नीत्शे, देवता और स्त्रियां

Posted By Geetashree On 4:15 AM Under

प्रतिभा कटियार

मैं ईश्वर में विश्वास नहीं कर सकता. वह हर वक्त अपनी तारीफ सुनना चाहता है. ईश्वर यही चाहता है कि दुनिया के लोग कहें कि हे ईश्वर, तू कितना महान है. - नीत्शे
नीत्शे ने यह किन संदर्भों में कहा होगा नहीं पता लेकिन मुझे यह कथन स्त्री विमर्श के संदर्भ में एकदम मुफीद लगता है. एक किस्सा याद आ रहा है. कुछ सालों पहले एक मनोवैज्ञानिक डॉक्टर के पास बैठी थी. तभी एक महिला काउंसलिंग के लिए आई. यूं कोई भी डॉक्टर किसी के सामने काउंसलिंग नहीं करता लेकिन चूंकि वो महिला मेरी जानने वाली थी और उसे कोई ऐतराज नहीं था इसलिए बात सामने शुरू हुई. बात बेहद सामान्य सी थी. हां, उन सामान्य बातों से उपजे अवसाद बड़े गहरे थे, जिनका संतुलन उस महिला से साधे नहीं सध रहा था. डॉक्टर ने बेहद हल्के-फुल्के अंदाज में जो बात कही वो बड़े काम की थी.

बात सिर्फ इतनी सी थी कि पहले हम औरतें एक साधारण पुरुष को पूज-पूज कर ईश्वर बना देती हैं. व्रत, उपवास, पूजा, अर्चना, लंबी उमर की कामना, सीता, सावित्री बनने की इच्छा वगैरह. बच्चा होश बाद में संभालता है उसे यह अहसास पहले होने लगता है कि वो लड़की से सुपीरियर है.धीरे-धीरे जब वो अपने भीतर देवत्व महसूस करने लगता है तब हम उसे खुद को खुदा मानने के आरोप में जकड़ देते हैं. वो कहते हैं न कि सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा.

नीत्शे का कथन और डॉक्टर का कथन आसपास ही तो हैं. हम अपने डर के चलते ईश्वर को गढ़ते हैं. स्त्रियों ने भी अपने तमाम तरह के डरों के चलते देवता गढ़े हैं. देवता पिता, देवता भाई, देवता पति...वगैरह. अठारह बरस की लड़की चार बरस के लड़के की उंगली थामके घर से बाहर निकलने पर सुरक्षित महसूस करती है. यह असुरक्षा कई कारणों से है. ये डर आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक, मानसिक हर तरह के हैं. जितनी डरी हुई स्त्री होगी उसके आसपास के देवताओं के आसन उतने ही मजबूत होंगे. देवताओं का आसन मजबूत रहे इसलिए उनकी आंखों का उठना ही अपराध सा माना गया है. उनका सीना तानकर चलना बेशर्मी कहलाई. बात करना, जवाब देना बुरी बात. देवताओं के आसन सुरक्षित रहें इसलिए परंपराओं, मर्यादाओं, नैतिकताओं, संस्कारों की मजबूत बाड़ लगा दी गई.

