प्रवीण शुक्ल जी की प्रतिक्रिया

Posted By Geetashree On 2:13 AM

मेरे ताजा पोस्ट नख दंत विहीन नायिका का स्वागत... को लेकर प्रवीण जी की प्रतिक्रिया यहाँ पोस्ट कर रही हूं..। मैं इसका जवाब देना चाहती हूं। जिस मनुस्मृति का हवाला इन्होंने दिया है, उसी के चुनिंदा श्लोक यहां सामने रख कर कुछ सवाल उठाना चाहती हूं..मेरे पोस्ट पर हमेशा मिली जुली प्रतिक्रियाएं आती रही हैं, जिनका मैं दिल से स्वागत, सम्मान करती हूं, कई बार जरुरी लगा कि उनका उत्तर दिया जाना चाहिए। किसी कारणवश ठिठक जाना पड़ा..प्रवीण जी के विरोध के खुले दिल से स्वागत करते हुए जवाब हाजिर करुंगी इस पोस्ट के बाद.. गीताश्री

गीता जी, विरोध दर्ज करा रहा हूँ । मै आपकी हर पोस्ट पढता हूँ और नयी पोस्ट का इन्तजार रहता है ,,विचार नहीं मिलते और आपकी बातों से सहमत नहीं होता सो तिप्पणी नहीं करता। विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी को है , पर विचार वैचारिकता की श्रेणी में ही हो तो ज्यादा ही अच्छे लगते है , परन्तु जब किसी के किसी निजी विचार से किसी की व्यक्तिगत ,संस्कृति ,सभ्यता या परम्पराओं का अपमान हो , तो वे निजी विचार भारी विवाद का कारण बनते है। आप के इस लेख से मै आहत हुआ । स्त्री पुरुष समंधो के बारे में जो आप लिखती है मुझे नहीं पता उसका उद्देश्य क्या है (प्रसिद्धि या फिर कोई पूर्वाग्रह या झुंझलाहट ) परन्तु मैं उसे आप की निजी अभिव्यक्ति मानता हूँ। आज जो आप ने भगवान् मनु को लेकर लिखा है ( मुझे नहीं पता की आप ने मनु-स्मृति पढ़ी है या नहीं ) उसमे मै अपना विरोध दर्ज कराते हुए मनु-स्मृति के दो चार श्लोको का अर्थ यहां पर रखूंगा।

स्त्रियों के बारे में भगवान् मनु क्या सोच रखते थे यह एक श्लोक से ही सिद्ध हो जाता है--यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ,रमन्ते तत्र देवताः। यत्रेतः तू न पूज्यन्ते सर्वा त्रता पद क्रिया (मनु स्मरति अध्याय २ श्लोक ५६ ) अर्थात : जहा नारियों का सम्मान होता है वहा देवता (दिव्य गुण ) निवास करते है, और जहां इनका सम्मान नहीं होता है , वहां उनकी सब क्रियायें निष्फल होती है। समाज में स्त्रियों की दशा बहुत उच्च थीं, उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। आर्थिक मामलो की सलाहकार और समाज-व्यवस्था को निर्धारित करने में भी स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान था। उन्हें भाग्योदया कहा जाता था,,प्रजनार्थ महाभागः पूजार्हा ग्रहदिप्तया। स्त्रियः श्रियस्च गेहेषु न विशेषो स अस्ति कश्चन (मनु स्मरति अध्याय १ श्लोक २६अर्थात :संतान उत्पत्ति के लिए घर का भाग्य उदय करने वाली आदर सम्मान के योग्य है स्त्रिया , शोभा लक्ष्मी और स्त्री में कोई अंतर नहीं ये घर की प्रत्यक्ष शोभा है।

ये है हमारी संस्कृति। आज कल जो कथित प्रगतिवादी स्त्रियां और कुछ पुरुष भी भारतीय समाज को पुरुष पोषक समाज और धर्म को पुरुष पोषक धर्म बताते है, कहते है पुत्र और पुत्री में समानता नहीं है और इस अव्यवस्था के लिए भगवान् मनु को दोषी ठहराते है वहीं भगवान् मनु मनु-स्मृति में कहते है ...
पुत्रेण दुहिता समाः अर्थात : पुत्री पुत्र के समान ही होती है। इतना ही नहीं भगवान् मनु तो पिता की संपत्ति में पुत्रियों के समान अधिकार की भी बात करते है। वो कहते है...अविशेषेण पुत्राणाम दायो भवति धर्मतः। मिथुनानां विसर्गादौ मनु स्वयम्भुवो Sब्रवीत (मनु-स्मृति, अध्याय ३ श्लोक १४ ) ।
Mithilesh dubey
September 21, 2009 at 4:14 AM

