) और लंगोटी लगाए पुरुष. घरेलू अर्थव्यवस्था की धुरी है वहां औरत. वह खेत में हल चलाती है. फसल बोती है, मछली पकड़ती है और इसे बेचने के लिए बाजार भी वही जाती है. पति की भूमिका है कमाऊ पत्नी के पीछे बच्चों की परवरिश. बल्कि एक तरह से बच्चों की पैदाइश में मदद की प्राकृतिक जरूरत पूरी करना. सारे कामों से निपटकर इन निपट देहाती औरतों का थकान मिटाने का अंदाज भी कुछ यूरोपीयन-सा है. महुए की शराब के नशे में धुत्ता होकर मर्दों के साथ राने जवां-राने जवां या रे रेला रेला रे बाबा की धुन पर सुबह होने तक थिरकना. पति की छाया बनकर घूमने का बंधन नहीं.

युवाओं के लिए तो पहले बाकायदे नाइट क्लब की तर्ज पर घोटुल हुआ करते थे. अविवाहित जोड़ों के लिए समझ लीजिए खास तरह के ट्रेनिंग सेंटर. यहां घर बनाने से लेकर दांपत्य जीवन के लिए जरूरी सभी तरह की शिक्षा. गोबर से आंगन लीपने से लेकर खाना रांधना और यौन शिक्षा तक. घोटुल के अंदर कोई यौन वर्जना नहीं होती थी और सचमुच प्रेमजाल में पड़कर किसी जोड़े के विवाह की नौबत आ जाए तो समझिए पूरी इज्जत के साथ हमेशा के लिए उनकी विदाई. विवाह हुआ नहीं कि जोड़ा घोटुल के लिए पराया हो गया. ऐसी भी मिसालें हैं जिसमें कई संतानों की मौजूदगी में जोड़े दांपत्य सूत्र में बंधे.

इन आदिवासियों के बीच जिंदगी का बड़ा हिस्सा गुजर गया. बैलाडीला की फूलमती और हिड़मे, कुटरू के जोगे, मादी, चंपी बिज्जे, कोंटा का बारे, किलेपाल का डोरा-डौका और मोलसनार का भूगोड़ी मांझी. इनके चेहरे और आवाज आज भी यादों में ऐसे बसे हैं जैसे आज की ही बात हो. न जाने कितने परिचित थे जिनके बीच स्कूली छुट्टियां, उन्हें एयरगन से चमगादड़, पंडूकी या हरियल मारकर भेंट करके कांटी. बस्तर के जंगलों में तब शिकार की तलाश में 12 बोर की बंदूक लिये घूमना भी बचपन का खास शगल था. कुटरू और मोलसनार के जंगलों में घूमकर बिताए दिन भला कैसे भुलाए जा सकते हैं. अपने आफत के परकाले मामाओं के साथ बस्तर और वैसे ही आदिवासी जिले मंडला में न जाने कितनी बार शेर से लेकर चीतल तक के शिकार में गई, याद नहीं. एक बात और बता दूं, इस शिकार प्रकरण को सलमान खान से न जोड़ें क्योंकि तब शिकार पर सरकारी रोक नहीं थी.

उस पर रही-सही कसर बस्तर के राजपरिवार में आवाजाही ने पूरी कर दी. राजा प्रवीरचंद भंजदेव, छोटे कुंवर, बड़े कुंवर, राजगुरु परिवार में तब जो देखा उसे बखानने बैठूं तो भरोसेमंद नहीं लगेगा. मुझे अच्छी तरह याद है बस्तर गोलीकांड में शहीद होने के बाद दुनिया भर में जाने जाने वाले महाराजा प्रवीरचंद के रहन-सहन का विलायती अंदाज, उनकी टूटी-फूटी हिंदी और अंग्रेजीदां महिला मित्र. कुंवर गणेश सिंह की पत्नी जिन्हें हम नानी कहते थे, की फिल्मी सितारे की-सी छवि. संगमरमर के टेबल पर अपनी लंबी उंगलियों में थमी सिगरेट के कश लगाते हुए पत्ते खेलना. उन्हीं के घर की शशि की मां (नाम याद नहीं) और ठुन्नू बाबा (शायद पद्मा नाम था उनका) महारानी हितेंद्र कुमारी के हाल्टरनुमा ब्लाउज. कुटरू जमींदारिन नानी की हाथी मार बंदूक. उनके वह शाहखर्च बेटे छत्रापाल शाह उर्फ बाबा जिन्होंने देश में सबसे कम उम्र में मंत्री बनने के साथ-साथ घर की पूरी प्रॉपर्टी अपने चेलों पर लुटाकर यह मिथक तोड़ा कि नेतागिरी कमाई का जरिया है. परलकोट जमींदारिन का पान की जुगाली करना. 

