प्यार से भी जरुरी कई काम है..

Posted By Geetashree On 9:18 AM

गीताश्री
मोबाइल पर आने वाले कुछ एसएमएस बड़े सटीक होतें हैं और उनका सामाजिकयथार्थ आपकी आंखें भी खोल देता है।


एक ताजा संदेश पढिए--
फुलफार्म औफ गर्ल-
जी-गोली देने में सबसे आगे
आई-इनोसेंट सिर्फ शक्ल से
आर-रोने धोने की आटोमेटिक मशीन
एल-लड़ने में सबसे आगे
जागो मुंडया जागो

ये संदेश किसी मर्दवादी कुंठित सोच की उपज है जो लड़की को अपने ढंग से, अपने अनुभव से परिभाषित करती है। ये अपना अपना परसेप्शन भी हो सकता हैलेकिन लागू तो हर लड़की पर किया जा रहा है। इस संदेश के आलोक में हम नईलड़की को पहचान सकेंगे। नई स्त्री के साथ साथ नई लड़की का जन्म हो चुकाहै। समाज इस बदलाव को देखने और स्वीकारने के लिए अगर तैयार नहीं है तोकुछ नहीं किया जा सकता। लेकिन बेहतर हो कि ये विलाप करने के बजाए वे यातो सीधे अपने आसपास गौर फरमाए या नई फिल्में देख आएं। नई स्त्री का नयाअवतार...नई लड़की दिख जाएगी। जो ना तो रोती धोती है ना, ना लड़को को किसीगलतफहमी में रखती है। बदल गई है लड़की। ये वो लड़की नहीं है जो सदियो सेप्रेम के नाम पर ठगी जाती रही है।नई लड़की को आप प्रेम के नाम पर ठग कर चहारदिवारी में सीमित नहीं करसकते। क्या जरुरत है काम करने की, मैं कमा रहा हूं ना..बाहर की दुनियासेफ नहीं है, कितना कमा लोगी, उतना तो मैं ही तुम्हे दे दूंगा, घर मेंमजे से रहे, बच्चो को वक्त दो, कुछ करना हो तो तो घर में ही कर लो, क्याकाम कर पाओगी, तुम्हारे बस का नहीं....आदि आदि..पता नहीं कितने डायलाग।लड़कियां सुनसुन कर खुद को कैदी बना चुकी है, सुख-सुविधाओ की। इसके पीछेजो नीयत काम करती है, वो अब एक्सपोज हो चुका है। आप नई लड़की को बांधनहीं सकते। उसके पास पंख है, हौसला है, उड़ान है और खुद का बुना-चुना अपना आकाश है। उसके पास सपने हैं, इरादे हैं, और योजनाएं है। वो संघर्षसमर में हैं..जहां घमासान मचा है। उसे अवसर की तलाश है, वो खोज में है,वो बराबरी का मंच तलाश रही है..और नया पुरुष वर्ग अब भी वही ओल्ड ट्रिक्सआजमा आजमा कर उसे हलकान किए जा रहा है..
सेंटर फार सोशल रिसर्च की डा. रंजना कुमारी सही कहती हैं कि लड़कियो के प्रति सोच को बदलने के लिए जमीनी प्रयास बेहद जरुरी है। नहीं बदलेंगे तो वैसे ही गच्चा खाएंगे जैसे हालिया रिलीज फिल्म दिल तो बच्चा है जी में तीनों लड़के खाते हैं।
तीन लड़के, अलग अलग उम्र के। एक चालीस के करीब पहुंच रहा है, दूसरे अपेक्षाकृत युवा हैं और शिकारी की तरह लड़कियो की टोह में हैं। अधेड़ पुरुष तो क्या युवा लड़के भी लड़कियो के ऊपर वही ओल्ड ट्रिक्स आजमाते हैं और सोचते हैं लड़कियां किसी उपयोगी सामान की तरह उनके हाथ आ जाएंगी। अधेड़ पुरुष को डांस के लिए क्या युवा लड़की ने आमंत्रित कर लिया, उनकी बाजूएं फड़कने लगीं। लड़की तो लाइन दे रही है..पंसी रे भईया..फंसी..लड़की स्वभाविक है..अपनी रौ में किसी पहाड़ी नदी सी बही जा रही है..