हैरान हूँ आपके द्वारा लिखे गये लेखो से। न पता कि आप क्या बताना चाहती है और क्या सिद्ध करना चाहती हैं। मै आपके ब्लोग के हर पोस्ट को देखता हूँ और जितनी बार देखता हूँ उतनी ही बार सोचने को मजबुर हो जाता हूँ। हर बार पुर्वाग्रह से ग्रसित रचना, हर बार आप एक ही पक्ष को रखंती हैं, सवाल पुछे जाने पर कोई जवाब भी नहीं मिलता।

खैर छोड़िये इन बातो को अब मुद्दे पर आता हूँ। मुझे नहीं पता कि प्रवीण जी के टिप्पणी को आपने क्या सोच कर प्रकाशित किया और क्यों प्रकाशित किया। इसमे आपने अपनी बात तो रखी ही नही, सवाल आपसे पुछा गया या ये टिप्पणी आपको पसन्द नहीं आयी तो कम से कम आपका जवाब भी होना ही चाहिए। मुझे नहीं लगता कि प्रवीण जी ने कुछ गलत कहा है, और कहा क्या उन्होनें साफ तौर पर वही कहा जो "मनुस्मृति" में कहा गया, और आपका का विरोध किसलिए है और क्या है ये तो कहीं दिखा ही नही। आपने आपने लेख "नख दंत विहीन नायिका का स्वागत है." में कहा है कि पुरुष औरतो से अपनी रक्षा करवाते है, मुझे तो नहीं लगता कि इसमे कुछ स्चाई है, क्या बस औरते ही पुरुषो की रक्षा करती है पुरुष नहीं,। क्या भगवान राम ने सिता माता को बचाने के लिए रावण से युद्ध नहीं किया था। आपने कहा है कि काम निकलते ही इन्हे (औरत को) हटा दिया जाता है, पता नहीं आप कौन से काम की बात कर रहीं हैं। क्या पुरष और स्त्री के बिच जो कुछ भी होता है वह औरतो कि जरुरत नही होती। हाँ अगर आपके नजरिये से देखा जाये तो शायद ऐसा ही है।

आपने कहा है हि (नख दंत विहीन नायिका का स्वागत है.मे) पश्चिम में औरते आजाद है, मतलब साफ है आप उनके जैसे आजादी चाहति हैं। कौन सी आजादी खुले पन की, नंग्नता की, खुलेआम जानवरो की तरह सेक्स करने की। आप जैसी प्रगतिवादी महिलाएं न पता कौन सी आजादी चाहति हैं। पश्चिम का देश इतना आजाद है ,इतना खुला है इसलिए वहाँ स्कुल में ही पढने वाली लडकियां शादी से पहले माँ बन जाती हैं,और ये बडे़ संख्या में होता है, ये मेरा नहीं सर्वेक्षण का कहना है। इतना सब होने के बावजूद हमारे यहां की औरतो को पश्चिम देशो जैसी आजादी चाहिए।

प्रवीन जी से शतप्रतिशत सहमत हूँ, उन्होनें आपके विचारो को न सिर्फ गलत ठहराया है, बल्कि उसे साक्ष्य भी करके दिखाया।

सुशीला पुरी
September 21, 2009 at 8:48 PM

प्रवीण शुक्ल जी को बहुत धन्यवाद जो उन्होंने अपनी बिरादरी की आखें खोलने का गुरुतर भार उठाया है , पर मैं उनके इस बात से सहमत नही हूँ की वे गीताश्री को कह रहे हैं की ''आप स्त्री विमर्श पर जो भी लिखती हैं वो पूर्वग्रह ,झुंझलाहट या कुंठा है '' बिलकुल गलत बात है ये ....आज के समाज की सही तस्वीर दिखातीं हैं गीताश्री.

सुशीला पुरी
September 21, 2009 at 8:49 PM

प्रवीण शुक्ल जी को बहुत धन्यवाद जो उन्होंने अपनी बिरादरी की आखें खोलने का गुरुतर भार उठाया है , पर मैं उनके इस बात से सहमत नही हूँ की वे गीताश्री को कह रहे हैं की ''आप स्त्री विमर्श पर जो भी लिखती हैं वो पूर्वग्रह ,झुंझलाहट या कुंठा है '' बिलकुल गलत बात है ये ....आज के समाज की सही तस्वीर दिखातीं हैं गीताश्री.

