आपका क्या होगा जनाबेआली

Posted By Geetashree On 10:33 PM



ये दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है, इसका अंदाजा इन दिनों कुछ ज्यादा ही हो रहा है। अभी समलैंगकिता पर उठा तूफान थमा नहीं था कि वैज्ञानिको ने एक और नई बहस छेड़ दी। समलैंगिकता को अवैज्ञानिक करार देने वाले इस नई वैज्ञानिक खोज के बारे में क्या कहेंगे.
ताजा ताजा खोज है-नजर डालें। पूरी दुनिया में हलचल मची है। लंदन के वैज्ञानिको ने पहली बार लैब में कृत्रिम मानव स्पर्म बनाने का दावा किया है। कहा तो ये भी जा रहा है कि इसके पूरी तरह से सफल होने पर बच्चा पैदा करने के लिए पुरुषों की जरुरत नहीं रह जाएगी। लगता है मर्दो ने इस बात को दिल पर ले लिया है। खोज जारी रही तो जल्दी ही औरतो की भी जरुरत नहीं पड़ेगी। उन्हें लग रहा है कि आगे चलकर अगर यह तकनीक प्रचलन में आई तो महिलाएं शायद बच्चे पैदा करने के काम से भी उन्हें अलग ना कर दें। तब तो उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। उनके घबराने की और भी वजहें हैं..तनाव, व्यस्तता, प्रदूषण की मार से पुरुषों में पिता बनने की क्षमता कम हो रही है। वंश चलाने के लिए पिता तो बनना ही पड़ेगा ना। विज्ञान उनका काम आसान कर रहा है तो सहजता से स्वीकारने में हर्ज क्या है।

विज्ञान की रफ्तार बहुत तेज है। वह सारी नैतिक बहसो से आगे निकल चुका है। नैतिकतावादी कृत्रिम बच्चे का विरोध कर सकते हैं। उन्हें भय सताने लगेगा कि आगे चलकर पूरी तरह से कृत्रिम रुप से बच्चे पैदा किए जाने लगेंगे।
वैज्ञानिको का कहना है कि अगर आगे भी टेस्ट में लैब में बनाए गए इन स्पर्म को नेचुरल स्पर्म की तरह साबित कर दिया गया तो इससे मेल इनफर्टिलिटी के मामले में बहुत सहायता मिल सकेगी। उनका कहना है कि अभी महिलाओं की कोशिकाओं से स्पर्म बनाने की संभावनाओं की भी स्टडी की जा रही है, ताकि लेस्बियन महिलाओं के लिए बच्चे को जन्म देना मुमकिन हो सके। यह सिर्फ समलैंगिको को लिए ही खुशी की बात नहीं है, पति में कमी की वजह से बच्चा पाने से वंचित जोड़ों के लिए भी नयी उम्मीद जागी है। आंकड़े बताते हैं कि हर छठे दंपत्ति को किसी ना किसी वजह से औलाद का सुख नहीं है। अब कमसेकम उनकी त्वचा की मदद से ही उन्हें संतान सुख मिल सकता है।
हालांकि अभी इस संबंध में कई सबूतो की मांग हो रही हैं। अभी इसे आसानी से नहीं माना जा सकता। फिर भी आप इस खोज को हल्के से नहीं ले सकते। ये बहुत ही क्रांतिकारी खोज होगी जो दुनिया का चेहरा बदल देगी। औरतों की दुनिया एकदम से बदल जाएगी। रिश्तों के मायने बदल जाएंगे। अभी समलैंगिकता ने जो तूफान उठाया उससे पुरुषों की दुनिया उबर नहीं पाई है। उनके अस्तित्व को जो खतरा समलैंगिकता से दिख रहा था, उससे ज्यादा खतरा यहां है। उन्हें खतरे की घंटी सुनाई दे रही है। जहां पुरुष इसे चौकन्ना करने वाली बात मान रहे हैं वहीं स्त्रियां अभी मौन हैं। इस मामले में अभी कोई राय कायम करना जल्दीबाजी ही होगी। लेकिन कुछ लोगों में त्वरित प्रतिक्रियाएं हो रही हैं जो बेहद दिलचस्प है।
कोई कह रहा है, कृत्रिम चीजें ज्यादा दिन नहीं चलने वाली।
पुरुष कभी अप्रासंगिक नहीं होगा।
-प्रकृति के करीब रहना ज्यादा जरुरी है। ये चीजें आएंगी और चली जाएंगी।
-स्त्री-पुरुष में एक दूसरे के प्रति जो आदिम ललक है, वह कायम रहेगी।
-हमें कुछ चीजों की आदत होती है, जो आसानी से नहीं छूटती...कितना भी साजिश रचे जाएं, रोमांटिसिज्म की परिकल्पना कभी खत्म नहीं होगी।
-स्त्री-पुरुष संबंधों में भावनाओं के साथ साथ देह की उपस्थिति अनिवार्य है।
-मैं भ्रम में हूं..इस खोज का समर्थन करें या खिलाफत। दोनों ही उलझा देने वाला है। हम विज्ञान के खिलाफ जाएं या ईश्वर के विऱुद्ध किसी मानवीय आयोजन में शामिल हों या सामाजिक बहसो को आमंत्रित करें। खोज करने वाले वैज्ञानिक तर्क दे रहे हैं कि विज्ञान हमेशा से सामाजिक बहस और मुद्दों से आगे रहता है। वह नैतिक बहसो के चक्कर में नहीं पड़ता। विज्ञान इनसे आगे चलता है। लेकिन यहां इतना तो सोचा ही जा सकता है कि प्रजनन सिर्फ बायोलोजिकल प्रक्रिया भर नहीं है। थ्योरिटिकल रुप से तो सही हो सकता है मगर इजाजत देने से पहले मनोवैज्ञानिक, सामाजिक पहलुओ पर क्या विचार नहीं करना चाहिए। आप क्या सोचते हैं....
काजल कुमार Kajal Kumar
July 9, 2009 at 10:43 PM