ध्यान रहे ये बाड़ सिर्फ स्त्रियों के लिए थी. स्त्रियों को यह समझाया गया कि यही उनके जीवन का सबसे बड़ा और सुंदर सच है. करवाचौथ की थालियां सजायें स्त्रियां बेहद मगन होकर गाने लगीं मेरा पति मेरा देवता है...बताओ भला एक देवता और एक इंसान की जोड़ी क्या नॉर्मल है. स्त्री या पुरुष में से जब एक देवता हो जायेगा तो रिश्तों का, समाज का हश्र वही तो होगा जो हो रहा है. संतुलन गड़बड़ायेगा. रिश्ते इकतरफा हो जायेंगे. रिश्तों की कमान उसके पास होगी जो देवत्व ग्रहण करेगा यानी पुरुष. जो स्त्रियां अपने बाड़े नहीं पार करतीं, उन्हें उनके देवता खाना, कपड़ा देकर तारते रहते हैं. लेकिन जहां स्त्रियों ने बाड़े के बाहर झांकने की कोशिश की, जहां उन्होंने यह सोचा कि यह पुरुष है तो हमारी ही तरह फिर यह देवता क्यों है, साथी क्यों नहीं? वहीं देवताओं के आसन डोलने शुरू हुए. जैसे ही स्त्रियों ने अपना जीवन अपने हाथों में लेना शुरू किया, आर्थिक, सामाजिक स्थितियों को मजबूत बनाना शुरू किया उनके मन के भय कम होने लगे. और जैसे ही भय कम हुए वैसे ही देवताओं को खतरा शुरू हो गया. आज स्त्रियों का डर कम हो रहा है. उन्हें यह अहसास हो रहा है कि सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत जिंदगी के लिए उन्हें इतना डरने की $जरूरत नहीं है. उनमें और पुरुषों की क्षमताओं में बहुत अंतर भी नहीं है. तो क्यों देवता बनाना किसी को. अब पति परमेश्वर की नहीं, पति मित्र की तलाश शुरू हुई.

लेकिन ये इतना आसान कहां है...देवत्व के जो बीज इतने गहरे गड़े हैं वो इतनी आसानी से कैसे अपना असर दिखाना बंद कर देंगे. हमारे डर अगर पूरे खत्म हो गये तो क्या होगा देवताओं का...यही सोचकर चारों तरफ खलबली है.

Prabhash Dutta
January 4, 2010 at 5:18 AM

aapka blog padha
ek taraf se aapke baaton se purn rup se sehmat hone ki koshish karta hun
per kuch baatein mujhe aapse itefaaq na rakhne ko majboor kar rahi hain.
koi bhi 'ism' bahut jyada perfect nahi hoti...maslan communalism,favouritism,regionalism vagirah vagiarah
issi tarah main naye zamane ki "femin-ism" ko bhi dekhta hun
aapke lekh ko padh kar vaakai main laga ki
stri ka shashaktikaran behad zaruri hai aur do pahiyon ki tarah hi hum purush aur ishtri ko dekhna chahiye
lekin jahan aap jaise lekhaq bhi hai wahi feminism ki aad main ek alag tarah ki manshikta ko janm de rahe hain metro culture
agar aap kuch Delhi aur mumbai ke women college main jaayen to waha aapko pata chalega ki students ko yeh bataya ja raha hai ki saare purush rakchas hote hain, cruel hote hain, aur unhe apne saath rakhne ki koi zarurat nahi....kya aap bhi aisa sochti hain?
kya vichar hai
kya hummain bure kuritiyon ko dur karne ki zarurat hai ..naari ko sabla banane ki zarurat hai...shasaktikaran ki zarurat hai ya ...yeh batane ki zarurat hai ki pusush jaati hi apne aap main kharab hai bura hai...
kya hum negativism nahi paros rahe
kya hum wahi nahi kar rahe jo aaj tak purush varg ne kiya
??

सागर
January 4, 2010 at 5:28 AM

पिछली बार जहाँ से छोड़ा था वहीँ से उठाया है... आगे भी जारी रहें. इतिहास से अरसा हुआ नाता टूटे हुए... बातें विचारणीय है..

