मैं गीताश्री!

Posted By Geetashree On 11:10 PM
मैं दिल्ली से निकलने वाली आउटलुक साप्ताहिक (हिंदी) पत्रिका की फीचर संपादक हूँ. मैं इस एक अनचिन्हीं दुनिया में शामिल होना चाहती थी, जहाँ मैं खुद को व्यक्त कर सकूँ. बिना संपादन के. यहाँ मैं ही लेखक हूँ, रिपोर्टर हूँ, संपादक हूँ अदृश्य पाठकों के बीच. अब इन असंपादित बेलगाम अभिव्य्क्तियों के लिए तैयार हो जाइये. यहाँ वे घिसे-पिटे टेक, बाजारवाद के फार्मूले और मर्दवादी मानसिकता के गुलाम शब्दों के सौदागरों की कोई दखल नहीं है.एक बानगीमैं मर्दों की बनाई हुई दुनिया (?) में एक चुनौती हूँ. मेरी नज़र में औरत एक रात है जो सुबह होने के इंतज़ार में अँधेरे को पीती रहती है. मगर हिस्से में अँधेरा ज़्यादा है. सुबह मर्दों की मुट्ठी में कसमसा रही है.
avinash
March 16, 2007 at 3:45 AM

गीता जी, आपका इस दुनिया में स्‍वागत है। हालांकि ये दुनिया भी कुछ वैसी ही है, जैसी द्रष्‍टव्‍य दुनिया का विवरण आपने दिया है। पढ़े-लिखे तकनीकी लोग भी उन्‍हीं सामाजिक खोलों से आये हैं, जहां पुरुषों का रचा हुआ अंधेरा है। यहां भी आपको लड़ना पड़ेगा और अपने लिए जगह बनानी पड़ेगी। हमारी खूब खूब शुभकामनाएं।

nukkad
March 20, 2007 at 4:18 AM

अविनाश जी, आपकी पाती पढी। जिंदगी और समस्याओं को देखने का मेरा अपना नजरिया है। शायद यही मेरी तमाम मुसीबत का कारण भी है। इस समाज में हम औरतों को इजाजत नहीं होती। हमें तो आदत सी हो गई है...जीवन के बहुत साल हमने यूं ही निकाल दिए। अब बदलाव सामने है...मैं महानगरों की महिलाओं के बारे में कभी बात नहीं करती। मैं चाहती हूं अपने ब्लाग के जरिए गुमशुदा अंधेरे कोने में बिलबिलाती मध्यवगीय औरतों के सपनों पर कुंडली मारे बैठे मदॅवादी सत्ता को चुनौती दूं और एक विमशॅ खड़ा करुं। महानगर की आधुनिक, तेज, चालबाज, प्रगति का शाटॅकट तलाशने वाली औरतों को मेरे विचार वैसे ही रास नहीं आतें जैसे उनके आकाओं को नहीं पचते। इस विषय पर कभी मैं लंबा आलेख इस पर लिखूंगी। बस जरा इंतजार...

Maneesha
April 8, 2007 at 10:40 AM

mahilaon ki dushman aksar mahila hi hoti hai gitaji. khaskar madhyamvarg me. saas aur bahu, nand aur bhabhi.... aur aurat ki sauten bhi aurat hi hoti hai. mardvadi satta ko chunauti dene ke saath saath hume ek doosre ko bhi samajhna hoga aur parakhna hoga..... aur kyon hum kisi ki ijazat ka intezar karen, raasta dekhen ya zikr karen.ijazat shabd hume chota bana deta hai. hum apne ap me ek entity hain aur khud jeena ana chahie.....

