औरत कैसी औरत है

Posted By Geetashree On 3:52 AM Under
0 प्रतीभा कटियार 0
इश्किया देखने के बाद आकांक्षा पारे ने जो सवाल उठाए हैं उस पर कई कमेंटस आए...प्रतिभा जी ने भी कुछ लिखा है। बहस पर नई रोशनी डालता हुआ उनका लेख .यहां पेश हैं। इश्किया में इस्तेमाल गालियों पर बहुत बहस हुई..अखबारों में लेख लिखे गए, चैनलों पर बहसें हुईं...मगर एक संवाद अनदेखा रह गया जिसमें एक स्त्री के जरिए समूची स्त्री जाति को कठघरे में खड़ा कर दिया। तिलमिला देने वाले इस संवाद को जस्टिफाई नहीं किया जा सकता..लोगबाग अब सफाई दे रहे हैं...तरह तरह के तर्क गढे जा रहे हैं...इस संवाद से हामारा वजूद खतरे में भले ना पड़ा हो..हमारी विश्वसनीयता पर हमले किए गए हैं...उसका प्रतिकार जरुरी...यह लेख उसी सिलसिले की कड़ी है... गीताश्री
औरत होने का क्या अर्थ है। विन्रम, सुशील, सच्ची...नैतिक, पारंपरिक उच्च चरित्रवाली ईमानदार, मृदुभाषी...ये फेहरिस्त काफी लंबी है।

अक्सर आसपास ऐसे जुमले सुनने में आते रहते हैं, एक औरत होकर उसने ये किया...देखो औरत होकर भी कैसा काम किया. उसकी भाषा देखो, औरतों की नाक कटा दी. एक औरत होकर क्राइम में...

पिछले दिनों रवीश कुमार जी के ब्लॉग पर एक तस्वीर चस्पां की गई कि औरतें भी जेबकतरी हो सकती हैं...सावधान. कमेंट्स भी आये कि लो जी औरतों से तो ये उम्मीद नहीं थी या यहां भी आ गईं महिलाएं. संभ्रांत तबकों से आवाजें और घनी होती हैं. कोई औरत अगर आगे बढ़ जाती है तो उसका चरित्र निशाने पर, पर अगर नहीं बढ़ पाती तो उसकी कार्यक्षमता निशाने पर. घर के मोर्चे पर असफल तो नौकरी को दोष, नौकरी के मोर्चे पर ढीली पड़ी कभी तो घर को दोष. अगर सब साध ही लिया ठीक से उसकी स्मार्टनेस उसकी चालाकी कहलाती है. ये है आज का आधुनिक युग और आधुनिक सोच. औरत होने का अर्थ क्या होता है बार-बार सोचना पड़ता है. स्त्री विषयों पर मुखर होने के कारण अक्सर ऐसे मौकों पर जब कोई महिला कहीं भी किसी भी मामले में दोषी पाई जाती है तो मुझे घेरा जाता है कि देखा औरतों को आजादी देने का नतीजा. हम सब जानते हैं कि ऐसे जुमले कसने वाले बेहद एलीट, पढ़े-लिखे लोग होते हैं. ऐसे जुमलों से ज्यादा खतरनाक होती है उसकेपीछे की नीयत.
एक अजीब किस्म का सैडिस्ट अप्रोच. जो आगे बढऩे वाली महिलाओं में खामियां देखते या ढूंढते ही खिल उठता है. समझ में नहीं आता कि ये लोग कब समझेंगे औरत होने का अर्थ. औरत होते ही सारे गुणों की चादर में क्यों लपेट दिया जाता है किसी को. औरत होना भी इंसान होना ही तो है. सारे गुण-दोषों से युक्त. उसकी गलतियों की सफाई देना मेरा मकसद नहीं न ही उसका पक्ष लेने का. सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि जो इंसान है वो इंसानी गुणों से भी तो भरपूर होगा, दोषों से भी. गलत फिर गलत ही है एक जैसा चाहे स्त्री करे या पुरुष. इसमें लिंग भेद की गुंजाइश कब, कहां, कैसे आ जाती है. स्त्री भी एक इंसान है. उसमें भी गुण दोष सब हैं. आगे बढऩे के लिए वो भी वो सब कर सकती है जो अब तक सिर्फ पुरुष करते आये हैं. दांव-पेंच, झूठ-सच, अच्छा-बुरा सब कुछ. क्यों उसे अलग खांचे में फिट किया जाता है और एक की गलती के बहाने पूरी औरतों की बिरादरी और उनके संघर्ष पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाता है. इतने बरसों से तो पुरुषों ने एक-दूसरे का गला काटा है. भाई ने भाई का, बाप ने बेटे का, दोस्त ने दोस्त का. एक की टांग घसीट कर पीछे करना, खुद को आगे निकालना यही सब तो होता रहा है, हो रहा है. लेकिन गलती से कोई एक औरत अपनी किसी सहयोगी की आलोचना करे तो हो जाती है औरत ही औरत की दुश्मन. पुरुष ऐसे मौकों को हथियाने को तैयार बैठे रहते हैं. क्या स्त्रियों को इन खांचों से मुक्त होकर एक स्वतंत्र इंसान के तौर पर कभी देखा जायेगा. जहां उनसे किसी देवी होने की उम्मीद नहीं की जायेगी. उनकी गलतियां भी वैसी ही हैं जैसी किसी पुरुष की. न कम न ज्यादा. गलत को गलत कहना बुरा नहीं. बुरा है उसे जेंडर के खांचे में डालकर आनंद लेना.
प्रतिभा कटियार
शशिभूषण
February 14, 2010 at 5:50 AM