sushant jha
January 4, 2010 at 8:29 AM

स्त्रियों का सबसे बड़ा दुश्मन वर्जिनीटी का कंसेप्ट है। मतलब कि स्त्रियों की वर्जिनिटी उसके पति की अमानत है और इसी को कंट्रोल करने के लिए तमाम तरह की वर्जनाएं, नैतिकताएं और धार्मिक मान्यताएं गढ़ी गई हैं। इसका एक मतलब ये भी है कि स्त्रियां तो एक ही पुरुष से संबंध बनाए जो उसके भाग्य का विधाता भी हो लेकिन पुरुषों पर ऐसी कोई बंदिश आयद नहीं की गई हैं। लेकिन इस विचार जन्म कैसे हुआ होगा इसके बारे में एक अनुमान जरुर लगाया जा सकता है।
आदिम काल में जब मनुष्य जंगल और गुफाओं में रहता था तो उस समय समाज और शासन व्यवस्था का ये रुप नहीं था। सभी लोग स्वच्छंद थे और स्त्री-पुरुषों का संबंध किसी नियम में नहीं बंधा था। कौन किसका पिता है ये ज्यादा मायने नहीं रखता था सिर्फ मां का पता होता था। सभी बच्चे कबीले के बच्चे होते थे। कुल मिलाकर उस वक्त स्त्रियां ज्यादा आजाद थी-इसका थोड़ा सा रुप हम अभी भी आदिवासी समाज की स्त्रियों में देख सकते हैं जो तथाकथित सभ्य समाज की तुलना में अपनी महिलाओं को ज्यादा आजादी दिए हुए है। लेकिन जैसा कि मार्क्स ने कहा कि- मानव सभ्यता के तमाम ऐतिहासिक चरण आर्थिक आधारों पर तय हुए हैं- जंगल में जब शिकार की कमी और पड़ोसी कबीलों से लड़ाई की वजह से सरदार नामकी संस्था का जन्म हुआ तभी से स्त्रियों की हालत खराब होने लगी। सरदार बनने की ये प्रक्रिया ,राजतंत्र और व्यवस्था के मजबूत होने का पहला चरण था। अब कबीले की व्यवस्था सरदार के हाथों में था-हलांकि वह अभीतक अपने समकक्षों में से ही एक-लेकिन सम्मानति व्यक्ति था। धीरे-धीरे सरदार ने ये सोचा कि उसके कबीले का प्रभाव और उसकी सत्ता उसी की संतान के हाथों में हस्तांतरित होनी चाहिए। इसके लिए ये सुनिश्चित करना जरुरी था कि जो बच्चा आगे जाकर सरदार की सत्ता को संभालने वाला है वो उसी का बच्चा है!साथ ही साथ जंगल की जिदगी के बाद जब आदि मानव बस्तियां बसाकर रहने लगा और व्यक्तिगत संपत्ति की भावना ने जोर पकड़ा तो लोगों के मन में अपने ही संतान को संपत्ति और सत्ता हस्तांतरित करने की भावना ने जोर पकड़ी। यही विवाह नामकी संस्था का जन्म हुआ जिसने ने औरत की यौनिकता को खूंटे में बांध दिया। ऐसा इसलिए किया गया कि औरत किसी दूसरे के साथ संबध न बना सके और बच्चे के पिता की पहचान सुनिश्चित की जा सके! लेकिन इस प्रथा ने औरत की यौन आजादी को तो खूंटे में बांध दिया लेकिन पुरुषों को बेलगाम छोड़ दिया-वे चाहें तो कई-कई औरते रख सकते थे! दूसरी तरफ जंगल में असहाय आदिमानव, जब बिजली की चमक, तूफान, बारिश और भूस्खलनों से भयभीत होती तो एक पारलौकिक सत्ता(ईश्वर) की अवधारणा भी जन्म ले चुकी थी-जिसे वैधानिक जामा पहनाने के लिए पुजारी वर्ग का जन्म हो चुका था। इस पुजारी वर्ग ने सरदार(राजा का पूर्व रुप)से सांठगांठ की और उसे दैवीय वैधानिकता प्रदान की कि राजा, देवता का प्रतिनिधि है और राज करने के लिए पैदा हुआ है। इसी वर्ग ने उसके वंशानुगत शासन को जनता से मान्यता दिलवाई, तमाम तरह के धार्मिक साहित्य रचे और औरतों के खिलाफ एक से एक नियम कानून बना डाले। चूंकि औरत सशक्त नहीं थी, शासक नही थी- सो इस 'देवप्रवक्ता'का विरोध वो नहीं कर पाई। धीरे-2 जब व्यापार का उदय हुआ तो राजाओं के लिए ये आय का बड़ा स्रोत बन गया और राजा, पुजारी और व्यापारी कि तिकड़ी अपने मनमाफिक नियमकानून बनाने में मशगूल हो गई। जाहिरा तौर पर औरतों का हित किसी के एजेंडे में कभी नहीं आया। और आज के जमाने में भी जब औरते अपने हक की आवाज उठा रही हैं तो यहीं तिकड़ी और इसकी समाज पर थोपी मानसिकता औरतों को सिर्फ वर्जिनीटी के आधार पर कुचलने के लिए आमादा है।
कुल मिलाकर कहने का लब्बोलुआव ये कि औरते तब तक आजाद नहीं हो सकती जब तक वे आर्थिक रुप से आजाद हों।