nukkad
April 10, 2007 at 1:35 PM

मनीषा जी

आप बिल्कुल सही बात कह रही हैं। मैं आपसे पूरी तकह सहमत हूं। औरत ही औरत की दुश्मन होती है और एक दूसरे के राहों में कांटे बिछाती हैं। अपनी देह को जाल-कांटा बना देने वाली औरतों ने जेनुइन औरतो का रास्ता रोक रखा है। मुझे नहीं लगता है कि औरत जात अपनी जात को कभी समझ पाएगी और उनका रास्ता छोड़ पाएगी। हमारा संघषॅ उनकी बेहतरी के लिए है। ये औरतें आदमियों की साजिश कभी समझ नहीं पाएंगी। बहरहाल अपनी बदहाली का रोना छोड़कर हम कोई और मुद्दा उठाए तो बेहतर। आखिर हमारी भी कोई पहचान है। आधी दुनिया से हमारे हिस्से है। हमें किसी के रहमो करम पर कब तक रहेंगे?

सुजाता
April 6, 2008 at 10:18 PM

आपकी शुरुआत का इंतज़ार है ।
पर जैसा कि अविनाश ने कहा कि -पढ़े-लिखे तकनीकी लोग भी उन्‍हीं सामाजिक खोलों से आये हैं, जहां पुरुषों का रचा हुआ अंधेरा है। यहां भी आपको लड़ना पड़ेगा और अपने लिए जगह बनानी पड़ेगी।----
तो जगह बानाने की लड़ाई मे एक कारवाँ भी तैयार हुआ है -चोखेर बाली -यानी आँख की किरकिरी । पता है sandoftheeye.blogspot.com
हममें से ज़्यदातर महिलाएँ पत्रकारिता से नही हैं , बल्कि अलग अलग व्यवसायों से है जो पिछले 1 से 4 साल पुरानी ब्लॉगर हैं ।
लेकिन कविता और रसोई से अपने लेखन को जैसे ही विचार विमर्श की ओर बढाया ब्लोग के पुरुषॉ6 ने सही औकात बताने की कोशिश की ।
स्माज और व्यवस्था के हर संरचना में बसी पैट्रिआर्की और पुरुष के फ्यूडल रवैये को उद्घाटित करने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं ।
कृपया आप यहाँ पधारिये और प्रतिक्रिया दीजिये , कुछ अनुभव साँझा कीजिए ।
सादर ..

DEO PRAKASH CHOUDHARY
April 28, 2008 at 2:24 AM

औरत अगर एक रात है....तो हमें उस सुबह का इंतजार है...जहां रोशनी होगी।
आपकी चिंता और जिद की कद्र करता हूं,लेकिन रोशनी की तरफ शुरुआत बहुत आसान नहीं। क्योंकि...
अंधेरे के पास वक्त की कमी नहीं
हमेशा जल्दी में होता है उजाला।
मैं फुटपाथ पर हूं...अब मुलाकात होगी। मेल आईडी दें। नुक्कड़ के लिए कुछ अच्छे कोलॉज हैं मेरे पास।
शुक्रिया





के हिस्से में आई अंधेरों के खिलाफ आप हमेशा

NILAMBUJ SINGH
June 15, 2008 at 1:49 PM

इसे चाहे जज्बाती बयान मान लीजिये पर ये सच है की मैं आउटलुक पत्रिका के तीन पत्रकारों का फैन हूँ।योगेश मिश्र, भाषा जी और आप का।

आपको ब्लॉग पर देख कर अच्छा लगा।
उम्मीद है बाकी लोगों से भी जल्द ही मुलाक़ात हो जाएगी।

मैं कुछ दावा तो नहीं करता लेकिन मैं भी थोड़ा सा कागज़ काला करता हूँ।
आपको इस्लाह के लिए दिखाऊंगा।

आप ऐसे ही लिखती रहिये ।
भाषा जी और योगेश जी को नमस्ते कहियेगा।
धन्यवाद।

Pravin Kumar
July 15, 2008 at 7:07 AM

गीताश्री जी ,शायद वक््त का आपको अंदाजा नहीं...आपका ब््लाग वक््त से करीब १३ घंटे पीछे है। क््या आपका लेखन भी इस घड़ी की तरह तो नहीं!