हमेशा तारीफ सुनना चाहता है ईश्वर

Posted By Geetashree On 2:19 AM

नीत्शे के बहाने मनुष्य की प्रवृत्तियों को याद करते हुए...क्योंकि हम लोग भी हमेशा अपनी तारीफ सुनना चाहते है... शायद ईश्वर होना चाहते हैं. नभाटा पढते हुए नीत्शे का पुराना राग फिर नजरो के सामने से गुजरा...और कई चेहरे झिलमिलाए। हम जिस व्यवस्था में जी रहे हैं...वहां तारीफ की बहुत कद्र है। ये एक कला है जो आपको आना चाहिए। चाहे और कुछ आए या ना आए..। इसके दम पर दुनिया का कुछ हिस्सा तो आप जीत ही सकते हैं...कमसेकम किसी का दिल तो अवश्य। तारीफ एक किस्म की बीमारी भी है और इलाज भी। किसी का इगो सहलाता है तो कहीं शक्ति पैदा करता है..कई खूबियो और दुर्गुणों से भरी है ये तारीफ...जिन्हे ये कला नहीं आती...वे बेहद पिछड़े हैं..जिन्हें महारत हासिल है वे चमत्कार कर रहे हैं....खैर..मैं फिलहाल अपनी तारीफ सुनने के मूड में हूं..सो नीत्शे के विचार को यहां रख रही हूं...
नीत्शे (1844-1900) जर्मन विचारक और दार्शनिक थे, जिन्हें अपने क्रांतिकारी और लीक से बिल्कुल ही अलग विचारों के लिए जाना जाता है। नीत्शे के जिस कथन से सबसे ज्यादा खलबली मचाई, वह था : ईश्वर मर चुका है।

नीत्शे के कई विचारों पर खासा विवाद भी रहा है। नीत्शे 24 साल की उम्र में ही दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर बन गए थे। कुछ दिनों बाद वह बीमार रहने लगे और एक लंबा अर्सा बीमारी के इलाज में जगह-जगह घूमते हुए गुजरा। इसी दौरान उनके क्रांतिकारी विचार सामने आए। नीत्शे के विचार, आस्था क्या है, सत्य को न जानने की इच्छा। ईश्वर एक विचार है, जो हर सीधी-सादी चीज को जटिल चीज में तब्दील कर देता है।

मैं ईश्वर में विश्वास नहीं कर सकता। वह हर वक्त अपनी तारीफ सुनना चाहता है। यही चाहता है कि दुनिया के लोग कहें कि हे ईश्वर, तू कितना महान है। क्या इंसान ईश्वर की सबसे बड़ी गलतियों में से एक है? या फिर ईश्वर ही इंसान की सबसे बड़ी गलती है? डर नैतिकता की मां है। इंसान नैतिक रहता है क्योंकि वह डरता है। सारी समझदारी, सत्य के सभी सबूत अपनी खुद की सोचने-परखने की क्षमता से हासिल होते है। किसी एक अतिवादी स्थिति की परिणित किसी बीच के रास्ते में नहीं, बल्कि दूसरे अतिवादी तरीके में होती है।

ओह, ये औरतें! ये ऊंचे इंसान को और भी ऊंचा बना देती हैं और नीचे को ओर भी नीचे गिरा देती हैं। दुनिया के सारे महान विचार टहलने के दौरान लोगों के दिमाग में आए हैं। हमें हर उस दिन को गंवाया हुआ मानना चाहिए, जिस दिन हम एक बार खुशी से नहीं थिरके या किसी दूसरे के चेहरे पर मुस्कान नहीं फैलाई। शैतान से लड़ते वक्त सबसे ज्यादा सावधानी इस बात की बरती जानी चाहिए कि कहीं हम खुद ही तो शैतान नहीं बनते जा रहें है।

अनंत विजय
December 20, 2009 at 3:41 AM

बहुत गझिन लेख है । हम जैसे आम पाठकों के लिए नहीं बल्कि नीत्शे, ग्राम्सी, जोस मार्टिन, आदि आदि जैसे लेखों को ओढने वालों के लिए लिखकर आपने हम गरीब पाठकों को नेगलेक्ट किया लेकिन फिर भी मैंने पढ़कर समझने की कोशिश की

सागर
December 20, 2009 at 3:57 AM

सुन्दर...

Udan Tashtari
December 20, 2009 at 4:50 AM

शैतान से लड़ते वक्त सबसे ज्यादा सावधानी इस बात की बरती जानी चाहिए कि कहीं हम खुद ही तो शैतान नहीं बनते जा रहें है।

-सही कहा...अच्छा आलेख.

सुशीला पुरी
December 20, 2009 at 8:31 AM

हमें हर उस दिन को गंवाया हुआ मानना चाहिए जिस दिन हम ख़ुशी से थिरके नही या किसी के चेहरे पर मुस्कान नही बिखेरी ...........वाह गीताश्री जी! कितनी बड़ी बात लिखी आपने ....हार्दिक बधाई .

अन्तर सोहिल
December 20, 2009 at 10:31 PM

दोबारा पढ रहा हूं
शायद समझ पाऊं

प्रणाम

रंगनाथ सिंह
December 21, 2009 at 3:50 AM

वर्जिनिया वुल्फ से एक प्रशंसक ने पूछा की आपको इतने बेहतरीन ख्याल आता कहां से हैं ? उन्होंने कहा घर के काम करने के दौरान....

pragya pandey
December 21, 2009 at 4:38 AM

गीताश्री जी नीत्शे के दर्शन की जानकारी हुई . अच्छा लगा ... तारीफ़ अच्छी तो लगती है और उसको करना और स्वीकारना दोनों ही एक कला है. आपने अच्छी पोस्ट दी है. सच्ची तारीफ़ है . स्वीकार कीजिये

usha rai
December 22, 2009 at 4:05 AM

इंसान नैतिक रहता है क्योंकि वह डरता है।.....नैतिकता होनी चाहिए .बिलकुल .........इस तरह की बाते पढ़ते हुए मुझे भारतीय साहित्य और संस्कृति ही अच्छी लगती है गीता जी ! आप सदैव ही ज्ञान वर्धन करती हैं ! धन्यवाद !

इलाहाबादी अडडा
December 22, 2009 at 8:24 AM

जी सच लिखा है।

krishna
December 23, 2009 at 10:45 AM

haqeeqat hai magar yah bhi ek sach hai ki tareef karne walon ke saath sacche nindak bhi jaroori hain.ninda achhi to nahin lagti kintu sochne par vivash to karti hi hai.ishwar hai ya nahi, mara ya jinda hai, yah sab rahasya ke parde mein hai.main ishwar mein vishvas karta hoon lekin dikhave ke liye kuch bhi nahin karta.isi tarah main tareef ko insan ke liye khushi ki jahan ek vajah samajhta hoon vaheen ise use sirfira bana dene ki vajah bhi manta hoon.cheejen santulit hon tabhi samagrata mein theek hoti hain.
krishnabihari, abudhabi

krishna
December 25, 2009 at 12:26 AM

geetasriji,
tareef hi to maar dalti hai.neetshye ne jo likha ki iswar mar gaya yah shayad tareef ki hi ati rahi hogi.tareef karo to theek aur na karo tab skiya dhara vyarth.
krishnabihari