विवेक सिंह
September 21, 2009 at 10:40 PM

ऐसा है क्या !

सुशीला पुरी
September 22, 2009 at 3:39 AM

अब ये भाई मिथलेश दूबे जी को क्या हो गया !!!!!!!!???????

विनीत कुमार
September 22, 2009 at 7:11 PM

प्रवीणजी
स्त्री-मुक्ति को लेकर गीताश्री जो भी कह रही हैं,उसे आप उनकी व्यक्तिगत झुंझलाहट और विचार समझ रहे हैं,ये अकेला वाक्य आपके बौद्धिक दायरे को साबित करने के लिए काफी है। गीताश्री क्या देश और दुनिया की कोई भी स्त्री,स्त्री-मुक्ति के स्वर को मजबूत करनेवाला कोई भी पुरुष वही सोचगा,कहेगा जो कि गीताश्री कह रही हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि स्त्रियों को लेकर होनेवाली बहसों को आप बिल्कुल भी नहीं समझ पा रहे हैं। दूसरा कि मनु(आपके हिसाब से भगवान मनु)के श्लोकों का जो हवाला दे रहे हैं,क्या एक स्त्री की दशा को देखने-समझने विश्लेषित करने औऱ उससे बेहतर होने की सारी विचारणा मनुस्मृति से ही ली जाएगी। क्या इसके आगे मुक्ति की कोई भी खिड़की नहीं खुलती? आप इस मसले पर थोड़ी कोशिश तो कीजिए,आपको अंदाजा लग जाएगा कि मनुस्मृति का क्या स्वर है,वो स्त्रियों को शामिल करते हुए भी किस तरह का समाज चाहते हैं?
यत्र नारी पूज्यन्ते का हवाला दिया,व्यक्तिगत स्तर पर मुझे इस बात का रत्तीभर भी भरोसा नहीं है,इसके कई कारण हैं,इसके विस्तार में न भी जाउं तो सिर्फ दो बातें कहना चाहूंगा। एक तो ये हम स्त्री को देवी के रुप में देखने औऱ साबित करने में इतने उतावले नजर क्यों आते हैं? पुरुष इच्छा पर स्त्री को देवी या तो फिर दासी ये दो किस्म का ही दर्जा क्यों देते हैं? आप एक स्त्री पर घर के बरामदे में हुक्म जमाते हैं,रसोई में उसके हाथ जलने की परवाह किए 365 दिन करारी रोटी की डिमांड करते हैं,दिनभर की थकी-हारी होने पर भी रात गहराते ही उसके शरीर से अपने भीतर की कामेच्छा को शांत करते हैं। जब आप एक स्त्री के साथ ये सब कुछ करते हैं तो क्या आप उस स्त्री को देवी के तौर पर मानकर ऐसा कर रहे होते हैं? क्या आपका धार्मिक कठमुल्लापन इस बात की इजाजत देता है कि आप स्त्री को देवी मानते हुए उसके साथ संभोग करें। अच्छा,आप किसी दासी के साथ शारीरिक संबंध बनाने,चकरी की तरह अपने आगे-पीछे घुमाने में यकीन रखते हैं। मुझे नहीं लगता कि इन दोनों स्थितियों में ऐसा करना चाहेंगे। मेरा कहना सिर्फ इतना भर है कि जब आफ अपने जीवन में देवी और दासी से हटकर,हांड-मांस की स्त्री के साथ संभोग करने से लेकर संवेदना,भावुकता,सामाजिक लोकाचार औऱ भी दुनियाभर की चीजों के स्तर पर