समानता की मिसाल देखिए, बस्तर में लड़कियों को तब बाबा कहा जाता था. लड़की होने का अहसास तब भी नहीं जागा. पिता के तबादले के साथ शहर और कॉलेज बदले. यह जागरूकता तो इस दिल्ली ने दिलाई जिसे लोग महानगर कहते हैं. इसी महानगर में आकर जाना कि लड़कियों को दिन ढलने से पहले घर लौट आना चाहिए. लड़कियां बतातीं, मां ने फलां जगह जाने को मना किया है. शाम का शो नहीं देखना या मेरे भाई का जन्मदिन है, धूमधाम से मनेगा तो ताज्जुब होता. ये छोटी सोच का कैसा महानगर है.

अपने सेकेंड सेक्स होने का अहसास तब और गहराया जब पत्रकारिता में कुछ कर गुजरने का जज्बा मुझे पटना ले गया. 1984 की बात है. एक मुख्यमंत्री की मिल्कियत वाले अखबार में जब काम करने पहुंची तो पता लगा कि लड़की हूं लिहाजा रिपोर्टिंग कैसे कर सकती हूं. खासी हुज्जत के बाद रिपोर्टिंग मिली तो हजारों नसीहतें फलां से बात मत करना, फलां के साथ क्या कर रही थीं, मानों बात न हुई कोई स्कैंड्ल हो गया. उस पर आशियाने की तलाश में मेरी जाति से लेकर मेरा प्रोफेशन और उससे भी बढ़कर लड़की होना कैसे बाधक बना, अब सोचती हूं तो लोगों की बुध्दि पर तरस आता है.

दिल्ली में बैठे मेरे माता-पिता को यह तनिक भी अंदाज न होगा कि पटना जाकर मुझे क्या-क्या झेलना पड़ेगा. पर पटना का हर राह चलता इंसान जैसे मेरा जबरिया हमदर्द था. उन्हें यह बात हजम नहीं होती थी कि सिर्फ कॅरिअर और जज्बे की खातिर कोई मां-बाप अपनी युवा बेटी को एक अनजान शहर में जाने की छूट दे सकते हैं. लिहाजा वे अटकलें लगाते, बेचारी बहुत गरीब होगी. कहीं घर से भागी तो नहीं है. आम राय यही बनती है कि किसी आर्थिक तौर पर बेहद तंग परिवार की होने के कारण मुझे इतनी दूर नौकरी करनी पड़ रही है. लोग खोद-खोद कर मेरे परिवार का ब्यौरा मुझसे लेते और जब मैं बताती कि मेरे पिता भारत सरकार में बड़े ओहदे पर हैं तो वे ऐसे अविश्वास से देखते जैसे किसी पहले दर्जे की झूठी से पाला पड़ा है. मेरी जिंदगी के सफर का ये एक ऐसा पड़ाव था जिसने मुझे औरत होने की जमीनी हकीकत से रूबरू कराया. पटना पहुंच कर लगा जैसे लड़की होकर मैंने कोई पाप किया हो. इस नाते मेरी महत्वाकांक्षा का रास्ता शादी के गलियारे में भटक जाता है. आसपास की आंखों में मैं यह सवाल कि क्या मैं इलिजिबल हूं, साफ पढ़ लेती थी.

पटना के इस दमघोटूं माहौल की काली रातें जल्द कट गईं. एक राष्ट्रीय अखबार में मेरी नियुक्ति हो गई. मुझे जयपुर भेजा गया. नया शहर, नए साथी, मनपसंद काम और पटना से हटकर खुला-खुला माहौल. मेरे लिए तो जैसे जन्नत. पर जन्नत की ये खुशगवारी ज्यादा दिन न रह पाई. शहर में घरों के दरवाजे लड़की किराएदारों के लिए खुले थे. इसके पीछे तर्क ये था कि लड़कियां दंदी-फंदी नहीं होतीं. शराबखोरी और मंडली बाजी का लफड़ा नहीं. ऐसी आम सोच थी पर दफ्तर का माहौल तब भी उतना उदार न था. 25 लोगों के बीच दो लड़कियां. उस पर हमारे सर्वेसर्वा का पक्षपातपूर्ण रवैया. मेरी चाल-ढाल से लेकर काम-काज तक पर टिप्पणी और वजह शायद यह कि कभी बिना जरूरत उनसे मुखातिब नहीं हुई. कभी खुद के लड़की होने की दलील देकर कभी कोई फेवर नहीं मांगा. उलटे तब इस्तीफा देने पर आमादा हो गई जब पता लगा कि मेरा लिंग और कम उम्र मेरे कर्तव्य के रास्ते में बाधक है.