अबयज़ ख़ान
January 4, 2010 at 9:50 AM

बेहतरीन है, रिश्तों को बड़े सलीके से पिरोया है.. मर्द की व्याख्या भी बहुत बढ़िया की है.. इसमें कोई दो राय नहीं, कि देवता हम ही बनाते हैं... लेकिन ये समाज है.. बदलते-बदलते वक्त लगता है... जो बातें कभी 19वीं सदी में थीं वो आज कहां है... इसलिए जो कुरुतियां आज हैं.. वो भी रफ्ता-रफ्ता करके ख़त्म ज़रूर हो जाएंगी...

Udan Tashtari
January 4, 2010 at 6:43 PM

’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

-त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

-सादर,
समीर लाल ’समीर’

ali
January 4, 2010 at 7:41 PM

कल रात मित्र नें इसे पढने के लिए लिंक दिया था , हालांकि यहां उनकी कोई टिप्पणी मुझे दिखाई नहीं दी लेकिन मैं उनकी फीलिंग्स से सहमत हूँ ! आलेख सच में बहुत अच्छा है ! चिंतनपरक आलेख !

rohit
January 4, 2010 at 11:40 PM

apka article acha laga.Prabhash Dutta ji ne apke artcle par comment karte hua likha hai ki pursho ki ek negative chavi nirmit ki ja rahi hai.unhe raksas kaha ja raha hai.lakin kya es negative chavi ko nirmit karne mai pursho ka hi hath nahi hai.aaj bhi jayadatar log stri ko deh se jayada kach nahi samajte hai.kya aise mai hamari Ram jaise chavi nirmit hogi.hamare samaj ne hi aisa vatavaran banaya hai ki aaj striya pursho ko raksas kahane lagi hai.
ab bat apke article par.pursho mai devatav viksit karne mai striyo ka bhi hath hai.bachpan se hi ladko ko ladkiyo se behtar samja jata hai.halaki aaj situation change ho rahi hai.lakin poore samaj mai ek ajib khokhla adarshvad pasara hua hai.jab bhai striyo par bat hoti hai to hamare purvagrah samne aa hi jate hai.

Rohit Kaushik

pragya pandey
January 5, 2010 at 8:04 AM

यह बात सच है .की . देवत्व जब जड़ की तरह जमा हुआ है तो इतनी आसानी से वह जाने वाला नहीं है .. बहुत सही लिखा आपने बधाई

रंगनाथ सिंह
January 7, 2010 at 1:08 AM

बहुत बढ़िया लेख है। बहस अच्छी बढ़ रही है। आगे की पोस्ट का इंतजार रहेगा।

पंकज
January 8, 2010 at 3:24 AM

कमेंट स्वरूप अपने ब्लाग की लिंक दे रहा हूँ जहाँ मैंने आज नारी की स्थिति से संबन्धित पोस्ट दी है. आदर. <

http://epankajsharma.blogspot.com/2010/01/blog-post_08.html

raj
January 17, 2010 at 10:23 PM

लेख नीत्से स्त्रीयां और देवता पढ़ा. सच तो यह है है कि स्त्री पुरुष दोनों इंसान हैं और एक दूसरे के पूरक हैं. दोनों सामान हैं. अच्छी लेख के लिए आपको बधाई.
- राज वाल्मीकि

ravi ranjan kumar
January 18, 2010 at 2:32 AM

आपकी ख्वाहिशें विराट हैं, आपकी चाहत दीवार के पार उतर जाना चाहती हैं.इस चाहत को सलाम. इच्छाओं का क्या अंत. जैसे पुरुष मिले अधिकार को छोड़ने को तैयार नहीं .वैसे ही स्त्रियाँ बंधन में खुश रहने की आदी हो चुकी हैं. वक्त लगेगा .

BHARTI
April 29, 2011 at 2:26 AM

bahut achcha laga.aage intezaar karungi