जुड़ते हैं तो उस स्त्री को लेकर बात करने का स्पेस आफ क्यों खत्म करना चाहते हैं। नागरिक समाज में एक स्त्री नागरिक की हैसियत से जीती है औऱ उसको अधिकार है कि वो अपने उपर होनेवाले अत्याचारों,शोषण,भेदभाव और उत्पीड़न से जुड़ी बातों को हमारे सामने रखे। यहां ये साफ कर दूं कि हर स्त्री के साथ पुरुषों द्वारा शोषण और भेदभाव का स्तर वही नहीं होता जिसे आप अपका महान ग्रंथ या तो समझ नहीं पाता या फिर जो अखबारी बयान के अन्तर्गत नहीं आता। इसमें कई बारीकियां हैं,कई महीन विभाजन है।
आप हमें मनु की इकॉनमी समझा रहे हैं। मन की तो बात छोड़ दीजिए और पुरुषों के कमाए धन को स्त्री की झोली में लाकर डाल देने की बात भी मत कीजिए। आप हमें सिर्फ इतना भर बता दीजिए कि इतना सबकुछ होने के वाबजूद भी क्या स्त्री अपनी इच्छा से,अपनी सुविधा और जरुरत के हिसाब से अपनी ही हड्डी बजाकर कमाए गए पैसों को खर्च करने के लिए आजाद है। सच्चाई तो यही है कि पितृसत्तात्मक समाज पुरुषों द्वारा अर्जित पैसों से स्त्री को साज-सिंगार की थोड़ी-बहुत छूट भले ही दे दे,गृहस्थी चलाने की छूट भले ही दे दे(ये दोनों बातें अंततः उसके हित में ही जाते हैं) लेकिन इसके बीच से अपनी दशा सुधारने का किसी भी रुप में समर्थन नहीं करता। शायद आपको इस बात का अंदाजा नहीं कि जब अपने यहां स्त्री-मुक्ति का एक सिरा आर्थिक निर्भरता के तौर पर खोजा जाने लगा तो कुछ मामलों पर तो ये फार्मूला फिट हो गया लेकिन बहुत जल्दी औऱ ज्यादातर मामलों में स्त्रियों पर दोहरी जिम्मेदारी,लांछन और अर्जित धन पर उसके बेदखल होते रहने के मामले बने। कभी आप इसकी वजहों पर गौर करेंगे तो आपको अंदाजा लग जाएगा कि आप ही की तरह के लोग स्त्री-मुक्ति के सवाल को देवी जैसी भावुकतावादी अवधारणा की ओर धकेलने के हिमायती रहे हैं और व्यवहार के स्तर पर दासी से भी बदतर व्यवहार करने के अभ्यस्त रहे हैं।
कहना सिर्फ इतना है कि एक स्त्री को चाहे देवी के आसन पर बिठाया जाए,चाहे जलती हुयी सिगरेट उसके शरीर में घुसेड दिए जाएं,इसमें बहुत अंतर नहीं है,दोनों ही स्त्री को कमजोर करने की साजिश और हरकतें हैं इसलिए आप जैसे लोगों से इतनी भर अपील है कि स्त्री-मुक्ति औऱ बेहतरगी के लिए आरती उतारने के बजाए मानव अधिकारों औऱ संभव हो संविधान के पन्ने पलटने शुरु कर दें क्योंकि बिना इसके भय के आप सोशल इंजीनियरिंग के तहत,बहस और विमर्शों के हवाले से स्त्री-मुक्ति की बात समझने से रहें।
उसके बाद आप गीताश्री से बहस करें तब आपकी बातों को मानने,न मानने की गुंजाइश पैदा होगी।