इसके सिर्फ दो मतलब थे पहला मेरे आचरण पर आशंका या मेरे साथियों के चाल-चलन पर भरोसा न होना. मानों मैं इन विश्वामित्रों की कर्तव्यपरायणता में कहीं रोड़ा न बन जाऊं. वह मामला कैसे निपटा और मैं कैसे काम पर लौटी इसकी एक अलग कहानी है. बहरहाल, इसी दफ्तर ने मुझे बताया कि लड़के और लड़की के बीच सिर्फ प्रेम हो सकता है, दोस्ती की बात बकवास है. नतीजतन मेरी दोस्तियों पर टीका-टिप्पणी के दौर चल पड़े और अपने एक सहयोगी से मैं शादी कर बैठी. आज भी उस घड़ी को कोसती हूं जब मुझ जैसे बेबाक इंसान पर माहौल हावी हो गया. मेरी परवरिश, मेरे जीवन मूल्य कभी मुझे ऐसी दहलीज पर ला खड़े करेंगे यह कभी सोचा न था. हालात कुछ ऐसे बने कि मुझे अपने ही अखबार के दिल्ली दफ्तर आना पड़ा.

दिल्ली में दिलों के दायरे और सिमटे हुए थे. जितना बड़ा दफ्तर उतनी छोटी सोच. दिल्ली दफ्तर में काम करने का मेरा खुमार चंद महीनों में उतर गया. काम का जज्बा तो वैसा ही था, पर लोग वैसे नहीं थे, जैसे पत्रकारिता में होने चाहिए. ऐसे लोगों की बड़ी तादाद थी जो लड़कियों की एक नजर के कायल थे, उनकी उम्र भर की ख्वाहिश होती कि एकांत में चाय के कप पर चंद लम्हे मिल जाएं. मुझे चाय पीने पर कोई आपत्ति नहीं थी, गिला इस बात का था कि ये सभी चाहते कि उनके बाकी साथियों को इसकी कानोकान खबर न हो.

एक वरिष्ठ साथी ने जब मुझसे कहा कि तुम कैंटीन पहुंचो, मैं आता हूं तो उनका रवैया मुझे बड़ा रहस्यमय लगा. मैंने इस गोपनीयता पर सवाल उठाने शुरू किए तो लोगों को खटकने लगी. एक और सज्जन की अक्सर मेरे साथ नाइट डयूटी लगती (या शायद वे लगवाते). इस दौरान वे मेरे दिमाग से लेकर रूप, गुण की तारीफ करते थकते नहीं. फलां रंग आप पर फबता है. फलां ड्रेस सूट करती है. आप चुप क्यों हैं, बोलते हुए अच्छी लगती हैं और एक बार सार्वजनिक तौर पर जब उन्होंने मेरे बातूनीपन पर सवाल उठाया कि आप इतना बोलती क्यों हैं और मेरे पलटकर उन्हीं की बात कहने पर उनके चेहरे का उड़ा रंग देखने वाला था. बस तभी से मैंने उनसे बोलचाल बंद कर दी.

इसी संस्थान ने मुझे बताया कि औरत होने के नाते मैं पुरुष साथियों की बराबरी करूं बल्कि बढ़-चढ़कर काम करूं तो भी मेरी सीमाएं हैं, मेरी सामर्थ्य हमेशा उनसे कमतर है. और मर्द होने के नाते उन्हें मुझे मोनिका लेविंस्की के फोटो दिखाकर आपस में अश्लील फब्तियां कसकर सताने का हक है. एडीशन निकालने से लेकर मेरी चाल-ढाल, व्यवहार तक में मुझे मेरी दोयम दर्जे की हैसियत का अहसास कराया जाता. इन हालातों के बीच मेरी परवरिश ने मुझे हमेशा पूरी ताकत और विश्वास से जूझने का हौसला दिया. मैं माहौल से परेशान अपनी साथिनों की तरह संस्थान छोड़कर भागी नहीं (जब तक कि उन्होंने मुझे निकाल न दिया). शायद यही वजह थी कि मैं कामयाबी की ऊंचाइयों की तरफ बड़ी तेजी से बढ़ रही थी. उस संस्थान में सबसे कम समय में दो प्रमोशन पाने की हैरतअंगेज मिसाल कायम करने वाली अकेली कर्मचारी थी पर मेरी यही काबिलियत, मेरा जुझारूपन लोगों के आंख की किरकिरी बन गया. कल तक जो लोग कितनी प्यारी लड़की है, बड़ी मेहनती है, दौड़-दौड़कर काम करती है, कहते नहीं अघाते थे, दौड़ में मुझे अपने समानांतर पाते ही बहकने लगे. दरअसल, हमारी पारंपरिक परवरिश ने पुरुषों को लड़कियों को सिर्फ मातहत के तौर बर्दाश्त करना सिखाया है. बराबरी या वरिष्ठता की बातें उनके जीवन की सिर्फ मजबूरी है.