ओह ! ये किधर जा रहे हैं हम :-(

अंशुमाली रस्तोगी
July 9, 2009 at 10:53 PM

गीताजी, विज्ञान की खोज और उसके मोहल्ले में ईश्वर की कहीं कोई जगह नहीं होती।

vinay
July 9, 2009 at 11:44 PM

mere hisab se yeh nistan damptiyo ke liye vardan hai.

akanksha
July 10, 2009 at 2:28 AM

मुझे लगता है यह बहस या इसे खोज कह लीजिए, पुरुष के पुरषार्थ या स्त्री की आजादी की नहीं है। आज भी कुछ औरतें हैं, जो नौ महीने पेट में लात मारते बच्चे को महसूसना चाहती हैं, आज भी कुछ पुरुष हैं, जो पेट फुलाए स्त्री का हाथ पकड़ कर डॉक्टर के यहां ले जाने में खुद को धन्य समझते हैं। यह सिर्फ विज्ञान का चमत्कार है। उनके लिए जो निसंतान हैं। औरतें पुरुषों के बिना अधूरी हैं और पुरुष औरतों के बिना सूना है। जिस दिन स्त्री-पुरुष की झंडाबरदार बहस आगे बढ़ेगी, चरम पर पहुंचेगी, यकीन मानिए प्रकृति उसी दिन प्रलय का ऐलान कर देगी। फिर शुरुआत के लिए.

अनंत विजय
July 10, 2009 at 3:03 AM

विज्ञान स्त्री विमर्श को एक नया आयाम दे रहा है

pragya
July 10, 2009 at 4:22 AM

गीताश्री जी अभी से आपसे बात हुई . स्पर्म के निर्माण से पुरुष जगत में खलबली मचना तो
स्वाभाविक है उनकी साख इसीलिए तो बढ़ चढ़ कर है कियोंकि उन्हें गुरुर है की दुनिया उनके बिना नहीं है ..औरते अगर सक्षम हो जाएँ तो बुरा क्या है .. रोमांस और शरीर संपर्क पैर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है औरत की मजबूरी ख़त्म हो जायेगी समाज सुधर जायेगा

सैयद | Syed
July 10, 2009 at 9:15 AM

लेकिन क्या कुदरत के साथ ऐसा खिलवाड़ सही है ?

बकबकिया
July 12, 2009 at 4:14 AM

संजय कुमार मिश्र
आपको ब्लाॅग पर देखकर मुझे बेहद खुशी हुई। आपसे बात करने की भी इच्छा थी लेकिन नहीं हो सकी। आपसे मेरी छोटी सी मुलाकात इलाहाबाद में हुई थी। ज्यादा इसलिए नहीं बताउंगा कि कुछ आप भी दिमाग पर जोर डालें। फिलहाल आपने जो लिखा वो बेहद समसामयिक जानकारी पूर्ण आलेख है। मैं तो वैसे भी आपको पढता रहा हूं।

Sushila Puri
July 13, 2009 at 8:29 PM

गीताश्री जी ! बहुत जरुरी बात की है आपने ...इतना तो निश्चित है की कृत्रिम स्पर्म के निर्माण के बाद हमारे सामाजिक ढांचे में उथल -पुथल मचेगी ,पर इसके मनोबैज्ञानिक पहलू पर गौर करने की अधिक जरुरत है .....ठीक है की बिज्ञान सारी मान्यताओं से ऊपर जा कर सोचता है किन्तु हमारी आदिम ललक क्या हमें अलग कर पायेगी ???