नवीन कुमार 'रणवीर'
September 22, 2009 at 10:49 PM

ये मनुस्मृति का ठेका क्या सारे दूबे जी, शुक्ला जी नें ही ले लिया है? भाई लोगों आप लोग आज क्या आनें वाले 100 सालों में भी नहीं मानोगे कि क्या गलत हुआ है इन हज़ारों सालों में। अपनें शरीर के एक हाथ को बांध कर हज़ार साल नहीं केवल 2 साल तक रखों और फिर अपनें शरीर के अन्य भागों से उसकी कार्यक्षमता और काबलियत पर उंगली उठाओ? फिर सवाल करों की क्यों बांधा ये हाथ? किसनें बांधा? ये भी तो मेरे शरीर का हिस्सा था ? क्यों इसे अलग रखा? आपकी ही संस्कृति है जिसकी आप दुहाई दे रहे है क्या उसके इस वाक्य पर कहीं कोई "कंडीशन्स ऐप्लाई" लिखा है कि ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी?

UNBEATABLE
September 23, 2009 at 4:49 AM

Shukla G aur Dubey G ke vicharon ki prashansa karnee hogi jis purjor tareeke se unhone apna mat rakha .... Lekin hume samjhana aur sweekaar karnaa hoga ki sankhya mei aaj bhi yahi mansikta adheek hai, Lekin Yeh bhi sahi hai ki Samay ab Badlaav ka hai ... aur Neeshchit hi naaree ko uskaa ucheet sthaan Milega .. Samay jaroor lagega .... MANUSMRITI ke Shloko ke bhavarth ko lekar vivad ho saktaa hai Lekin jahaan tak Stree ke Darje aur dashaa par kisi ko vivad nahi hona chaahiye ... aaaj bhi jo stree kuch had tak swantra deekhaayee deti hai unkee sankhya ungaliyo par geeni ja saktee hai aur wo bhi ek chalawa maatr mei hi jee rahi hai .... Lekin mei aashanwit hoon Geetashree .... SAMAJ mei KRANTEE AAYEGI

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी)
September 24, 2009 at 12:58 AM

नमस्कार गीता जी ,, सबसे पहले तो माफ़ी अगर मेरे विरोध से आप को किसी भी तरह का भावनात्मक आघात पहुंचा है तो,, मेरा ये बिलकुल उद्देश्य नहीं था की मै किसी भी तरह से स्त्री विकाश या उत्थान का विरोध करूँ ,,या किसी भी तरह से आप को व्यक्तिक आघात दूँ ,,, हमारे और आप के लक्ष्य में विरोध नहीं है लक्ष्य प्राप्ति की प्रक्रिया अलग अलग है ( आप पश्चिम अनुकरण में स्त्रियों की दशा सुधार का मन्त्र देखती है और मै पश्चिम का अनुकरण आवश्यक नहीं मानता हूँ ,,, हाँ समाज में स्त्रियों की दशा को लेकर मै वास्तव में चिंतित हूँ
,, परन्तु समाज में स्त्रियों की इस दशा के लिए पुरुष ही दोषी है या फिर उनकी इस दशा के लिए उन्होंने एक गहरी साजिश रची ,, और हमारे गर्न्थो और परम्पराओं में स्त्रियों की जो जगह निर्धारित की गयी है,, वह स्त्री शोषण को ध्यान में रख कर निर्धारित की गयी ,, ये हूँ इससे सहमत नही हूँ ,,, स्त्री विकाश का पछधर हूँ और स्त्रियों की दशा में सुधार होना चाहिए ,,,,परन्तु क्या क्या ये उत्थान केवल पश्चिम के अन्धानुकर्ण से और भारतीय सभ्यता को नकारने से ही आ सकता है ,,,यह पर्श्न म के लिए छोड़ रहा हूँ ,,,,
सुशीला जी मेरा कोई भी उद्देश्य गीता जी पर व्यक्तिक आघात करने का नहीं था भाषा में थोरा rosh था ,, जो नहीं होना चाहिए आप ने मेरे द्बारा कहे गए अस्यिमित वाक्यों पर मेरा ध्यान केन्द्रित कर बहुत अच्छा काम किया जिसके लिए मै आप का आभारी हूँ,,,,
नवीन जी किसी भी चीज को नकारने से पहले हमारे पास उसे नकारने की पर्याप्त योग्यता और उस की उचित जानकारी होनी चाहिए ,,, ( यहाँ पर मेरा उद्देश्य ये नहीं है की आप को विषय पर जान कारी नहीं है परंतु आप ने राम चरित मानष की जिस चौपाई को उठाया है (लिखा है कि ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी?) उसमे आप को ताड़ना वाक्य के अध्यन के लिए ताड़ना शब्द के भाषा शास्त्र का अध्यन करना पड़ेगा अगर मुझे समय मिला तो म आप को उसकी मेल कर दूंगा और इस चौपाई की विस्तर्त व्याख्या ,,,,
विनीत जी मुझे आप के पत्र में कुछ ऐशा नहीं लगा जिसका मै जबाब यहाँ पर लिखूं ,,,,
( सिवाय भाषाई रोष और स्त्री पुर्ष संबंधो के जिनको ले कर जबाब देने में मै अपने आप को अयोग्य समझता हूँ )मुझे मेरे बौधिक दायरे की औकात याद दिलाने ,,, और मनु स्म्रति के पावन श्लोक को स्त्री पुरुष संबंधो में रख कर मेरे कठ मुल्ले पन पर आघात कर के आप ने अपनी ज्ञान दक्षता का बहुत ही सुन्दर उदाहरण पर्स्तुत किया है,,, वैसे पोस्ट के अंतिम चरणों में आप ने बहुत ही मार्मिक विषय उठाये थे मगर मूल विषय के अभाव में वे सारे अप्रसांगिक हो गए ,,, फिर भी आप का बहुत बहुत साधुबाद और आप की तीव्र अनुग्रह द्र्स्टी के लिए आभार