मागलिक रंगदारीप्रथा की वापसी

Posted By Geetashree On 2:08 AM

सुना है फिर किसी लड़के का अपहरण कर उसका पकड़ुआ विवाह करा दिया गया है। सीधी-सादी, भोली भाली ग्रामीण लड़कियों के दुर्भाग्य के दिन फिर लौट रहे हैं। जिन्न फिर कई सालों बाद बोतल से बाहर आ गया है। पकड़ुआ विवाह का जिन्न कुछ ही साल पहले बोतल में बंद हुआ था। ये अचानक कैसे प्रगट हुआ, वो भी इस दौर में जब पकड़ुआ विवाह की जगह किसी और प्रथा हनीमून किडनैपिंग ने जन्म ले लिया और अपनी पुख्ता जगह बना ली है। सिनेमाई असर वाला यह नया चलन है। प्रेमी जोड़ा जब शादी को लेकर चौतरफा विरोध झेलने लगता है तो दोनों आपसी रजामंदी से एक नया दांव खेलते हैं। लड़की अपनी मर्जी से लड़के द्वारा अपहरण करवा लेती है और दोनों शादी कर लेते हैं। लड़की वाले लड़के के परिवार पर केस कर देते हैं। प्रभावशाली परिवार के दवाब में कई बार शादी टूट जाती है और लड़की गुस्से में आकर अपने मायके जाने से इनकार कर देती है। उसके बाद शुरु होता है उसकी यातना का लंबा सिलसिला...उसे रिमांडहोम या सुधारगृह भेज दिया जाता है। आप सोच सकते हैं कि वहां तन्हाई के कितने साल...बिता रही होंगी वे। वहां बिताए जाने वाले एक एक पल को जोड़ ले तो हम स्पेनिस उपन्यासकार मार्खेज की तरह कह सकते हैं...तन्हाई के सौ साल।

पकड़ुआ विवाह और उसका खौफ लोगों के जेहन से गायब होने लगा था। वह चलन और स्मृतियों से भी बाहर होने लगा था...अचानक टीवी चैनलों पर सामाजिक विषयों पर आधारित सीरियलो की आंधी आई तो गड़े मुर्दे फिर से उखड़ने लगे। एक नए चैनल पर एक धारावाहिक भाग्य विधाता दिखने लगा और पकड़ुआ विवाह से अब तक अनजान पीढी को भी पता चल गया। जो लोग इस सीरियल को देख रहे होंगे, हो सकता है उन्हें यह कोरी काल्पनिक कहानी पर आधारित लगता हो, मगर हाल ही में हुई एक घटनाने सच का सामना करा दिया। अब ये कहना मुश्किल है कि जिन्न को बाहर लाने में सीरियल का हाथ है या कोई और वजह इसके पीछे काम कर रही है। आपकी धुंधली स्मृतियों को ताजा करते हुए बता दूं कि अस्सी के दशक में बिहार के बेगुसराय जिले में पकड़ुआ विवाह के खूब मामले सामने आए। शहर के कई संपन्न परिवारों और खास जाति के कम उम्र लड़के पकड़ पकड़ कर या कहे अपहरण करके जबरन ब्याह दिए गए। उस दौरान देशभर में खूब शोर शराबा हुआ..मीडिया में खबरे छाई रहीं..पकड़ुआ विवाह फलता फूलता रहा। पुलिस कानून सब बेकार...लड़कियां गूंगी गुड़ियाओं की तरह एक अनजाने लड़के से ब्याह दी जाती रहीं और समाज तमाशबीन बना रहा। वैसे बिहार के कस्बे और ग्रामीण इलाको में लड़कियां शादी ब्याह के मामले में गूंगी ही होती हैं। ना कोई उमंग है ना कोई तरंग है...जैसी भावना के साथ वे मां बाप द्वारा तय की गई शादी स्वीकार कर धन्य हो जाती हैं। बिहार का मीडिया पकड़ुआ विवाह को मांगलिक रंगदारी प्रथा कहता है। अगरआपने भाग्यविधाता सीरियल देखा होगा तो उस पर यकीन मानिए। बड़े ही शोध के बाद वह सच्चाई कहानी बनकर आपके लिए मनोरंजन परोस रही है। सीरियल की नायिका का दुख देखिए..हमने अपनी आंखों से अपने परिवारों में घटित होतेदेखा है। गुनाह करे कोई, भरे कोई। लड़की पैदा करने की ताकत रखने वाले परिवारों में ल़ड़की की शादी करने का दम नहीं तो मांगलिक गुनाह का आसान रास्ता चुन लिया। लड़के उठा लाओ और जबरन शादी करा दो। लड़का बंदूक के साएमें शादी करने के बाद दुल्हन घर ले आता है और बदले की भावना से भर कर उस मासूम लड़की का जीवन ससुराल रुपी यातना शिविर के हवाले कर देता है। आखिर ये रास्ता लड़की के घरवाले क्यों अपनाते है..इसकी बहुत पड़ताल होचुकी है। सबसे बड़ा लड़की को बोझ मानना और उसे किसी तरह ब्याह देने की मानसिकता इसके पीछे काम करती है। आर्थिक मामला को भयानक है। बेगूसराय, मूंगेर, खगड़िया जैसे इलाको में दहेज की मांग भयानक थी। लड़की वाले उतनादेने में समर्थ नहीं होते। अमीर लोग गरीब परिवार से दहेज के कारण रिश्ता जोड़ते नहीं थे। नतीजतन उस जमाने में गरीब परिवारो ने विद्रोह कर दिया। बाकायदा एक एसे गैंग का उदभव हुआ जो लडके अपहरण करके शादी करवाने का ठेका लेने लगा। ज्यादातर तब पढाई करनेवाले लड़के शिकार बनते थे। संपन्न परिवारों के लड़के होते थे इसलिए बहुत बवाल मचा लेकिन इधर अबोध लड़की के साथ क्या हुआ इसकी खबर नही सुनी गई। शोर मचाने वालो को इनके घरों और जीवन में जरुर झांकना चाहिए था कि इन लड़कियों के साथ आखिर समाज-परिवार क्या व्यवहार करता है। मैं उसी समाज से आती हूं, इसलिए देखा है अपनी आंखों से कि कैसे मां बाप कुछ दिन बाद उस लड़की को कहीं खपा देते, घर से भगा देते हैं, जीवन भर दासी बना कर रख लेते हैं या किसी अंधेरी कोठरी में कैद कर
देते हैं या वापस मायके भेज देते हैं। उस जमाने में एसी लड़कियों के भाई-बाप का लड़को और परिवारों पर घोर आतंक था...लोगो ने अपने जवान होते बेटो को दूर दराज के शहरो में पढने के बहाने भेजना शुरु कर दिया था। जो पहले से बाहर पढ रहे थे उनका गांव आना बंद करा दिया गया था कि ना जाने कब कोई दबंग भाई उठा ले जाए और ढेर सारे दहेज लाने वाला उनका बेटा सस्ते में निपट जाए और एक अनचाही बहू साथ लेकर घर लौटे। उस वक्त बहुत कम परिवारवालो ने एसी बहू को स्वीकार किया। दस मामले में एक परिवार ने बहू को स्वीकारा और नौ परिवारों ने यातना देने के नृसंश तरीके अपनाए। जहां ससुराल उसके लिए यातना शिविर से कम नहीं था। कई एसी लड़कियां रहीं जिन्होंने यातना शिविर में ही जीवन गुजार दिए येसोच कर कि कभी तो नाजियो का दिल पसीजेगा और उसके भी दिन बहुरेंगे। इस भरोसे उन्होंने पति की दूसरी शादी तक झेली और वहां से हिली नहीं। मायके जाकर भी उन्हें क्या मिलता...लांछन, प्रताड़ना..भाई-भाभियों के उलाहने।

