एक लड़का प्रेमाकुल सा

Posted By Geetashree On 4:15 AM
वह पहली बार मुझे दिखा था एक मेले में। मैं लंबे अंतराल के बाद अपने शहर मुजफ्फरपुर गई थी, तो जितनी मैं उत्साहित थी उतनी ही मेरी पुरानी साहित्यिक मित्र मंडली भी। मेरे आने की उनको खबर लगी तो उन्होंने झट से एक कार्यक्रम का न्यौता मुझे थमा दिया। दो साल पुरानी बात है उन दिनों शहर में खादी मेला चल रहा था। मुझे खादी मेले में युवा पीढ़ी और खादी का बाजार विषय पर शाम को बोलना था। भाषण से पहले मुख्य अतिथि के तौर पर मेरी मित्र मंडली ने मुझे खादी मेले में घुमाया। मेरे साथ-साथ कम उम्र के लड़के-लड़कियों की भीड़ ज्यादा थी। यह वो पीढ़ी थी जो शहर में मेरी अनुपस्थिति
में बड़ी हुई थी। उनमें एक दुबला-पतला, सहमा, सकुचाया, सिमटा सा एक लड़का भी मिला।
इन लड़कों के मन में मुझे लेकर खास आकर्षण था। ऐसा मुझे उनसे बातचीत करने के बाद अहसास हुआ और मेरी मित्र मंडली ने मुझे छेड़ते हुए इसकी पुष्टि की। मेले में सांस्कृतिक मेले के आयोजक , कवि संजय पंकज ने उस दुबले-पतले लड़के को मेरे सामने किया और कहा यह हैं पंकज प्रेमाकुल जी, कविताएं लिखते हैं और आपसे मिलना चाहते हैं। मैं नाम सुनकर हंस पड़ी और मैने छूटते ही कहा कविताऐं लिखते हो इसका क्या मतलब है कि नाम के साथ प्रेमाकुल जोड़ लोगे..तुम्हारा असली नाम क्या है..तो उसने झेपते हुए कहा कि पंकज नारायण। मैंने कहा इतना अच्छा तो नाम है यही क्यों नहीं रखते हो। लगभग एक साल बाद दिल्ली में एक फोन आया कि मैं पंकज नारायण बोल रहा हूं। अब तक मैं उसे भूल चुकी थी। उसने कहा कि वही पंकज प्रेमाकुल...मुझे याद आया तो मैंने जोर से ठहाका लगाया उधर से वह भी देर तक हंसता रहा। प्रेमाकुल आजकल दिल्ली में रहते है और साहित्य के साथ-साथ स्वतंत्र पत्रकारिता भी कर रहे हैं। उनका गंवईपन अभी गया नहीं है। वो अब भी अपनों के लिए वैसे ही चिंतित होते है। दिल्ली से मुजफ्फरपुर तक सभी की खबर रखते हैं।
छोटे शहर का अनगढ़ लड़का महानगर में जीने की कला सीख रहा है। उम्मीद है जल्दी ही चालाक हो जाएगा। फिलहाल इस भोले से लड़के ने मुझे अपनी दो कविताएं भिजवाईं हैं। मैं चाहती हूं कि आप भी पढ़ें और अपनी राय दें।

रात नींद और सपने...
रात मुझे सोने नहीं देती,
दिन मुझे जगाकर रखता है,
कुछ लोग कहते हैं
मैं नींद में जागता हूं,
एक आदमी हूं।
बिना शर्त सपने देखता हूं,
हर शर्त पर उसे,
पूरा करना चाहता हूं,
कुछ लोग कहते हैं,
मैं नींद में भागता हुआ,
एक आदमी हूं।
मेरा नीद से पुराना रिश्ता है,
नींद कभी फैल जाती है,
मेरे आकार लेते सपनों पर,
सपने कभी लेट जाते हैं,
मेरी नींद में,
कुछ लोग कहते हैं,
मैं नींद में समाता हुआ,
एक सपना हूं।

पंकज नारायण
vijaymaudgill
September 24, 2008 at 5:07 AM

बिना शर्त सपने देखता हूं,
हर शर्त पर उसे,
पूरा करना चाहता हूं,
कुछ लोग कहते हैं,
मैं नींद में भागता हुआ,
एक आदमी हूं।

बहुत ख़ूब। बहुत अच्छी कविता लिखी है पंकज नारायण उर्फ़ पंकज प्रेमाकुल जी ने।

डॉ .अनुराग
September 24, 2008 at 7:21 AM

उससे कहियेगा लिखता रहे .....खूब लिखता है....ओर बहुत खूब लिखता है....

श्रीकांत पाराशर
September 24, 2008 at 10:38 AM

Premakulji ki kavita achhi hai

Udan Tashtari
September 24, 2008 at 12:29 PM

पंकज नारायण को पढ़वाने का आप को बहुत शुक्रिया.

Anil Pusadkar
September 24, 2008 at 10:41 PM

सुन्दर रचना।बधाई पंकज जी को लेखन की,और आपको भी उन्हे पढने का मौका देने की।

Jolly Uncle
September 25, 2008 at 2:28 AM

It is really nice to visit your site. Mr. Pankaj Narayan is not only a good poet and writer but also a very good human being. I wish all of you a great success in the coming years.

Jolly Uncle
www.jollyuncle.com

Jolly Uncle
September 25, 2008 at 2:45 AM

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aarti
September 25, 2008 at 3:05 AM

Pankaj Jee aapki kavitayen apane ander bahut geharai chhupai huye hai.

Aarti Srivastava

Neeraj Bhushan
October 5, 2008 at 8:51 AM

I know Pankaj for about two years now and I know him as an emotional, courageous person.

I am impressed by him, so much so that I would love to work with him, if given an opportunity.

His description in the blog is apt. I hope other senior journalists from my state - Bihar - will also write about Pankaj and encourage him, which I think he needs the most.

Salute to Geetashree for picking one of our extremely talented folks as her subject in this blog.

My best wishes to 'hamaranukkad', 'GEETASHREE' & 'Pankaj (Premakul) Narayan.

Neeraj Bhushan
October 5, 2008 at 8:53 AM

I know Pankaj for about two years now and I know him as an emotional, courageous person.

I am impressed by him, so much so that I would love to work with him, if given an opportunity.

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उमाशंकर मिश्र
January 1, 2009 at 12:35 AM

अभी कुछ समय पूर्व पंकज से मिलना हुआ था. पंकज की ऑंखें ख़ुद किसी कविता और कहानी का एक कोष सा प्रतीत होती हैं... गीता जी ने उन इतना लंबा लिख डाला है तो संभावनाओं का अंदाज लगाया जा सकता है... बहरहाल बधाई पंकज प्रेमाकुल उर्फ़ पंकज नारायण ......