वो ना प्रेम कर रही है ना पुरुषो के साथ टाइम पास (वैसे इन दिनों पुरुष महिलाओं, लड़कियो को टाइम पास ही मानते हैं) कर रही है। वह अपनी स्वभाविक गति से जीवन जी रही है। ये नई लड़की है जो फिल्म में तीन रुपो में दिखती है। तीन लड़कियो का अलग अलग किरदार है जो एक ही नई लड़की का प्रतिनिधित्व करती है। तीनों को पुरुषो का साथ पसंद है मगर उन्हें लेकर कोई गलतफहमी नहीं है। जबकि पुरुष बहुत जल्दी गलतफहमी के शिकार हो जाते हैं। इन लड़कियो के सामने अपना पूरा भविष्य चमचमा रहा है, उनकी अपनी पसंद है, अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष भरे रास्ते हैं। उसके जोखिम हैं..इनके बीच मस्ती के कुछ पल हैं जिन्हे वो पुरुष साथियो के साथ बांट लेती है। ये नई लड़की वन नाइट स्टैंड को भी कोई बड़ी घटना नहीं मानती। उसे सामान्य घटना की तरह भूल कर आगे बढ जाती है। वे जानती हैं कि ये वक्त प्रेम करने का नहीं..अपनी पहचान कायम करने का वक्त है।
उनकी सारी लड़ाई प्रेम करने और उसे पाने पर खत्म नहीं होती। फिल्मकार मधुर नई लड़की को अच्छी तरह पहचानते हैं। फिल्म की कहानी में और भी बहुत कुछ है। मगर सबसे ज्यादा नोटिस करने लायक नई लड़की है जिसकी राहें प्रेम की ठगिनी दुनिया से आगे जाती है। एक प्रबंधन गुरु का कथन यहां बताने लायक है...प्रेम करने से पहले दूसरे के अस्तित्व का महत्व समझना जरुरी है। दूसरे के दिल में जगह बनाना और उसके जीवन का अहम हिस्सा बनना वास्तविक प्रेम है न कि उसके दिल को बंधक बनाना और उसके जीवन को सीमाओं में बांध देना...।
नई लड़की इस मंत्र का पालन करती है, इसका मर्म समझती है। उसके लिए प्यार से भी ज्यादा जरुरी कैरियर है, अपनी पहचान है। फिल्म में तीनों लड़कियां कैरियरिस्ट हैं। एक नायिका बनना चाहती है। उसके पीछे एक युवक पड़ा है, एक फैशन डिजाइनर है, उसे भी एक लड़का घेरे हुए है। ये दोनो लड़कियां इन्हें स्पष्ट बता देती हैं कि उन्हें पहले अपना कैरयिर बनाना है, प्रेम के लिए फिलहाल कोई जगह नहीं है। एक लड़की के पीछे उसका अधेड़ बौस पागल है। लड़की की हरकतो से उसे लगता है कि वह उससे प्रेम करने लगी है। जबकि लड़की अपनी ही दुनिया में खोई है। नई लड़की के खुलेपन को अब तक पुरुष समाज समझ नहीं पाया है। बार बार ठोकर खाता है, गालियां बकता है, बदला लेने की फिराक में रहता है, और अपने को दुनिया का महान प्रेमी साबित करना चाहता है।
एसे ही पुरुषो को वो खम ठोक कर कह रही है...तेरे हाथ कभी ना आनी। देसी मुन्नी बदनाम होती रहेगी लेकिन शहरी शीला का रवैया अभिमानी ही रहेगा। आप उसे बिगड़ैल लड़की कह सकते हैं मगर वह अपने बदले हुए रवैये के साथ अपना मुकाम तय करके ही प्रेम के द्वार तक पहुंचेगी।
वन्दना
February 9, 2011 at 2:19 AM

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (10/2/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

डॉ.मीनाक्षी स्वामी
February 9, 2011 at 7:49 AM

सटीक और सार्थक के लिये आभार

डॉ .अनुराग
February 10, 2011 at 5:55 AM

दिलचस्प ओर बेबाक नजरिया...हकीक़त को दिखाता.........फ़िलहाल तो इसका एक गाना पसंद आ रहा है......