रुक्मिनी (सेन) की कहानी,उसी की जुबानी

Posted By Geetashree On 11:24 PM Under
जीवन की छोटी छोटी बातें कई बार कितनी मार्मिक और सार्थक होती है...जब हम बीते हुए पलो को सुनने की कोशिश करते हैं तो ध्वनियां मनुष्यता की कई सुनहरी परते खोल देती हैं..मैं आपको पिता-पुत्री संवाद के बहाने एसी ही ध्वनियां सुनवाने जा रही हूं...रुक्मिनी दिल्ली स्थित निजी चैनल में पत्रकार हैं और अंग्रेजी भाषा की सक्रिय ब्लागर हैं... गीताश्री

पिता के बारे में
यह मेरे पिता के साथ जुड़ी हुई कुछ प्रिय यादों में से एक है। वे 75 साल के हैं। मगर जीवन उनमें कूटकूट कर भरा है। अपनी जीवंतता की वजह से उन्होने मुझ पर अपना भरपूर प्रभाव डाला है। हालांकि राजनीतिक मसलों को लेकर हमारे बीच हमेशा मतभेद रहे हैं। लेकिन इन राजनीतिक मतभेदों का असर हमने अपने रिश्तों पर नहीं पड़ने दिया। मैंने दुनिया के बारे में जो कुछ जाना समझा वो सब उन्होंने समझाया। मुझे इसके लायक बनाया कि मैं दुनिया को समझ सकूं वो और वे मुझे समझते रहे..

इसके लिए मैं उनकी कर्जदार हूं..जीवन की राहों पर वे मेरे मित्र बने रहे, जिंदगी. प्यार और काम को पहचानने के महत्व को समझाया है। वे समझाते रहे कि मैं जो भी चयन करुं वो दोषरहित हो।

संवाद
बीती रात बाबा(पिता), सुवोजित(पुरुष मित्र) और मैंने अमरुद के रस के साथ फेनी पीने का कार्यक्रम बनाया। सुवोजित और बाबा को डायबिटीज है। मैं भी वजन कम करने की बारहमासी योजना चल रही है। फिर भी हमलोग इसके लिए इकठ्ठे थे। फेनी ने तेजी से अपना असर दिखाया। मैंने एक छोटे बच्चे की तरह बाबा से स्वीकृति लेने के अंदाज में पूछा--मेरे बारे में क्या सोचा है।

बाबा बोले-बेस मी(ज्यादा सोचता हूं), निश्चय ही एक लड़की..जो कभी कभार जल्दबाजी में निर्णय लेकर अपना नुकसान कर बैठती है। मैं जिज्ञासु हूं, इसलिए कौतुहल से भर गई।

मेरी अभिलाषा एक ग्रैंडडाटर की है...बोलते हुए उनकी आंखें नशीली हो रही थी। मैंने सुवोजित का हाथ पकड़ लिया और फुसफुसाई...वे नशे में हैं। बाबा बोलते जा रहे थे..वह कितनी बड़ी हो चुकी होगी मम्मू।

बाबा मुझे मम्मू कह कर बुलाते हैं। मैंने भी पी रखी थी। हल्का नशा मुझे भी था। लेकिन मैं होश में थी। ...वो नौ...या...दस साल की हो चुकी होगी.., मेरे होठ थरथराए।

कुछ पल के लिए मैंने पिता को देखा कि वे अपनी ग्रैंडडाटर की आकृति बनाने की कोशिश कर रहे हैं.. वह मेरे भतीजे भतीजियों से कितनी बड़ी होगी या छोटी...बाबा यादों में खो चुके थे..वो कितनी सुंदर थी, नन्ही परी की तरह। भिशुन सुंदर छिलो..एत्तो सुंदर..एत्तो हाल्का..किंतु कोत्तो भारी..जितना हल्की, उतनी वजनी भी..मैंने पहली बार महसूस किया कि उनके भीतर अपनी गुजर चुकी ग्रांडडाटर के लिए कितना दर्द, कितनी चाह भरी है ..। उसके लिए एक नाम भी चुन रखा है उन्होंने..यह भी पता चला। यास्मिन...मुस्लिम नाम। बाबा हिंदू नाम नहीं सोच पा रहे थे। साफ तौर पता चल रहा था कि वे अभी तक मेरे पूर्व पति परवेज को भुला नहीं पाए हैं। उसके लिए उनके मन में अभी तक प्यार अलग से कायम है।

मैं उन्हें नहीं बता सकी कि परवेज ने अपनी बेटी का नाम नोवा रखा था। मैं अतीत में चली गई..उस पल से कोसो दूर...मेरे सामने सिर्फ मेरी बेटी थी, जो मात्र 15 मिनट के लिए मेरे गर्भ से बाहर आकर सांसे ली...और नौ माह गर्भ के अंधेरे में रही..मेरे अंदर..उसकी एक कहानी...और दो दो नाम।

फिर आना नोवा..नहीं..नहीं.. यास्मिन...
अर्शिया अली
August 11, 2009 at 12:45 AM

हार्दिक बधाई.
{ Treasurer-T & S }

avinash
August 11, 2009 at 12:54 AM

उफ्फ कैसा मार्मिक ज़‍िक्र है। दर्द की इस पगडंडी पर मैं चल नहीं पाऊंगा। मैं पढ़ नहीं पाऊंगा नोवा की कहानी। प्‍लीज़ उसे मत आने दीजिए बाहर।

प्रभाकर मणि तिवारी
August 11, 2009 at 1:45 AM

जैसा मार्मिक संवाद, वैसा ही अनूठा उसे पेश करने का अंदाज.
बधाई.....

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha)
August 11, 2009 at 2:01 AM

मार्मिक कथा का सुन्दर प्रस्तुतीकरण

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी)
August 11, 2009 at 2:08 AM

geeta ji bhut hi marmik sambaad hai

jab kabhi harday me dabe kisi pal ki smrti yun aati hai man bhar jaata hai
saadar
praveen pathik
9971969084

सुशीला पुरी
August 11, 2009 at 7:10 AM

जिन यादों को नींद न आये ,
उन्हें भुलाना बहुत कठिन है .

pragya
August 13, 2009 at 11:54 AM

bahut hi marmik katha hai geetashriji