पत्रकारिता की दुनिया में लड़की होना ऐसा गुनाह है, जिसकी कोई सीधी सजा नहीं है, सिर्फ घुट-घुटकर बर्दाश्त करने की नियति, काम आप करें क्रेडिट आपका पुरुष साथी ले जाए. वह सारी कवायद कुछ ऐसे पेश करे जैसे कर्ता-धर्ता वही और आप हक्के-बक्के पर इस दुनिया की ये दरीदंगियां भी मुझे अपने लक्ष्य से डिगा नहीं पाईं. आदिवासी जिले बस्तर की एक मामूली स्कूल की इस लड़की को बहुत आगे जाना था, पर स्वाभिमान से लगन और मेहनत से. कहीं कोई शार्टकट नहीं. लिहाजा लड़कर हमेशा अपने हिस्से का हक पाया. हिंदी पत्रकारिता में न्यूज डेस्क पर शायद उस समय पहली महिला चीफ सब-एडीटर थी.

अपने काम और मातहतों से भाई-बंदी के स्वभाव ने मेरे इतने प्रशंसक तैयार कर दिए थे कि विरोधी फौज मेरी खबरें फेंके या फोटो गायब करें पर एडीशन बिरले ही लेट हुआ होगा. पूरा सपोर्ट सिस्टम था मेरे पीछे. अब उस टीम के सामने यही चारा था कि सीधे आबरू पर हमला बोल दिया जाए. मुझे मेरी योग्यता और लोकप्रियता की एवज में जिस तरह जलील होना पड़ा और छोटी-छोटी और बड़ी से बड़ी अदालतों तक लड़ाई लड़ी उसकी अलग कहानी है. ऐसी कहानी जिससे न्यायालयों और मानवाधिकार की पैरोकार कंपनियों की पोल खुल जाए. इस पूरी लड़ाई के नतीजे के तौर पर मुझे नौकरी से निकाल दिया गया.

फिलहाल, देश के बड़े हिंदी अखबार में ठीक-ठाक पद पर हूं पर अब भी यही लगता है कि औरत के लिए यहां भी गली तंग है. बस्तर की परवरिश की वजह से अब भी ठठाकर हंसती हूं, साथियों से ठिठोली करती हूं और जोर से नाराजगी दिखाती हूं. लेकिन इसमें बस्तर के दिनों की स्वच्छंदता नहीं है. मेरे पिता से विरासत में मिली आजादी नहीं है. काश कि मेरे पिता यह जान पाते की उनकी बेटी जिस दुनिया में गुजर कर रही है वहां औरतों की बेबाकी सिर्फ कंटेंट है.

यहां अरुंधति राय या किरण बेदी के सिर्फ इंटरव्यू छप सकते हैं वे खुद आ जाएं तो उनकी हालत पुलिस की नौकरी से कोई खास अलग न होगी. औरतों की बेबाकी यहां अब भी बड़बोलापन है.

यहां औरतों को फैशनपरस्ती पर लिखने की तो छूट है पर ठाठ-बाट से रहना ऐसी आभिजात्य की निशानी है जिससे ज्यादातर लोगों का बैर है. बस काम किए जाइए और लोगों को क्रेडिट लेने दीजिए. फल की चिंता से बेपरवाह आपने अपने हक का सवाल उठाया नहीं कि न जाने कितनी आवाजें किस्सागोइयों के साथ कितने कोनों से उभरेंगी और आपके बुलंद हौसलों को मटियामेट कर देंगी. हिंदी पत्रकारिता का यही उसूल है. औरत कराहे तो वाह-वाह और आवाज उठाए तो-? ऽऽ मैंने कहा न यहां की गलियां बड़ी तंग हैं पर पूरे माहौल में मैं अब भी और औरतों से अलहदा हूं. मेरी यह उन्मुक्तता किसे कैसी लगती यह साफ पढ़ लेती हूं. इस खुलेपन के साथ इन तंग गलियों में गुजर कैसे हो, पता नहीं, यह कब सीख पाऊंगी?