प्रतिभा की दुनिया से चंद सांसे

Posted By Geetashree On 5:26 AM
सीरिया की गाथा के बीच प्रतिभा की यह कविता मेरे हाथ लगी। उन्होंने लिखा था-जरा देख कर बताइए..पढने के बाद मैं खुद को रोक नही पाई। ये कविता वो आईना है जिसमें दुनिया, समाज का प्रेम से डरा हुआ लेकिन खौफनाक चेहरा दिखाई पड़ता है।--गीताश्री
किस कदर उलझे रहते हैं वे
एक-दूसरे में,
किस कदर तेज चलती हैं उनकी सांसें
किस कदर बेफिक्र हैं वे दुनिया के हर खौफ से
कि दुनिया को उनसे ही लगने लगा है डर,
कि उन पर ही लगी हैं सबकी निगाहें
वे कोई आतंकवादी नहीं,
न ही सभ्यताओं के हैं दुश्मन
न ही उनके दिमाग में है कोई षडयंत्र
फिर भी दुनिया को लग रहा उनसे डर.
पंचायतों की हिल गई हैं चूलें
पसीने आ रहे हैं समाज के मसीहाओं के
कैसे रोकें वे उन दोनों को
कैसे उलझायें उन्हें दूसरे कामों में
कि उनकी दिशायें ही बदल जायें
कौन से जारी किये जाएं फरमान
कि खत्म हो सके उनका प्रेम
कितने खतरनाक हैं
वे इस दुनिया के लिए, सचमुच?

प्रतिभा कटियार
MUMBAI TIGER मुम्बई टाईगर
May 13, 2009 at 10:40 AM

किस कदर उलझे रहते हैं वे
एक-दूसरे में,
किस कदर तेज चलती हैं उनकी सांसें
किस कदर बेफिक्र हैं वे दुनिया के हर खौफ से
कि दुनिया को उनसे ही लगने लगा है डर,
कि उन पर ही लगी हैं सबकी निगाहें

बहुत सुन्दर * * * *
आभार
मुम्बई टाईगर
हे प्रभु यह तेरापन्थ

Udan Tashtari
May 13, 2009 at 2:14 PM

बहुत उम्दा रचना! आभार प्रस्तुत करने का.

aseem
May 14, 2009 at 1:25 AM

sundar kavita hai. Sachmuch aaj ke daur ki sachchai hai ye.

Ajayendra Rajan
May 14, 2009 at 2:49 AM

हर दिल में इश्क जवां रहता है
हर दिल जमकर धड़कता है
दीवाने तो दीवाने ही होते हैं
विरोधी भी दीवाने होते हैं
आप ही बताइए इसे क्या कहें
ये दीवाने ही दीवानों का विरोध करते हैं

pratibha
May 14, 2009 at 8:47 AM

न ही उनके दिमाग में है कोई षडयंत्र

इस लाइन में न छूट गया है, कृप्या जोड़ लें गीता जी. शुक्रिया नुक्कड़ में शामिल करने के लिए.

प्रतिभा

अभिषेक ओझा
May 15, 2009 at 10:16 AM

कितना सच है ! ये आज की वो हर एक जोड़ी समझ सकती हैं जिन्हें हजारों आँखें सिर्फ इसलिए घूरती हैं क्योंकि वो साथ होते है.