एसी शादी में लड़की कहीं की नहीं रहती। दबंग भाई उसके सपने का सौदा करकेनिकल लेता है और संताप झेलती हुई लड़कियां जिंदगी की मार से असमय बुढाजाती हैं।
AJAY
August 8, 2009 at 2:09 AM

Bahut achha likha hai aapne aur us naadan ladki ke dukh ko bade achhe se chitran kiya ........ Lekin mei fir kahoonga geetashree ...... aapkaa blog ek baar fir purntaya BIAS hai mahilaaon ke liye ... mei samajh saktaa hoon aapkee vyatha mahilaaon ke liye ... Lekin kya aapko nahi lagtaa ki isme kuch shabd un bechaare ABLA LADKO ke liye bhi likhne chaahiye the jo iss pratha ke shikaar hote hai ........ kher aapke shabdo ki taakat aur mahilaaon ki vyaatha ko wyaqt karne ke jajbe ko ek baar aur NAMAN .... KEEP WRITING ... KEEP FIRING

Nirmal Vaid
August 8, 2009 at 2:26 AM

Kya baat hai Geet ji kamal likha hai, meri taraf se bahut bahut badhai. Jari rakho likhna......

Pankaj Narayan
August 8, 2009 at 2:26 AM

abhi bhi ladkio ke liye bahuto parivar ka antim lakashya shadi kar dena hota hai... pichle 7-8 saal mein maine esi 10 se zyada sadi dekhi-suni hai... Bhagyavidhata jaise serial ko dekhkar sayad kuchh asar pade... apka blog to gyani log hi padhenge... serial gramin aurate v dekhti hai...

Arun Aditya
August 8, 2009 at 5:21 AM

जरुरी सवाल; सटीक विश्लेषण।
बधाई।

सुशीला पुरी
August 10, 2009 at 9:51 AM

bahut bhayawah hai yah..........