भूल जाओ पेट की भूख

Posted By Geetashree On 12:57 AM

मेरे आग्रह पर वरिष्ठ पत्रकार, मशहूर ब्लागर, प्रतिभा कटियार जी ने अपनी प्रतिक्रिया आलेखनुमा भेजा है। अफगानिस्तान का नो सेक्स, नो फूड कानून ही एसा है जिससे कोई भी स्त्री बौखला जाएगी, चाहे वह किसी भी देश की हो। मैं यहां प्रतिभा की इसी सार्थक बौखलाहट को दुनिया के सामने रख रही हूं..
बजबजाती हुई हकीकत
सिमोन का यह मानना कि किसी भी रिश्ते के दमनकारी तत्वों के विनाश की कोशिश करनी चाहिए से मैं भी पूरी तरह सहमत हूं लेकिन अगर यह विनाशकारी तत्व शरीर ही हो तब? तब क्या किया जाना चाहिए? अफगानिस्तान में कानून बन रहा है कि पति की देह की भूख नहीं मिटाने पर अपनी पेट की भूख भी भूल जाओ...क्या सचमुच बहुत आश्चर्यचकित करता है? कम से कम मुझे तो नहीं करता. कानून की शक्ल में भले ही न हों लेकिन हमारे यहां भी हालात इससे कोई बहुत बेहतर नहीं हैं. बल्कि खाना-पीना बंद कर देना भर अगर सजा हो तो महिलाएं चैन की सांस ही लेंगी. हिंदुस्तानी औरतों को तो पेट की भूख से जूझने की वैसे भी खूब आदत है. कभी व्रत-उपवासों के बहाने तो कभी दूसरे कारणों से. (मेरी गुज़ारिश है पढऩे वालों से कि इसे नयी उभरती एलीट लाइफ के संदंर्भों में न देखा जाए.) किसी भी वजह से बीमारी के चलते, अनिच्छा के चलते, गर्भावस्था के दौरान या यूं ही अगर स्त्री अपनी देह का भोजन मुहैय्या कराने में आनाकानी करती है तो मिलने वाली सजाओं की क्रूरताएं नया इतिहास ही रचती नजर आती हैं. पति बिलबिलाते हैं कि उनकी पत्नी उन्हें प्यार नहीं करती. (प्यार भी हमारे यहां सेवा और सेक्स से जोड़कर ही देखा जाता है). मानो शादी के पेड़ पर प्रेम का फल लगना जरूरी हो. जब वह स्वत: नहीं मिलता तो समाज पति को हौसला देता है कि हासिल करो. नहीं कर पाने पर नामर्द होने की तोहमतें तक लग जाती हैं. बहुत सारे ढंके-छिपे आदर्श परिवारों की हकीकत बजबजाती हुई है. आंसुओं का सैलाब और कुंठाओं का ढेर है. आज के समय में तो यह हर घर का मसला बन चुका है. खासकर तब, जब महिलाओं ने अपनी इच्छाओं को टटोलना शुरू किया है. किसी सोफे या टीवी सेट की तरह अपनी देह को इस्तेमाल करने से मना करना शुरू किया है. पुरुषों का अहं चोटिल होने लगा है. अंदर तक तिलमिलाहट है. तथाकथित पढ़े-लिखों की मुश्किल यह है कि वे इन मुद्दों पर सीधे-सीधे रिएक्ट भी नहीं कर सकते. परिवार टूटने का, रिश्तों के विघटन का यह भी कारण है. इस मुद्दे की प्रासंगिकता हर घर, हर रिश्ते में है. हमारे यहां भले ही ऐसा कोई कानून नहीं है लेकिन हर पति यह बात अच्छे से जानता और मानता है कि पत्नी के शरीर पर उसका अधिकार है. उस अधिकार के आड़े आने वाली पत्नी पर पहली रात से ही चरित्रहीन होने का शक जाता है, जो वक्त के साथ गहराता जाता है. चरित्र यानी क्या? यह सवाल बड़े रूप में सामने खड़ा है. हर किसी के आत्ममंथन का समय है. गीता जी, उम्मीद है अफगानिस्तान के बहाने आपने जो चर्चा यहां शुरू की है वहीं से बदलाव के कुछ अंकुर फूटें. बात निकली है तो शायद कुछ दूर तलकजाए...और सूरत-ए-हाल कुछ बदले.


varsha
August 27, 2009 at 2:12 AM

deh ke paar bhi ek duniya hai ...umeed karen ki use dekhne ki bhi koshish hogi.

matukjuli
August 27, 2009 at 3:59 AM

lekh jyada damdar tha ya parichay- "ko bad chot kahat apradhu"

sushant jha
August 27, 2009 at 6:40 AM

एकदम सच्ची बात है...यूं मुझे कई बार लगता है कि ये जो मध्यमवर्ग की औरते हैं जो उनकी त्रासदी कहीं और ज्यादा है। उच्चवर्ग और बिल्कुल निम्मवर्गम में एक बिल्कुल दूसरे ढंग की आजादी है...कई बार मजदूरों की औरते जो खुद भी अपने पति के बराबर कमाती है-वे अपने देह पर बेहतर अधिकार रखती हैं। वे संबंधों को बनाने में भी और उसे तोड़ने में भी कई बार मध्यमवर्गीय महिलाओँ से बेहतर होती हैं लेकिन मध्यमवर्ग में आते ही फिर सारी यातनाएं शुरु हो जाती है। महिलाएं यहां जो चीज सबसे पहले खोती है वो है अपने यौन जीवन पर अपना अधिकार। विवाह नामकी संस्था महिलाओं के यौन बलिदान का सबसे अनोखा उदाहरण है जिसमें उसे सबकुछ खोना ही खोना है-पाना शायद कुछ नहीं।
सच है कि ये सिर्फ अफगानिस्तान का सच नहीं, बल्कि हर देश का सच है। विमर्श इस बात पर होनी चाहिए कि क्या विवाह नामकी संस्था अपने मौजूदा स्वरुप में आवश्यक रह गई है?

काजल कुमार Kajal Kumar
August 27, 2009 at 10:33 AM

अफ़गानी समाज को कबीलाई जीवनशैली से जब तक अलग होने का मौक़ा नहीं मिलेगा, ये चलेगा ही.

सतीश पंचम
August 27, 2009 at 10:54 AM

गीताश्री जी, अगस्त 2009 के अंक में आपकी लिखी कहानी 'प्रार्थना के बाहर' बहुत अच्छी लगी।

सुशीला पुरी
August 30, 2009 at 9:48 AM

प्रतिभा कटियार सच ही लिख रहीं हैं की जब तक तथाकथित पढ़े लिखे लोग इस पर कुछ कहने से बचते रहेंगे तबतक सूरत बदलने वाली नही ......इस बजबजाती सच्चाई को अफगान ही नही हिंदुस्तान भी
समेटे है

pragya
September 18, 2009 at 8:52 AM

pratibha ji ne sahi mudde par charcha chhedi hai per sach toh ye hai kitana bhi yeh sach bajbajaye .. kitane bhi kaanoon banen jab tak aurat khud ko majboot swayam hi nahin karegi tab tak kuchh nahin hone wala hai