जा बिट्टो..जा..भईया को भेज...

Posted By Geetashree On 3:07 AM

लाडो पे लाड़ ना आए जहां
गीताश्री
...एक ठाकुर परिवार में अनेक नवजात कन्याओं की मौत हुई। अब उसकी केवल एक बेटी है। एक बेटी को मां ने ही बेरहमी से मार डाला। नवजात को मुंह में तंबाकू भरकर नाले में फेंक दिया गया। किसी ग्रामीण ने उसे बचा लिया। और उसे ठाकुर के घर ले आया। ठाकुर ने उसे स्वीकार नहीं किया और चार पांच घंटे बाद वह चल बसी। (मुरैना, देहात)

...मोती बुआ नामक एक दाई नवजात कन्याओं की हत्या के काम में माहिर थी। वह पीढ़ी (एक तरह का छोटा स्टूल) की एक टांग नवजात की गर्दन पर रखकर यह कहते हुए बैठ जाती है, ‘जा बिट्टो जा, अपने भैया को भेज।’

...युवा लडक़ी एक बेल या लता की तरह होती है। देखते देखते वह बड़ी होकर उपर चढ जाती है। सोचने का भी वक्त नहीं देती। बालपन से ही उसपर लोगो की नजर पडऩे लगती है। बेटी पैदा करने की जिम्मेदारी भी बड़ी विकट है। अगर बेटा हो तो कोई फिक्र नहीं।
देश के प्रमुख पांच राज्यो, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में एक्शन एड और इंटरनेशनल डेवलपमेंट रिसर्च सेंटर (कनाडा) द्वारा कराए गए एक अध्ययन से अनेक चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
यह अध्ययन बालिकाओं और औरतो के विरुध पक्षपात की बारीकियों को समझने और व्यापक पड़ताल करने के उद्देश्य से पांच जिलों में कराया गया। एक्शनएड के निदेशक (इंडिया) बॉब मैथ्यु ने जानकारी दी कि यह अध्ययन गरीबी और पितृसत्ता के खिलाफ अभियान में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यूं तो हरेक राज्य में बेटियों का जीना मुहाल है लेकिन कुछ राज्यो के अंदरुनी हालात से वहां के सरकारी दावो की कलई खुल जाती है।

हरियाणा कन्या भ्रण हत्या के लिए बदनाम भले हो लेकिन सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में और राजस्थान के धौलपुर जिले में बाल मृत्यु दरें बहुत ऊंची हैं और मरने वालो में बालिकाएं ज्यादा हैं। भाजपा शासित मध्य प्रदेश में कन्याओं के लिए लाडली जैसी अनेक कल्याणकारी योजनाएं प्रभावी हैं। ऐसे में वहां के आंकड़े भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं। अध्ययन के मुताबिक मुरैना में 25 से 26 वर्ष की आयु वर्ग की मांओं में बाल जन्म औसत 2.85 है और सरवाइवल दर 2.56 हैं। यानी 200 परिवारों में लगभग 90 बच्चे मौत के मुंह में समा जाते हैं।

धौलपुर की स्थिति और भी बुरी है। वहां 200 परिवारो में 95 बच्चो की मुत्यु हा जाती है। गौर करने वाली बात ये हैं कि किस हद तक बालिकाएं बाल मरणशीलता का शिकार होती हैं। मुरैना में जन्म से पहले ही बालिका विरोधी रवैया उजागर हो जाता है। धीरे धीरे मामला संगीन होता चला जाता है। बालिका-शिशु हत्या की पुरानी प्रथा वाले इन जिलों में देहात के लोग भी टेकनोलॉजी का इस्तेमाल करने लगे हैं। वहां के कस्बाई इलाके में अनेक ऐसे केंद्र हैं जहां लिंग पहचान और लिंग आधारित गर्भपात का प्रबंध है। वहां सिर्फ बेटियो वाले परिवार कम ही मिलते हैं।

मुरैना में एसे परिवार मात्र 3 प्रतिशत ही हैं। ये अनचाही बेटियां भी मजबूरन बेटे के इंतजार में पैदा हो जाती हैं। जबकि ज्यादा बेटे वाले परिवार ज्यादा नजर आते हैं।

सेंटर फॉर वीमेनस डेवलपमेंट स्टडीज की निदेशक मैरी ई. जॉन बताती हैं कि अध्ययन में और कई चौंकाने वाली सच्चाईयां उजागर हुई हैं। मसलन लिंग जांच कराने में महिलाएं बढ चढ कर हिस्सा लेती हैं। ज्यादातर वे अपनी मर्जी से कन्या भ्रूण जांच कराती हैं और बेटे की चाह में अपनी कोख से अपनी लाडो का सफाया करवा देती हैं।

उदाहरण के तौर पर धौलपुर में नाई जाति की शिक्षित अंजलि को एक बेटा व बेटी है। इसकी इच्छा है कि उसका बेटा सुशिक्षित हो और अच्छा आदमी बनें। एक और बेटे की चाहत में उसने नसबंदी नहीं कराई। बेटी के जन्म के बाद उसने दो कन्या भ्रूणों का गर्भपात कराया। ये उस औरत का फैसला था कि उसे बेटा चाहिए या बेटी। हद तो यह है कि मुरैना और धौलपुर में बच्चे पैदा करने की जरुरत के निर्देश देने में सास ससुर और मां बाप भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। ठाकुरो, गूजरो और जाटवो में यह पाया गया कि बच्चों के जन्म संबंधी मामले में पुरुषों की आवाज ज्यादा ताकतवर होती है। महिलाओं को बार बार गर्भधारण करना पड़ता है। ऐसा न करने की उन्हें इजाजत नहीं होती। जन्म देने को वहां पुरुषत्व के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। उन्हें कईबार यह निर्देश दिया जाता है कि उसे किस लिंग का बच्चा पैदा करना है। जो महिलाएं गर्भ गिराना चाहती हैं, उनके चरित्र पर लांछन लगाया जाता है कि बच्चे का बाप कोई और है।

धौलपुर का एक गूजर पति स्पष्ट रुप से बताता है कि अगर मेरी पत्नी कहती है कि वह एक बेटे और बेटी से संतुष्ट है, चाहे उसका शरीर और बच्चे जनने लायक मजबूत नहीं है, तो भी उसे जितने मैं चाहूं उतनी संख्या में बच्चे पैदा करने होंगे। भले ही इस बात को लेकर झगड़े हो जाएं । इन परिस्थितियो में औरत की पिटाई भी करनी पड़ सकती है।

मैरी सरकार की योजनाओं के बारे में दो टूक कहती है कि कहीं भी कोई योजना ना लागू की गई है ना ही लोगो की इसकी भनक है। खराब लिंग अनुपातो वाले इलाके से ये योजनाएं कोसो दूर दिखीं। वे चाहती हैं कि सरकार अपनी घोषणा के मुताबिक कम लिंग अनुपात वाले इलाके में गर्भवती महिलाओं की मॉनीटरिंग शीघ्र शुरु करवा दे ताकि चाहे भी तो कोई गर्भपात न करा सके। समुचित संख्या में बेटियां तभी पैदा हो सकेंगी।
सुशीला पुरी
August 20, 2010 at 5:04 AM

ओह !!!

कविता रावत
August 28, 2010 at 2:54 AM

sach mein es tarah kee ghatnayon se dil dahal jaata hai.. kah yah baat am jan samajh pate...
Bahut hi saarthak aalekh aapke blog par padhne ko mile..
Haardik shubhkamnayne