बहुत पहले हंस में प्रतिभा कटियार जी की कहानी पढ़ी थी.फिर पायोनियर में कुछ फीचर.इतने सालों बाद पिर कुछ छपा हुआ पढ़ रहा हूँ.यह मेरी ही सीमा है.दरअसल समझदार लोग औरत को इंसान ही समझते हैं.कुछ जैविक अंतरों के अलावा कोई अंतर नहीं होता औरत-मर्द में.काम,क्रोध,लोभ,मोह(माफ़ कीजिए पुराने समझ लिए गए दुर्गुणों को आधुनिक संदर्भों में चस्पा करने के लिए)सब में समान होती है आत्मनिर्भर स्त्री.पराधीन की कोई पहचान अपनी नहीं होती सो उसे छोड़ दीजिए.जब गायों की भी कोई बात की जाए तो खुली गाय और बंधी गाय के अलग-अलग पक्ष रखे जाएँ.कई बार हम आरोपो के जवाब में आरोप ही लगा बैठते हैं.यह कोई दकियानूसी खयाल नहीं सच है कि औरतें काफ़ी सबल हुई हैं.कार्यक्षेत्र में गलत औरत से टकराव हो तो सही मर्द भी अंतत:परास्त होता है.यह भी एक रूढ़ि है कि कैसी भी औरत का पुरुष के संबंध में हर आरोप सही मान लिया जाता है.हर पुरुष को अंतत:सामंती और स्त्री विरोधी समझा ही गया है.किसी भी महापुरुष का नाम लीजिए उससे जुड़ी औरत गालियों से लैस मिलेगी.
इसे कभी सत्ता और संपत्ति से भी जोड़कर देखा जाएगा उम्मीद करें.

amritwani.com
February 14, 2010 at 6:28 AM

आज तक कोण समझ पाया हे ओरत को |

शेखर कुमावत

pragya pandey
February 14, 2010 at 7:48 AM

औरत को देवी भी बनाते हैं और उसका तिरस्कार भी उतना ही करते हैं यह समाज उसको एक सामान्य इंसान मानता ही नहीं है .यही तो विडम्बना है .उसके अन्दर भी वे सारे गुण दोष ठीक उसी तरह हैं जिस तरह पुरुषों में होते हैं . लेकिन वह आज तक स्वतंत्र न तो जी पायी न सोच ही पाई हमेशा या तो एक आदर्श नारी या तवायफ जैसी किसी गाली के खांचे में ही उसे फिट किया गया बीच की कोई ज़िन्दगी उसे नहीं मयस्सर है .

सुशीला पुरी
February 14, 2010 at 9:00 AM

'हमारी विश्वसनीयता पर सवाल '.....सामयिक प्रसंग पर आपने जो बहस शुरू की है,वह सचमुच सोचने को मजबूर करती है . मुझे लगता है की इस मर्द वादी व्यवस्ता में हम हैं कहाँ ?हाशिये पर होकर मुगालते
में रहने का भ्रम पालें भी तो कैसे ? क्या गालियाँ, मर्दों के द्वारा ,मर्दों से ,मर्दों के लिए हो पाएंगी ???

manjusha
February 15, 2010 at 3:10 AM

Andar kahi gai lines satik hain. Is padna aisa laga mano jaise ysh sab koi samne khade hokar bol raha hai. Bas antar kitna tha ki use kuch kahne mein padte waqt khud ko asamarth paya. Par isme jo bhi likha hai sahi hai.

rana
February 15, 2010 at 11:10 PM

Behtreen lekh pratibha ji. lekin isi tarah se purushon ke bare me bhi socha jana chahiye...saare purush bhi galat nahi hote unki neeyat par shak kyon hota hai hamesha aurton ko...

शरद कोकास
February 20, 2010 at 4:29 AM

यह दोहरे माप दंड पुरुष ने ही बनाये हैं ।